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सुकांत भट्टाचार्य की चार कविताएं

sukanta-bhattacharya1. सिगरेट

मै हूँ सिगरेट
पर तुम लोग मुझे जीने क्यों नहीं देते ?
हमें क्यूँ जलाकर नि:शेष करते हो ?
क्यूँ इतनी अल्प आयु है हमारी ?
मानवता की क्या दुहाई तुम दोगे ?

हम लोगों की कीमत बहुत ही कम है इस पृथ्वी पर |
तभी तो तुम लोग हमारा शोषण कर पाते हो ?
विलासिता की सामग्री समझ जलाकर ख़त्म कर देते हो ?
तुम लोगों के ही शोषण के खिचांव से हम राख होते हैं :
तुम लोग निविड़ रहो आराम के उत्ताप से |

तुम लोगों का आराम : हमारी मृत्यु !
इस तरह चलेगा कितने काल तक ?
और कितने काल तक हम नि :शब्द आवाज़ देकर बुलाएँ
आयु – हरण कारी तिल – तिल अपघात को ?

दिन और रात्रि —– रात्रि और दिन :
तुम हमारा शोषण कर रहे हो हर पल —
हमें विश्राम नहीं पलभर , मजदूरी नहीं —
नहीं जरा सा भी आराम |

इसलिए, और नहीं ;
और अब नहीं रहेंगे बंदी बन
डिब्बों और पैकेटों में
उँगलियों में और जेबों में ;
सोने से मढ़े सिगरेट केसों में हमारी सांसें रुद्ध नहीं होंगी अब
हम निकल पड़ेंगे ,
सभी एक जुट हो , एकत्र हो —–
उसके बाद हमारे असतर्क समय में
ज्वलंत होकर छिटक पड़ेंगे तुम लोगों के हाथों से
बिस्तरों पर या कपड़ों पर ,
सारा घर जलाकर उसके भीतर मार देंगे तुम्हे ,
जिस तरह तुम लोगों ने हमें जलाकर मारा है हमें इतने काल से | |

 

2. माचिस की काड़ी

मै हूँ एक छोटी सी माचिस की काड़ी इतना नगण्य , शायद नज़र ही न आता होऊं ;
फिर भी जान लो
मुह में मेरे चुभ रहा है बारूद ——
सीने में मेरे जल रहा उठाने को तैयार तेज़ उच्छ्वास ;
मै हूँ एक माचिस की काड़ी |

याद है उस दिन कितना हैरान परेशान हो उठा था ?
जब घर के कोने में ही जल उठी थी आग ————
मुझे अवज्ञा से न बुझा कर दूर फैंक दिया गया था इसलिए !
कितने ही घरों को जलाकर राख किया ,
कितने ही प्रासादों [ महलों ] को किया है धुलिसात
मैंने अकेले ही —– मै एक छोटी सी माचिस की काड़ी |

वैसे ही अनेक नगर , अनेक राज्यों को कर सकता हूँ तहसनहस
तब भी क्या अवज्ञा से देखोगे हमें ?
याद नहीं ? उस दिन ————-
हम जल उठे थे एक संग एक ही डिब्बे में ;
घबड़ा गए थे ————
हमने सुना था तुम्हारे विवर्ण मुख का अंतर्नाद |

हम लोगों की जो असीम शक्ति है
उसे तो अनुभव किया होगा बारम्बार ;
फिर भी क्यूँ नहीं समझ पाते ,
हम नहीं रहेंगे बंदी तुम लोगों के पैकटों में
हम निकल पड़ेंगे , हम बिखर जायेंगे
शहरों , कस्बों , गाँवों———–और दिगंत से दिगंत |
हम बार – बार जलते हैं , नितांत अवहेलना में ——-
वह तो तुम सब जानते ही हो !
किन्तु तुम लोग नहीं जान पाते :
कब हम जल उठेंगे ———-
एक संग सब ———- आखिरी बार | |

 

3. १९४० ……… अनुभव …….

अवाक् पृथ्वी | अवाक् कर दिया तुमने |
जन्म से ही देखता हूँ छुब्ध स्वदेश भूमि |
अवाक् पृथ्वी |हम लोग हैं पराधीन
अवाक् ,कितनी तेजी से जमा हो रहा है,
क्रोध दिन दिन ———
अवाक् पृथ्वी |अवाक् करते हो तुम ,और भी
जब देखता हूँ इस देश में सिर्फ होता है मृत्यु का ही कारोबार|
हिसाब का बही –खाता जब भी लिया है हाथों में
देखा है सिर्फ लिखा हुआ रक्त का ही खर्च उसमे ,
इस देश में जन्म लेकर सिर्फ
पदाघात ही मिला,
अवाक् पृथ्वी | सलाम ,तुझे सलाम |

 

4. १९४६……..अनुभव …..

विद्रोह आज विद्रोह चारों तरफ ,
मै लिखता जा रहा हूँ उन्ही दिनों को पंचांग में ,
इतना विद्रोह किसीने कभी नहीं देखा ,
हर तरफ से उठ रही अबाध्यता की तरंग ,
स्वप्न शिखर से उतर आओ सब ————-
सुनाई देता है ,सुन रहे हो उद्दाम कलरव ?
नया इतिहास लिख रहे ये हड़ताल ,
रक्तों से चित्रित है सभी द्वार |
आज भी घृणित और कुचले लोग हैं ,दलित हैं ,
देखो आज वे सवेग से दौड़ रहे हैं ,
उन्ही के दलों के पीछे मै भी दौड़ रहा हूँ ,
उन्ही के मध्य मैं भी मरता जी रहा हूँ |
तभी तो चल रहा है लिखना इन दिनों पंचांग ———
विद्रोह आज | विप्लव है चारों तरफ |

 

mita-das

अनुवाद- मीता दास
६३/४ नेहरू नगर वेस्ट
भिलाई, छत्तीसगढ़, ४९००२०

प्रस्तुति : नित्यानंद गायेन

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3 comments

  1. too good poems mam…bhut hi saral bhasha me asharan bat ko prstut kiya gya h

  2. आग लगानेवाली हैं सुकांत भट्टाचार्य की कविताएं! एक आम और नकारात्मक सी वस्तु -सिगरेट के माध्यम से शोषण की पूरी दास्ताँ! मीता दास ने इतना सहज रूपांतर किया है कि अनुवाद नहीं, मूल का अहसास हो रहा है।

  3. Putushotam. kumar

    आप की कविताए बहुत ही बेहतरीन है,

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