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शैलेन्द्र कुमार शुक्ल की चार कविताएँ

shailendra shukla1. लखनऊ

जब भी मिलता है अकेले में
लखनऊ
जी भर कर गरियाता हूँ
एक बार सर तक नहीं उठाता
पान-मसाला और ज़र्दे को
गुटखे मे तब्दील कर कानून का मज़ाक उड़ता हुआ
एक अदना सा आदमी
गोबराए मुंह से थूक देता है
शहर के वक्ष पर
और लखनऊ उफ़ तक तक नहीं करता
कि अचानक याद आ जाता है
मिर्ज़ा हादी रुस्वा और
उसकी उसकी उमराव जान ‘अदा’
चौदहवीं के चाँद सी सूरत वाले लखनऊ
तुझे कौन सी गाली दूँ
उमराव जान की सिसकती हुई आवाज
आज भी मेरा कलेजा सालती है
सड़क के मुहाने पर खड़ी मुस्कुराती हुई कोठियों को देख कर
दर्द और हरा हो जाता है
कि दरकने लगती है आत्मा
कि सालने लगता है कलेजा
दीवार से कान लगा कर सुनता हूँ जब
यह तहज़ीब का शहर है
यहाँ हत्याएं तहज़ीब से होती हैं
तहज़ीब से मारी जाती हैं यहाँ औरतें
तहज़ीब से मारे जाते हैं यहाँ माशूम भूखे बच्चे
बेइंतहा देश के गदराए हुये बसंत में ।

 

2. नए शहर में

उस मौसम की याद
भूलने के बाद
बची है जो खाली जगह
सोचता हूँ
हैदराबाद के पहाड़ का
एक फटा हुआ
काला पत्थर
जो पहले लाल था
रख लूँ उसी जगह
और डुबो दूँ
लाल , काले और सफ़ेद
पानी में
ताकि यह कोई न कह सके
कि पहाड़ मर चुका है ।

 

3. तुम्हें खेलना नहीं आता

खिड़की पर आई है
एक छोटी चिड़िया
मुझे डाटने के लिए
कल पेड़ ने गिरा दिया
मेरे ऊपर एक पका हुआ फल
और हँसने लगा
एक लड़की जो निमकौड़िओं के गुच्छों से
पहनी है हार, नथ और पायलें
मेरे कंधे हिलाती हुई बोली
तुम्हें खेलना नहीं आता
मुंडेर पर घर की आया है
एक कौआ चिल्लाता हुआ
शायद कुछ कह रहा है माँ से
गाँव का सबसे बूढ़ा आदमी
खाँस रहा है खटिया पर
मांग रहा है एक लोटिया पानी मुझसे

शायद इस गाँव में मैं ही बचा हूँ अकेला
और सब शहर की तरफ देख रहें हैं
टकटकी लगाए
डरे हुये
सहमे हुये ।

 

4. बाबा का समय

बाबा के न रहने के बाद
लाठी का क़द सिर्फ डंडे भर रह गया है
लेकिन लाठी को
डंडा कहने मेँ उन्हेँ संकोच होता है
बाबा के हाथ में लाठी देखी थी जिसने
बाबा के न रहने के बाद
दो दो भांदौ पड़े एक ही साथ
उन कलमुँही रातोँ को मैँने रोते हुए देखा है।

निँबिया की छाहीँ कुछ सिमट सी गयी है
कि गुमसुम खड़ा है दऱख्त
पागलोँ की तरह मुँह लटकाये
अपने पतझार होने के इंतजार मेँ
बाबा के न रहने के बाद

तरवाहे तरे
कि खूँटी से टंगा है बाबा का लाल कुर्ता
आले मेँ रखी है बाबा के जूतोँ की जोड़ी
सुरमदानी पड़ी है लुढ़कती हुई
बूढ़ी आँखोँ का स्पर्श पाने के लिये
तिद्वारी के सामने पसरा पड़ा है
फूटी खपरैल से गिरा हुआ धूप का छोटा टुकड़ा
जैसे पूछ रहा है घर के लोगोँ से
क्या बुढ़ऊ नहीँ रहे !

बाबा के न रहने के पहले ही
नहीँ रहे थे बाबा के तेलियाये सीगोँ वाले बैल
अब वह लढ़ी भी नहीँ थी
जिसकी पैजनी मेँ बाँधा करते थे बाबा
लाल हरी रस्सियाँ
उन दिनोँ की एक फटी हुई पाखरी पड़ी है
भुसौरी के कोने मेँ
कि पड़ी है एक जाजिम
और एक गलीचा
धूल माटी को समेटे उन दिनोँ की

बाबा के न रहने के बाद
पड़ा है बाबा के जमाने का समय
बैलोँ के ख़ाली पड़े मुसिक्के चढ़ाए हुए
खारे मेँ अपने जिस्म को कसे हुए
सफरे पर सिमटा पड़ा है
बाबा के जमाने का समय
बाबा के न रहने के बाद ।

 

कवि परिचय:

शैलेन्द्र कुमार शुक्ल
जन्म- 01 जुलाई 1986 (उत्तर प्रदेश के जनपद सीतापुर में गाँव साहब नगर) ।
शिक्षा- प्राथमिक शिक्षा गाँव के सरकारी स्कूल से तथा उच्च शिक्षा लखनऊ, बनारस, हैदराबाद,और वर्धा के विश्वविद्यालयों से।
प्रकाशन- ‘बया’, ‘वागर्थ’, ‘संवेद’, ‘जनपथ’और ‘परिचय’ आदि पत्रिकाओं में कुछ कवितायें प्रकाशित।
संप्रति- शोधरत(पीएच.डी.), महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा, महाराष्ट्र
ई-मेल- shailendrashuklahcu@gmail.com

प्रस्तुति: नित्यानंद गायेन

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