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जण गण मन अधिनायक जय हे!

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नरेंद्र मोदी के साल भर की उपलब्धियों का प्रचार थोड़ा थमा हैं

उनके गुब्बारे में हवा भरने वाले, अब भी हवा भर रहे हैं।

उनकी छवि को चमकाने वाले, अब भी उसे रगड़ रहे हैं।

मगर, उनकी हवाबाजी और उनकी रगड़घस्स की रफ्तार में गिरावट दर्ज की जा सकती है। वैसे, यह गिरावट फौरी है। इससे अपने लिये संभावनाओं की उड़ान भरने वालों की तादाद चाहे जितनी बड़ी हो, इसे इस व्यवस्था की गिरावट के रूप में दर्ज करने वालों की तादाद बड़ी है। और यहीं इस व्यवस्था से निजात पाने की उम्मीदें घटती है।

सच बतायें, तो अभी इस देश में जो लोग इस व्यवस्था से छुटकारा पाने की उम्मीद पाल रहे हैं -बिना कुछ किये- या जो लोग छटपटा रहे हैं -जो भी बन पड़ रहा है, उसे करते हुए- उन दोनों के लिये समय बुरा है। उनके साथ, अभी कुछ अच्छ होने वाला नहीं है।

अवसरवादी- इस अवसर का फायदा उठायेंगे,

जिन्हें हताश होना है,- वो आत्म हत्या कर लेंगे,

इसके बाद भी जो बच जाते हैं, समझिये उसी के लिये जनपथ है। वहीं से खालिश लोग भी निकलेंगे।

राजपथ को छोड़ ही दीजिये, वहां दलालों की भरमार हैं सरकार के दलाल, और राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय वित्तीय ताकतों की दलाल सरकारें हैं। वो हर एक मुद्दे को ऐसे देखते हैं, कि पलीते में आग कहां से लगायें कि पलीता जलता रहे और मुद्दा बचा रहे। आम जनता धोखे में रहे और सपने बुनती रहे। लप्पड़-थप्पड़ खाये और यह मानती रहे कि झटके हल्के हैं। और झटका जब जोर से लगे, तब कुछ करने के लायक ही न रहे।

लोकतांत्रिक जनचेतना की समझ भी यही है।

ऐसा होने पर ही लोकतंत्र मजबूत होता है- जैसा लोकतंत्र है।

अमित शाह कहते हैं -वे भाजपा के सबसे तगड़े और तंदरूस्त अध्यक्ष हैं- कि ‘‘यहां जितने भी सांसद बैठे हैं, सभी पहले के हारे हुए हैं। 2014 का लोकसभा चुनाव जीते हैं, तो मोदी की छवि के कारण। इसलिये, यदि प्रधानमंत्री के गुड लिस्ट में रहना है, तो पंचायत चुनाव में दल, बल और बाहुबल सब ले कर मैदान में कूद पड़ो, कुछ भी करो लेकिन चुनाव जीत कर दिखाओं, नहीं तो परिणाम भुगतने को तैयार रहो।‘‘

उन्होंने 11 जुलाई 2015 को कानपुर में महा सम्पर्क अभियान के तहत यह कहा। जहां केंद्रीय मंत्री कलराज मिश्र, निरंजन ज्योति, विनय कनियार सहित यूपी के और भी सांसद बैठे थे। उन्होंने सबके मुंह पर तमाचा जड़ा गोया कहना चाहते हों- ‘‘मोदी के कठपुतलियों, आज तुम जो कुछ भी हो, वह मोदी की कृपा है। कृपा पात्र बने रहना है, तो जीत का अभियान जारी रखो।‘‘ और यह अभियान लोहे का ऐसा चना भी नहीं है, जिसे घोड़े चबा भी न सकें।

दल है- भाजपा की केंद्र में सरकार और संघ का संगठन है।

बल है- पैसे और प्रचार की कोई कमी नहीं।

बाहुबल है- इस बारे में कुछ भी कहना ठीक नहीं है, बस इतना ही कहना काफी है, कि जितना भी बन पड़े एवीएम मशीन का बटन दबाओ और दबवाओ।

और मोदी कृपा की शर्त यदि जीत है, तो जीत के लिये जान हाजिर है। और हाजिर नहीं किये तो

एक दल,

एक नेता,

किसका सिद्धांत है, इतिहास पलट लें। पता चल जायेगा कि क्या होता है?

