Home / विश्व परिदृश्य / अफ्रीका / अफ्रीकी देश माली में सैन्य हस्तक्षेप

अफ्रीकी देश माली में सैन्य हस्तक्षेप

Maliऔपनिवेशिक ताकतों के आगे-आगे जैसे चर्च और मिशनरियां चला करती थीं, अफ्रीका और एशिया में साम्राज्यवादी ताकतों के आगे-आगे इस्लामी संगठन और अलकायदा चल रहे हैं। इस्लामी आतंकवाद और अलकायदा का धुआं फैला कर अमेरिका और पशिचमी देशों के हितों पर परदा डाल दिया जाता है। माली और अल्जीरिया में भी यही हो रहा है। अलकायदा अफ्रीकी देशों में अमेरिका और पशिचमी देशों के लिये हस्तक्षेप की सिथतियां बनाता है, और साम्राज्यवादी ताकतें अपने लाव-लश्कर के साथ वहां पहुंच जाती हैं। टयूनीसिया से शुरू हुआ सरकार विरोधी आंदोलन पूरे अरब जगत में अब साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलन में बदल गया है। जिसे साम्राज्यवादी ताकतें औपनिवेशिक काल में लौटाना चाहती हैं। सरकार और साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलनों को जनतंत्र के नाम से सैनिक तानाशाही से हांका जा रहा है। हमारे सामने लीबिया के बाद का अफ्रीका है, मिस्त्र और अल्जीरिया है। और माली है। जहां फ्रांस और राष्ट्रसंघ के साथ यूरोपीय संघ, नाटो संगठन और अमेरिका के साथ इस्लामी आंतकी संगठन हैं।

माली के राष्ट्रपति ने राष्ट्रसंघ और फ्रांस के राष्ट्रपति को एक पत्र भेज कर उनसे मदद मांगी। जहां पिछले साल हुए तख्तापलट के बाद से राजनीतिक शून्यता का वातावरण बन गया है, और उत्तरी क्षेत्र में टूवारेग विद्रोही लगातार अपना प्रभाव बढ़ाते जा रहे हैं। उन लोगों ने माली के महत्वपूर्ण शहर कोन्नो को भी अपने कब्जे में ले लिया है। इस घटना के बाद ही माली के राष्ट्रपति ने राष्ट्रसंघ और फ्रांस के राष्ट्रपति को पत्र लिखा।

वास्तव में आज के माली की बिगड़ी हुर्इ सिथतियों के लिये पशिचमी ताकतें और अमेरिका ही जिम्मेदार है, जिनसे मदद की गुहार लगायी जा रही है, और राष्ट्रसंघ के द्वारा भी सैन्य हस्तक्षेप की स्वीकृति दे दी गयी है।

लीबिया में जब तक कर्नल गददाफी थे, तब तक माली में सिथति सिथर और मजबूत थी। उन्होंने माली की सरकार और वहां के ट्रार्इबल्स गुटों के बीच तालमेल बनाये रखने का काम किया। माली के विकास में लीबिया की भूमिका महत्वपूर्ण थी। किंतु अमेरिका और नाटो देशों के द्वारा कर्नल गददाफी के तख्तापलट के साथ ही यह संतुलन बिगड़ गया। जो हथियार पशिचमी देश और अमेरिकी सेना ने लीबिया में टीएनसी विद्रोही, आतंकी और स्थानीय कबीले के लोगों को कर्नल गददाफी के खिलाफ बांटा था, वो हथियार अब पूरे उत्तरी अफ्रीकी देशों में फैल गया है। जिसका उपयोग माली के कबीले अब सरकार के खिलाफ कर रहे हैं।

अफ्रीकी देशों के केंद्र में लीबिया और कर्नल गददाफी का न होना और यूरोपीय देश तथा अमेरिकी साम्राज्य का होना ही, आज माली और इस क्षेत्र की समस्या है। संयुक्त राष्ट्रसंघ के सुरक्षा परिषद ने दिसम्बर 2012 में ही माली में अफ्रीकी देशों की वरियता में 3,000 अंतर्राष्ट्रीय सैन्य टुकडियों की तैनाती को मंजूरी दे दी थी। 11 जनवरी 2013 को फ्रांस ने माली में विद्रोहियों के खिलाफ अपने सैन्य अभियान की शुरूआत की, जिन पर अलकायदा से जुड़े होने का ठप्पा लगा दिया गया है। पूरे माली में आपातकाल की घोषणा की गयी है।

