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तुर्की की आम जनता युद्ध के खिलाफ है

turkeyतुर्की की मौजूदा छवि एक युद्ध उन्मादी देश की हो गयी है, जहां की आम जनता अपनी सरकार का विरोध कर रही है, और सरकार जन भवनाओं के विपरीत, साम्राज्यवादी हितों से संचालित हो रही है। नाटो सैन्य संगठन के द्वारा जमीन से हवा में मार करने वाले पेटि्रयाट मिसाइल की तैनाती के निर्णय ने लोगों को सड़कों पर ला दिया है। 26 दिसम्बर को हजारों तुर्कीवासी देश की राजधानी अंकरा की सड़कों पर उतर आये। वो सीरिया-तुर्की सीमा पर पेटि्रयाट मिसाइल की तैनाती का विरोध कर रहे थे। यह प्रदर्शन तुर्की की कम्युनिस्ट पार्टी के द्वारा किया गया।

प्रदर्शनकारियों के पोस्टर पर लिखा था-

”नाटो वापस जाओ!”

”हम युद्ध नहीं चाहते!”

”हम साम्राज्यवाद का विरोध करते हैं!”

एक प्रदर्शनकारी ने कहा- ”तुर्की की वर्तमान सरकार अमेरिका को खुश करने के लिये, तुर्की की सीमा पर पेटि्रयाट मिसाइल तैनात कर रही है।”

साम्राज्यवादी युद्ध के खिलाफ एकजुट होती तुर्की की आम जनता, अपने देश को किसी भी कीमत पर, सीरिया के मुददे में, साम्राज्यवादी अमेरिका और पशिचमी देशाें के साथ खड़ा करना नहीं चाहती है। उन्होंने सीरिया की आम जनता के पक्ष में नारे लगाये। एक अन्य प्रदर्शनकारी ने कहा- ”अमेरिकी मध्य-पूर्व के प्राकृतिक संसाधनों को लूटना चाहते हैं। हम तुर्की के लोग इसे रोकने के लिये जो भी कर सकते हैं, करेंगे।”

25 दिसम्बर को तुर्की की प्रमुख विपक्षी पार्टी -रिपबिलकन पिपुल्स पार्टी- ने कहा कि- ”लीबियायी और सउदी विद्रोही तुर्की की सीमा से आराम से सीरिया में घुसपैठ कर रहे हैं।” वो अरब जगत के अमेरिकी समर्थक राष्ट्रों के कटटरपंथियों को -जिनमें अल-कायदा के आतंकी भी शामिल हैं- सीरियायी विद्रोहियों की मदद के लिये भेज रहे हैं, ताकि वहां की बशर-अल-असद की सरकार को उखाड़ा जा सके। तुर्की की सरकार इन पेशेवर विद्रोहियों की मदद कर रही है और पूरे क्षेत्र में युद्ध के माहौल को बनाने की कोशिश कर रही है। उसने व्यापक जनविरोध के बाद भी तुर्की की संसद से आवश्यकता होने पर सीरिया के विरूद्ध सैन्य कार्यवाही करने का प्रस्ताव भी पारित करा लिया है। तुर्की की सरकार ने नाटो सैन्य संगठन को अपने देश में पेटि्रयाट मिसाइलों की तैनाती का आग्रह भी किया। वह इसे तुर्की की सुरक्षा के लिये उठाया गया कदम मानती है।

21 दिसम्बर को नाटो ने तुर्की के तीन शहरों में पेटि्रयाट मिसाइलों के तैनाती की घोषणा की। घोषणा में कहा गया है कि ”जर्मनी कहरामनमारस में, निंदरलैण्ड अदन में और अमेरिका गाजापटटी में अपने मिसाइलों को तैनात करेगा।”

इस घोषणा के साथ ही तुर्की में सरकार विरोधी, युद्ध और साम्राज्यवाद विरोधी प्रदर्शनों का तांता सा लग गया है। तुर्की की आम जनता युद्ध उन्मत सरकार और साम्राज्यवादी शकितयों का व्यापक विरोध कर रही है।

