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समीक्षा – हमारी कहानी कहने वाला कवि : हरीश चन्द्र पाण्डे


harish chandra pandey

‘लोगों की चेतना उनके अस्तित्व को निर्धारित नहीं करती, बल्कि समाज में उनका अस्तित्व ही उनकी चेतना को निर्धारित करता है.’ मार्क्स  के इस बहु’उद्धृत कथन को कवि निराला के उस कथन से मिला कर देखें जिसमें उन्होंने कहा है मनुष्य की तरह कविता की भी मुक्ति होती है;  तो दोनों कथनों की संगति से यह तथ्य स्पष्टतया उभर कर सामने आता है कि मनुष्य की भांति कविता की चेतना उसके सामाजिक अस्तित्व से जुड़ी होती है. कविता का अस्तित्व अर्थात् कविता की सत्ता का भाव मुक्ति की भावना से प्रेरित हो कर ही मनुष्यत्व प्राप्त कर सकता है. कविता की मनुष्योन्मुखता ही उसे मुक्ति प्राप्त करने का सामर्थ्य देती है और इस मनुष्यता की तलाश उसे प्रांतर में नहीं मनुष्यों से भरे-पूरे समाज में करनी पड़ती है जहां जीवन-स्पंदन बहुत लघु रूपों में विद्यमान रहते हैं और इसी लघुता की, नगण्यता की तलाश में निकली हुई कविता जीवन की विराट महत्ता को परिभाषित करती हुई, मानवीय गरिमा को स्थापित करती हुई काल के अनवरत प्रवाह की तरह जीवन धारा में बहती है. उसके बहाव में उसका साथ वही दे पाते हैं जो अपनी बोझिल गुरुता को त्याग, हल्के हो कर बहते हैं. जिनमें चींटियों सी लगन, धैर्य, जीवटता, साहस और अनुशासन होता है. हरीश चन्द्र पाण्डे की कविताएं ‘लम्बी कूच पर निकली’ इन्हीं चींटियों की तरह जीवन के अत्यंत लघु-प्रसंगों में साकार होती हैं :

‘मीठा – सा कुछ हो कहीं

चींटियों को जाना ही है वहां

रस्ते में खाली हाथ लौटती चींटियों को देख लौट नहीं आना है

न होने को अपनी आँखों से देखना है

और होने को तो चखना ही है

-चींटियाँ

यहां ‘मीठा – सा कुछ’ की तलाश जीवन में सुस्वादु व उमंग की तलाश है. वीरेन डंगवाल की कविताओं में पापड़, चटनी जैसी मामूली चीजों से जीवन के उल्लास को व्यक्त किया गया है. मामूलीपन के इसी महत्त्व को समझते हुए ही मंगलेश डबराल ने वीरेन डंगवाल की कविता को ‘नगण्यता का गुणगान’ करने वाली कविता कहा है और हरीश जी की कविता के इस वैशिष्ट्य को प्रणय कृष्ण ने भी अनयत्र लक्षित किया है. ठीक ऐसे ही हरीश चन्द्र पाण्डे की कविता भी ‘थर्मस’ से लेकर ‘प्रजातंत्र’ तक को अपने कथ्य की परिधि में समेटती है. जहां कवि जिन्दगी के मामूल में  भी ताजेपन की गंध अपनी कविता से सूंघ लेता है और भांप लेता है लोकतंत्र के नाम पर इस देश में चलने वाले खेल को जो अपनी भ्रामकता से टूटने के लिए अभिशप्त है :

‘बार-बार कहा गया था कि

जनता राज्य में ऐसे विचरे

जैसे         पिता के घर में पुत्र

 

प्रजातंत्र टूटा

एक मिथक कि तरह…’

