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चैतन्य नागर की कविताएं

chaitanya-nagarचैतन्य नागर की कविताएं अनुभव के टटकेपन की ही नहीं उसके गुंथाव की भी कविता है। जो कई बार अपने दुखते-कसकते मूलों के साथ-साथ चला आता है। इसमें हमारे साँसतपूर्ण जीवन की छाया है, हमारे अस्तित्व का सहगामी अवसाद और रोज के जीवन-व्यवहार की टुच्चई को स्वीकार करने का साहस भी। इनके पास जिद्दू कृष्ण मूर्ति से मिली इस असार के सार को पहचानने की जीवन-दृष्टि और चीज़ों को विश्लेषित कर सकने का धैर्य भी है। इन छोटी-छोटी कविताओं में दुख-सुखात्मक अनुभव हैं। एक साधारण आदमजात के सहज, सार्थक और हारसिंगार के फूलों की तरह पवित्र अनुभव। आप कविताएं पढ़ें और खुद किसी निर्णय पर पहुँचें। कविता और आपके बीच मेरा आना ठीक नहीं।

 

1.
कभी सोचता हूँ तुमसे आखिरी बात मेरी यही होगी:
‘कभी प्रेम नही रहा हमारे बीच’
पता नही क्यों मैं स्वीकार नही क़र पाया प्यार होता ही नहीं संबंधों में
जहाँ ढूँढो वहां तो नहीं होता
बस एक सुकून देने वाला
आरामदायक कोना था हमारा रिश्ता
मैं वहां जम कर बैठता था
उसके छिन जाने से डरता था

सोचता हूँ बस…
पर कह नही पाउँगा ऐसा

यह भी जानता हूँ
मरते दम तक नही जुटा पाता आदमी
सच कहने का साहस
स्पष्ट भी नही रह पाता इस बारे में
कि जो कहना चाहता है
सच है भी या नहीं

 

2.
एक अड़ियल कविता
बरसों टंगी रही सामने खूँटी पर
और आज तक उतार नहीं पाया कागज़ पर
तुम्हारा दिया एक पुराना की-बोर्ड
इतना जर्जर
कि अब टाइप नहीं कर पाता तुम्हारे ही नाम का पहला अक्षर
और फिर भी बदल नहीं पाया इसे
उमस से भभाता एक कमरा
जहाँ सांस लेने में छितरा गए मेरे फेफड़े
फिर भी बाहर नहीं निकल पाया वहाँ से
वाहियात ज़हरीली निकोटीन-सा है प्यार
बेबसी, खीझ और नाउम्मीदी में लिपटा
एक सुस्त, शातिर संस्कार
जो रोज़ बस घटाना जानता है किसी की बची खुची साँसों को..

 

3.
मैंने कहा ‘आजादी’
और तुमने मेरे हाथों में
जलते अंगारे-सा कुछ रख कर
झुलसा डाली हथेलियाँ मेरी
सुन, जब मैं आजादी मांगूं
समझना कोई नया पिंजरा मांग रहा हूँ
जंजीरों के पुराने अवशेष के साथ
ध्यान दो, आजादी चाह रहा हूँ मैं
बस नए आका को ढूंढने की
ऐसी आजादी नहीं
जो उस खूँटी को ही उखाड़ डाले
जिसपर टंग कर मैं आराम फ़रमाता आया हूँ
हमेशा मेरी बात को गलत समझा है तुमने
अपनी भाषा को ठीक करना होगा
अभी काम करना होगा
अपनी कमज़ोर शब्दावली पर तुम्हे
हाँ, और अब कल जब मैं प्रेम मांगूं
तो पहले से ही साफ़ साफ़ जान लेना मेरा मतलब

 

4.
रात भर आँखों में
चुभते हैं तुम्हारे ख्याल
सीलन भरी मेरी टी शर्ट की महक है
आधे जगे सपनो में

