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ग्रीस के बारे में मीडिया जो नहीं बताती

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मुख्य धारा की मीडिया ‘यूरोप में कर्ज के संकट‘ की बात नहीं करती। उनके लिये यह सवाल ही नहीं है, कि संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोप की सरकारों पर कर्ज का बोझ कैसे लद गया? या इतना कर्ज आया कहां से, कि सरकारें दिवालियापन के कगार पर पहुंच गयीं? जबकि सदियों से तीसरी दुनिया के देशों को, उनके प्राकृतिक संसाधन और लोगों को, वो लूटते रहे हैं। उनकी आयातित समृद्धि का आधार ही एशिया, अफ्रीका और लातिनी अमेरिकी महाद्वीपों के देशों का अबाध शोषण और दमन रहा है।

आज भी वो यही कर रहे हैं। इसके बाद भी उनकी अर्थव्यवस्था संकटग्रस्त है, उनकी वैश्विक संरचना के सामने गंभीर चुनौतियां हैं। जिसे हल कर पाना उनकी नवउदारवादी वैश्वीकरण की सोच और मुक्त बाजारवादी अर्थव्यवस्था के बस से बाहर है।

उन्हें सोचने की फुर्सत नहीं है?

या वो सोचना नहीं चाहते हैं?

या उन्हें सोचने की मनाही है?

ग्रीस के आर्थिक संकट के साथ हम इस बारे में आपसे चर्चा जरूर करेंगे।

‘ग्रीस के बारे में मीडिया के द्वारा जो बातें नहीं बताई जाती हैं‘ क्रिस कान्थन का जिक्र भी हम आधार की तरह करेंगे।

दुनियाभर की मुख्य धारा की मीडिया ग्रीस के बारे में यही खबरें फैला रही है, कि ग्रीस में आर्थिक संकट, सरकारों के द्वारा काफी पैसा खर्च किये जाने की वजह से है। उदार बैंकों ने उसे पैसे दिये मगर ग्रीस अभी भी उन पैसों का भुगतान करने की स्थिति में नहीं है, क्योंकि उसने उन पैसों को गलत तरीके से खर्च कर दिया है।

सुनने में ये सभी बातें सही और मुनासिब लगती हैं, मगर असल में यह बहुत बड़ा झूठ है।

ऐसा सिर्फ ग्रीस के मामले में ही नहीं हैं, बल्कि यह आर्थिक रूप से संकटग्रस्त स्पेन, पुर्तगाल, इटली और आयरलैण्ड जैसे यूरोपीय देशों के मामले में भी उतना ही बड़ा झूठ है। इन सभी देशों की आम जनता भी भयानक कटौतियों का सामना कर रही है। ये पूरी तरह से वही झूठ है, जिसका की उपयोग कर के वित्तीय इकाईयां – विश्व बैंक – अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष – और कारपोरेशन दशकों  से कई लातिनी अमेरिकी, एशियायी और अफ्रीकी देशों का शोषण करती आयी हैं। आर्थिक विकास और सामाजिक विकास योजनाओं को दिये गये आर्थिक सहयोग के जरिये उनकी प्राकृतिक सम्पदा का दोहन और आम लोगों का अबाध शोषण करती आयी है।

वास्तव में ग्रीस खुद असफल नहीं हुआ, उसे असफल किया गया है। उसकी असफलता में ही कर्ज देने वालों का हित था। संक्षेप में कहें तो यूरोपीय संघ, यूरोपीय सेण्ट्रल बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष -ट्रोइका- ने ग्रीस की सरकार को तबाह किया। जान-बूझ कर उसे उस कर्ज की ओर धकेल दिया गया, जिसका भुगतान वह नहीं कर सके, ताकि अभिजात्यवर्गी पूंजीपति वर्ग और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकाईयां एवं दैत्याकार कारपोरेशन आने वाली अस्थिरता और आम जनता की गरीबी से लाभ कमा सके। यह यूरोप में ग्रीस और उसके जैसे देशों की आम जनता की मुसीबतों और बद्हाली से मुनाफा कमाने के लिये रची गयी साजिश है। ग्रीस और उसकी अर्थव्यवस्था को अपने कब्जे में लेने की साजिश।

