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जन समर्थन के साथ ग्रीस वार्ता की मेज पर है

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ग्रीस के संकट को पहले ग्रीस में रोका गया, किंतु अब यह यूरो जोन और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष का ही नहीं, बल्कि बाजारवादी अर्थव्यवस्था का संकट बन गया है। जिसके विस्तार को रोका नहीं जा सकता। निश्चित रूप से हम कह सकते हैं, कि ‘‘ग्रीस का संकट बाजारवादी अर्थव्यवस्था और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकाईयों या निवेशकों के कर्ज से अपने देश की अर्थव्यवस्था को संभालने की नीतियों की असफलता है।‘‘ जिसने ग्रीस को 284 बिलियन डाॅलर का कर्जदार बना दिया। यही नहीं उसके संभलने की सभी संभावनाओं को भी अपने कब्जे में ले लिया।

किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को अपने कब्जे में लेने का यह खेल बहुत बड़ा है। जिसमें वल्र्ड इकोनाॅमिक फोरम, उनकी सहयोगी सरकारें, वैश्विक वित्तीय इकाईयां, वाॅल स्ट्रीट के बैंक और रेटिंग एजेन्सियां ही नहीं उनकी मीडिया तक शामिल है। जो वित्तीय संकट को पैदा करते हैं, उसे बढ़ाते हैं, और फिर सहयोग, समर्थन और आर्थिक विकास के नाम पर उसे अपने कब्जे में ले लेते हैं। सरकारों को जन विरोधी बना देते हैं।

ग्रीस की चुनी हुई सरकारें अपने देश की आम जनता के साथ वैश्विक संकट के शुरूआती दौर से ही, वैधानिक धोखाधड़ी कर रही है। 2008 से यही हो रहा है, कि एक सरकार ग्रीस की दिवालिया होती अर्थव्यवस्था को बचाने के लिये यूरोपीय संघ, यूरोपीय सेण्ट्रल बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष के कठोर शर्तो केे तहत कर्ज लेती है, और अपने देश की आम जनता की सुविधाओं में, वेतन और पेनशनों में कटौती की घोषणां के साथ ही संसद के चुनाव की घोषणा कर देती है।

दूसरी सरकार अपने पूर्ववर्ती सरकार की मानी हुई शर्तो और कटौतियों की घोषणां को लागू करती हैं।

संसद में पक्ष और विपक्ष का कोई मतलब नहीं रहता।

जन असंतोष, जन प्रतिरोध और कटौतियों के खिलाफ जनप्रदर्शनों को लोकतंत्र के चुनावी प्रक्रिया से विकल्पहीन बना दिया जाता है।

ग्रीस में स्थितियां ऐसी बन गयी हैं, कि सरकारें चाहे जिसकी भी बनें, नीतियां यूरोपीय संघ, यूरोपीय सेण्ट्रल बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष -ट्रोइका- की ही चलती है। यही स्थिति कमो-बेश यूरो जोन के अधिकांश संकटग्रस्त देशों की है। सरकारों के बदलने से मुक्त व्यापार या बाजारवादी अर्थव्यवस्था की नीतियों में कोई बदलाव नहीं आता। एक बड़े कर्ज के बाद कर्ज के दूसरे किस्तों से बड़े कर्ज के भुगतान की ऐसी व्यवस्था विकसित की गयी है, कि संकटग्रस्त अर्थव्यवस्था का संकट घटने के बजाये बढ़ता चला जाता है। ग्रीस के साथ जो हुआ वहीं यूरोप की तीसरी और चैथी अर्थव्यवस्था स्पेन और इटली के साथ हो रहा है। शेष संकटग्रस्त छोटे यूरोपीय देशों की अर्थव्यवस्था के साथ भी यही किया जा रहा है।

जिसे देख कर यह साफ लगने लगता है, कि यूरोपीय संघ, यूरोपीय सेण्ट्रल बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष की नीतियां यूरो जोन के 19 देशों की अर्थव्यवस्था को वास्तविक रूप में अपने नियंत्रण में रखने की है, जहां जर्मनी और फ्रांस का वर्चस्व है। जिनकी मुद्रा -यूरो- एक है, और जिस पर यूरोपीय सेण्ट्रल बैंक का नियंत्रण है।

यूरो जोन का संकट यह है, कि यदि ग्रीस यूरो जाने से अलग होता है, तो कई देशों के लिये अलग होने की राहें खुल जायेंगी, और यदि वह यूरो जोन से अलग नहीं होता और ट्रोइका की शर्तों को भी नहीं मानता है, तो समझौते की शर्तें क्या होंगी?

