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पानी का मेढक

nityanandकल रात फिर मैंने सपना देखा |

लगातर तीन दिन तक बारिश के कारण दिल्ली की सड़के तालाब बन चुकी थीं | बड़ी –बड़ी गाड़ियाँ उनमें तैर रही थी ऐसा लग रहा था कि सार्क और व्हेल तैर रही हों समन्दर की सतह पर | मैं भी उसमें डूबा हुआ था मैं क्या मेरे आसपास के सभी लोग पूरे परिवार के साथ | हाँ मैं पानी में डूबने के बाद मेढक बन चुका था |

यहाँ तक तो ठीक था सब पर उससे आगे क्या देखता हूँ कि मेरे आस –पास गाय,भैंसे और आवारा सांडों का एक झुण्ड भी उसी पानी में तैर रहा है | तभी अचानक हरियाणा रोडवेज की एक बस , एक डीटीसी की बस और एक राक्षस जैसा ट्रक रेंगते हुए मेरी ओर बढ़ रहा था | मुझ मेढक की तो हालत पतली हो गयी थी | मैं सब कुछ पानी के भीतर करने लगा , हाँ वही सब कुछ जो एक कमजोर दिल वाला भय के कारण कर बैठता है | अच्छा तो यह हुआ कि मैं पानी में था नहीं तो मेरी इज्जत की तो बाट लग जाती | किसी तरह सभी भयकर वाहन रेंगते हुए गुजर गये | मैंने गहरी साँस ली | भैंसे मेरा चेहरा देख कर मुस्कुरा रहे थे |

अभी मैं सामान्य होने की कोशिश कर ही रहा था कि देखा एक मोटा आदमी जिसके सिर पर कम और दाढ़ी में ज्यादा बाल थे काँटा लेकर आ गया | उसके पीछे और भी बहुत से लोग थे जो उस आदमी का नाम लेकर जयगान का उद्घोष कर रहे थे |

सभी भाई जी की जय और जिंदाबाद चिल्ला रहे थे |

मैंने पानी से अपनी मुंडी और बाहर निकाली देखा की उस भयंकर आदमी के माथे पर तिलक है और बहुत ही भयवाह दिख रहा था वह |

फिर भी मैंने हिम्मत जुटा के पूछ लिया – सर आप कौन हैं ?

उस व्यक्ति ने पहले कुछ नहीं कहा , फिर रहस्यमय एक मुस्कान के साथ कहा –मैं जो भी हूँ , हूँ …|

मैंने पूछा – आप यहाँ क्या करने आये हैं ?

तो कहा बहुत देर से मैं तुम्हें मिस काल दे रहा था . तुम नहीं आये तो मुझे आना पड़ा |

और फिर उसने मुझे अपनी जेब से एक कमल का स्टीकर दिखाते हुए कहा – इसका सदस्य बनाने आया हूँ |

मैं इतना डर गया कि पानी में ही दौड़ने लगा |

नींद टूट गयी मेरी देखा कि मैं अपनी दोनों टांगों को जोर से बिस्तर पर मार रहा हूँ |

-नित्यानंद गायेन

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One comment

  1. नित्यानंद गायेन का गद्य घरघोर सामाजिक व्यंग्य को जन्म देता है ठीक उनकी कविताओं की तरह

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