यह सब कुछ वैसे ही हुआ है, जैसे हाॅलीवुड की माफियाछाप फिल्मों में होता है। जिस जमीन, जिस कारोबार को माफिया सरगना अपने कब्जे में लेना चाहता है, उस कारोबार में ऐसी अस्थिरता और असुरक्षा पैदा की जाती है, कि मुसीबतों से वह घिर जाये। उसे हत्या, गोलीबारी और आतंक से भी परहेज नहीं होता। और जब उस कारोबार की शाख गिरने लग जाती है, मुसीबतें बढ़ जाती हैं, तब माफिया सरगना -गाॅड फादर- की तरह दोस्ताना तरीके से आर्थिक सहयोग देता है। बदले में उस कारोबार को संभालने के लिये, उसके कारोबारी लेन-देन एकाउण्ट, की देख-रेख करने लगता है, पहले के पूरे इंतजाम और प्रबंध को बदल देता है, और फिर एक दिन ऐसा भी आता है, कि कारोबार का मालिकाना हक उसके पास होता है, ‘ओनरशिप‘ बदल जाती है। पूर्व मालिक के हाथों से सब कुछ निकल जाता है।

ग्रीस के साथ यही हुआ है। उसके संकट को ऐसे ही बढ़ाया गया है, और सहयोग भी ऐसे ही दिया गया, ताकि उसकी अर्थव्यवस्था पर ‘ट्रोइका‘ का कब्जा हो। ग्रीस की सरकार उसके नियंत्रण में हो।

वास्तव में यह अन्तर्राष्ट्रीय वित्ती माफिया का खेल है। ऐसी कहानी है, जिसे चार चरणों में पूरा किया गया।

आईये हम सिलसिलेवार तरीके से, इस खेले गये खेल और लिखी गयी कहानी का चरणबद्ध विश्लेषण करें।

पहला चरण-

ग्रीस का इस जाल में फंसने का पहला और सबसे बड़ा कारण है 2008 का ‘महान वित्तीय संकट‘। जिसका आविष्कार अन्तर्राष्ट्रीय बैंकर्स और वाॅलस्ट्रीट ने किया। उन्होंने ऐसे लोगों और कम्पनियों को कर्ज देने का आविष्कार किया जो संकटग्रस्त हैं, जिनकी शाख लगातार गिरनी है, ओर जो लिये गये कर्ज को वापस करने की क्षमता नहीं रखते। ऐसे ही लोगों और कम्पनियों को कर्ज देकर, दिये गये कर्ज को -जिसे वापस नहीं होना है- उसे माॅर्टगेज-बैक्ड सिक्योरिटी के तौर पर दुनियाभर के देशों के वित्तीय संस्थानों को बेच दिया गया। ये ऐसे वित्तीय टाईम बम थे जिनका फटना तय था, और यही हुआ। जिससे इन्होंने काफी बड़ा मुनाफा कमाया।

इन अपराधिक गतिविधियों को संभव बनाने वालों में शामिल थे बैंकिंग सिस्टम के कई ब्रान्च, एस एण्ड पी, फिट्ज और मूडीज जैसी रेटिंग एजेंसियों का समूह, जिन्होने पहले से तय असफल होने वाले ‘वित्तीय उत्पाद‘ को शानदार रेटिंग देने का काम किया। अनैतिक और बेशर्म राजनेता, जैसे कि टोनी ब्लेयर (पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री) को बड़े बैंकों ने बड़ा भुगतान इसलिये किया कि वो फेरीवालों की तरह घूम-घूम कर इस घातक नीतियों के पैकेज को पेंशन फण्ड, म्यूनिसपल और यूरोप के आस-पास के देशों में बेचें। (भारत में यह कौन कर रहा है? बताने की जरूरत नहीं है।)

बैंक और वाॅलस्ट्रीट के गुरूओं ने इस स्कीम से सैंकड़ों बिलियन डाॅलर कमाये। मगर यह एक बड़ी योजना का मात्र पहला चरण हैै। इसके शेष तीन चरणों में और भी कमाई है।

दूसरा चरण-

दूसरे चरण की शुरूआत फाईनेंशियल टाईम बमों के फटने के साथ हुई। वैश्विक अर्थव्यवस्था में तब अफरा-तफरी मच गयी जब कमर्शियल और इन्वेस्टमेंट बैंक्स कुछ ही सप्ताह में दिवालिया होने के कगार पर पहुंच गये। राज्य और केन्द्र की सरकारों ने देखा कि उनके निवेश और सम्पत्तियां समाप्त हो गयीं। चारो ओर अव्यवस्था और आर्थिक गड़बडि़यां फैल गईं।