फ्रांस के राष्ट्रपति होलांदे ने कहा कि ”फ्रांस की सेना ने 11 जनवरी के दोपहर से, माली की सेना को आतंकवादियों से लड़ने में सहयोग देना शुरू कर दिया है। यह अभियान तब तक जारी रहेगा, जब तक इसकी जरूरत रहेगी।” विद्रोहियों के ठिकानों पर हवार्इ हमले की शुरूआत हो गयी है, और अंतर्राष्ट्रीय सेना की मदद से माली की सेना ने अलकायदा लड़कों को आगे बढ़ने से रोक दिया और कोन्नो शहर को फिर से अपने कब्जे में ले लिया है। जहां 100 इस्लामी लड़ाकों के मारे जाने की खबर है।

12 जनवरी को बि्रटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने फ्रांस के द्वारा माली में सैन्य हस्तक्षेप का समर्थन किया। बि्रटिश प्रधानमंत्री कार्यालय से जारी वक्तव्य में कहा गया है कि ”प्रधानमंत्री इस बात से सहमत हैं कि बि्रटेन विदेशी सैन्य टुकडियों एवं सैन्य साज-ओ-सामान को माली भेजने में सहयोग करेगा। किंतु वह अपनी सेना वहां तैनात नहीं करेगा।” उसके सैन्य अधिकारी माली की सेना को प्रशिक्षित करने का काम करेंगे।

माली पहले फ्रांस का उपनिवेश था। पिछले साल अप्रैल से ही माली के उत्तरी क्षेत्र में अंसार डार्इन और मुजाओ का कब्जा है। उन लोगों ने टूवारेग विद्रोहियों का एक मोर्चा बना लिया, मगर यह मोर्चा जल्द ही टूट गया, और इस्लामी संगठन क्षेत्र के शहरी इलाकों पर कब्जा कर रहे हैं। उन्होंने टूवारेग विद्रोहियों को किनारे कर दिया। इन इस्लामी संगठन पर युद्ध अपराध करने और पूरे अधिग्रहित क्षेत्र में शरिया कानून लागू करने का आरोप है। फ्रांसीसी हस्तक्षेप के बाद अलगाववादी टूवारेग विद्रोहियों की वजह से इस्लामी ताकतों के हाथों में उत्तरी माली आया, आज उसी से टूवारेग विद्रोही अलग हो गये हैं। उन्होंने जबरन शरिया कानून लागू करने के विरोध में ऐसा किया।

अफ्रीकी देश बुरकीना फासोो, नाइजर, सेनेगल और टोगो की पांच-पांच सौ टुकडियां भी माली के सैन्य अभियान में शामिल होंगी। बेनिन ने 300 सर्विस पर्सनल भेजने का वायदा किया है। ये सैन्य टुकडियां 20 जनवरी से माली में पहुंचना शुरू कर दी हैं। फ्रांस इस सैन्य अभियान में 550 सैन्य टुकडियों को तैनात कर चुका है। 16 जनवरी को 600 से ज्यादा टुकडियों के होने की जानकारी दी गयी। फ्रांस के रक्षा मंत्रालय ने जारकारी दी है कि ”1400 टुकडियों की तैनाती हो चुकी है, और यह संख्या 2,500 तक बढ़ार्इ जा सकती है।” मंत्रालय ने कहा है कि ”यह इस बात पर निर्भर करता है कि इस सैन्य अभियान का विस्तार कितना होता है, और विद्रोहियों के विरूद्ध हमें कितनी बड़ी कार्यवाही करनी पड़ती है।” फ्रांस के राष्ट्रपति ने हवार्इ एवं जमीनी कार्यवाही को देखते हुए सेना भेजने की बात की है।