ग्रीस की आम जनता ने, इस बीच दो महत्वपूर्ण काम किये हैं, जिसे आप निर्णायक कदम या निर्णय कह सकते हैं-

  • अब तक की जनविरोधी सरकारों और देश की बाजारवादी अर्थव्यवस्था समर्थक राजनीतिक दलों को अस्वीकार कर वहां की समाजवादी राजनीतिक दल एवं वामपंथियों को अपना समर्थन दिया।
  • देश के नव निर्वाचित प्रधानमंत्री सिप्रास की सरकार को बेलआउट पैकेज की शर्तों को न मानने का अधिकार दिया। उन्होंने यूरोपीय संघ, यूरोपीय सेण्ट्रल बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष को अस्विकार कर दिया।

यूरोप में जारी प्रदर्शनों के नारों पर नजर डालें तो चाहे वह ‘जर्मनी, फ्रांस, स्पेन, इटली और ब्रिटेन जैसी बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देश हों या पुर्तगाल, आयरलैण्ड, निदरलैण्ड, फिनलैण्ड, हाॅलैण्ड और शेष छोटी अर्थव्यवस्था वाले देश हों, वहां की सरकारों के खिलाफ हो रहे जन प्रदर्शनों में ‘हम सभी ग्रीक हैं‘ के नारों को तरजीह मिली है। इसलिये यदि ग्रीस की आम जनता के निर्णय को यूरोप की आम जनता के समर्थन के रूप में देखें तो यूरोपीय संघ का अस्तित्व ही संकटग्रस्त नजर आयेगा। और यह संकट आने वाले कल के लिये महत्वपूर्ण है। सर्बिया और हर्जोगोविना ने इस मामले में पहले ही निर्णायक पहल की है, जिसे पश्चिमी मीडिया ने कोई जगह नहीं दिया जहां के कामगर-मजदूरों ने समानांतर सरकार की व्यवस्था की।

ग्रीस की सिप्रास सरकार को लातिनी अमेरिका और कैरेबियन देशों के समाजवादी देशों का समर्थन हासिल है, जिन्हें साम्राज्यवादी ताकतों के खिलाफ, अपनी अर्थव्यवस्था निर्माण और विकास के जरिये समाजवाद का अनुभव हैं।

रूस और चीन का हित भी ग्रीस से जुड़ा हुआ है।

यूरोपीय संघ के द्वारा रूस के खिलाफ लगाये गये आर्थिक प्रतिबंधों की आलोचना ग्रीस की नयी सरकार ने ब्रुसेल्स सम्मेलन में किया, जहां नये प्रतिबंधों की घोषणां की गयी। यूरोप की कृषि उपज एवं पशुपालन उद्योग पर टिके कई यूरोपीय देश पहले से ही इस प्रतिबंधों के विरूद्ध हैं, जिनके लिये रूस सबसे बड़ा बाजार था। जिसने यूरोपीय प्रतिबंधों के विरूद्ध जवाबी कार्यवाही करते हुए न सिर्फ प्रतिबंधों की घोषणां की, बल्कि लातिनी अमेरिकी देशों से वैकल्पिक व्यवस्था कर यूरोप के लिये अपने बाजार को बंद कर दिया। यह प्रतिबंध रूस से ज्यादा यूरोपीय संघ की अर्थव्यवस्था के लिये घातक प्रमाणित हो रहा है।

रूस नहीं चाहता, कि ग्रीस यूरोपीय जोन से बाहर हो। जिस यूरोपीय गैस लाईन परियोजना को रूस ने यूरोपयी संघ के अडंगों की वजह से स्थगित कर, उसे तुर्की गैस पाईप लाईन में बदल दिया, उसी को वह ग्रीस की सीमा तक बढ़ा कर एक ‘आॅयल हब‘ बनाने की नीति पर काम शुरू कर चुका है, जो ग्रीस की लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था के लिये बड़ा सहयोगी होगा। जहां से तेल एवं प्राकृतिक गैस की आपूर्ति यूरोपीय बाजार तक संभव है। जिसके लिये ग्रीस का यूरोपीय जोन में रहना जरूरी है।

चीन ने ग्रीस की नयी सरकार का समर्थन किया है, साथ ही इस बात की संभावना व्यक्त किया है, कि ग्रीस यूरोजोन में बना रहेगा।

इस बात की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता कि चीन ग्रीस की दिवालिया होती अर्थव्यवस्था को संभालने के लिये आर्थिक सहयोग दे सकता है। जिससे यूरोप ही नहीं विश्व अर्थव्यवस्था में उसकी दखल का बढ़ना तय है। वैसे भी उसकी अर्थव्यवस्था का स्वरूप वैश्विक हो चुका है, और एशियायी ढांचागत निवेश बैंक उसके पास है। रूस और चीन के समर्थन से ‘ब्रिक्स बैंक‘ भी ग्रीस को सहयोग दे सकता है।