मौजूदा लोकतंत्र कुछ ऐसा ही लोकतंत्र है। इसलिये वास्तविक लोकतंत्र के लिये सरकार कितना बड़ा खतरा है। बताने की जरूरत नहीं। जिन्हें बताना चाहिये, लोकतंत्र का वह चैथा स्तम्भ बिल्कुल सपाट है। और यदि आप उसे करीब से देखेंगे तो, आपको लगेगा- बड़़ा झुट्ठा है। मीडिया में ज्यादातर लोग ऐसे ही हैं। जिनके हाथ में नकली पेन है, जिनकी मेज पर नकली कागज है, जिससे वो नकली खबरें रचते हैं। नकली नजरिया बनाते हैं। यही उनकी काबलियत है, वो नकली लोकतंत्र के ही काबिल हैं। जहां सरकार आम जनता या अपने देश के नागरिकों को धोखे में रखती हैं, और अपनी इमानदारी या आम जनता के लिये जो जिम्मेदारियां होती है, उन्हें वहां गिरवी रख आती है- इस इरादे के साथ कि उसे डूबना ही है- जहां से मुनाफे का हिस्सा मिलता है।

अभी आपात काल की बड़ी धूम मचाई गयी थी। 1975 के आंतरिक आपात काल का। श्रीमती इंदिरा गांधी को तानाशाह और तानाशाही के गहरे अनुभव का बड़े ही शान से रोना रोया गया।

आपात काल और श्रीमती गांधी का विरोध करना हमने भी कुबूल किया था। लेकिन आज एक सवाल है, कि श्रीमती इंदिरा गांधी यदि तानाशाह थीं, तो उन्होंने 1977 में लोकसभा का चुनाव क्यों कराया? वो हार कैसे गयीं?

अपने कार्यकाल में, उन्होंने 42वां संविधान संशोधन क्यों पास कराया?
प्रिविपर्स को बंद क्यों किया?

कोयले का राष्ट्रीय करण क्यों किया?

बंधुआ मजदूरों को मुक्ति क्यों मिली?

बैंकों का राष्ट्रीयकरण क्यों हुआ?

गुटनिर्पेक्ष आंदोलन को मजबूती क्यों दी?

सोवियत संघ से सम्बंधों को वैश्विक सम्बंधों का आधार क्यों बनाया?

और अंत में फिर वही सवाल कि वो आम चुनाव हार क्यों गयीं?

क्या कोई अमित शाह उन्हें नहीं मिला? या उन्हें अमित शाह जैसे लोगों की जरूरत नहीं थी?

मनमोहन सिंह से पहले की कांग्रेस सरकार चाहे जैसी थी, किंतु खुले रूप में सरकार उद्योगपतियों -राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की दुकान तो नहीं थी?

मनमोहन सिंह की दुकान सिर्फ इसलिये उजड़ गयी कि उन्होंने भूमि अधिग्रहण के लिये खुलेआम बंदूक निकालना मंजूर नहीं किया। यह सच है कि गोलियां चलीं, लोगों को उजाड़ा गया, यह भी हुआ कि मुक्त व्यापार का दरवाजा खुला और विषैली हवाओं ने लोगों के साथ लोकतंत्र की जान भी ली। लोकतंत्र मरा भी उसी दौरान। सरकार की नीतियों को -खासकर आार्थिक- तय करने का अधिकार भी राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय कम्पनियों और वैश्विक वित्तीय इकाईयों को मिला।

अमित शाह नरेंद्र मोदी को भारत की सूरत बना रहे हैं।

अपने लोगों को आदेश दे रहे हैं, कि मोदी सरकार के एक साल की उपलब्धियों का बखान करें। उत्तर प्रदेश से पहले बिहार को फतह करे।

