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भूमि अधिग्रहण विधेयक- ठण्डे बस्ते की राजनीति

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केंद्र की मोदी सरकार ‘भूमि अधिग्रहण विधेयक‘ के मामले में संवैधानिक प्रावधानों के तहत अपने लिये गुंजाईशें बनाने और देश की आम जनता के लापरवाह होने का इंतजार कर रही है। वह जानती है, कि ऐसी गुंजाइशें हैं, और मुद्दे को यदि ठण्डे बस्ते में डालने का प्रचार हो जाये, तो बात धीरे-धीरे बन जाती है।

15 जुलाई 2015 को आयोजित नीति आयोग के संचालक समिति की बैठक में, जिसकी अध्यक्षता प्रधानमंत्री ने की, ऐसी गुंजाइशें तलाश ली गयीं और विधेयक को ठण्डे बस्ते में डालने का संदेश प्रचारित कर दिय गया। जिसका जिक्र हम आगे करेगे। पहले जान तो लें कि मोदी सरकारी ऐसा क्यों कर रही है? उसकी फिक्र कहां अंटकी है?

उसे अपनी फिक्र है।

राष्ट्रीय बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हितों की फिक्र है।

मेक इन इण्डिया के लिये आधारभूत ढांचा और पूंजी निवेशकों की फिक्र है। जो हाथ पकड़ कर और जरूरत पड़ने पर गिरेबां पकड़ कर काम कराने की ताकत रखती हैं।

मोदी सरकार दो बातें अच्छी तरह जानती है, कि-

  • चुनावी जनसमर्थन कितना दिखावटी और कितना वास्तविक है?
  • देश की 86 प्रतिशत आबादी -तमाम प्रचारों और आश्वासनों के बाद भी- भूमि अधिग्रहण विधेयक के खिलाफ है।

ग्रामीण क्षेत्रों में विरोध न सिर्फ तीखा हुआ है बल्कि विरोधियों के स्वर आपस में जुड़ने लगे हैं। और यह जुड़ाव किसी भी काॅरपोरेट सरकार के लिये सबसे बड़ा खतरा है। जहां राजनीतिक दलों का खास कोई दखल नहीं है। जो बहुमत की सरकार, विपक्ष के हाय-तौबा और संसद के आंकड़ों और बकवास से बाहर है।

यह विरोध उन जन ताकतों की ओर बढ़ रहा है, जिसे सरकार माओवादियों की सूरत लगा कर कुचलना चाहती है, क्योंकि माओवादि संगठित विरोध का हिस्सा हैं। जिन्हें विकास विरोधी, आतंकवादी और देशद्रोही आरोपित किया जा चुका है। जिनके खिलाफ घोषित और अघोषित रूप से ‘सख्त कार्यवाही‘ की पहल हो चुकी है, नीतियों को अंतिम रूप दिया जा चुका है। ‘मीडिया वार‘ बहुत पहले से शुरू है। जिन्हें रास्ते से हटाना सरकारों के लिये जरूरी है, क्योंकि वो खनन एवं कारखानों के लिये निजी कम्पनियों से अनगिनत समझौते कर चुकी है। जिसके लिये बस्तियों को उजाड़ना, गांवों को खाली कराना जरूरी है। जहां ‘जान देंगे जमीन नहीं‘ का स्लोगन दीवारों पर लिखा है। इनमें से ज्यादातर वह क्षेत्र हैं, जो आदिवासी बाहुल्य है और जहां माओवादियों की पकड़ और मौजूदगी है। यह भी सच है, कि इन क्षेत्रों में सरकारी हिंसा और दमन का जवाब माओवादी ही दे रहे हैं। वे ही ऐसे दमन और हिंसा के खिलाफ अपनी जमीन को बचाने की लड़ाई में आदिवासियों और ग्रामीणों का पनाहगाह बन रहे हैं। उनके विस्तार की वजह सरकार की नीतियां ही बन रही हैं। झारखण्ड, उडीसा और छत्तीसगढ़ में उन्होंने सफल प्रतिरोध भी किया है।

