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भारत के महत्व को बढ़ाने की नीति

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सरकार समर्थक भारतीय मीडिया अमेरिका और यूरोपीय देशों से सम्बंधों और उनके वक्तव्यों को तरजीह देती है। उस पर इतराना भी उसे अच्छा लगता है। जहां मोदी जी सिर्फ इसलिये विशेष हैं, कि वो उनकी शर्तों पर देश की सूरत बदलना चाहते हैं।

ऐसा नहीं है कि सूरत बदलने की शुरूआत उन्होंने की। नहीं! सूरत बदलने की शुरूआत तो यूपीए की मनमोहन सरकार कर चुकी थी, मोदी जी ने उसे सौंपने की पहल की है। अपने प्राकृतिक सम्पदा, बाजार और श्रम बाजार को पूरी तरह सौंपने की पेशकश की है। जिस बात का दबाव वैश्विक वित्तीय इकाईयां और अमेरिकी बाजारवादी ताकतें बना रही थी, मोदी जी ने उसे प्लेट में सजा कर सामने रख दिया है और उन्होंने यह भी कहा है, कि ‘आपकी फरमाइशें हमें कुबूल हैं।‘ उनकी तमाम योजनायें, अध्यादेश और विधेयक बाजारवादी ताकतों को दी जाने वाली खुली छूट हैं। चाहे वो भूमि अधिग्रहण अध्यादेश, श्रम कानूनों में संशोधनों का विधेयक या ढ़ांचागत निवेश की भाग-दौड़ हो।

नरेन्द्र मोदी ने देश की सरकार को बाजार का कारिन्दा और बिचैलिया बना दिया है।

यह प्रचार जोरों पर है, कि भारत बदल रहा है। अमेरिका, यूरोपीय देश और विश्व बैंक तथा अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष जैसी वैश्विक वित्तीय इकाईयां जो मुक्त व्यापार के खिद्मतगार हैं, आने वाले कल के सपने बांट रहे हैं। रेटिंग एजेंसियां नयी संभावनायें दिखा रही हैं।

काले घोड़े पर उजला सवार है।

इसलिये संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोपीय संघ के सदस्य देश तथा उनके मित्र देशों के बारे में इतना कहना ही काफी है, कि वो अपने हित में भारत के महत्व को बढ़ाने की नीति पर काम कर रहे हैं। जिसका मकसद अपनी चरमराती संरचना और बिखरती वैश्विक व्यवस्था को बचाना है, ताकि मुक्त व्यापार के नये क्षेत्रों की रचना करने वो देशों- रूस, चीन और अमेरिका विरोधी एशिया, अफ्रीका और लातिनी अमेरिकी एवं कैरेबियन देशों के खेमें में भारत की मौजूदगी को घटाया और रोका जा सके। जिसका विस्तार तेजी से हो रहा है। जो यूरो-अमेरिकी साम्राज्य और उनकी वैश्विक संरचना के सामने गंभीर चुनौतियां हैं।

भारत बाजारवाद के दोराहे पर है।

नवउदारवादी अमेरिकी मुक्त व्यापार और मुक्त व्यापार के नये क्षेत्रों की रचना करने वाले रूस और चीन के बीच।

सोवियत संघ के पतन तक भारत की सम्बद्धता गुटनिर्पेक्ष आन्दोलन और समाजवादी शिविर से थी। जो स्वाभाविक रूप से उपनिवेशवाद एवं साम्राज्यवाद के विरूद्ध राष्ट्रीय एवं समाजवादी आन्दोलनों से जुड़ा था। उन ताकतों के विरूद्ध था जिसका नेतृत्व अमेरिका और यूरोपीय देश करते थे। अन्तर्राष्ट्रीय जगत में भारत की यह सम्बद्धता लगभग एक दशक तक और बनी रही, किन्तु यूपीए की मनमोहन सरकार ने अमेरिकी स्कूल में दाखिला ले लिया। मुक्त व्यापार और नवउदारवादी बाजारपरक अर्थव्यवस्था की नींव रखी गयी।