आपके लिये मोदी सरकार की उपलब्धियां क्या हैं? यह तो आप तय करें, मगर हमें निजीकरण को राष्ट्रीय नीति बनाना मंजूर नहीं।

श्रम कानून और भूमि अधिग्रहण कानूनों में संशोधन मंजूर नहीं।

लोकतंत्र के खिलाफ एकाधिकार और वित्तीय तानाशाही मंजूर  नहीं।

वैश्विक वित्तीय ताकतों की जिन शर्तों को मान कर मोदी सरकार सत्तारूढ़़ हुई है, वो शर्तें हमें मंजूर नहीं है।किसी भी राजनीतिक दल का सिर्फ अपनी सरकार बनाने की नीतियों से संचालित होना और किसी भी कीमत पर अपने देश की आम जनता की दुखती रग, दिमाग और हाथ को पकड़ कर और पकड़वा कर उसे अपने पक्ष में करना और यह भी कहना, कि उस दल के ‘जनप्रतिनिधियों‘ की जीत आम जनता से नहीं, नरेंद्र मोदी की कृपा की वजह से है, अपने आप में आम जनता के खिलाफ है।

‘महा सम्पर्क अभियान‘ समीक्षा बैठक में उत्तर प्रदेश में अपनी सरकार बनाने के लिये सपा सरकार के गुण्डागर्दी को बेनकाब करने की नीतियां बनायी गयी। बाराबंकी थाने में जलायी गयी महिला और शाहजहांपुर में पत्रकार को जला कर मारने का उल्लेख हुआ। 2017 के विधान सभा चुनाव के लिये 1 करोड़ 86 लाख भाजपा सदस्य बनाये गये अभियान का उल्लेख भी किया गया। मगर यह भी हुआ, कि भाजपा अध्यक्ष को ‘ज्ञापन देने की जिद्द को‘ भाजपायियों ने अपराध मान लिया और आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद कटियार और उपाध्यक्ष अमित गुप्ता को भाजपा कार्यकर्ताओं ने दौड़ा-दौड़ा कर पीटा। अखबारी खबर है, कि पुलिस बड़ी मुश्किल से  उन्हें बचा पायी। ज्ञापन देने के लिये अड़े इंटक नेताओं की भी पिटाई की गयी। हां, उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ सपाईयों की पीटाई तो नहीं हुई, लेकिन 217 सपाईयों ने गिरफ्तारी जरूर दी।

इन मामलों में चाहे जितनी भी सच्चाई हो, मगर इतनी बात तय है, ‘बाहुबल‘ का प्रदर्शन भाजपा कार्यकर्ताओं ने जरूर किया। यह कर के दिखा दिया कि ‘‘अध्यक्ष महोदय- जो तगड़े और तंदरूस्त हैं- जोर आजमाइश में हम उन्नीस नहीं पड़ेंगे।‘‘ संभवतः आने वाले कल में, मोदी जी के ‘गुड लिस्ट‘ में ऐसे ही  लोगों का नाम होगा, जो अपने ‘हिट लिस्ट‘ उनके ‘गुड लिस्ट‘ से जोडेंगे।

हमारी चिंता भाजपा, मोदी, संघ या शाह के लिये नहीं है।

हमारी चिंता देश, लोकतंत्र और गुब्बारे में हवा की तरह भरे जा रहे लोगों के लिये हैं। उन लोगों के लिये है, जिन्हें ‘राई-छाई‘ होना है। जिन्हें राजनीतिक एकाधिकार और वित्तीय तानाशाही के सामने खड़ा होना है, या ‘जन गण मन अधिनायक जय हे‘ गाना है।

और सबसे बड़ी बात तो यह है, कि जो अधिनायक है, उसे नजर नहीं आना है। जिसे गुलामी की प्रथा से प्यार-मोहब्बत है।

आप नहीं मानेंगे, हम भी नहीं मानते, मगर गुलामी की प्रथा इतनी लाभदायक है, कि उसे बदलने का मन, सरकारें नहीं बना पातीं। काम और कारोबार अच्छी तरह हो, इसलिये जरूरी है, कि हम इसे जनतंत्र कहें।

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