मोदी सरकार की वरियता काॅरपोरेट जगत को आश्वस्त करना और विरोध के मुद्दे को घटाना है।

यह विरोध वास्तविक और दो तरफा है।

मनमोहन सरकार के जाने की सबसे बड़ी वजह उनके उदारीकरण के बोतल से निकला बाजारवादी अर्थव्यवस्था का वह जिन्न है, जिसे विस्तार के लिये जमीन की भूख थी। और मनमोहन सिंह चाह कर भी उसे पूरा नहीं कर सके। उन्होंने राष्ट्रीयकरण की ओट में निजीकरण की गोटियां तो चल दी मगर काॅरपोरेट की भूख के सामने -तमाम ज्यादतियों के बाद भी- उनकी गोटियां अपर्याप्त ही बनी रहीं। दूसरी और वो घपले और घोटालों के जाल में उलझते चले गये। उदारीकरण निजीकरण को शानदार कारनामा नहीं बना सके। दिखावटी लोकतंत्र में ऐसी देरियां होती ही होती हैं। परिणाम हमारे सामने है।

मोदी सकरार भ्रष्टाचार विहीन सकरार के चाहे जितने भी दावे करे, मगर उसके कारनामों की फेहरिस्त बढ़ती जा रही है, ललित मोदी से लेकर व्यापकम् तक रेड काॅरपेट बिछ गया है। जिसे देख कर मोदी जी की बोलती भी बंद है। मुद्दे गरमाते जा रहे हैं। मनमोहन सरकार जितनी बद्नाम हो गयी थी और काॅरपोरेट जगत का जितना विश्वास खो दिया था, मोदी वैसा नहीं चाहते हैं। वो काॅरपोरेट को भी विश्वास में रखना चाहते हैं, और आम जनता में भी अपनी विश्वसनियता बनाये रखने की उनकी तलब है, जो उनके जुमलेबाजी और बड़बोलेपन को बकवास समझने की ओर बढ़ रही है।

भूमि अधिग्रहण और मुआवजा तथा विस्थापन के मुद्दे पर इस देश के किसी भी सरकार या राजनीतिक दल का नजरिया बेदाग नहीं है। नरेंद्र मोदी की सरकार इस मामले में सबसे आगे खड़ी रहना चाहती है। मुआवजे की राशि, काम के अवसर, क्षेत्र का विकास और आर्थिक विकास के लिये भूमि अधिग्रहण का बेरोक-टोक अधिकार सरकार के पास होना चाहिये। उनके लिये आम लोगों के अधिकारों का कोई मतलब ही नहीं है।

वो इस बात से भी टकराना नहीं चाहते हैं, कि काम के अवसर श्रम को सही दाम और उत्पादन के साधन पर आम लोगों का अधिकार क्यों नहीं? राज्य के द्वारा अधिकृत जमीन पर निजी कम्पनियों का आधिपत्य क्यों? श्रम के ऊपर पूंजी की वरियता का अर्थ क्या है? यदि सरकारों के द्वारा आधारभूत ढांचे के निर्माण के लिये किया गया खर्च और कर्ज यदि आम लोगों के द्वारा और उनके हिस्से है, और जमीन भी उन्हीं की है, तो निजी कम्पनियों का स्वामित्व क्यों? जिन्हें करों से छूट, सहूलियतें और आर्थिक सहयोग भी सरकारें ही देती हैं। मोदी की आर्थिक विकास योजनाओं में आम जनता की हिस्सेदारी सस्ता श्रम और उत्पादन का साधन बनने तक ही सीमित क्यों है?