नाटो की घोषणा में यह जानकारी दी गयी है कि अमेरिका और जर्मनी दो-दो पेटि्रयाट बैट्री और एंटी मिसाइल, 400 ट्रूप्स, तथा निदरलैण्ड दो पेटि्रयाट बैट्री और 360 ट्रूप्स तुर्की भेजेंगे। हर एक पेटि्रयाट बैट्री में 12 मिसाइल लांचर होते हैं। इन मिसाइलों की तैनाती इसी महीने के अंत तक हो जायेगी।

तुर्की और नाटो संगठन के इस निर्णय के खिलाफ रूस ने सख्त आपतित दर्ज करार्इ है। चीन भी इस बात को मानता है कि इस निर्णय से क्षेत्रीय तनाव में वृद्धि होगी। तुर्की की सत्तारूढ़ सरकार का तर्क है कि ”यह तुर्की की सुरक्षा के लिये उठाया गया कदम है। इसका उपयोग सिर्फ देश की सुरक्षा के लिये किया जायेगा।” रूस की आपतितयों का जवाब देते हुए तुर्की के प्रधानमंत्री ने आश्वस्त किया है कि ”इन पेटि्रयाट मिसाइलों का उपयोग किसी भी आक्रामक अभियान में नहीं किया जायेगा।”

एक रिपोर्ट के अनुसार यह अनुमान है कि ”2,000 विदेशी सैनिक तुर्की-सीरिया सीमा पर इन मिसाइलों को आपरेट करने के लिये तैनात किये जायेंगे। सभी पेटि्रयाट मिसाइल बैट्री नाटो के नियंत्रण में रहेंगी। रिपोर्ट के अनुसार इन विदेशी सैनिकों के सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी तुर्की की सेना की होगी। जिसके लिये सैंकडों तुर्की सेना के जवान तैनात किये जायेंगे।” यह सवाल बिल्कुल स्वाभाविक है कि नाटो के नियंत्रण में रहने वाले इन 6 मिसाइलों को आपरेट करने का अधिकार यदि तुर्की की सेना के पास नहीं है, तो तुर्की की सरकार अपने आश्वासनों को पूरा कैसे कर सकती है? जबकि इन मिसाइलों की जद में सिर्फ सीरिया ही नहीं रूस के सीमांत क्षेत्र भी आते हैं। र्इरान पर भी इससे दबाव बनाया जा रहा है। नाटो का मकसद सिर्फ तुर्की की सुरक्षा नहीं, बलिक सीरियायी विद्रोहियों को अपना समर्थन देना और क्षेत्रीय संतुलन को अपने पक्ष में करना है।

22 दिसम्बर को तुर्की की राजधानी अंकरा और अनताक्या में हजारों लोगों ने सीरिया के बारे में तुर्की के विदेश नीति के विरूद्ध प्रदर्शन किये। प्रदर्शनकारियों ने सरकार विरोधी नारे लगाये और सीरिया में हो रहे नरसंहार के लिये प्रधानमंत्री रेजेप तार्इप एरडोगन को जिम्मेदार ठहराया, जो अमेरिकी हितों के लिये काम कर रहे हैं। उन्होंने अमेरिका और जर्मनी विरोधी नारे लगाये और नाटो के झण्डे को जलाया।

अमेरिका का विरोध तुर्की में लगातार बढ़ता जा रहा है। युद्ध को बढ़ावा देने वाली उसकी विस्तारवादी नीतियों के खिलाफ 14 दिसम्बर को अदन में हजारों-हजार लोगों ने प्रदर्शन किये। उन्होंने उन अरब और पशिचमी देशों का भी विरोध किया, जो सीरिया में विद्रोहियों को बढ़ावा दे रहे हैं। प्रदर्शनकारियों ने अपनी सरकार के द्वारा पशिचमी ताकतों की नीतियों से संचालित होने की निंदा की। प्रदर्शनकारियों के प्रवक्ता ने कहा- ”विद्रोही और आतंकवादियों ने कुछ ही दिनों में सीरिया के दस हजार से अधिक अलाविटस को मौत के घाट उतार दिया और पशिचमी तथा साम्राज्यवाद समर्थक मीडिया बेशमोर्ं की तरह कहती है कि उन्हें राष्ट्रपति बशर-अल-असद की सेना ने मारा है।” उन्होंने आगे कहा कि ”अमेरिका और उसके सहयोगी झूठ बोल रहे हैं कि वो सीरिया में प्रजातंत्र लाना चाहते हैं। सच यह है कि वो वहां महीनों से नरसंहार कर रहे हैं।” उन्होंने जोर दे कर कहा कि ”उस संकटग्रस्त देश में होने वाले सभी अपराध के लिये साम्राज्यवादी ताकतें जिम्मेदार हैं।” प्रदर्शनकारियों ने ”कंधे से कंधा मिला कर, फासिस्ट ताकतों के खिलाफ संघर्ष” करने की घोषणायें की। उन्होंने तुर्की की आम जनता से अमेरिकी साम्राज्यवाद, पशिचमी शकितयों और अरब जगत के उनके सहयोगी देशों के खिलाफ एकजुट होने की अपील की।

