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रपट – “युवा कवि शम्भु यादव का एकल कविता-पाठ”

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“मंडेला”

यह तेरह फ़रवरी दो हज़ार बारह की ख़बर है
दक्षिण अफ्रीका में बैंक नोटों पर अब मंडेला दिखेंगे
आगे मैं कहता हूँ–
जैसे हमारे यहाँ गाँधी दिखते हैं

अब दक्षिण अफ्रीका में भी
कुछ इस तरह से होगा

पाँच सौ वाला मंडेला देना भाई
सौ का मंडेला तोड़ दे

जिस घर में जितने ज़्यादा मंडेला
उसकी उतनी बड़ी औक़ात

यह मंडेला फटेला है यार, दूसरा देना

चेप्पी लगा इस मंडेला पर
तभी चलेगा !

पूँजी का तंत्र एक जन-नायक को किस तरह अपने हक़ में इस्तेमाल कर सकता है और उसे हास्यास्पद और मूल्यहीन भी बना सकता है, इसका एक बेजोड़ उदाहरण है शम्भु यादव की यह कविता !

शम्भु यादव अपनी कविताओं का पाठ, हिन्दी की ज़मीनी रचनाशीलता को अनौपचारिक मंच देने के उद्देश्य से गठित साहित्यिक संस्था ‘हुत’ की ओर से आयोजित एकल कविता-पाठ कार्यक्रम के दौरान प्रस्तुत कर रहे थे। ‘हुत’ की तरफ़ से यह आयोजन रविवार, 17 मई, 2015 को शाम 6.00 बजे से एनडीएमसी पार्क, अबुल फ़ज़ल रोड, नियर तिलक ब्रिज रेल्वे स्टेशन, मंडी हाउस, नई दिल्ली में किया गया था।
अपने कविता-पाठ में शम्भु यादव ने-
‘दाँव’, ‘हिस्सा’, ‘कविता मेें जादू और सजग मैं’, ‘कई दिनों बाद’, ‘कविता की मौत’, ‘नाकामयाब’, ‘सूरज सुबह में’, ‘सूरज शाम में’, ‘मेरा विलोम’, ‘उसके चिकने बालों में एक बड़ा-सा फूल फँसा है’, ‘विशिष्ट पहचान-पत्र’, ‘धूप का पत्ता’, ‘मेरी तुम’, ‘केन किनारे’, ‘साफ़गोई की आशा में’, ‘कपड़े की पुरानी मिल’, ‘सबसे बडा डर’ आदि कई कविताएँ प्रस्तुत कीं।

बातचीत के दौरान युवा आलोचक आशीष मिश्र ने कहा कि शम्भु यादव की कविताएँ शहरी छाड़न की कविताएँ हैं। शहर का वह भयानक तलछट जो पिछले 20-25 वर्षों में जमा हुआ है। पूँजीवाद अपने चुस्त-चिकने दायरे में इसे ढक तो सकता नहीं, फलतः लाख चमक-दमक के बावजूद हर जगह से खुला हुआ है। मीडिया द्वारा निर्मित मनोवैज्ञानिक अशिक्षा और आत्मबद्धता के बावजूद संवेदनशील आदमी को अपराधबोध से भरता ही है। पर शम्भु यादव की कविताएँ न तो इससे भागकर स्मृतियों में बसे लोक में शरण लेनेवाली कविताएँ हैं और न ही मानसिक शान्ति के लिए रामदेव और आशाराम की शरण में । वे इसे विश्लेषित करते हैं, इसके वर्गीय अन्तर्विरोध को समझते हैं, कविता के स्तर पर लड़ने के लिए सन्नद्ध दिखते हैं।