फ्रांसीसी राष्ट्रपति होलांदे ने संयुक्त अरब अमिरात की अपनी यात्रा के दौरान प्रेस वार्ता में कहा कि ”हमारा एक ही लक्ष्य है कि हम जब माली से वापस जायें, तब माली पूरी तरह सुरक्षित देश हो। जहां चुनि हुर्इ सरकार हो और पूरा क्षेत्र आतंकवाद से पूरी तरह मुक्त हो।” जो काम पिछले दो दशक से अमेरिका अफगानिस्तान में, इराक और गये साल से लीबिया में नहीं कर सका, फ्रांस के राष्ट्रपति वह काम माली में करने का लक्ष्य निर्धारित करते हैं।

माली में फ्रांसीसी हस्तक्षेप के साथ ही धीरे-धीरे यूरोपीय संघ और नाटो संगठन भी अब माली पहुंचने की तैयारी में लग गये हैं। यूरोपीय संघ के 27 सदस्य देशों के उच्च राजनयिक, 200 निर्देशक और कुछ सुरक्षा अधिकारी, माली की सेना को -इस्लामी लड़ाकों के विरूद्ध प्रशिक्षित करने के लिये- भेजने के प्रति अपनी सहमति की घोषणा की है। वहीं 18 जनवरी को वाशिंगटन फ्रांस को सेना और सैन्य साज-ओ-सामान भेजने के लिये हवार्इ सुविधा देने की घोषणा कर चुका है। माना यही जा रहा है कि जनवरी के अंत तक अमेरिकी सैन्य अधिकारियों का एक ग्रूप माली पहुंच जायेगा। अमेरिकी सरकार की ओर से अब तक स्पष्ट घोषणां नहीं की गयी है कि वह फ्रांस के सैन्य हस्तक्षेप -अभियान- को किस सीमा तक सक्रिय सहयोग देगा, किंतु अमेरिकी एयरफोर्स कारगो फ्लार्इट की शुरूआत 18 जनवरी से ही हो गयी है। सी-7 और सी-5 का उपयोग शुरू हो गया है।

17 जनवरी को यूरोपीय संघ की एक आपात बैठक ब्रूसेल्स में हुर्इ और माली में ‘मिलिट्री ट्रेनिंग मिशन’ भेजने की योजना को स्वीकार कर लिया गया। 17 जनवरी को ही टोगो और नार्इजर के सैनिक भी माली पहुंच गये हैं। माली के गृहयुद्ध का व्यापक प्रभाव वहां के जन-जीवन पर पड़ रहा है। लोग पलायन कर रहे हैं, सिथतियां बदतर हो गयी हैं, राष्ट्रसंघ हार्इ कमिशनर के अनुसार 1,47,000 माली के निवासी पड़ोसी देशों में अब तक पलायन कर चुके हंैं। राष्ट्रसंघ शरणार्थी ऐजेन्सी ने चेतावनी दी है कि ”यदि संघर्ष बढ़ता है तो 7,00,000 लोग माली छोड़ कर जाने के लिये विवश हो जायेंगे।” साम्राज्यवादी हस्तक्षेप के बाद सिथतियाें में सुधार की संभावनायें खत्म हो गयी हैं। सरकार और विद्रोहियों के बीच अब आतंकवादी संगठनों की मौजूदगी है।