भारत आज भी गुटनिर्पेक्ष देशों का संस्थापक सदस्य है। ब्रिक्स देशों के संगठन सहित ब्रिक्स बैंक, संघाई सहयोग संगठन और एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक का सदस्य देश है। जहां रूस और चीन की वरियता भले ही है, किन्तु भारत की स्थिति समान और महत्वपूर्ण है। ब्रिक्स बैंक में चीन की सबसे बड़ी पूंजी लगी है, किंतु इन तीनों देशों के अलावा लातिनी अमेरिकी देश ब्राजील और अफ्रीकी देश दक्षिण अफ्रीका को समान अधिकार एवं समान सहयोग पाने का अधिकार है। शंघाई सहयोग संगठन में भारत की सदस्यता सुनिश्चित है, और चीन के द्वारा निर्मित ‘एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक‘ में भारत संस्थापक सदस्य है। जो अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राकोष और विश्व बैंक जैसी वित्तीय इकाईयों के समकक्ष है।

रूस भारत का परम्परागत मित्र देश है। और चीन का वर्तमान नेतृत्व भारत से अच्छे सम्बंधों का पक्षधर है, वह वार्ताओं के मेज पर दोनों देशों की सीमा विवादों का समाधान चाहता है। जिसके सामने ‘वैश्विक वैकल्पिक व्यवस्था‘ का लक्ष्य है। जिसमें भारत की साझेदारी न सिर्फ चीन की वैश्विक हो चुकी अर्थव्यवस्था के लिये जरूरी है, बल्कि दोनों देशों की सुरक्षा के साथ एशिया-प्रशांत क्षेत्र के देशों की सुरक्षा एवं स्थिरता तथा आर्थिक विकास के लिये भी जरूरी है। जिसका गंभीर राजनीतिक, कूटनीतिक एवं सामरिक महत्व है। क्योंकि अमेरिका एशिया में आतंकवाद विरोधी युद्ध के जरिये राजनीतिक आतंकवाद की नीतियों पर चल रहा है, और राजनीतिक अस्थिरता को बढ़ा कर तख्तापलट के लिये गृहयुद्ध को बढ़ावा दे रहा है।

अमेरिकी सरकार और यूरोपीय देश क्रीमिया का रूस संघ में विलय और यूक्रेन के गृहयुद्ध को मुद्दा बना कर और चीन के आर्थिक विकास एवं उसकी वैश्विक हो चुकी अर्थव्यवस्था को रोकने के लिये ‘विस्तारवादी‘ तथा युद्ध का खतरा प्रमाणित कर रहे हैं, जबकि सारी दुनिया में फैली अमेरिकी सेना न सिर्फ युद्ध के खतरे को बढ़ा रही है, बल्कि सक्रिय युद्ध भी कर रही है। सीरिया, इराक, लीबिया पर जारी हवाई हमलों के अलावा यूरोपीय देश की सेनायें अफ्रीका के माली, सूडान, नाइजीरिया और उपसहारा क्षेत्र के देशों में लड़ रही हैं और युद्ध को विस्तार देने की नीतियां बना रही हैं। वो एक बड़े युद्ध की तैयारी में लगे हैं। और भारत के लिये उनकी नीति भारत को चीन के विरूद्ध खड़ा करने की है।

भारत की मोदी सरकार चीन की तरह निर्यात एवं उत्पादन पर आधारित अर्थव्यवस्था के लिये अवसर की तरह देखती है, और भारतीय मीडिया अमेरिकी नजरिेये से चीन के लिये आशंकाओं को बढ़ाने, सीमा विवाद को वार्ताओं की तेज से उठा कर युद्ध की आशंकाओं को बढ़ाने में लगी रहती है। ऐसी खबरों का ताना-बाना बुनती रहती है, जिससे भारत और चीन के बीच विवादों का विस्तार हो और आर्थिक रूप से भारत की प्रतिद्वन्दिता चीन से सुनिश्चित हो।