-प्रजातंत्र

अन्यत्र ‘प्लेटफार्म पर’ कविता में  लोगों की भीड़ के बावजूद निपट अकेले होने की विडम्बना यात्री को सबसे पहले जंजीर की दुकान तलाशने के लिए विवश करती है ताकि यात्री अपने सामान को सुरक्षित करके सुकून की साँस ले सके. पर क्या सुकून किसी दुकान से ख़रीदा जा सकता है! यही पूंजीवाद द्वारा प्रस्तावित उपभोक्ता का लोकतंत्र है जहां दुकानों पर सुकून बेचने का झूठ है. आदमी के स्वार्थी भीड़ में बदल जाने के बाजारू फायदे हैं. कविता की यह बारीकी कवि की रचनात्मक उद्यमशीलता के उस ताने-बाने का परिणाम है जो उसके गहन और पीड़ादाई अवबोध से उपजी है ‘कि मनुष्येतर भी है संसार/मनुष्य होने पर ही जाना हमने’.  यह पीड़ाजन्य अनुभव ब’जरिये  मनुष्यता  ही प्राप्त हो सकता है और जब तक बची रहेगी यह मनुष्यता संसार में जो कुछ भी नकारात्मक है वह चीन्हें जाने से बचा नहीं रह सकता. नकारात्मकता को पहचान लेने की यह तमीज ही दुनिया के बचे रहने की संभावना है.

बहुधा हरीश चन्द्र पाण्डे की कविताएं पूर्ण वाक्य से शुरू होती हैं. वे एक पूरी भाव स्थिति पाठक के सम्मुख रख देती हैं. जैसे- ‘काम करते – करते उसने कहा, ‘पानी’, (शीर्षक- प्यास) ‘नि:स्सार है संसार’, (संसार) ‘देहें सभी की उल्टी लटकी थीं’, (ये भीड़ किधर जाएगी) ‘दो पत्तियों के पीछे छुपा है आम’, (आम और पत्तियां) ‘चिड़िया चहक रही है’, (चिड़िया की आँखों में) ‘वह पुर्जा चलता रहा ढीला होकर भी’, (मुक्ति)‘बसंत में ही क्यों नहीं खिल गए ये फूल’, (ये फूल बसन्त में नहीं खिलते) ‘आज बच्चा काफ़ी बेचैन था’, (बेचैनी और बच्चा) ‘गिरी अपने ही भार से      बेआवाज़’, (जख्म). ऐसे तमाम पूर्ण वाक्य ‘असहमति’ काव्य संग्रह के अतिरिक्त अन्यान्य संग्रहों से प्रस्तुत किए जा सकते हैं. क्या यह प्रवृत्ति कवि द्वारा एक संपूर्ण जीवन परिस्थितियों की तलाश की कोशिश को ओर संकेतित नहीं है. कवि का जो विषय-विस्तार है, जिस तरह उसकी दृष्टि जीवन की आनंदपूर्ण नगण्यताओं के बखान से लेकर भूमंडलीय उदारवाद की विराटता  के प्रति प्रश्नांकन तक विस्तृत है (‘इस बीच उदारता विश्वव्यापी हो गई थी/और स्थानीयता आत्महत्या करने लगी थी’) उसको देखते हुए इतना तो तय है कि कवि  के लिए खंड-सत्य काम्य नहीं. अभिव्यक्ति की यह भंगिमा कवि की रचना-प्रक्रिया की ओर  पाठक की आस्वादन प्रक्रिया में रूपांतरित होने का कारण है क्योंकि आलोचन और आस्वादन दोनों का प्राथमिक आधार अंतत: रचना ही होती है. यदि रचनाकार के लिए तीन क्षणों की आवश्यकता है तो पाठक के लिए भी कविता क्षण मात्र में घटित होने वाली चीज नहीं है. रचनाकार की सृजन प्रक्रिया की भांति उसकी अपनी अवगाहन/आस्वादन प्रक्रिया भी होती है. इस बात को कवि समझता है. इसी वजह से वह कवि पाठक के कविता में प्रवेश करने से पहले उसके मन पर दस्तक देता है. उसे उद् बुद्ध करता है. ताकि पाठक अपने जीवन के वास्तविक अनुभव के साथ कवि के अनुभव में प्रवेश करे और इस तरह पाठक के काव्यगत अनुभवन तथा कवि  के अनुभव का यह द्वन्द ही कविता में तहाए गए अर्थ को फैलाता चलता है. तब अंतत: पाठक जो कुछ प्राप्त करता है वह तीन स्तरों पर घटित हुआ होता है- एक, पाठक का अनुभावन; दो, कवि अनुभव से उसकी अनुक्रिया और तीन, कविता के एक संपूर्ण अर्थ का अनुबोध.

