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सेंट पीटर्सबर्ग अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक फोरम का वार्षिक सम्मेलन

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18 जून, 2015 को रूस में ‘‘सेंट पीटर्सबर्ग इण्टरनेशनल इकोनाॅमिक फोरम‘‘ का सम्मेलन सेंट पीटर्सबर्ग में हुआ। 1997 से हर वर्ष रूस के आर्थिक विकास मंत्रालय द्वारा आयोजित यह सम्मेलन, वैश्विक स्तर पर ‘वल्र्ड इकोनाॅमिक फोरम‘ की तरह ही, दुनिया  की अर्थव्यवस्था को नियंत्रित रखने वाली ताकतों के सम्मेलन का दर्जा हासिल कर लिया है। घोषित तौर पर जिसका मूल उद्देश्य विश्व अर्थव्यवस्था की तात्कालिक समस्याओं पर विचार करना और उसका समाधान निकालना है, ताकि मुक्त व्यापार के विकास, और उसकी दिशा को सुनिश्चित किया जा सके। जिसमें देशों के राष्ट्र प्रमुखों, उनके प्रतिनिधियों, वैश्विक वित्तीय संगठनों, इकाईयों, बैंकों एवं संस्थानों सहित दुनिया के बिलेनियर्स-मिलेनियर्स शामिल होते हैं।

कह सकते हैं, कि यह सम्मेलन निजी वित्तीय पूंजी के विस्तार और विश्व अर्थव्यस्था पर उसकी पकड़ को मजबूत बनने की कवायत है। यह सांस्कृतिक कार्यक्रमों और मनोरंजन के बीच, निजी वित्तीय पूंजी से दुनिया की अर्थव्यवस्था की समस्याओं का समाधान अपने हित में खोजना है। निवेशकों के सामने आकर्षक निवेश की प्रदर्शनी है। जिसमें विस्तृत बैठक के अलावा गोलमेज कांफ्रेन्स होता है।

‘‘वल्र्ड इकोनाॅमिक फोरम‘‘ के दावोस सम्मेलनों की तरह ही, ‘‘सेंट पीटर्सबर्ग इण्टरनेशनल इकोनाॅमिक फोरम‘‘ के सम्मेलन को ‘रूसी दावोस‘ भी कहा जाने लगा है। ऊपरी तौर पर ‘दोनों ही फोरमों‘ के बीच कोई ‘वित्तीय वैचारिक‘ मतभेद नहीं है। दोनों का लक्ष्य मुक्त व्यापार और बाजारवादी वैश्विक अर्थव्यवस्था का निर्माण और उसे नियंत्रित करना है। किंतु राजनीतिक एवं कूटनीतिक स्तर पर यह अमेरिकी एकाधिकारवाद के विरूद्ध बहुध्रुवी विश्व की अवधारणां से संचालित, मुक्त व्यापार के नये क्षेत्रों की रचना और विश्व की वैकल्पिक व्यवस्था का पक्षधर है।

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पूतिन ने सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए 19 जून को कहा- ‘‘हम विश्व समुदाय के सभी सदस्यों -अमेरिकी, यूरोपीय, एशियायी एवं अफ्रीकी देशों- के साथ समान अधिकार और आपसी सम्मान पर आधारित सम्बंधों के पक्ष में हैं। हम ऐसे ही सम्बंधों की स्थापना करना चाहते हैं, जिसमें समानता और सम्मान हो।‘‘ उन्होंने कहा- ‘‘अंतर्राष्ट्रीय मंच पर हम अंतर्राष्ट्रीय कानून के नियमों और उनके मूलभूत सिद्धांतों की तथा संयुक्त राष्ट्र संघ के संविधान की रक्षा करने के पक्ष में हैं।‘‘

उन्होंने रूस की नीतियों, सैद्धांतिक सम्बद्धता और अंतर्राष्ट्रीय दायित्वों के बारे में कहा- ‘‘हम आक्रामक नहीं हैं। अब हम अपने हितों की रक्षा दृढ़ता से करने लगे हैं। हम दशकों चुप रहे और संयम से सहयोग की संभावनायें पेश करते रहे, लेकिन हमें लगातार पीछे हटने के लिये विवश किया गया, लेकिन अब हम वहां पहुंच गये हैं, जहां से पीछे हटा नहीं जा सकता।‘‘ उन्होंने वैश्विक व्यवस्था के पुर्ननिर्माण के स्थान पर सहयोग, सम्मान एवं समर्थन पर जोर देते हुए, आम समस्याओं के समाधान का विकल्प रखा। राष्ट्रपति पुतिन ने इस बात की स्पष्ट घोषणां की, कि ‘‘हम अपना आधिपत्य स्थापित करना या महाशक्ति का दर्जा हासिल करना नहीं चाहते। रूस का यह उद्देश्य नहीं है।‘‘ उन्होंने युद्ध और आतंक के बजाये वार्ताओ की मेज पर वैश्विक समस्याओं के समाधान की पेशकश की।