मुर्दा खा कर जीने वाले गोल्डमैन सैक्स और अन्य बड़े बैंकों ने इस अव्यवस्था और आर्थिक अनिश्चयता से तीन तरीकों से मुनाफा कमाया-

  • बड़े बैंकों ने छोटे बैंकों को कौडि़यों के मोल खरीद लिया। जैसे कि लेहमन ब्रदर्स और वाशिंगटन म्यूचूअल कौडि़यों के मोल बिक गये।
  • सट्टेबाजी को नयी ऊंचाईयां मिली। गोल्डमैन सैक्स और सट्टेबाजी में अंदरूनी तौर पर जुड़े जाॅन पाॅल्सन -जिसने हाल ही में हावर्ड को 400 मिलियन डाॅलर का डोनेशन दिया है- ने शर्त लगाई कि बैंकों के द्वारा बनाई गयी अपनी सुरक्षा में विस्फोट हो जायेगा। पाॅल्सन ने कई बिलियन डाॅलर की कमाई की। और मीडिया ने उसके सूझ-बूझ की तारीफ की। जश्न मनाया।
  • घाव पर नमक की तरह ही था कि बड़े बैंकों ने उन्हीं आम नागरिकों से ‘बेलआउट‘ की मांग की जिनके जीवन को उन्होंने तबाह कर दिया था। अमेरिका में ही इन बैंकों को अमेरिकी सरकार से करोड़ों बिलियन डाॅलर मिले और फेडरल रिजर्व से कई ट्रिलियन डाॅलर मिले। जो आम नागरिकों का टैक्स के रूप में सरकार के पास जमा पैसा था। इन बैंकों ने बेलआउट पैकेज से भारी मुनाफा कमाया।

ग्रीस में वहां के बैंकों को 30 बिलियन डाॅलर से ज्यादा का बेलआउट पैकेज मिला। ग्रीस की गैरजिम्मेदार सरकार को ऐसे ही पूंजीवादी बैंकों को बेलआउट देना पड़ा जो लम्बे समय से सिर्फ मुनाफा के लिये काम कर रहे हैं।

तीसरा चरण-

तीसरे चरण की शुरूआत तब होती है, जब अंतर्राष्ट्रीय परजीवी बैंक किसी देश की सरकार को, बड़ा कर्ज लेने का दबाव बना कर, उसे कर्ज लेने के लिये विवश कर देती है। इसकेे बाद ही दूसरों का खून पी कर अपनी सेहत बनाने वाले ये बैंक अपने सबसे सफल आजमाये हुए नुस्खे आजमाते हैं। वो उस देश के सरकारी बाॅण्ड का दर्जा घटा देते हैं। साल 2009 के शुरूआत में उन्होंने ‘बाॅण्ड के ब्याज दर‘ को बढ़ा दिया। इससे ग्रीस के लिये कर्ज लेना और ज्यादा खर्चीला हो गया, यहां तक कि उसे मौजूदा बाॅण्ड के भुगतान को भी स्थगित करना पड़ा।

साल 2009 से 2010 के मध्य के बीच ग्रीस के 10 वर्षीय बाॅण्ड का लाभ लगभग तीन गुणा हो गया। इस नृःसंश वित्तीय हमले ने ग्रीस की सरकारी को घुटनो पर ला दिया। इन बैंकों ने अपना पहला दांव ग्रीस को 110 बिलियन यूरो का कर्ज दे कर जीत लिया।

अब बैंकों और वित्त्ीय इकाईयों ने ग्रीस की राजनीति को अपने कब्जे में लेना शुरू किया। साल 2011 में जब ग्रीस के प्रधानमंत्री ने दूसरे बेल आउट पैकेज को लेने से मना कर दिया, तब उन बैंको ने यूरोपीय सेण्ट्रल बैंक के वाॅयस प्रेसिडेण्ट को उनकी जगह बैठा दिया बिना किसी चुनाव के। और इस नये व्यक्ति ने क्या किया? उन्होंने बैंकों के द्वारा रखी गयी सभी शर्तों को स्वीकार कर लिया। जहां-जहां उन्हें दस्तखत करने को कहा गया, वहां-वहां उन्होंने दस्तखत कर दिया।