मुक्तिबोध ने अपनी कविता ‘एक अंतर्कथा’ में ‘आधुनिक सभ्यता के वन में/व्यक्तित्व – वृक्ष सुविधावादी’ प्रवृत्ति  के लिए बीड़ी की तलब के रूपक का प्रयोग किया है. हरीश चन्द्र पाण्डे ने अपनी ‘आग’ शीर्षक कविता में लिखा है :

‘गो कि आग

सभ्यता की एक निशानी थी

पर जंगली थी वह आग

जो अभी – अभी लगी थी

***

कोई शौकीन बीड़ीबाज

नकार गया

हरे जंगलों से हो कर गुजरने का नियम

(आग, उन्नयन-10)

यह शौकीन बीड़ीबाज आखिर है कौन? वस्तुत: यह शौक़ीन बीड़ीबाज ‘आधुनिक सभ्यता के वन में’ विचरण करने वाला सुविधावादी ही तो है, जिसके लिए जीवन-मूल्यों (हरेपन) का कोई अर्थ नहीं. उसकी सुविधा और शौक ही उसके असली जीवन-मूल्य बन गए हैं. मध्यमवर्गीयता का यह सुविधावादी चरित्र ही ‘मई – जून की दोपहर’ में ‘शर्ट – टाई/रे बैन चश्मा/जूतों में पालिश/और इस सब में पड़ी हुई धूल की कई – कई परतें/साथ में एक लड़की/सर पर कैप/बगल में बैग’ लिए एक लड़की के साथ गेट पर खड़े सेल्स मैन को दुत्कार देता है. उसे चिलचिलाती धूप में थके-हारे दो लोगों से सहज मानवीय व्यवहार करने का बोध तक नहीं है :

‘नहीं… कुछ नहीं चाहिए

भीतर जाते जान छुडाते कहा जाता है

…पीछे मुड़कर देखना          फंसना है जी’

-एक सेकिंड सर…

‘सर! सर!/मैडम!/मैडम!/एक सेकिंड सर/सरs  सरs’ की पुनरावर्तित नीरसता डूब जाती है ‘गेट बंद होने की आवाज’ में और भी गहरे,  लेकिन कवि इन परिस्थियों में निराश नहीं है. पंकज चतुर्वेदी की एक पुस्तक का शीर्षक उधार लेकर कहूं कि कवि यहां ‘निराशा में भी सामर्थ्य’ ढूंढ निकालता है :

‘जूते खोल पैर फैला       दोनों हाथों को पीछे टेक

किसी बात पर हँस पड़े हैं दोनों प्राणी

भीतर उछल पड़ी हैं अंतड़ियाँ

एक पब्लिक नल से नाराज हो

चल पड़े हैं दोनों       ढाबे की ओर…

 

‘दो प्लेट समोसा’

‘छोला मिला कर’

‘चटनी भी’

 