नाटो संगठन के द्वारा पेटि्रयाट मिसाइलों की तैनाती के पहले से ही सीरिया के बारे में तुर्की सरकार की नीतियों का विरोध आम जनता करती रही है। किंतु, मिसाइलों की तैनाती के निर्णय ने विरोध को उग्र कर दिया है। अब यह विरोध तुर्की की संसद में भी नजर आने लगा है। संसद में नेशनल मोमेण्ट पार्टी के लीडर देवलेट बाहचीलि ने पड़ोसी देश सीरिया के मौजूदा हालात पर टिप्पणी करते हुए सरकार के नीतियों की आलोचना की। उन्होंने संसद में कहा कि ”पड़ोसी देशों से हमारी नीति समस्याहीन सम्बंधों की रही है, मगर दूर्भाग्यवश नीतियां बदल गयी हैं और तुर्की क्षेत्रीय टकराव का केंद्र बन गया है।”

उन्होंने सरकार से अपनी विदेश नीति की समीक्षा करने और उसे राष्ट्रहित से जोड़ने की अपील की। किंतु तुर्की की मौजूदा सरकार सीरिया के खिलाफ नाटो संगठन के अभियान का हिस्सा बन गयी है। तुर्की की मीडिया ने जानकारी दी कि अमेरिका की 27 सदस्यीय टीम तुर्की के दक्षिण-पूर्वी क्षेत्र गाजापटटी पहुंच गयी है। और नाटो ने सीरिया की सीमा पर पेटि्रयाट मिसाइलों की तैनाती का काम शुरू कर दिया है। जिसके खिलाफ 6 जनवरी को गाजापटटी क्षेत्र में विशाल प्रदर्शन हुआ। उन्होंने अपने देश की सरकार, अमेरिका, जर्मनी और निदरलैण्ड के विरूद्ध नारे लगाये। 8 जनवरी को निदरलैण्ड ने भी अपने 2 पेटि्रयाट मिसाइल तुर्की रवाना कर दिये। उसके 30 सैनिक तुर्की पहुंच गये हैं। 20 जर्मन सैनिकों की पहली खेप पहुंच गयी है। जर्मनी ने घोषणा की है कि ”21 जनवरी तक उसके मिसाइल तुर्की के सिकन्दरिया पोर्ट तक पहुंच जायेंगे।”

14 जनवरी को नाटो प्रवक्ता ने बताया कि ”फरवरी के शुरूआत तक मिसाइलों की तैनाती का काम पूरा हो जायेगा और इस बात की उम्मीद है कि मिसाइलें अपना काम शुरू कर देंगी।”