सहयोग और समर्थन के बजाये असहमति और टकराव को बढ़ाने में लगी अमेरिकी और पश्चिमी मीडिया की तरह ही भारतीय मीडिया एशिया और दुनिया में हो चुके और हो रहे परिवर्तनों को अस्वीकार करने में लगी है। जहां रूस और चीन की साझेदारी आर्थिक, कूटनीतिक एवं सामरिक विकल्पों की रचना कर चुकी है। जिसमें भारत की साझेदारी भी है और विस्तार की संभावनायें भी प्रस्तावित हैं।

18 जून, 2015 को रूस की भूतपूर्व राजधानी सेंट पीटर्सबर्ग में ‘सेंट पिटर्सबर्ग इण्टरनेशनल इकोनाॅमिक फोरम‘ जिसे ‘रूसी दावोस‘ भी कहा जाता है, के सम्मेलन में भाग लेने पहुंचीं भारत के वाणिज्य एवं उद्योग राज्यमंत्री निर्मला सीतारमण। उनके साथ भारतीय व्यवसायियों और उद्योगपतियों का एक बड़ा प्रतिनिधि मण्डल भी था। जिसमें ‘फेडरेशन आॅफ इण्डियन चेम्बर्स आॅफ काॅमर्स एण्ड इण्डस्ट्रीज‘ (फिक्की) और ‘काॅन्फेडरेशन आॅफ इण्डियन इण्डस्ट्रीज‘ (सीआईआई) के अधिकारी एवं वरिष्ठ सदस्य भी शामिल थे। दोनों देशों के बीच ‘गोलमेज काॅन्फ्रेन्स‘ भी हुआ। जिसमें दोनों देशों के प्रतिनिधियों के अलावा भारत के वाणिज्य एवं उद्योग राज्यमंत्री निर्मला सीतारमण और रूस के आर्थिक विकास मंत्री अलेक्सेई उल्युकायेव की सह अध्यक्षता थी।

यह मुक्त व्यापार और बाजारपरक अर्थव्यवस्था का ही कमाल है, कि ‘अमेरिकी वल्र्ड इकोनाॅमिक फोरम – दावोस‘ की तरह ही ‘रूस के सेंट पिटर्सबर्ग इण्टरनेशनल इकोनाॅमिक फोरम‘ -रूसी दोवोस- जैसी इकाईयां अस्तित्व में आयीं। जिनमें दुनिया के बड़े उद्योगपतियों और कम्पनियों तथा काॅरपोरेशनों, प्रबंधकों एवं बैंकों के प्रतिनिधियों के साथ राष्ट्रप्रमुख और राजनेताओं की हिस्सेदारी हो रही है। जो विश्व अर्थव्यवस्था को नियंत्रित कर रहे हैं।

यह विश्व व्यवस्था में वित्तीय पूंजी के वर्चस्व एवं उसके निर्णायक होने का प्रमाण है। जो राजसत्ता एवं सरकारों को नियंत्रित कर रही है।

स्थितियां कुछ ऐसी बन गयी हैं, कि अब सरकारें आयोजक हैं और निजी वित्तीय पूंजी- दैत्याकार काॅरपोरेशन, बैंक, वित्तीय इकाईयां और संस्थानों के लिये ऐसे आयोजन होते हैं। कह सकते हैं, कि दुनिया की महत्वपूर्ण सरकारों ने वित्तीय पूंजी के वर्चस्व को स्वीकार कर लिया है, और अब वो सारी दुनिया की अर्थव्यवस्था को अपने कब्जे में रखने की कोशिशों को नया आयाम दे रहे हैं। रूस में यह आयोजन 1997 से हो रहा है, जिसे रूस का आर्थिक विकास मंत्रालय आयोजित करता है।