दो प्राणी टूट पड़े हैं प्लेटों पर

एक पर्त एक छिलका एक दाना नहीं गिर रहा नीचे

गटागट पानी पी

फिर हल्के मज़ाक का आक्सीजन ले रहें हैं

-एक सेकिंड सर…

हरीश चन्द्र पाण्डे की कविताओं में महिलाओं और बच्चों खास तवज्जो मिली है. हमारे अपने पुरुष प्रधान समाज में दोनों को मुख्यधारा की दुनिया में तवज्जो नहीं दिया जाता है. महिलाएं ‘तुम औरत हो, तुम क्या जानों’ जैसे मुहावरों का शिकार रही हैं. तो  ‘बचकानापन’ के मुहावरे का शिकार हो कर  बचपन ने अपनी मासूमियत को खो दिया  है. अपने जन्म के पश्चात् अपनी माँ की गंध से सर्वाधिक परिचय रखने वाले बच्चे और उसकी माँ दोनो की नियति एक सी है. अधिकार के नाम पर दोनों को सिर्फ ‘अनुशासन’ मिला है. हरीश चन्द्र पाण्डे की कविताओं में स्त्री दबी-कुचली, असहाय-बोध व यौन कुंठाओं से ग्रस्त नहीं है. कवि की दुनिया में उसे मुक्त रूप से विचरण करने की स्वतंत्रता है. इनमें उसके  कुशलता पूर्वक सार-संभार करने वाली गृहणी रूप को यह कह कर महिमा मंडित करने कोशिश नहीं- सब कुछ तो वही संभाले हुए है. जैसा कि शोषक वर्ग द्वारा शोषण को उदात्त शब्दावली द्वारा महिमामंडित करते हुए एक खास किस्म के उदारतावाद द्वारा उसे मजबूत बनाए रखा जाता है. कवि की दुनिया में ‘जीवन भर साथ चलते – चलते थकी औरतें’ अपनी बात कहने के लिए समय के छोटे से छोटे अंतराल में भी चूकती नहीं हैं. बारात में गए पुरुषों से खाली घर में ‘रतजगा’ करती हुईं  वे वर्जनाओं को अधिकारों में ढाल लेती हैं :

‘प्रताड़नाएं , जिन्होंने उनका जीना हलकान कर रखा था.

अभी प्रहसनों में ढल रही हैं

डंडे कोमल – कोमल प्रतीकों में बदल रहे हैं

वर्जनाएं अधिकारों में ढल रही हैं

***

जो आदमियों द्वारा केवल आदमियों के लिए सुरक्षित है

उस लोक में विचार रही हैं

पिंजरे से निकल कितना ऊँचा उड़ा जा सकता है

परों को फैलाकर देख रही हैं

-रतजगा

उड़ने से पहले अपने परों को फैला कर अपने उड्डयन क्षेत्र की असीम ऊँचाईयों को आंकने वाली औरतें श्मशान घाट पर (इलाहाबाद) दाह-कर्म करने वाली ‘महराजिन बुआ’ में तब्दील हो जाती हैं (यह पुरुषों का धुर अपना क्षेत्र है). जो ‘पंडों के शहर में/मर्दों के पेशे को/मर्दों से छीन कर /जबड़े में शिकार दबाये-सी घूम रही है वह’. इस कविता के अंत में कवि ने एक टिप्पणी दी है जिसमें उसने कविता को महराजिन बुआ के’पौरुष को समर्पित’ किया है. कवि ने इस कविता में प्रतीकात्मक ढंग से मनुवाद को भी प्रश्नांकित किया है. परंतु ‘घाट पर भी मर्द बने एक आदमी को/उसी की गुप्तांग भाषा में’ लथेड़ने वाली स्त्री की शक्तिमत्ता, निडरता पौरुष की शब्द भंगिमा से उपमित होने के लिए बाध्य है. वास्तव में यही रचनाकार की सीमा भी है क्योंकि रचनाकार अपने समय के पार जाने की क्षमता के बावजूद उससे बंधा भी है. वह एक साथ अपनी अपनी वर्तमानता से मुक्त भी है और बंधा भी है. और यहीं रचनाकार अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए स्पेस देता है :

