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भास्कर चौधुरी की छह कविताएँ

भास्कर चौधुरी1. साथ-साथ

नहीं हैं
पिता मेरे पास
और माँ भाई के साथ

माँ और पिता
हमसे दूर

साथ-साथ हैं !

 

2. सूखा

(एक)
रोटी चांद सी
थाल सी गोल
रोटी अम्मा के माथे की बिंदी सी
पर जहाँ रोटी ही नहीं
सारी उपमाएं
धरी की धरी !

(दो)
तुम्हारे यहाँ
गड्ढे भरे हुए हैं
सड़कों पर जगह-जगह भरा है पानी
पास खेतों और नालों में मेंढक टर्रा रहे हैं
पूरी तकत से
गायें पसरी हुई हैं बीच सड़क पर
हवा में बिखरी हुई है मूत्र और गोबर की गंध
मैदानों में बच्चे
चड्डी या हाफ पेंट पहिनें
कीचड़ में लथपथ
गेंद छीनने के प्रयास में भिड़े पड़े हैं
आसमान में काले बादल बहुत नीचे आ चुके हैं
लगता है जैसे बिल्कुल हाथों की ज़द में
बरसने वाले ही हैं अभी बिल्कुल अभी
तुम्हारे यहाँ शाम होते ही
झिंगुर गाने लगें हैं तेज़ आवाज़
जुगनू झाड़ियों के बीच ढेर सारे जैसे
टिमटिमा रहे हों तारे असंख्य…

और इधर कोई कोना नहीं बचा
जहाँ कोलतार की पहुँच ना हो
कोई गली नहीं जहाँ काँक्रीट न बिछी हो

यहाँ तैयारी चल रही है
दुनिया की सबसे ऊँची इमारत बनाने की
जिसकी छत पर होगा
घास का मैदान
बच्चों के लिए पार्क
और दीगर सारे इंतज़ामात
यहाँ ज़रूरत पड़ी तो हो सकेगी कृत्रिम बारिश भी…

 

3. गोदाम

चूहे कुतर सकते हैं
गोदामों में भरा अनाज

पर
यहाँ मना है
आना-जाना
आदमियों का !

 

4. किसान

दिनों बाद
आज गिर रही है बारिश
धीरे-धीरे

और मैं उठ रहा हूँ
जैसे भूखे पेट सो जाने के बाद
कोई जागता हो
नीम बेहोशी से
पेट पर हाथ रखे हुए
आहिस्ते-आहिस्ते
कदम रखते हुए
धरती पर

बारिश तेज़ हो रही है
और मेरे कदम बढ़ रहे हैं
हल की ओर
आप ही आप
दोनों बैलें जैसे
जानते हैं
मेरे मन की बात
तैयार खड़े हल कांधे पर रखने को
बैलों को लगता मेरा हल
हल्का जैसे पूरा खिला हुआ
खुशबुओं से भरा फूल कोई !!

 

5. दुःख

होता तो है दुख
पर उतने ही वक्त तक
जब तक
पड़ती रहती है छाया दुख की

सुख की रोशनी पड़ते ही
सिमट जाती है दुख की छाया…
होता तो है दुख
पर उतने ही वक्त तक
जब तक सुख के ताप से
पिघल नहीं जाती दुख की बर्फ
और ऐसा इन दिनों
पलक झपकते ही हो जाता है !!

 

6. लम्ही

गाँव जिसके सरोवर का नाम
मुंशी प्रेमचंद सरोवर हो
और जिसके पानी का रंग
गाढ़ा हरा या काला हो
या अधिकांश हिस्सों का बदन फटा हो
या जिसके बहुत बड़े हिस्से को
गाँव भर के नाइयों ने
गाँव भर के बालों के निस्तार की जगह बना ली हो
गाँव वह–
जिसके हाई स्कूल का नाम
मुंशी प्रेमचंद हाई स्कूल हो
और गाँव की सीमा से लगा कालिज
मुंशी प्रेमचंद कालिज
गाँव का वोट
जातियों-धर्मों मेँ बंटा हो
जहाँ गाँव वाले नेताओं को
उनकी तस्वीरों से पहचानते हों
और गाँव के नेता उनके
पंच सरपंच या प्रधान हों
जिनके पेटों का व्यास
दो वर्षों मे दुगुना हो गया हो
और गालों के गढ्ढे पूरी तरह भर गए हों
भले ही ‘मनरेगा’ की सड़कें
बन के टूट टूट के बन और बन के टूट चुकी हों
गाँव की कुछ लड़कियाँ
रोजाना कालिज जाने लगी हों
मनचले उनके आस-पास मंडराने लगे हों
और उनमें से किसी को भी प्रेमचंद की कहाँनियों की
इक्का-दुक्का शीर्षकों के नाम के अलावा कुछ याद न हो
भले ही गोदान की धनिया मौजूद हो गाँव में
और गोबर शहर गया तो लौटा न हो
तो वह गाँव प्रेमचंद का लम्ही गाँव ही है
जिसके बदलने की रफ्तार बैलगाड़ी की सी
जहाँ टीवी और मोबाइल ने चांदमारी कर ली है
और जहाँ लड़कियों का बाप
आधी उम्र पूरी करते-करते बूढ़ा हो गया हो
बच्चियों के लिए दहेज की रकम जुटाते-जुटाते
और माँ की रातों की नींद मानों
गौरया उड़ा ले गई है अपने साथ
इस चिंता में कि बिटिया जीवित तो है
सास-ननदों की भेदती निगाहें
उसके गहनों को तौलती जो रहती हैं

प्रेमचंद की कहाँनियों के आगे कुछ बदला भी है तो
बदला नहीं है बहुत कुछ –
लम्ही गाँव का नाम लम्ही ही है
‘मुंशी प्रेमचंद सरोवर’की तरह
‘मुंशी प्रेमचंद गाँव’नहीं हुआ है अब तलक!!

 

कवि परिचय :-
भास्कर चौधुरी अध्यापक हैं और कविताएँ भी लिखते हैं | उनका एक काव्य संग्रह ‘कुछ हिस्सा तो उनका भी है’ २०११ में प्रकाशित है | देश के साहित्यिक पत्र –पत्रिकाओं में इनकी रचनाएँ प्रकाशित होती रहती हैं | भास्कर की कविताओं में मानवीय संवेदनाओं के सभी रंग मौजूद होते हैं | इनकी कविताओं में माता-पिता, रिश्ते –नाते सब हैं | भास्कर चौधुरी प्रेम और पीड़ा के कवि हैं |

संपर्क :-
बी/1/83 बालको टाउनशिप, बालको
कोरबा (छग)
495684

प्रस्तुति :- नित्यानंद गायेन

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2 comments

  1. simple soft good Hindi poetry thanks.

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