तुर्की की सरकार और नाटो संगठन के इस निर्णय से क्षेत्रीय तनाव में ही वृद्धि नहीं हुर्इ है, बलिक तुर्की में भी तनाव बढ़ गया है। वह राजनीतिक संकट का शिकार होता जा रहा है। आम जनता और संसद की विपक्षी पार्टियां सरकार के इस निर्णय का विरोध कर रही हैं। 5 जनवरी को तुर्की के स्थानीय समाचार -टर्किश ओरटाडोगु डेलि- को दिये अपने इन्टरव्यू में तुर्की के प्रमुख राजनेता और ‘नेशनलिस्ट मोमेण्ट पार्टी’ के अहमेत केनान जानरिकुलु ने कहा कि ”तुर्की की मौजूदा सरकार के द्वारा अपने पड़ोसी देश (सीरिया) के लिये अपनार्इ जाने वाली गलत नीतियों की वजह से देश में राजनीतिक असिथरता पैदा हो गयी है। हम राजनीतिक संकट से घिर गये हैं।” उन्होंने कहा कि ”देश के अंदर और बाहर की अव्यवसिथत राजनीतिक सिथतियाें ने तुर्की के राजनीतिक सिथरता को नुक्सान पहुंचाया है, और देश आर्थिक संकट और विखण्डन के कगार तक पहुंच गय है।” उन्होंने जोर देकर कहा कि ”तुर्की के नये संविधान के निर्माण पर लगा रोक, देश के अंदर आतंक को मिल रहा बढ़ावा और अपने पड़ोसी देश के विरूद्ध उकसावे की नीतियों ने तुर्की को गहरे संकट में डाल दिया है। लोगों की आर्थिक सिथतियां तेजी से बिगड़ रही हैं, कीमतों में भारी वृद्धि हो रही है, बेरोजगारी दर तेजी से बढ़ रही है। हम आर्थिक एवं राजनीतिक संकट से घिर गये हैं।” उन्होंने अंत में कहा कि ”आर्थिक सिथरता के लिये राजनीतिक सिथरता की जरूरत होती है, और अंकरा इस समय इस क्षेत्र की राजनीतिक समस्याओं में उलझा हुआ है।” जो अमेरिका और नाटो संगठन की मौजूदगी से विस्फोटक हो चुका है।

तुर्की की आम जनता तुर्की और उस क्षेत्र में अमेरिका और यूरोपीय देशों की मौजूदगी के सख्त खिलाफ है। उनका विरोध नाटो संगठन के द्वारा पेटि्रयाट मिसार्इलाें की तैनाती के साथ बढ़ता जा रहा है। इस बढ़ते हुए विरोध में अब इस्लाम का मुददा भी जुड़ गया है। यह साम्राज्यवाद विरोधी विरोध को गलत दिशा देने की फासिस्ट सोच भी हो सकती है। 12 जनवरी को दक्षिणी तुर्की के अदन प्रांत के लोगों ने इनसरलाइक एयर बेस में ठहरे अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी के खिलाफ भारी विरोध प्रदर्शन किया। उन्होंने अमेरिकी सैनिकों के द्वारा इस्लाम को अपवित्र करने का आरोप भी लगाया। रिपोर्ट के अनुसार -नववर्ष की पूर्व संध्या पर शराब के नशे में धुत्त अमेरिकी सैनिकों की एक टुकड़ी, वहां के स्थानीय मसिजद में घुस कर न सिर्फ तोड़-फोड़ की बलिक उन्होंने कुरान की प्रतियों को भी नष्ट कर दिया।

प्रदर्शनकारी उन अमेरिकी सैनिकों की पहचान कर उन्हें सजा देने और तुर्की से अमेरिकी सैनिकों को बाहर निकालने की मांग कर रहे थे। अदन की प्रांतीय सरकार ने इस घटना के जांच के आदेश दिये हैं। हालांकि, तुर्की की सेना के द्वारा, अमेरिकी सेना के टुकडियों के द्वारा, ऐसे किसी भी घटना को अंजाम देने की बात से, इंकार किया गया है। इसके बाद भी विरोध जारी है।

