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वैश्विक अर्थव्यवस्था पर युद्ध और हिंसा के प्रभावों का आंकलन

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2014 के वैश्विक अर्थव्यवस्था पर युद्ध और हिंसा के आर्थिक प्रभावों का आंकलन किया गया, जो कि आश्चर्यजनक रूप से 14.3 ट्रिलियन डाॅलर है। दूसरे शब्दों में कहें तो यह विश्व के सकल घरेलू उत्पाद -जीडीपी- का 13.4 प्रतिशत है। यह ब्राजील, कनाड़ा, फ्रांस, जर्मनी, स्पेन और ब्रिटेन के संयुक्त आार्थिक उत्पाद के बराबर है।

कह सकते हैं, कि युद्ध और हिंसा ने राजनीतिक अस्थिरता को ही नहीं बढ़ाया है, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के सामने आर्थिक अनिश्चयता का संकट भी पैदा कर दिया है।  यह ऐसा संकट है, जिसके बारे में निश्चित तौर पर कहा जा सकता है, कि विश्व समुदाय और वैश्विक ताकतें इसे हल कर सकती हैं, किंतु पूंजीवादी व्यवस्था का संकट और विश्व अर्थव्यवस्था को अपने नियंत्रण में रखने की लड़ाई ने, न सिर्फ समस्या के समाधान की मुश्किलें बढ़ाई है, बल्कि आज जो वैश्विक संकट है, उसकी वजह भी वे ही ताकतें हैं। जिसका खामियाजा दुनिया की आम जनता और युद्ध और हिंसा के चपेट में आये देशों की आम जनता को चुकाना पड़ रहा है। हम मुक्त व्यापार और नवउदारवादी वैश्वीकरण के उस दौर में हैं, जहां युद्ध, आतंक और हिंसा को साम्राज्यवाद के विस्तार का जरिया बना लिया गया है।

‘ग्लोबल पीस इंडेक्स‘ के वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, जिसे ‘इंस्टीच्यूट फाॅर इकोनाॅमिक्स एण्ड पीस‘ थिंकटैंक ने संकलित किया है- ‘‘2008 से इस खर्च में 1.9 ट्रिलियन डाॅलर की वृद्धि क गयी है, जो 15.3 प्रतिशत वृद्धि है।‘‘ इस रिपोर्ट में यह परिभाषित किया गया है, कि हिंसा का आर्थिक प्रभाव विश्व अर्थव्यवस्था के प्रवाह और विस्तार पर क्या पड़ रहा है? और उसका प्रभाव आर्थिक संसाधन तथा संचालन खर्च पर, हिंसाग्रस्त उन क्षेत्रों के गैर उत्पादक क्षेत्र में बदलने से वैश्विक अर्थव्यवस्था पर कितना पड़ रहा है?

स्वाभविक रूप से ऐसे क्षेत्रों में उनके कुल खर्च का ज्यादातर हिस्सा आंतरिक संघर्षाें की वजह से होने वाले विस्थापन (पलायन), सैन्य खर्च और आंतरिक सुरक्षा के लिये पुलिस पर होता है। यह वो खर्च है, जिससे न तो उस देश की अर्थव्यवस्था को कोई लाभ मिलता है, ना ही वैश्विक अर्थव्यवस्था में उनकी जो आर्थिक हिस्सेदारी थी, उस पर पड़ता है। उनकी हिस्सेदारी लगातार घटती जाती है, और उनके साथ वैश्विक अर्थव्यवस्था भी संकटग्रस्त हो जाती है। उनके आर्थिक संसाधन का सबसे बड़ा हिस्सा गैर-उत्पादक क्षेत्र में खर्च हो जाता है। आर्थिक विकास और लोगों के जीवन स्तर में सुधार की संभावनायें भी युद्ध और आतंक की वजह से संकटग्रस्त हो जाता है।

इस तरह सेना, आंतरिक सुरक्षा और शरणार्थियों पर आने वाला खर्च वैश्विक वित्त व्यवस्था के न सिर्फ विकास को रोक रहा है, बल्कि उसे तेजी से खोखला भी करता जा रहा है।