गये साल, दिसम्बर में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की यात्रा के दौरान 2025 तक भारत और रूस के द्विपक्षीय व्यापार को 30 अरब डाॅलर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है, जो वर्तमान में 9.5 अरब डाॅलर मात्र है। जबकि दोनों देशों के बीच मजबूत राजनीतिक सम्बंध रहे हैं, और आज भी राजनीतिक विश्वास कायम है। भारत के सामरिक समझौते और सुरक्षा सन्धियां आज भी जीवित हैं, जिसे अब वाणिज्य एवं व्यापार से भी जोड़ा जा रहा है। दोनों देशों के बीच की कमजोर आर्थिक कडि़यों की बड़ी वजह परिवहन एवं व्यापार मार्गोंं की कमियां हैं। जिसे चीन के ‘सिल्क रूट‘ से हल किया जाना है। इस क्षेत्र में रूस, ईरान और भारत ने भी पहल की है। ‘रूस-यूरेशियन आर्थिक संघ‘ भी महत्वपूर्ण माध्यम बन रहा है।

पूंजी निवेश की नयी संभावनायें बनायी जा रही हैं। यह निवेश सिर्फ भारत में ही नहीं, रूस और भारत संयुक्त रूप से ईरान जैसे तीसरे देश में भी कर सकते हैं। जिससे परिवहन की समस्या का समाधान संभव है। सम्मेलन में भाग लेने वाले आईबीए के सलाहकार अरूण प्रकाश ने ‘स्पूतनिक‘ को दिये साक्षात्कार में इस बात की संभावना व्यक्त की, कि ‘‘भारत और रूस के वाणिज्य मंत्रियों ने मुक्त व्यापार के जिस समझौते पर हस्ताक्षर किये हैं। अब एक कार्यदल का गठन होगा, जो मुक्त व्यापार समझौते के तीन मुख्य पहलुओं -रूस और भारत से आयातित सभी मालों पर आयात-शुल्क में 10 प्रतिशत की कटौती, रूस और भारत के बीच दोहरे कराधान को हटाना और दोनों देशों के बीच निवेश के क्षेत्र में सामरिक भागीदारी पर ध्यान देना- पर विचार-विमर्श कर आने वाले 5-6 महीनों में सभी बातें स्पष्ट कर लेगी।‘‘ जहां अमेरिका और यूरोपीय देश अपने लिये संभावनायें बना रहे हैं। भारत और चीन के बीच 20 अरब डाॅलर के निवेश की बातें पहले ही तय हो गयी हैं। जिसमें विस्तार की संभावनायें हैं।

इस बीच दुनिया के वित्तीय एवं भू-राजनीतिक संतुलन में जो बदलाव आया है, उसकी वजह से नये वैश्वीकरण की शुरूआत हुई है, जो अमेरिकी वैश्वीकरण से अलग है। जिसकी वजह से ‘भारत के महत्व को बढ़ाने की नीति‘ को नयी गति मिल गयी है।

इस बात को समझने की सख्त जरूरत है, कि ऐसा सिर्फ भारत के साथ ही नहीं हो रहा है। लातिनी अमेरिकी एवं कैरेबियन देशों सहित ग्रीस और ईरान-तुर्की जैसे कई देशों के साथ भी हो रहा है। उन अफ्रीकी देशों के साथ भी हो रहा है जहां रूस और चीन के द्वारा आर्थिक विकास एवं कूटनीतिक रिश्तों को विस्तार मिल रहा है। और वो उनके आर्थिक विकास एवं सुरक्षा की अनिवार्यता बन गये हैं। जहां यूरो-अमेरिकी साम्राज्य अपने पक्ष में युद्ध, गृहयुद्ध और तख्तापलट की वारदातें कर रहे हैं, जहां आतंकवाद को खुली छूट मिली हुई है।

बाजारवादी वैश्वीकरण की वजह से भारत का महत्व बढ़ा है। दुनिया दो खेमों में बंट चुकी है। भारत अलग-अलग तरीके से दोनों ही खेमों में मौजूद है। पीएम मोदी अमेरिकी काॅरपोरेट की उपज हैं, मगर उनके लिये संभावनायें रूस और चीन के वैकल्पिक व्यवस्था में है।

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