‘लगभग ठीक उसी वक्त

एक शिशु

इस पृथ्वी पर अपनी पहली किलकारी मारता है…‘ 

-संसार

बचपन को सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, गोरख पाण्डे, चंद्रकांत देवताले, मंगलेश डबराल सरीखे उल्लेखनीय कवियों ने अपनी कविता में जगह दी है. बच्चे अपनी संवेदनशीलता, कोमलता, निच्छलता के लिए अपना उदहारण आप ही होते हैं. मनुष्यता की भविष्यत् संभावनाओं के प्रति गहरा आश्वस्ति बोध उन्हीं से मिलना संभव है. मनुष्यता का भविष्य उनके स्कंधों की ओर टकटकी बांधे देखता रहता है. जैसा कि फेदरीको गार्सिया लोर्का ने अपने एक दोस्त को लिखे पत्र में कहा है कि ‘आत्मा की गहराइयों में मैं बहुत बचकाना और मामूली हो जाना चाहता हूँ.’ और ठीक उसी पत्र के अंत में अपने मित्र से लोर्का एक अनुरोध करते हैं, ‘कभी भी ‘सिपाही का गीत’ मत गाना (वह एक हज्जाम संगीतकार काम है). अगर वे तुम्हें गोली से उड़ाने की धमकी दें, तब भी नहीं. वरना तुम मेरे दोस्त नहीं हो सकते.’ बचकाने और मामूलीपने की मसृणता ही विषमताग्रस्त समय की कठोरता के विरुद्ध प्रतिकार है. यह मसृणता ही मनुष्य की संभाव्यता है :

‘जब मदद के सारे स्रोत हाथ खड़ा कर देते हैं

कर्ज का मतलब जब पठान की थूक फुचकारती गाली हो जाता है

अपने-अपने गुल्लक लिए खड़े हो जाते हैं नन्हें

जैसे दुनिया के सारे कर्ज इसी से निपट जाएँगे

-गुल्लक

हरीश चन्द्र पाण्डे की कविताएं बिना किसी किस्म का नारा लगाए हमारे जेहन दाखिल होती हैं…दाखिल ही नहीं वरन् दिल में जज्ब हो जाती हैं. मितकथन इनका ही शिल्पगत वैशिष्ट्य है. ये बड़बोली नहीं हैं. इनमें दहाड़ने का वह आग्रह नहीं जो चुप्पी को दहाड़ का पर्याय मान लेता है. जैसे अज्ञेय ने अपने निबंध ‘चुप की दहाड़’ में कवि के चुप्पा होने को तर्क-संगति देने की कोशिश किया है. हरीश जी अपनी कविताओं के साथ बहुत अभ्यस्त तरीके से, सधे हुए जन के बीच उपस्थित होते हैं – ‘तुम्हारी कहानी तुम्हीं को सुनाने’ (बल्ली सिंह चीमा).  जिनकी कविताओं को पढ़ने पर मन चौंकता है कि अरे! हमारी नज़रों से यह क्यूँ रह गया था. जिन्हें देखा जाना जरूरी था, पर जिसे देख पाना ‘मुश्किल’ नहीं था, फिर भी रह गया. घटनाएं जो हमारे आस-पास ठसाठस वस्तुओं की तरह हो गई हैं कि जिनके हम इतने अभ्यस्त हो चले हैं उनके होने का एहसास तक मिट चला है. यहीं कवि अपना काम करता है और ‘मिट चले’ पर फिर से गहरे रंग भर देता है.

shrikant pandey

समीक्षा – श्रीकांत पाण्डेय

105/9-G

रामानंदनगर, अल्लापुर,

इलाहाबाद,

उत्तर प्रदेश-211006.

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2 comments

  1. आशीष मिश्र

    पहले पढ़ी हुई, बेहतरीन कवि पर अच्छी समीक्षा !

  2. सधी हुई भाषा वाला लेख..जरी रहे..

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