ग्रीस की इस घटना के ठीक दूसरे दिन ही, बिल्कुल ऐसी ही घटना इटली में घटित हुई, जहां प्रधानमंत्री ने इस्तीफा दिया और उनकी जगह ऐसी ही एक बैंकर को बैठा दिया गया। इसकेे ठीक 10 दिन बाद स्पेन में समय से पहले चुनाव हुआ और वहां भी ऐसे ही एक बैंकर की जीत हुई।
इस तरह ग्रीस की कठपुतली सरकार के साथ ही इटली और स्पेन में भी, इन ताकतों की सरकारें बन गयीं। नवम्बर 2011 का महीना कठपुतली सरकार बनाने वालों के लिये सबसे अच्छा महीना था।

कुछ महीने बाद, 2012 में बाॅण्ड बाजार को इस तरह प्रभावित किया गया कि ग्रीस बाॅण्ड पर मिलने वाले लाभ को 50 प्रतिशत बढ़ा दिया। इस वित्तीय आतंकवाद का वांछित प्रभाव पड़ा। ग्रीस की संसद दूसरे बेलआउट के लिये -जो पहले से भी बड़ा था- तैयार हो गयी।

अब, यहां एक और तथ्य जिसे ज्यादातर लोग नहीं जानते या समझ नहीं पाते कि यह कर्ज एक सामान्य कर्ज नहीं था, जैसा कि आप क्रेडिट कार्ड या बैंक से लेते हैं, बल्कि इस कर्ज के साथ विशेष शर्त जुड़ी हुई थी, कि ‘‘ग्रीस अपने सरकारी एवं सार्वजनिक सम्पत्ति का निजीकरण करेगा।‘‘ गोल्डमैन सैक्स, यूरोपीय सेण्ट्रल बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष ने अपने हिसाब से ग्रीस को अपने सांचे में ढ़ालना शुरू कर दिया। वह आर्थिक रूप से उनकी गिरफ्त में था। वो अपनी मनमानी करने का वित्तीय अधिकार प्राप्त कर चुके थे।

चौथा चरण-

अब ‘कटौती‘ और ‘ढांचागत सुधार‘ के नाम पर ग्रीस के साथ बद्सलूकियों का दौर शुरू हुआ। उसे अपमानित करने और उसकी अर्थव्यवस्था को अपने कब्जे में लेने की कार्यवाही शुरू हो गयी। जो कर्ज उस पर थोपा गया था, उसकी वजह से ग्रीस को अपने महत्व्पूर्ण आय के स्त्रोतों वाली सम्पत्तियों को अभिजात्य वर्गी लोगों और अंतर्राष्ट्रीय काॅरपोरेशनों को बेचना पड़ा। बिजली, पानी, पोस्ट आॅफिस, एयरपोर्ट सेवायें, राष्ट्रीय कृत बैंक, टैली कम्यूनिकेशन, बंदरगाह (जो कि दुनिया के सबसे बड़े शिपिंग इण्डस्ट्रीज़ में से एक है) का निजीकरण करना पड़ा।

110 बिलियन यूरोप के बेल आउट पैकेज (कर्ज) से ग्रीस की लूट शुरू हो गयी। चालाक बैंकरों ने मांग की कि सभी मीडिया का तत्काल निजीकरण किया जाये। जिसका मतलब यह होता कि ग्रीस को ‘फोटोजनिक टीवी ऐंकर‘ मिलते जो हर दिन एक नया ‘प्रोपोगेण्डा‘ का प्रचार करेंगे। जो लोगों को बतायेंगे कि ‘धूर्त और लालची बैंकर्स‘ उनकी ‘सुरक्षा और विकास‘ के लिये कितने जरूरी हैं? वो उन्हीं के आर्थिक विकास को सुरक्षित करने में लगे हैं। वो लोगों को बतायेंगे कि किसी विकल्प को खोजने से अच्छा है, कटौतियों के लिये गुलामी। इन वित्तीय ताकतों ने मीडिया का अर्थ ही बदल दिया। आम लोगों के प्रति अपनी जिम्मेदारी से काट दिया। मीडिया का मतलब -‘‘जो है उसे स्वीकार करना और लोगों को विकल्पहीन बनाने के अभियान को आगे बढ़ाना हो गया। उनके जेहन में यह बात ही नहीं रह गयी है, कि आम लोगों क लिये उनकी कोई जिम्मेदारी भी है।

अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकाई और बैंकों ने ग्रीस की अर्थ व्यवस्था और ग्रीस की सरकार को अपने कब्जे में ले लिया। वो सरकारी बजट के हर एक मद का निर्धारण करने लगे।

इन्होंने ग्रीस के सैन्य बजट में कटौती की?