पुतिन ने अपने सम्बोधन में कहा- ‘‘रूस और चीन (जिनकी वैश्विक नीतियां एक ही मेज पर तय की गयी लगती हैं) किसी भी सैन्य संगठन का निर्माण नहीं कर रहे हैं, ना ही उन्होंने नाटो जैसे किसी सैन्य संगठन की स्थापना की है।‘‘ उन्होंने घोषित किया- ‘‘हमारी नीतियां और हमारी मानसिकता गुट-निर्पेक्ष है। हम वैश्विक स्तर पर सोचने, जिम्मेदारियों को बांटने और आपसी वार्ताओं से समस्याओं का समाधान चाहते हैं। हम सैन्य कार्यवाही, बल प्रयोग को तरजीह नहीं देते। हम वार्ताओं के आधार पर समस्याओं के समाधान की खोज करना चाहते हैं। और मैं समझता हूं कि हमारी कोशिशें सफल रही हैं।‘‘

उन्होंने संयुक्त राज्य अमेरिका, यूरोपीय संघ और नाटो सैन्य संगठन के बारे में कहा- ‘‘वो नाटो सैन्य संगठन का विस्तार कर रहे हैं, जबकि सोवियत संघ अब नहीं है, जिसका प्रतिरोध करने के लिये, नाटो सैन्य संगठन की स्थापना की गयी थी। वार्सा संधि भी अब नहीं है। इसके बाद भी नाटो का विस्तार किया जा रहा है। राष्ट्रपति पुतिन ने विश्व परिदृश्य, उसकी जटिलता, समस्या एवं समस्याओं के समाधान का जिक्र किया। सीरिया से लेकर यूक्रेन के संकट का उल्लेख किया।

सीरिया के बारे में स्पष्ट किया कि रूस राष्ट्रपति बशर-अल-असद और तथाकथित विपक्ष से राजनीतिक सुधारों के लिये वार्ता के पक्ष में है।‘‘ कितु अमेरिका और यूरोपीय देशों तथा उन अरब देशों के उस प्रस्ताव के विरूद्ध है, जिसके लिये वार्ता से पहले, राष्ट्रपति असद को सत्ता छोड़ देनी चाहिये। उन्होंने कहा- ‘‘यह सीरिया की आम जनता का अधिकार है।‘‘

रूस और चीन के द्वारा मुक्त व्यापार के जिस अर्थव्यवस्था का विकास किया जा रहा है, उसमें निजीकरण और निजी वित्तीय पूंजी की गहरी हिस्सेदारी है, जिसे गैर समाजवादी अर्थव्यवस्था ही कहा जायेगा, किंतु अमेरिकी वैश्विक वित्त व्यवस्था और मुक्त व्यापार के रूसी-चीनी संस्करण में निजी कम्पनियों के साथ सार्वजनिक क्षेत्र एवं सरकारी आधिपत्य वाली कम्पनियों के होने का फर्क है। अमेरिकी संस्करण में सरकारी कम्पनियां और सार्वजनिक क्षेत्रों के बिना, निजी कम्पनियों एवं काॅरपोरेशनों कों खुली छूट है। जहां राज्य की सरकारें भी वित्तीय इकाईयों की तरह काम करती हैं। उनका राजनीतिक अस्तित्व वैश्विक वित्तीय इकाईयों के लिये संधि-समझौते करने एवं उन्हें वैधानिक दर्जा दिलाने का जरिया है, जबकि मुक्त व्यापार के रूसी-चीनी संस्करण में राज्य की सरकारों का अस्तित्व है। सार्वजनिक क्षेत्र एवं सरकारी कम्पनियों की हिस्सेदारी भी है। कह सकते हैं, कि निजी वित्तीय पूंजी पूरी तरह राज्य के नियंत्रण से बाहर नहीं है।

सेंट पीटर्सबर्ग अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक फोरम में भारत के आर्थिक विकास, पूंजी निवेश की संभावना और सहयोग के क्षेत्र पर विशेष चर्चायें हुईं। दोनों देशों के बीच वाणिज्य एवं व्यापार को विस्तार देने, निवेश की व्यवस्था तथा सामरिक सुरक्षा के क्षेत्र में आर्थिक एवं कूटनीतिक साझेदारी पर चर्चायें हुईं। संयुक्त रूप से दूसरे देशों में निवेश की संभावनाओं को तलाशा गया। राष्ट्रपति पुतिन ने भी विशिष्टता से भारत का उल्लेख किया और ब्रिक्स देशों के माध्यम से विस्तार की अनिवार्यतायें दर्शायी। उन्होने शंघाई सहयोग संगठन से लेकर एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक का जिक्र किया। जिसमें भारत की साझेदारी हैं।

यह बात स्पष्ट है, कि रूस और चीन के लिये भारत महत्वपूर्ण साझेदार है। गोलमेज कांफ्रेन्स में भी लम्बी वार्तायें हुई और निर्णय हुए जो भारत के हित में हैं। रूस भारत से अपने व्यावसायि सम्बंधों में विस्तार दे रहा है, वहीं चीन भारत के व्यावसायिक घाटा को घटाने में लगा है। कई परिवहन एवं व्यापार मार्गों के निर्माण से भारत की अर्थव्यवस्था के विकास को भी सुनिश्चित करने की कार्ययोजना है। जो चीन के निवेश और रूस के सहयोग से संभव है। रूस का आस्त्राखान से शुरू हुआ समुद्री मार्ग ईरान से होता हुआ भारत तक पहुंचता है।