माली की बिगड़ी हुर्इ सामाजिक एवं राजनीतिक सिथति के लिये यूरोपीय देश और अमेरिकी साम्राज्यवाद जिम्मेदार है, जो अफ्रीकी महाद्वीप के विशाल खनिज भण्डार पर कब्जा जमाने के लिये फिर से उसे अपना उपनिवेश बनाने में लगे हैं। माली का संकट उन राजनीतिक सिथतियों का परिणाम है, जिसे अफ्रीका में, साम्राज्यवादी ताकतों ने ही पैदा किया है, जिसमें इस्लामी आतंकवादी संगठन उनके प्रमुख सहयोगी हैं। जो राजनीतिक असिथरता पैदा करते हैं, और साम्राज्यवादी सैन्य हस्तक्षेप की सिथतियां बनाते हैं। माली में यही हो रहा है। यही कारण है कि सीरिया में जिन इस्लामी विद्रोहियों की मदद पशिचमी ताकतें कर रही हैं, उन्हीं विद्रोहियों के खिलाफ वो माली में अपनी सेना के साथ, सरकार के समर्थन में लड़ने पहुंच जाती हैं। इस्लामी आतंकवाद उनके लिये सबसे बड़ा खतरा बन जाता है। जिस अल कायदा के खिलाफ उन्होंने अभियान छेड़ रखा है, उसी अल कायदा के प्रमुख अल जवाहिरी का भार्इ सीरिया में विद्रोहियों के साथ पकड़ा जाता है, जिनके वैधानिक होने का फतवा यूरोपीय संघ और अमेरिकी साम्राज्य पढ़ता है।

माली और नाइजर में यूरेनियम का विशाल भण्डार है। भले ही माली की राजनीतिक असिथरता और गृहयुद्ध की सिथतियाें का कारण लीबिया और कर्नल गददाफी का न होना है, मगर साम्राज्यवादी हस्तक्षेप की एक बड़ी वजह यह भी है। राजनीतिक सुरक्षा की गारण्टी से उसके प्राकृतिक संसाधन पर अधिकार जमाया जा सके। फ्रांस अपने उपयोग की 78 प्रतिशत बिजली यूरेनियम ऊर्जा से ही प्राप्त करता है। नाइजर जहां यूरोनियम का दूसरा सबसे बड़ा भण्डार है, उस पर फ्रांस की कम्पनी अरेवा काम कर रही है। लोग कहते हंै कि ”नाइजर का यूरेनियम फ्रांस को प्रकाशित करता है, और नाइजर को अंधेरे में रखता है।” माली की सिथति नाइजर से अलग नहीं है, जहां यूरेनियम के साथ अफ्रीका का तीसरा सबसे बड़ा स्वर्ण भण्डार है। जिसके प्रमुख दो सोने के खदानों पर कनाडा के ”आर्इ0ए0एम0गोल्ड” का अधिकार है।

29 जनवरी को अफ्रीकी यूनियन के मुख्यालय -इथोपिया की राजधानी अदिस अबाबा में अफ्रीकी यूनियन के प्रमुख राजनेता और उनके अंतर्राष्ट्रीय सहयोगी देश -अमेरिका, बि्रटेन तथा अन्य यूरोपीय देश- माली की समस्या का युद्ध के जरिये समाधान निकालने के लिये -444 मिलियन डालर की सहायता देने का निर्णय लिया। पशिचमी अफ्रीका में बि्रटेन अपने 300 सैन्य अधिकारियों को भेजने के निर्णय की घोषणा कर चुका है।

माली के राजनीतिक संकट के पीछे टूवारेग लोगों का दशकों पुराना संघर्ष है। जो माली के 15.5 मिलियन की जनसंख्या में 1.2 मिलियन लोग हैं। जिनके पास अपनी कोर्इ जमीन नहीं है, अपना देश नहीं है। ऐतिहासिक रूप से इनकी जमीन नाइजर, उत्तरी माली और छोटे-छोटे टुकड़े लीबिया, नाइजीरिया, बुरकिना फासो, और आज के अल्जीरिया के हिस्से हैं। वे खुद को केल तामाशेक कहते हैं और तामाशेक भाषा बोलते हैं। ये 20वीं सदी से ही उपनिवेशवाद द्वारा थोपे गये सीमाओं के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं। उनका संघर्ष एक अलग राज्य के लिये है। दक्षिणी अफ्रीका में अल्प संख्यक राष्ट्रीयता में टूवारेग भी एक है।