साल 2014 में सेना पर किया गया खर्च 3 ट्रिलियन डाॅलर से भी ज्यादा रहा है। जिसमें संयुक्त राज्य अमेरिका का खर्च 1.3 ट्रिलियन डाॅलर से भी अधिक है। इस अध्ययन से यह सच भी सामने आया है, कि सैन्य अभियानों सहत सेना, आंतरिक सुरक्षा के लिये पुलिस और लोगों की सुनियोजित राजनीतिक एवं आतंकियों के द्वारा किये जा रहे हत्या, -तीनों का -संयुक्त खर्च सबसे ज्यादा- कुल खर्च का 68.3 प्रतिशत है। शेष खर्च में ही शरणार्थियों पर किया जाने वाला खर्च है।

शरणार्थी और हिंसा तथा युद्धग्रस्त देशों में, आंतरिक पलायन के लिये विवश लोगों के सहयोग के लिये किया जाने वाला खर्च 2008 से 2014 में 267 प्रतिशत बढ़ गया है। यह खर्च लगभग 128 बिलियन डाॅलर है। ऐसे विस्थपितों की कुल संख्या 2014 में 59.5 मिलियन हो गयी है, जोकि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद का सबसे बड़ा पलायन और विस्थापन है। और 2015 में भी इसके रूकने या घटने की तिल भर भी संभावनायें नहीं हैं, क्योंकि यूरोपीय संघ के सदस्य देश और अमेरिकी सरकार एशिया और अफ्रीका में अपने सैन्य अभियानों में तेजी ला रहे हैं। आतंकवाद के खिलाफ जारी सैन्य अभियानों ने आातंकवाद को बढ़ाने का काम किया है।

इन विपरीत परिस्थितियों में राष्ट्रसंघ के द्वारा किये जा रहे शांति प्रयासों पर आने वाला खर्च 0.17 प्रतिशत से भी कम है।

शरणार्थियों के मामले में यूरोपीय संघ की नीतियां एशिया और अफ्रीका से हो रहे पलायन को रोकने के लिये सैन्य कार्यवाही की है, और जो यूरोप में घुस आये हैं, उन्हें वापस अपने देश में खदेड़ने की है। जिसके लिये वो अमेरिकी सरकार सहित खुद जिम्मेदार हैं, उसके प्रति उनकी नीतियां पूरी तरह अमानवीय हैं। किसी भी देश को बूचड़खाना में डालना है। जिसके लिये यूरोपीय संघ ने दस सूत्रीय कार्यक्रम की घोषणां की है। अमेरिकी सरकार के साथ वह उन क्षेत्रों में विस्तृत सैन्य अभियान की नयी शुरूआत कर रहा है, जहां उन्हीं के दिये गये हथियारों, आर्थिक सहयोग एवं कूटनीतिक समर्थन से आतंकी गुट, साम्राज्यवादी हितों के लिये आम लोगों की हत्यायें कर रहे हैं। पलायन और शरणार्थियों की समस्या भी इन्हीं यूरो-अमेरिकी हमले और उन्हीं के पाले-पोसे हुए आतंकी हत्यारों की वजह से है।

हाल के समय में अमेरिकी साम्राज्य के निशाने पर सीरिया, अफगानिस्तान और इराक है।

नाम लीबिया का भी लेना जरूरी है, जहां अब कोई भी केंद्रिय सरकार नहीं है, और हंथियारों से लैस आतंकी और मिलिसियायी गुट आपस में लड़ते हुए लोगों को मार रहे हैं। जहां से लोगों का पलायन अपने चरम पर है। कर्नल गद्दाफी की हत्या के बाद से ही लीबिया के सुख, शांति एवं समृद्धि तथा केंद्रीय सरकार की हत्या हो गयी। जिसकी अर्थव्यवस्था आज पूरी तरह से ध्वस्त हो गयी है। जिस पर अधिकार जमाने और जिसके प्राकृतिक गैस एवं तेल के भण्डार को अपने नियंत्रण में लेने के लिये लीबिया पर हमले किये गयें। जिसका स्वाभाविक परिणाम यह हुआ, कि लीबिया की अर्थव्यस्था ही ध्वस्त नहीं हो गयी, बल्कि उसके सहयोग से अफ्रीकी देशों के आर्थिक विकास और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर उसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।