नहीं।

बड़े काॅरपोरेट घरानों और कुलीनों पर सरकारी कर बढ़ाया?

नहीं।

इस तरह का माइक्रोे-मैनेजमेण्ट -हर एक चीज पर पैनी नजर रखना- कर्ज लेने और देने वालों के बीच नहीं होता।

निजीकरण और निरंकुश बैंको के माइक्रो-मैनेजमेण्ट में क्या होता है?

सरकार के आय -रेवेन्यू- में लगातार गिरावट आती है।

कर्ज बढ़ता चला जाता है।

जिसे ठीक करने के लिये सरकारी खर्च में कटौतियां की जाती हैं। जिसका मतलब है-

सरकारी क्षेत्र के कामगरों को काम से निकालना।

न्यूनतम वेतन और पेंशन में कटौती।

सरकार द्वारा जारी सामाजिक कार्यों एवं जनकल्याण योजना में कटौती।

सरकारी करों में ऐसी वृद्धि जो समाज के सुविधा सम्पन्न 1 प्रतिशत लोगों को छोड़ कर 99 प्रतिशत लोगों पर लागू हो।

ऐसी चीजों पर भरी कर जिसका उपयोग 99 प्रतिशत लोग करते हैं।

ग्रीस में अब तक 50 प्रतिशत पेंशन कटौतियां लागू हो चुकी हैं, और सरकारी करों में 20 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

इन सभी उपायों और सुधारों की वजह से ही ग्रीस वित्तीय आपदा का शिकार हो गया है। जो 1930 के अमेरिकी महामंदी से भी भयानक है।

इसके बाद भी कर्जदाताओं ने करों में वृद्धि और नये कटौतियों की शर्तें पेश कर दी है।

इस तरह किसी देश की अर्थव्यवस्था को तबाह कर, उस देश के लोगों को मुसीबतों में डाल कर लाभ कमाने का काम कोई विशेष मनोरोगी ही कर सकता है। यूरोपीय संघ, यूरोपीय सेण्ट्रल बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और पूंजीपति वर्ग ने यह किया।

यदि ग्रीस के लोगों को इन कटौतियों का सच और शर्तों के तहत कर्ज का सच पता होता हो वह उसमें नहीं फंसते।

इस तरह की घटनायें स्पेन, इटली, पुर्तगाल और आयरलैण्ड तथा अन्य हर उस देश में घट रही है, जो कटौती और कर्ज से दबे हैं। इसका सबसे दुखद और नकारात्मक पक्ष यह है, कि वैश्विक वित्तीय इकाई और सम्राज्यवादी ताकतों के द्वारा तय की गयी नीतियां नयी नहीं हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय से ही लूट का यह अभ्यास अनगिनत बार ‘विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष ने एशिया, अफ्रीका और लातिनी अमेरिकी देशों में करते रहे हैं। कह सकते हैं, कि यूरोपीय देश उनका नया शिकार हैं, जिनकी सरकारें तीसरी दुनिया के देशों के खिलाफ इनका साथ देती रही हैं। वो भी इस लूट के अभ्यास में शामिल रही हैं।

यही इस (वित्तीय) वैश्विक सत्ता का सारांश है। मुट्ठी भर दैत्याकार काॅरपोरेशन, उनके द्वारा संचालित बैंकों की व्यवस्था और मुट्ठी भर लोगों के द्वारा जो नियंत्रित है। जहां अधिकार विहीन सरकारें और अधिकार विहीन लोग ही होंगे। कह सकते हैं- दासों की तरह।

तीसरी दुनिया के ज्यादातर देश वैश्विक वित्तीय ताकतों के जाल में फंसे हैं, और फंसते जा रहे हैं- जिनमें भारत भी एक है। जिनके लिये ग्रीस कोई सबक है या नहीं? हम नहीं जानते। क्योंकि उन देशों की सरकारों की तरह मीडिया भी आम जनता को धोखा दे रही है।

एक बात और बताना जरूरी है, कि हम इस बात को नही भूल सकते हैं, कि यूरोपीय वामपंथ या यूरो समाजवाद संशोधनवादियों का ऐसा संस्करण रहा है, जो पूंजीवादी लोकतंत्र के नाम से धोखा खाती और आम लोगों को धोखा देती रही है। ग्रीस में क्या होगा? देखते हैं।

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