20वीं सदी में जब तक माली पर फ्रांस का कब्जा था, उस दौरान फ्रांसीसी टूवारेग लोगों का दमन बड़ी निर्ममता से करते थे। उन्हें अपने नियंत्रण में रखने के लिये दमन को ही अपनी नीतियों में बदल लिया था। 1960 में माली और उसके पड़ोसी देशों की स्वतंत्रता के बाद भी टूवारेग लोगों की सिथति में कोर्इ विशेष परिवर्तन नहीं आया। यही कारण है कि 1962-64 में पहला टूवारेग विद्रोह हुआ। दूसरा बड़ा विद्रोह 1990 में शुरू हुआ। स्वतंत्र माली की सरकार से 1997 में कुछ क्षेत्रों को जीत लिया। तीसरा विद्रोह 2007 में माली और नाइजर में हुआ, जिसमें विद्रोहियों ने कुछ राजनीतिक एवं स्थानीय स्वायत्तता हासिल की। 2009 में लीबिया ने माली सरकार और टूवारेग विद्रोहियों के बीच शांति समझौता कराने का काम किया। जिसके अंतर्गत टूवारेग लोगों की सिथति में परिवर्तन आया। किंतु माली की सरकार और सेना इसके विरूद्ध आवाजें उठाती रहीं। 2011 टूवारेग लोगों की हत्यायें अपने चरम पर पहुंच गयीं।

माली की सेना पिछले साल 6 अप्रैल को ‘नेशनल लिबरेशन मोमेण्ट आफ अजावाद”- एम0एन0एल0ए0 से हार गयी, परिणाम स्वरूप अजावाद के स्वतंत्रता की घोषणा कर दी गयी। अजावाद उत्तरी माली का विवादित क्षेत्र है, जहां कर्इ अल्प संख्यक राष्ट्रीयता वाले लोग रहते हैं, जिनमें टूवारेग भी एक हैं। समय से पहले की गयी स्वतंत्रता की घोषणा, अल्प संख्यक राष्ट्रीयता वाले लोगों के लिये घातक प्रमाणित हुर्इ, क्योंकि कटटरपंथी इस्लामी लोगों के हथियारबद्ध गुट ने इन्हें किनारे हटा दिया और उत्तरी क्षेत्र पर अपना अधिकार जमा लिया। वे टूवारेग के स्वतंत्र राज्य के विरोधी हैं। इस बीच माली की सेना के द्वारा लोगों को मारने और प्रताडि़त करने का सुनियोजित अभियान चलता रहा। अपुष्ट खबरों में कहा गया है कि एम0एन0एल0ए0 ने स्वतंत्र अजावाद की मांग को छोड़ दिया है। दिसम्बर में स्वायत्तता पर बातचीत की शुरूआत हुर्इ। 13 जनवरी को इस ग्रूप के वेबसार्इट पर जारी बयान में कहा गया कि ”वह फ्रांस के सैन्य हस्तक्षेप को मान्यता देता है, किंतु उन्हें माली की सेना की मौजूदगी, इस क्षेत्र में स्वीकार नहीं है।”

अमेरिकी सेना सालों से माली की सेना को प्रशिक्षित करती रही है। 2005 में अमेरिका ने ‘फ्रांस सहारा काउण्टर टेरेरिज्म पार्टनरशिप’ की स्थापना की, जिसमें अल्जीरिया, बुरकिना फासो, लीबिया, मोरक्को, टयूनीसिया, चाड, माली, मारटेनिया, नाइजर, नार्इजेरिया और सेनेगल, ग्यारह अफ्रीकी देश शामिल हैं। जिसके अंतर्गत हर साल सैन्य अभ्यास होता है। यह संयुक्त सैन्य अभ्यास इस साल नाइजर में होना है। जिसमें कनाडा की सेना भी भाग ले रही है। कनाडा की सेना 2008 से ही इस सैन्य अभ्यास में भाग ले रही है। वर्तमान में माली कनाडा से सहायता पाने वाला प्रमुख देश बन गया है। कनाडा की सक्रियता भी अफ्रीकी देशों में बढ़ गयी है। 2008 में उसके 6 सैन्य अडडे बनाने की योजना का खुलासा हुआ है, जिसमें से 2 अफ्रीकी देशों में होगा। साम्राज्यवादी ताकतें अफ्रीकी देशों के साथ आम जनता के खिलाफ संगठित हो गयी हैं।