यही स्थिति आज सीरिया, अफगानिस्तान और इराक की है, जिनके प्राकृतिक संसाधन आौर उनकी बची हुई अर्थव्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा युद्ध और युद्ध के खर्च में बर्बाद हो रहा है।

Quantifying-Peace_gallerylargeपिछले 4 सालों से भी ज्यादा समय से सीरिया, अमेरिका और उसके सहयोगी देशों -यूरोप और अरब जगत- के द्वारा भड़काये गये गृहयुद्ध और अब अमेरिका के हवाई हमलों से तबाह हो रहा है। एक ठोस अनुमान के अनुसार- ‘‘अमेरिका के द्वारा भड़काये गये गृहयुद्ध और थोपे गये युद्ध ने सीरिया के कुल जीडीपी के 42 प्रतिशत हिस्से को इन विपरीत स्थितियों के हवाले कर दिया है।‘‘ दूसरे शब्दों में कहें तो सीरिया को अपने जीडीपी का 42 प्रतिशत गृहयुद्ध पर खर्च करना पड़ा है। अफगानिस्तान ने साल 2014 में अपने जीडीपी का 31 प्रतिशत सेना और पुलिस पर खर्च किया और इराक ने अपने जीडीपी का 30 प्रतिशत सेना और पुलिस पर खर्च किया।

यदि इन देशों में अमेरिकी हंस्तक्षेप नहीं होता, या राजनीतिक अस्थिरता पैदा कर के तख्तापलट या उसकी कोशिश नहीं की गयी होती, तों इन खर्चों की कोई जरूरत ही नहीं थी।

‘ग्लोबल पीस इण्डेक्स‘ के रिपोर्ट में सीरिया को दुनिया का सबसे अशांत देश घोषित किया गया है। लीबिया इस गिरावट एवं पतन के सातवें नम्बर पर है, और यूक्रेन इस पतन का अनुभव करने वाला दूसरे नम्बर का देश है। मध्य-पूर्व एशिया और उत्तरी अफ्रीकी क्षेत्र के देशों में पतन एवं गिरावट की स्थितियां सबसे अधिक हैं जहां संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोपीय देशों के द्वारा लगातार सैन्य अभियान चलाया जा रहा है।

इस गिरावट, पतन और दुनिया के सबसे अशांत एवं असुरक्षित पांच देश- सीरिया, इराक अफगानिस्तान, दक्षिण सूडान और मध्य अफ्रीकी रिपब्लिक है। संयुक्त राज्य अमेरिका का नम्बर 94 है, पेरू और सउदी अरब के बीच में। इस सूचि में 162 देशों को शामिल किया गया है।

इस सूची में संयुक्त रूप से यूरोपीय देशों को दुनिया का सबसे शांत एवं सुरक्षित क्षेत्र माना गया है। जिसके शीर्ष पर आइसलैण्ड है। डेनमार्क, आस्ट्रिया, न्यूजीलैण्ड, स्वीटजरलैण्ड, फिनलैण्ड, कनाडा, जापान, आॅस्ट्रेलिया और चेक रिपब्लिक सबसे ज्यादा सुरक्षित एवं शांत देश है।

वैसे यूरोप की शांति और सुरक्षा उसी आयातित समृद्धि के साथ ही आर्थिक संकट और आंतरिक परिस्थितियों की वजह से बदलने लगी है। इसके बाद भी वो एशियायी और अफ्रीकी देशों के अनुपात में शांत और सुरक्षित है।

रिपोर्ट में इस बात का विशेष उल्लेख किया गया है, कि साल 2012-13 में आतंकवाद की वजह से होने वाले मृत्यु दर में 61 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है, जोकि साल 2008 के आंकड़ों से दो गुणा है। 2013 में आतंकी हमलों में 17,958 लोग मारे गये और इन मारे गये लोगों में 82 प्रतिशत लोग इराक, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, नाइजीरिया और सीरिया से हैं।