राष्ट्रपति पुतिन ने 20 जून को सेंट पीटर्सबर्ग में विदेशी समाचार एजेन्सियों के प्रधान एवं विशिष्ट प्रतिनिधियों से मुलाकात की। उन्होंने कहा- ‘‘100 अरब डाॅलर की मूल पूंजी से बना ब्रिक्स बैंक अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संगठनों का प्रतिद्वन्दी बैंक नहीं है। इस बैंक की स्थापना इस उद्देश्य से नहीं की गयी है, कि यह वर्तमान वैश्विक संस्थाओं का स्थान ले, बल्कि इसलिये किया गया है, कि वह उनका अनुपूरक बने और मिल कर काम करे।‘‘ उन्होंने जोर दे कर कहा- ‘‘ब्रिक्स संगठन के सभी देशों -ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका- के सम्बंध विश्व बैंक एवं अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष से अच्छे हैं।‘‘

सेंट पीटर्सबर्ग इण्टरनेशनल इकोनाॅमिक फोरम -सम्मेलन में शामिल प्रतिनिधियों एवं मीडिया के सामने रूसी राष्ट्रपति ने हर तरह से यह प्रमाणित करने की कोशिश की कि रूस, चीन, ब्रिक्स देशों के द्वारा स्थापित ब्रिक्स बैंक और चीन के द्वारा स्थापित ‘‘एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक‘‘ -(एशियायी ढांचागत निवेश बैंक) विश्व की मौजूदा वित्तीय व्यवस्था में सकारात्मक भूमिका के पक्षधर हैं। वो अमेरिका, यूरोपीय संघ, विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष के विरूद्ध नहीं है। साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट करने की कोशिश की कि आर्थिक विकास, राजनीतिक स्थिरता और विश्व समुदाय की सुरक्षा के लिये आपसी सहयोग एवं समान अधिकार पर आधारित सम्बंधों से ही सुनिश्चित किया जा सकता है। उन्होंने यूरो-अमेरिकी एकाधिकार और सैन्य हस्तक्षेप को गैर जरूरी बताया है।

20 जून को विश्व बैंक के उपाध्यक्ष पेद्रो आल्बा ने कहा- ‘‘हम नये एशियायी ढांचागत निवेश बैंक और नये ब्रिक्स बैंक के प्रति सकारात्मक नजरिया रखते हैं। हमें आशा है, कि दोनों ही बैंक वित्तीय विकास के नये विचार के साथ काम करेंगे। और 2030 तक दुनिया को गरीबी से मुक्त करने में सहायक होंगी। जोकि दुनिया के सबसे बड़े विकास बैंक- विश्व बैंक का प्रमुख उद्देश्य है।‘‘

हम यह सवाल यहां नहीं करेंगे कि क्या विश्व बैंक, और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष जैसी वैश्विक वित्तीय इकाईयां वास्तव में तीसरी दुनिया के देशों केे विकास और विकास योजनाओं के माध्यम से दुनिया को भूख और गरीबी से मुक्त करने में सहायता हुई है? या वो यूरो-अमेरिकी साम्राज्य और दुनिया के वित्तीय ताकतों के लिये अबाध शोषण का जरिया बनी हैं? जिसने युद्ध, रक्तपात, हिंसा और आतंक को आर्थिक लाभ के लिये राजनीतिक अनिवार्यता में बदलने का काम किया।

‘वल्र्ड इकोनाॅमिक फोरम‘ आज वैश्विक अर्थव्यवस्था को पूरी तरह नियंत्रित करती है, जिस पर दुनिया के किसी भी देश या देशों के समूह या अंतर्राष्ट्रीय संगठन का नियंत्रण नहीं है। जिसमें दुनिया की आम जनता का एक भी प्रतिनिधि नहीं है। यदि ‘सेंट पीटर्सबर्ग इण्टरनेशनल इकोनाॅमिक फोरम‘ वैसी ही उभरती हुई मुक्त व्यापार और बाजारवादी व्यवस्था की वैश्विक इकाई है, तो विश्व समुदाय के देशों और आम लोगों के लिये यह कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं है। भले ही यह बहुधु्रवी विश्व की अवधारणाओं से संचालित हो और अमेरिकी एकाधिकारवाद के विरूद्ध हो।

वास्तव में यह साम्राज्यवादी विश्व का आर्थिक बंटवारा है, जिसमें राजनीतिक वैकल्पिक व्यवस्था, नये कूटनीतिक समिकरण और शक्ति के आधार पर सामरिक सुरक्षा है। जिसमें स्थायित्व से ज्यादा लगाम कसने की समझ है। यह पतनशील वैश्विक व्यवस्था के विरूद्ध ऐसा उदार मुखौटा है, जिसके पीछे भी साम्राज्यवाद और उसकी बाजारवादी अर्थव्यवस्था है।

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