सही अर्थों में यह समाज के श्रमजीवी वर्ग को सस्ते सामान में बदलना है। और सामान सस्ता हो, इसके लिये किसानों को भूमिहीन बना कर गांवों से बाहर निकालना है। विश्व बैंक के निर्देशानुसार 40 करोड़ किसानों -भूमिहीनों को गांवों से निकाल कर, औद्योगिक क्षेत्रों में धकेलना है, ताकि इस क्षेत्र में श्रमिकों की अधिकता हो और वह सस्ते में बिकें।

भूमि अधिग्रहण के पीछे का सच यह भी है।

इसलिये नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार के लिये भूमि अधिग्रहण विधेयक को ठण्डे बस्ते में डालना संभव नहीं है। कह सकते हैं, कि इस मुद्दे के लिये ‘ठण्डा बस्ता‘ सही जगह नहीं है।

नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुए 15 जुलाई की मुख्यमंत्रियों की बैठक में यह स्पष्ट हो गया कि केंद्र सरकार नीति आयोग के संचालक समिति के जरिये इसे आगे नहीं बढ़ा पयेगी, क्योंकि कांग्रेस के मुख्यमत्रियों ने इसका बहिष्कार किया और गैर-भाजपा मुख्यमंत्रियों में दिल्ली और बिहार के मुख्यमंत्रियों के अलावा कोई शामिल नहीं हुआ। जिसे अरूण जेटली ने ‘संघीय भावना के विपरीत‘ करार दिया।

वास्तव में यह सरकार और उनके नीतिकारों की सोची-समझी कार्यनीति थी।

संसद के संयुक्त समिति के पास भूमि अधिग्रहण विधेयक के होने के बाद भी, इस बैठक का होना अपने आप में सरकार के नियत की चुगली है। सरकार इस बात को अच्छी तरह देख रही है, कि उसकी शाख इस अधिनियम की वजह से गिरी है, मोदी के जादू का रंग झंवरा गया है।

युवा और बेरोजगारों के लिये रोजगार के अवसर,

कामगरों के लिये काम,

किसानों की दशा सुधारने का आश्वासन,

आवासहीनों के लिये आवास

आर्थिक एवं सामाजिक विकास के साथ आर्थिक महाशक्ति बनने के सपनों को भूमि अधिग्रहण से टिका दिया गया।

विदेशी पूंजी निवेश से समृद्धि का प्रचारित खाका दिखाया गया

सही मुआवजा, विस्थापन और सामाजिक कल्याण से भी काम चलाने के किस्से बने।

सरकार अलग-अलग समुदाय और अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग और एक साथ अपनी बातें की, मगर तर्क कारगर नहीं हुआ।

इसलिये ठण्डे बस्ते के पिछले दरवाजे से राज्य सरकारों को अधिग्रहण और विकास का मुद्दा थमा दिया गया।

मुख्यमंत्रियों के बैठक में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने कहा- ‘‘13 ऐसे मामले हैं, जिसमें सामाजिक आंकलन और सहमति के प्रावधान से छूट राज्य सरकारों को मिली है, और केंद्र की सभी जरूरी परियोजनायें उसमें शामिल हैं। विकास से जुड़े काम-काज राज्यों के जिम्मे है। इसलिये राज्यों के ऊपर यह निर्णय छोड़ना चाहिये कि वो अपने आधार पर भूमि अधिग्रहण कानून का निर्माण करे।‘‘ इस तरह मोदी सरकार विकास के जरिये भूमि अधिग्रहण का खेल जारी रखेगी। जिन वित्तीय ताकतों के प्रति वह जिम्मेदार है, उन्हें अपने पक्ष में बनाये रखेगी। उसकी आक्रामकता घटेगी नहीं। वैसे भी जिन राज्यों में उसे -जहां खनिज सम्पदा है, जिन्हें निकालने और उद्योगों की स्थापना के करार निजी कम्पनियों से हुए हैं- जमीन की सख्त जरूरत है, वहां भाजपा की सरकारें हैं।

इसलिये, भूमि अधिग्रहण विधेयक को ठण्डे बस्ते में डालने की नीति विपक्ष से मुद्दे को छीनने, अपनी शाख बचाने और देश की बहुसंख्यक आबादी को लापरवाह बनाने की कार्यनीति है।

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