पहले ग्रीस के सामने यूरोपीय संघ, यूरोपीय सेण्ट्रल बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष की शर्तों को मानने के अलावा और कोई विकल्प नहीं था, क्योंकि ग्रीस की अर्थव्यवस्था के लिये, बेलआउट पैकेज की, किस्त की अनिवार्यता थी। जिसके लिये -‘सुविधा में कटौती‘ के नाम पर आम जनता को दी जाने वाली सुविधा में कटौती, पेंशन, वेतन में कटौती और कटौती के नये क्षेत्रों में विस्तार के साथ सरकार के संसाधनों को घटाने का प्रस्ताव और किस्तो की अदायगी का दबाव था, जिसमें बेलआउट का बहुत बड़ा हिस्सा कर्जदाताओं के पास पहुंच जाता था।

ग्रीस की सिप्रास सरकार उन शर्तों को न मानने और किस्तों की अदायगी सहित कटौती के दबाव पर पुर्नविचार चाहती थी। जिसे पूरी तरह से नकार दिया गया।

आज ग्रीस की वांमपथी सरकार के सामने भले ही विपरीत परिस्थितियां हैं, किंतु उसके पास अपनी अर्थव्यवस्था के पुनर्निर्माण के लिये न सिर्फ विकल्प है, बल्कि ग्रीस के 61 प्रतिशत लोगों का समर्थन है। 5 जुलाई के मतदान के बाद आये परिणामों ने स्पष्ट कर दिय कि ग्रीस की आम जनता मौजूदा समाजवादी सरकार के साथ है। ग्रीस के वामपंथी नेता और प्रधानमंत्री एलेक्सिस सिप्रास ने सरकार के पक्ष में आये परिणाम के बाद कहा- ‘‘सरकार कर्जदाताओं से वार्ता के लिये तैयार है।‘‘ उन्होंने कहा- ‘‘आज हम लोकतंत्र की जीत का जश्न मना रहे हैं। रविवार का दिन यूरोप के इतिहास का ऐतिहासिक दिन है, क्योंकि हमने यह सिद्ध कर दिया है, कि ‘‘विपरीत परिस्थितियों में भी लोकतंत्र को ब्लैकमेल नहीं किया जा सकता।‘‘

लेकिन यह ‘ब्लैक मेलिंग‘ वास्तव में यूरोजोन के सभी देशों का सिर्फ एक मुद्रा ही नहीं, राजनीतिक रूप से -बैंकों एवं वित्तीय इकाईयों के माध्यम से- अपने नियंत्रण में लेने की तय की गयी योजना है, इसलिये यह नहीं कहा जा सकता कि ग्रीस की समाजवादी सरकार इस ब्लैक मेलिंग को रोक पायेगी या नहीं? क्योंकि ब्लैकमेलरों के पास आर्थिक ही नहीं, वैश्विक स्तर पर कूटनीतिक और सामरिक ताकतें भी हैं। उनके नियंत्रण में ग्रीस की सरकार के संभलने की संभावनायें और स्त्रोत भी है। जिसे ना छोड़ना उनकी नीति है, और जिसे उनके कब्जे से बाहर निकाल पाना ग्रीस की सरकार के लिये आसान नहीं है।

हां इस बात की संभावनायें हैं, कि स्पेन, इटली, पुर्तगाल, आयरलैण्ड और ऐसे ही कर्ज के संकट में फंसे देशों में ऐसी सरकारें बन सकती हैं, जो ग्रीस की नयी सरकार की तरह अपने देश की आम जनता के पक्ष में खड़ी हो, और यूरोप की आम जनता की तरह उनके धु्रवीकरण की पहल हो। जैसी घटनायें लातिनी अमेरिका के समाजवादी देशों में घट चुकी हैं, उसकी शुरूआत हो, और यूरोप में जन विरोधी सकरारें के विपरीत जनसमर्थक सरकारों की मांग बढ़े। रूस और चीन के नेतृत्व में ‘मुक्त व्यापार के नये क्षेत्रों‘ में उनके लिये जगह बने। उनकी अर्थव्ययवस्था को संभालने में आर्थिक सहयोग और राज्य के अस्तित्व को बचाने में मदद मिले।

इतिहास यह तय कर चुका है, कि यूरोप और विश्व समुदाय के लिये ग्रीस लीबिया की तरह स्थायी सबक बने।

ग्रीस की समाजवादी सरकार जन समर्थन के साथ यूरोपीय संघ, यूरोपीय सेण्ट्रल बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष की वार्ता के मेज पर है।

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