शम्भु यादव की कविताएँ पढ़ते हुए मिलेगा कि वे एक नए तरह का वर्गीयबोध रच रहे हैं । यहाँ सर्वहारा शास्त्रीय मार्क्सवाद से अलग नवसर्वहारा है जिसमें मज़दूर, बेरोज़गार, किसान, स्त्री, प्रकृति और प्राइवेट सेक्टर में काम करनेवाला टाई-कोट वाला बहुत बड़ा वर्ग भी शामिल है। एक और बात, शायद मैं सही कह रहा हूँ कि शम्भु यादव के साथ पहली बार हिन्दी कविता हिरियाणा की पठारी ज़मीन से जुड़ती है । यह ख़ास बात है कि किसी कवि के साथ कोई भूगोल कविता से जुड़े । और जब ऐसा होता है तो कुछ दिक़्क़तें भी खड़ी होती हैं, मसलन भाषा और सम्प्रेषण की समस्या । पर शम्भु यादव के यहाँ यह समस्या उस तरह से नहीं है यानी शब्दों को समझने के लिए कोश खोलने की समस्या नहीं है । अगर आपको पता है, सामान्य-सी बात पता है कि किसी भी पठारी भाषा में ट, ठ, ड, ड़ जैसे खड़खड़ाहट वाले थोड़े कठोर वर्णों की प्रमुखता होती है तो हिन्दी से उसे जोड़ते-अलगाते एक नई ज़मीन से भी जुड़ेंगे।

शम्भु यादव में एक विरल ख़ासियत है–अनुभव पर विश्वास और उसी पर कविता करने का आग्रह। अगर वे हिन्दी की परम्परा से परिचित हों, कुछ कविताएँ और आलोचना पढ़ें तो वे अपने को भाषा में और ठीक से सम्भव कर पाएँगे।

आशीष मिश्र की बातों पर असहमति व्यक्त करते हुए हिन्दी के महत्त्वपूर्ण आलोचक और कथाकार संजीव कुमार ने कहा कि बहुत अच्छा है कि शम्भु कम पढ़ते हैं ! हमारे समय के तमाम कवि जिस तरह से कविताओं से कविताएँ लिख रहे हैं, उसे देखते हुए तो यह एक प्लस प्वाइंट है। शम्भु अनुभव-विश्वासी हैं, अच्छा है, उसी के प्रकाश में ज़मीन तलाशेंगे। उन्होंने कहा कि पूँजी द्वारा पैदा विस्थापन को शम्भु बहुत गहराई से पकड़ते हैं। उनकी लाल चिमनी वाली कविता इन्हीं सन्दर्भों से जुड़ती है। इस तरह देखा जाए तो शम्भु यादव कविता में चालू मुहावरा के नहीं, कविता में अपने मुहावरा के कवि हैं ।

हिन्दी के सुपरिचित कवि और आलोचक बली सिंह ने शम्भु यादव की कई कविताओं को कोट करते हुए पठनीयता की समस्या को ख़ारिज करते उनकी कविताओं की तारीफ़ की। उन्होंने कहा कि शम्भु ने अपनी कविताओं के ज़रिए उस अपरिचित संसार को रचा है जो अनदेखा और अछूता रहा है।

सुपरिचित कवि-सम्पादक रवीन्द्र के. दास ने विचार व्यक्त किया कि इनकी कविताओं में संवेदना सधी हुई है। नई ज़मीन रचने की कोशिश सराहनीय है । वहीं सुपरिचित कवि उपेन्द्र चौहान ने शम्भु यादव की कविताओं में ताज़गी को रेखांकित किया तो युवा कवि पंकज चौधरी ने कविताओं में जीवन से टकराते यथार्थ को उल्लेखनीय बताया ।

कार्यक्रम में मजीद अहमद, मसऊद अख़्तर, अतुल सिंह, रवीन्द्र प्रताप सिंह, संदीप यादव, सुनील कुमार मिश्र, अनुपम सिंह, सुशील कुमार, विद्या सागर, शैलेन्द्र कुमार सिंह, कुमार वीरेन्द्र आदि रचनाकारों ने भी अपने विचार व्यक्त किए ।

प्रस्तुति—
इरेन्द्र बबुअवा

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