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हर टीले के नीचे गड्ढ़ा है

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हमारे गली का नजारा बड़ा ही शानदार है।

मानसून सत्र की शुरूआत हो गयी है। हल्की सी बारिश हुई नहीं कि जहां भी गड्ढ़ा है, वहां पानी भर जाता है। और गड्ढों की कमी तो है नहीं। 2013 में बाढ़ आया था, जिसका प्रभाव 2014 में दिखा। संसद भवन में तमाम जलचर भर गये, मगरमच्छ से लेकर व्हेल तक। जिनकी क्षमता थलचर और नभचरों की भी है।

‘पानी में रह कर मगरमच्छों से बैर‘ बस एक कहावत है। मगरमच्छों को पालतू बनाने वाले भी हैं। फिर भी गड्ढ़े और पानी का भय परम्परागत है। इसलिये जिसके भी घर के सामने गड्ढ़ा बनता है, वह कहीं से भी मलबे का जुगाड़ करके वहां डलवा देता है। रात में अंधेरे में। कहीं कोई विघ्न बाधा नहीं।

सुबह जहां गड्ढ़ा था, वहां गलीवासियों के लिये मलबे का टीला होता है। मामला मकान मालिकों का है, इसलिये किराये के नागरिकों को बीच में पड़ने का अधिकार नहीं। यह उनके लिये मकान मालिकों के द्वारा दी गयी अतिरिक्त सुविधा है।

जिसे पर्वतारोही बनना है, वह टील पर अभ्यास करे,

जिसे आॅफरोडिंग करनी है, वह गाड़ी पर अत्याचार करे

जिसे दूसरों पर कीचड़ उछालना है,

और जिसे कोफ्त खाना है, वो इत्मिनान से कोफ्त खायें

सभी गलीभक्त नागरिकों के सामने ठोकर खाते, लड़खड़ाते हुए भरे हुए गड्ढ़ों पर बने टीलों को समतल करने की जिम्मेदारी है। मनमोहन के सुंदरीकरण के बाद, मोदी के स्वच्छता मिशन से जुड़ने का समान अवसर है। यह विकास और अवसर की समानता है। मेक इन गली के जरिये आत्म निर्भरता और कौशल विकास का मूल सिद्धांत। जो गाज की तरह गिरने, कहर की तरह टूट पड़ने को है।

गली में सिवर का पानी भरा है।

गड्ढ़े डूबे हुए हैं, और टीले तन कर खड़े हैं।

और अब हर एक टीले पर अलग-अलग नाम, अलग-अलग जत्थों की तख्तियां लगी हैं।

कहीं सुषमा स्वराज

कहीं वसुंधरा राजे

कहीं शिवराज सिंह हैं

तो कहीं राॅबर्ट वाड्रा के साथ रोज नयी तख्तियां लगायी जा रही हैं।

कोयले की दलाली और स्पेक्ट्रम घोटालों का जिक्र कम है, जहां तमाम टीलेबाजों की सम्बद्धता है।

खेल नया, मसला जटिल है। सभी के पास अपने नियम-कायदे हैं।

गलीवासियों के सामने बस गड्ढे और टीले हैं।

बताना मुश्किल है, गली में गड्ढ़े है, या गड्ढ़े में गली है?

जिससे गुजरने वालों की यह जिम्मेदारी है, कि वो अपने लिये नया सड़क बनायें, आते-जाते, चलते-टकराते उसे समतल करें या फ्रीडमैन की किताब ‘‘वल्र्ड इज फ्लैट नाउ‘‘ पढ़ें। यह सबक लें कि ‘अब दुनिया गोल नहीं‘, उबड़-खाबड़ है, मलबे का ढूह है।

फ्रीडमैन को धन्यवाद दें, या न दें।

जो जी मे आये करें, न करें।

जहां दुनिया गोल है, वहां गोल रहेगी। जहां वह समतल है, वहां समतल रहेगी और जहां उबड़-खाबड़ है, वहां वह उबड़-खाबड़ रहेगी। यह सब मकान मालिकों का कमाल है। उनके बीच तेरे घर के सामने गड्ढ़े का जुमला है। इस जुमले में देश की संसद है। मानसून सत्र है।

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