A French soldier lays with a Milan anti-tank missile launcher at the forward position near Diabaly on January 22, 2013.अभी फ्रांस को माली पर हमला किये कुछ दिन ही हुआ और अभी से ही सैन्य हमलों से आम आदमी के घायल होने के सैंकड़ों वारदात सामने आने लगे हैं। मध्यमाली के दूएन्तजा शहर में घायल नागरिक स्थानीय अस्पतालों तक नहीं पहुंच पा रहे हैं। यह जानकारी ‘डाक्टर्स विदाउट बार्डरस’ ने दी है। एजेन्सी के इमरजेन्सी रिस्पान्स को-आरडिनेटर -सेसा क्रिस्टानी ने बताया कि ”बमवर्षा एवं लडार्इयों की वजह से सड़कों पर सन्नाटा खिंचा है। घायलों की चिकित्सा एवं सहायता संभव नहीं हो पा रही है।”

इण्टरनेशनल रेड़क्रास की रिपोर्ट है कि ”फ्रांससी हमले के क्षेत्र में आने वाले शहरों में घायलों की भरमार है।” एमनिष्टी इण्टरनेशनल ने जानकारी दी है कि माली की सेना कम उम्र बच्चों को भी तैनात कर रही है। उसकी रिपोर्ट में कहा गया है कि ”माली में पड़ोसी देशों की जो सेनायें आ रही हैं, वो अपने देश में अनगिनत हिंसक घटनाओं को अंजाम देने की दोषी हैं।” रिपोर्ट ने आशंका व्यक्त की है कि ”ऐसी सेना क्या माली में अंतर्राष्ट्रीय युद्ध नियमों का पालन करेगी?” वास्तव में माली अभी पेशेवर हत्यारों के गुट और भयानक हिंसक घटनाओं को अंजाम देने वाली सेना के बीच फंसा हुआ है। आम मालीवासियों के मारे जाने या घायल होने के बारे में फ्रांसीसी सेना के कमाण्डर का कहना है कि विद्रोही और आम जनता के बीच फर्क करने में दिक्कतें आ रही हैं, क्योंकि नागरिक क्षेत्रों से भी विद्रोही हमला कर रहे हैं। फ्रांस के आर्मी चीफ एडुआर्ड गियो ने रायटर्स से कहा है कि ”फ्रांस के हवार्इ हमले में इसलिये बाधा उत्पन्न हो रही है कि विद्रोही नागरिक क्षेत्रों का उपयोग छुपने के लिये कर रहे हैं।” इस समय 9,000 फ्रांसीसी सेना आइवरी कोस्ट, सेनेगल, गैबन, सेण्ट्रल अफ्रीकन रिपबिलक, चाड और जिबोटी में है।

राष्ट्रसंघ रिफ्यूजी एजेन्सी के अनुसार ”माली के वर्तमान संकट में 2,30,000 लोगों का पलायन हुआ है, और 1,44,500 मालीवासी पहले ही देश छोड़ कर पड़ोसी देशों में शरण लिये हुए हैं।

माली के मौजूदा संकट पर रूस के विदेशमंत्री सर्गेर्इ लोवारोव ने कहा है कि ”अरब क्रांति ने क्षेत्रीय संतुलन को बिगाड़ दिया है। माली की असिथरता ने आतंकवादियों को अपने लिये सुरक्षित क्षेत्र को बनाने का मौका दे दिया है, जो पहले से ही अपने प्रभाव का विस्तार करने में लगे थे।” उन्होंने कहा कि ”वो आगे भी हमला करेंगे, जैसा कि उन्होंने अल्जीरिया में किया है।”

23 जनवरी को प्रेस कांफ्रेंस में सभी विदेशमंत्री ने कहा कि ”माली में जिससे अभी फ्रांसीसी और अफ्रीकी लड़ रहे हैं, ये वे ही लोग हैं, जिन्होंने गददाफी को सत्ता से हटाया। जिसे हमारे पशिचमी सहयोगियों ने इस तरह से हथियारबद्ध किया था कि वो गददाफी की सरकार का तख्तापलट सकें।”

Print Friendly

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

Select language:
Hindi
English
Scroll To Top