इन आंकड़ों ने एक बार फिर से इस सच को खुलेआम कर दिया कि, तथाकथित ‘आतंकवाद के खिलाफ युद्ध‘ वास्तव में अमेरिकी साम्राज्यवाद के द्वारा निशाना बनाये गये देशों में आतंकी संगठनों को मजबूत करने का काम किया है। इन युद्धों के केंद्र में भले ही ‘राष्ट्रीय सुरक्षा‘ को रखा जाता है, मगर ज्यादातर आतंकी हमले विकसित पूंजीवादी देशों से बाहर ही होते हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है, कि ‘हाल के वर्षों में सैन्य संघर्षों में नाटकीय रूप से तिव्रता आयी है। साल 2014 में 1,80,000 लोग ऐसे संघर्षाें में मारे गये हैं। 2010 में यह आंकड़ा 49,000 था। चार साल में यह चार गुणा बढ़ा है।‘‘ जिसके लिये दुनिया के वो साम्राज्यवादी देश जिम्मेदार है, जो अपने वर्चस्व को एकाधिकार में बदलना चाहते हैं, और बाजारवादी अर्थव्यवस्था से अलग, किसी भी अर्थव्यवस्था को मिटा देना चाहते हैं। इराक, अफगानिस्तान, लीबिया और सीरिया की तबाही की वजह ही यही है। यही कारण है, कि अमेरिकी साम्राज्य का सैन्य बजट लगातार बढ़ता जा रहा है।

2014 का अमेरिकी सैन्य का खर्च अधिकारिक रूप से 610 बिलियन डाॅलर था। जो कि दुनिया भर के देशों के सैनिक खर्च का 35 प्रतिशत है। यह चीन, रूस, सउदी अरब, फ्रांस, ब्रिटेन, भारत और जर्मनी के संयुक्त खर्च, जोकि 601 बिलियन डाॅलर था, से भी ज्यादा है।

असल में अमेरिका का वार्षिक सैन्य बजट घोषित खर्च से कहीं ज्यादा है। यदि इस खर्च में परमाणु हथियारों के क्षेत्र में फंडिंग, विदेशों में जारी युद्धों के खर्चों पर होने वाले भुगतानों का ब्याज और पूर्व अमेरिकी सैनिकों को दिये जाने वाले सहयोग को भी शामिल कर दिया जाये तो ये बजट 1 ट्रिलियन डाॅलर के करीब पहुंच जायेगा। वास्तव में अमेरिकी अर्थव्यवस्था का संकट उसकी सेना का वैश्विक विस्तार और दुनिया भर में उसके द्वारा लड़ी जा रही लड़ाईयां हैं। 2000 से 2006 के बीच अमेरिका का सैनिक बजट 300 बिलियन डाॅलर से बढ़ कर 530 बिलियन डाॅलर हो गया। जिस समय फेडरल बजट में कटौतियां हो रही थी, उस समय भी 530 बिलियन के खर्च को बना कर रखा गया। साल 2016 के लिये 613 बिलियन डाॅलर कर सुरक्षा बजट प्रस्तावित है, जो अमेरिका शिक्षा बजट के 8 गुणा से भी ज्यादा है।

अमेरिकी सरकार के द्वारा दुनिया भर में युद्ध और आतंक के खतरों को बोने का पूरा लाभ हथियार उत्पादक अमेरिकी कम्पनियों को मिल रहा है। सितम्बर 2014 में, जब से अमेरिका ने इराक और सीरिया में ‘इस्लामिक स्टेट आॅफ इराक एण्ड सीरिया‘ के खिलाफ हवाई हमलों की शुरूआत किया है, 5 सबसे बड़े हथियार उत्पादक निजी कम्पनियों में से 4 कम्पनियां- लाॅकहेड माॅर्टिन, नाॅर्थअप ग्रूमन, जनरल डाॅयनमिक्स और रेथिआॅन के स्टाॅक्स अपनी ऊंचाईयों पर पहुंच गये।

इसके बाद भी सच यह है, कि हथियारों की बढ़ी हुई खपत, खनिज और प्राकृतिक गैस एवं तेल भण्डारों के लिये युद्ध और हिंसा ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया है। वह दुनिया की आम जनता की तरह ही संकटग्रस्त है। जिसे एक बड़े युद्ध के खतरों के मुहाने पर खड़ा किया जा रहा है।

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