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निजी कम्पनियों के लिये भयमुक्त वातावरण का मामला

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एक खबर है, कि ‘‘खाद्य उद्योग से जुड़ी कम्पनियें ने साफ-साफ कह दिया है, कि नये माहौल में निवेश करना असंभव है।‘‘

ऐसा क्या हो गया देश के माहौल में, कि निजी कम्पनियां इस कदर भड़क और बिदक रही हैं? सरकार को धकिया और धमका रही हैं?

क्या सरकार के पांव उखड़ रहे हैं?

क्या सरकार की नीतियां बदल रही हैं?

क्या सरकार को आम जनता की फिक्र ज्यादा होने लगी है?

क्या सरकार बाजार को निजी कम्पनियों से मुक्त करना चाहती है?

नहीं! लूट और कमाई के किसी भी योजना पर प्रतिबंध नहीं है।

सवा सौ करोड़़ लोगों का मालिक खुश है। ऐसी कोई बात ही नहीं हुई, कि सरकार को निजी कम्पनियां धमकायें। मगर वो धमका भी रही हैं, और धकिया भी रही हैं। यह बता रही है, कि सरकार ‘इंस्पेक्टर राज‘ ला रही है।

वजह बस इतनी है, कि ‘‘नेस्ले मैगी पर लगे रोक से वो नाराज हैं।‘‘

और बड़े मियां नाराज हैं, तो छोटे मियां की नाराजगी बिरादरी का मामला है। वैसे मामला ‘हमारी बिल्ली हम ही पर म्यांयु‘ का भी है। कि हमारी सरकार और ‘इंस्पेक्टर राज‘ हम पर ही। जबकि सरकार के पास इंस्पेक्टरी दिखाने के लिये जगह की कमी नहीं है।

जो अपनी जमीन विकास योजनाओं के लिये नहीं दे रहे हैं,

जो ऐसे लोगों का साथ दे रहे हैं,

जो जल, जंगल, जमीन के लिये लड़ रहे हैं,

जो आंतरिक सुरक्षा के लिये खतरा हैं,

जो जाहिल-गवांर, श्रम और संसाधनों को बेचने के खिलाफ हैं

जो सरकार की नीतियों के विरूद्ध हैं, इंस्पेक्टरी उनको दिखायें। उद्योग चेम्बर फिक्की और सीआइआइ के प्रतिनिधियों ने विभिन्न मंत्रालयां में घूम-घूम कर बता दिया कि ‘इंस्पेक्टर राज‘ हमारे लिये नहीं है। यदि इंस्पेक्टरी दिखायेंगे तो हम खाद्यान्न उद्योग में पैसा नहीं लगायेंगे।‘‘

सरकार को सीधे-सीधे ऐसी धमकी शायद पहली बार मिली।

यह केंद्र के मोदी सरकार की बड़ी उपलब्धि है।

मनमोहन सरकार भी औद्योगिक घरानों के दबाव में काम करती रही है, और दबती रही है, लेकिन मोदी सरकार के दबने की कोई सीमा नहीं होगी, क्योंकि जिन्होंने बैठाया है, वो उठा-बैठक कराने से चूकने वाले नहीं हैं। दुनिया भर में ऐसे लोगों की तादाद बढ़ी है, जो सरकारों से काम लेने के मामले में सख्त है। नेक दिल भी हैं, किसी सरकार को गिराने से पहले जता भी देते हैं।

इसलिये, सर्व साधारण को यह मानना चाहिये कि यह धमकी नहीं वैसी ही सख्ती है, जैसी सख्ती सरकार उन लोगों पर दिखाती है, जो आर्थिक विकास के मोदी माॅडल के खिलाफ हैं। जो ‘मेक इन इण्डिया‘ को देश के लिये स्थायी खतरा समझते हैं। जो समझते हैं, कि यह देश के प्राकृतिक संसाधन और मानव श्रम शक्ति की लूट है। जो बाजार के जबड़े में आदमी को डालना और उसे वहीं जीने के लिये विवश करना है। आज जो समस्यायें देश के सामने हैं, उससे निकलने के लिये कर्ज के ऐसे संकट में फंसना है, जिससे निकलने के लिये उन वैश्विक वित्तीय ताकतों से टकराना होगा, जिनका कोई अपना देश, अपना राष्ट्र या दीन-धरम नहीं है। वो ऐसे पगलाये हुए लोगों का समूह है- जिनके बारे में हम यकीन के साथ कह सकते हैं, कि उनका इलाज संभव नहीं है।

राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय निजी कम्पनियों के लिये मुनाफे से बड़ा कुछ भी नहीं है। इन्होंने दुनिया भर में व्यापार और बाजार का जाल बिछा लिया है, जिससे बाहर अब कोई नहीं। भारत में नेस्ले कम्पनी के नूडल्स ब्राण्ड मैगी को कई राज्यों में इसलिये प्रतिबंधित कर दिया गया है, कि वह निर्धारित मापदण्डों के आधार पर सही नहीं है। अब खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के सामने संकट यह है, कि निजी कम्पनियां धमकी यह दे रही हैं, कि ऐसे माहौल में नया निवेश करना संभव नहीं है। उद्योग चैम्बर फिक्की और सीआइआइ के अगुआई में खाद्य प्रसंस्करण से जुड़ी कम्पनियों के एक दल ने विभिन्न मंत्रालयों के प्रमुख अधिकारियों से मुलाकात की।

उन्होंने बताया, कि इस क्षेत्र की कम्पनियों के सामने इंस्पेक्टर राज का खतरा पैदा हो गया है। देश भर में खाद्य उद्योग से जुड़ी 100 से अधिक कम्पनियों को पिछले दो महीने के भीतर नोटिस जारी किया गया है। ‘‘भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं गुणवत्ता प्राधिकरा‘ ने एनर्जी ड्रिंक्स और प्रोटीन पाउडर की जांच की योजना बनायी है। जिसका प्रभाव कोल्ड ड्रिंक्स बनाने और बेचने वाली कम्पनियों पर पड़ेगा। कम्पनियां परेशान हैं, कि जहर बेचने की छूट का क्या होगा?

इधर मोदी साहब की सरकार परेशान है, कि ‘मेक इन इण्डिया‘ के तहत भारत को दुनिया का ‘फुड बाॅस्केट‘ बनाने का क्या होगा? 1.50 लाख करोड़ रूपये के भारतीय खाद्य प्रसंस्करण उद्योग को ‘फूड प्रोसेसिंग हब‘ बनाने केे आमंत्रण का क्या होगा? जबकि मोदी साहब की योजना कच्चा माल और सस्ता श्रम के साथ बाजार सौंपने और दुनिया भर में उसे बेच कर मालामाल होने की है।

खाद्य प्रसंस्करण मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने ‘‘भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं गुणवत्ता प्राधिकरण को देश में भय का वातावरण बनाने का दोषी करार दिया है।‘‘

अब आप ही बताईये भयभीत कौन है?

या तो खाद्य उत्पादन निजी कम्पनियां भयभीत है,

या सरकारें भयभीत है।

और वो क्यों भयभीत है?

खुली हुई बात है। बाजार में यदि माल नहीं होगा, तो मुनाफा कहां से आयेगा? और मुनाफे के बिना तो माहौल खराब होगा ही होगा। और जहां माहौल खराब है, वहां कोई निवेश क्यों करेगा? भय का माहौल तो बनेगा ही बनेगा।

मगर, सबसे ज्यादा भयभीत सरकार है, और उसके भय मुक्त होने के लिये निजी कम्पनियों का भय मुक्त होना जरूरी है। जो आसानी से भयमुक्त नहीं होतीं। इसलिये नहीं, कि वो अब वास्तव में सरकारों से डरती हैं, बल्कि इसलिये कि वो हर एक मौके का फायदा उठाना जानती हैं। ‘‘उनके लिये यह सरकार को अपने दबाव में लेने का मौका होता है, यह समझाने का मौका होता है, कि आप हमारे बिना न तो अपनी आर्थिक विकास योजनाओं को पूरा कर सकते हैं, ना ही अपनी सरकार चला सकते हैं।‘‘

हालांकि आर्थिक योजनायें उन्हीं की होती हैं, और सरकार भी उन्हीं की होती है।

कह सकते हैं, कि राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के लिये, नेस्ले जैसी घटनायें, अपनी सरकार को अपने नियंत्रण में रखने का अवसर है।

सरकार के लिये भी यह अवसर है-

  • अपनी प्रतिबद्धता और अपनी निष्ठा दर्शाने का,
  • केंद्र के नियंत्रण में राज्य की सरकारों को लेने का। उन्हें यह समझाने का, कि उनकी नीतियां केंद्र की नीतियों के अनुकूल होनी चाहिये।

सरकार (अभी सरकार नरेंद्र मोदी है) इसलिये निजी कम्पनियों और निवेशकों से डरती है, कि यदि उनकी फिक्र नहीं की गयी तो सरकार बदल जायेगी। आज जितनी वाहवाही और मौज है, कुछ भी नहीं रहेगा। इसलिये सरकार निजी कम्पनियों और निवेशकों को देश में भयमुक्त वातावरण देने में लगी हुई है।

आप कहेंगे- देश की आम जनता….?

सरकार कहे न कहे, हम तो यही कहेंगे- ‘‘जो मारे से नहीं मर रही है, वह खा कर क्या मरेगी। उसे मोदी राज का स्वाद चखने दें।‘‘

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