हत्यारी गर्मी की थकी हुई सुबह
सुबह आईने में अपना बेढंगा चेहरा देखता हूँ
यह क्या!
तुम्हारी प्रतीक्षा में तो
अपने पिता की उम्र का हो गया हूँ

 

5.
तुम्हारी भुरभुरी क्लांत देह लेटी है
मेरी उखड़ी साँसों पर

धरती पर पहली बार मुस्कुराई थी जैसी कोई स्त्री
ठीक वैसे ही मुस्कुराई तुम अभी

देखो, गिरता पड़ता चाँद
चला आया है हमारी ड्योढ़ी तक

बाहर कोयल गाये जा रही है
शायद तुम्हारी मुस्कान के साथ सुर मिलाने की कोशिश में है

छत की ओर ताकता सोच रहा हूँ
करीब ऐसा ही रहा होगा सृष्टि का पहला दिन

***

छोटी कवितायेँ :-

1.
आग की बरसात में
गुलमोहर कहता है
बस वही खिलता है
….जो सांस सांस जलता है

 

2.
एक ही हैं मेरी धरती और मैं
जब मैं हंसता हूं, धरती हंसती है
जब वह रोती है
तभी मैं भी

 

3.
कोई प्रेम की बात करता है तो नींद उड़ती है
मैं ढूंढता हूं इनसोम्निया का इलाज
नींद की गोलियों के ज़हर में
…. मेरी उम्र घटा कर ही चैन लेगा यह प्रेम…
—गुंटर ग्रास की एक कविता से प्रेरित

 

4.
हर बात ही अधूरी है
तुम भी नहीं पास
और खुद से भी अब कितनी दूरी है…

 

5.
हर कविता पूरी होती
न होता मैं जो उसमे
बस तुम होती….

 

6.
गूलर, बरगद, पाकड़
पूर्णिमा का चाँद
हर वृक्ष पर, हर कोने अतरे में दमक रहा है
धरती की थकी हुई खुरदरी मुट्ठी में
मुक्ति की सम्भावना–सा चमक रहा है

 

7.
बचपन से तो नहीं तुम
पर मेरे बचपन की दोस्त जरूर हो
जैसे ही मैं बच्चा होता हूँ
तुम दोस्त होती हो

 

8.
प्रेम है
मेरे और तुम्हारे बीच की दूरी
प्रेम है एक विनम्र प्रश्न
कि क्या करना है अब इस दूरी का

 

9.
एक घर में रहता हूँ
दूसरे में जीता हूँ
बीच की दूरी को
बस जैसे तैसे सीता हूँ….

 

10.
कितना भयावह होता है
यह सोचना
कि कोई अकेला है
वास्तव में अकेले होने से कितना ज़्यादा भयावह होता है
यह सोचना कि कोई अकेला है

 

11.
मुखौटों के पीछे बैठ कर
मसीहा के
इंतज़ार में हूँ
आग से भभक रहा है आसमान
मैं सोने की कोशिश में हूँ

 

कवि परिचय :-
चैतन्य नागर एक फ्रीलांस लेखक के तौर पर हिंदी और अंग्रेजी दोनों में लिखते हैं। कविता उन्हें भाती है और जीवन के मूल प्रश्नों पर वक्ता की हैसियत से जगह-जगह बुलाए जाते हैं। वह अतीत में पत्रकार, शिक्षक, प्रकाशक की भूमिका में काम कर चुके हैं। कृष्णमूर्ति फाउंडेशन की हिंदी पत्रिका ‘परिसंवाद’ के संपादक हैं. कई अखबारों और पत्रिकाओं में सामाजिक, राजनैतिक और जीवन के बुनियाद सवालों से जुड़े आलेख लगातार प्रकाशित होते रहते हैं.

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3 comments

  1. arvind kumar khede

    रागात्मक संबंधो कि सुन्दर व्याख्या…..

  2. Wonderful poems.

  3. Chaitanya Nagar ki kavita mann ki gehraiyon se baatein karti hain. Fantastic.

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