तुर्किस वक्र्स पार्टी के उपचेयरमैन ने तुर्की में नाटो सेना के तैनाती की निंदा करते हुए सभी राजनीतिक दल, संगठन और मजदूर यूनियनों से इस कदम के खिलाफ प्रदर्शन करने की अपील की है। उन्होंने तुर्की सरकार -प्रधानमंत्री- के द्वारा नाटो के द्वारा तुर्की के अधिग्रहण को बढ़ावा देने की नीति पर जर्बदस्त हमला करते हुए कहा कि ”पशिचमी प्रांत के इजि़मर में एक नया नाटो बेस स्थापित करने से, पूरा मध्य पूर्व अमेरिकी युद्ध का ‘कमाणिडग सेण्टर’ बन जायेगा।” उन्होंने नाटो सेना को तुर्की में हो रहे अपराधों के लिये दोषी ठहराते हुए कहा कि ”नाटो की सैनिक टुकडियां तुर्की में एक स्थान से दूसरे स्थान तक आजादी से आ-जा रही हैं।” जो कि तुर्की के बिगड़ते हुए आर्थिक एवं राजनीतिक सिथतियाें के लिये जिम्मेदार है। उन्होंने अंकरा सरकार से इसे रोकने और आम जनता से इनका विरोध करने की अपील की। नाटो सैनिकों की बढ़ती हुर्इ गतिविधियों ने तुर्की की आम जनता को आंदोलित कर दिया है। वो किसी भी कीमत पर अपने पड़ोसी देश -सीरिया- के खिलाफ नाटो अभियान का विरोध कर रहे हैं। तुर्की की आम जनता हर कदम पर सीरिया की आम जनता का समर्थन कर रही है, जहां अमेरिका, पशिचमी देश और उनके सहयोगी अरब देशों के घुसपैठिये विद्रोहियों को मदद पहुंचा रहे हैं। यही कारण है कि सीरिया की सीमा पर, तुर्की में नाटो मिसाइलों की तैनाती का विरोध वो हर कदम पर कर रहे हैं। 20 जनवरी को भी दक्षिणी शहर अनताक्या में विरोध प्रदर्शन हुआ। जिस दिन 240 जर्मन सैनिक तुर्की पहुंचे। ये सैनिक जर्मन एयर फोर्स के हैं। कुल 350 विदेशी सैनिकों की तैनाती होनी है। 21 जनवरी को जर्मन एवं निदरलैण्ड के मिसाइल तुर्की पहुंच गये हैं।

नाटो मिसाइलों की तैनाती के खिलाफ भड़के जनअसंतोष को दबाने के लिये तुर्की की सरकार अब दमन का सहारा ले रही है। वह सरकार के विरोध को किसी भी कीमत पर कुचल देना चाहती है। ‘रिपोर्टस विदआउट बार्डस’ ने कहा है कि ”तुर्की पत्रकारों के लिये सबसे बड़ा जेल” बना गया है। जब से प्रधानमंत्री रेजेप तार्इप एरडोगन ने सत्ता संभाला है, वहां की मीडिया सरकारी दबाव में आ गयी है। अब तक सैंकड़ो पत्रकारों को, सरकार की नीतियों का विरोध करने के जुर्म में जेलों में डाला जा चुका है। टर्किश डेलि अक्साम के अनुसार- ”तुर्की अभिव्यकित की स्वतंत्रता का उल्लंघन करने वाला सबसे बड़ा देश बन गया है। 2012 से प्रेस की स्वतंत्रता का दमन तेज हो गया है।” समाचार पत्र ने कहा है कि पिछले साल बड़ी संख्या में पत्रकारों को गिरफ्तार किया गया है, क्योंकि प्रधानमंत्री को अपने नीतियों की आलोचना बर्दास्त नहीं है। पिछले महीने ‘पे्रस फ्रीडम वाच लाक कमेटी आफ प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट’ ने तुर्की को पत्रकारों के लिये 2012 का सबसे बड़ा जेल करार दिया है। इस रिपोर्ट के अनुसार 1 दिसम्बर 2012 तक 49 प्रत्रकारों को हिरासत में लिया गया है। इनमें दर्जनों कुर्द पत्रकार एवं संपादक हैं, जिन पर आतंकी होने का आरोप लगाया गया है। कर्इ पत्रकारों पर सरकार विरोधी षडयंत्रकारी होने का आरोप लगाया गया है। रिपोर्ट में तुर्की के प्रधानमंत्री पर अभिव्यकित की स्वतंत्रता और आतंकवाद के बीच फर्क न करने का आरोप लगाया गया है।

तुर्की में नाटो और अमेरिका का विरोध बढ़ता जा रहा है। ‘अमेरिकी एयर फोर्स बेस’ तक पहुंचने की कोशिश कर रहे 25 प्रदर्शनकारियों को हिरासत में ले लिया गया, जहां तैनात किये जाने वाले अमेरिकी मिसाइलों को जोड़ने का काम किया जा रहा है। तुर्की की राजधानी अंकरा में भी अमेरिकी दूतावास के सामने सीरिया के प्रति हस्तक्षेपवादी नीतियों के विरूद्ध प्रदर्शन हुआ अपने ही देश की सरकार, अमेरिकी साम्राज्यवाद और नाटो सेना का विरोध, युद्ध की आंशकाओं को देखते हुए तुर्की की सीमाओं को लांघ जायेगा, यह तय है।

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