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संसद में ऊपरी खेल-तमाशा

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भारतीय विपक्ष और सरकार देश की संसद को मानसून सत्र में तमाशा बना चुकी हैं।

मुद्दे जो कल थे आज भी वहीं हैं।

कल जहां भाजपा बैठती थी, आज वहां कांग्रेस बैठी है। और जहां कांग्रेस बैठती थी, आज वहां भाजपा है।

कल भाजपा संसद की कार्यवाही को चलने नहीं देती थी, आज कांग्रेस उसे बाधित कर रही है।

मुख्यधारा की ज्यादातर मीडिया या तो चुटकुले सुना रही है, चुटकियां ले रही है, या ऐसी चिंता व्यक्त कर रही है, जिसे किसी का न तो भला होने वाला है, ना ही कुछ बनना-बिगड़ना है। देश की जनता के लिये तो फिक्र है ही नहीं। यदि फिक्र है, तो नरेंद्र मोदी की सरकार के लिये फिक्र है। जिसकी हरकतें भी वही है -या कहिये उससे बढ़ कर है- जो पूर्ववर्ती सरकार की थी।

और अब मोदी सरकार अपने ही मंत्रियों और मुख्य मंत्रियों के खिलाफ खुले भ्रष्टाचार के (राजनीतिक एवं आर्थिक) मामलों में सम्बद्धता के खिलाफ कांग्रेस और विपक्ष की एकजुटता को तोड़ने और समेटने के लिये, ‘तू भी चोर मैं भी चोर‘ के नीति पर चल रही है, कि हमारे मुद्दे को तूल दोगे, तो हम तुम्हारे भी मुद्दे उखाडेंगे। संसद में नया खेल शुरू हो गया है, कि सबसे बड़ा भ्रष्टाचारी कौन? मोदी जी के ‘न खायेंगे, न खाने देंगे‘ के चुनावी बोल की चिन्दियां उड़ गयी हैं।

आने वाला कल ‘वन गेट वन फ्री‘ का हो सकता है।

एक मुद्दा तुम दबाओ, दूसरा हम दबायेंगे और आपसी विश्वास को बढ़ाने के लिये जो सत्तारूढ़ हैं, वह एक मुद्दे को मुफ्त में सलटायेगा। या यह होगा, कि विरोध खत्म, सहयोग के काल की शुरूआत हो। आपस में डेमोक्रेटिक-रिपब्लिकन समझौता हो। उदारीकरण के बाद और उस दौर के रिश्तों पर धूल डालें, तुम नाथूराम गोडसे को टांगो, हम नेहरू-इंदिरा से काम चलायें। गांधी को मिलजुल कर बांट लें। कमीशन, कम्पेनिंग को सेवा शुल्क में बदल दें। जो जहां है, वहीं मौज से रहे। लोकतंत्र फूले-फले और संसद के गरिमा की बहाली हो। देश की जनता दोनों के प्रति संवेदनशील है।

आम जनता के नाम पर लोकतंत्र को बनाये रखने और आपस में मिल कर दाग-धब्बों को धोने के पहले की लड़ाई चल रही है। कांग्रेस ललितगेट से जुड़ी विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और वसुंधरा राजे तथा ‘व्यापम‘ से घिरे शिवराज सिंह चैहान का इस्तिफा मांग रही है।

मोदी सरकार पहले सुलह चाहती थी, किंतु मोदी इसे विपक्ष के सामने झुकना मान रहे हैं, इसलिये उनकी टीम गैर भाजपा एनडीए सरकारों की बखिया उधेड़ने की नीति पर चल पड़ी है। कौन नहीं जानता कि उदारीकरण की नीति के बाद जितने भी आर्थिक एवं राजनीतिक घोटाले हुए हैं, और अब हो रहे हैं, उसमें चाहे जिसकी भी सरकार हो -कांग्रेस की यूपीए सरकार  या भाजपा की एनडीए सरकार- उनके मंत्रियों की सम्बद्धता रही है।

उन निजी कम्पनियों और काॅरपोरेशनों की सम्बद्धता रही है, जिन्हें लाभ पहुंचाया गया, जिन्होंने उसका लाभ उठाया।

जिनकी वजह से मनमोहन सरकार बनी और गिरी और मोदी सरकार वजूद में है। जिनकी वजह से ही वाचाल नरेंद्र मोदी की जुबान बंद है। चुनावी भाषणों में ‘मनमोहन सिंह को मौन मोहन सिंह- कहने वाले नरेंद्र मोदी की बोलती बंद है। वो भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी अपनी सरकार और उसके मंत्रियों और भाजपा शासित राज्य सरकारों के मुख्यमंत्रियों की सम्बद्धता से उतने परेशान नहीं हैं, जितना परेशान वो इस बात से हैं, कि श्रम कानून और भूमि अधिग्रहण विधेयक से लेकर निजीकरण के लिये तैयार किये गये ‘रोडमैप‘ को पूरा करने के लिये जिन वैधानिक कार्यवाहियों को फटाफट निपटाने की जो नीति है, उसमें यदि देरी हुई तो क्या होगा?

वह पिछली सरकारों की कब्र खोदने का नाटक इसलिये कर रही हैं, कि वह आक्रामक नजर आयें। यह बता दें कि कांग्रेस भाजपा से ज्यादा मैली है, यह कैसे सिद्ध होग, कि भाजपा झक्क लिबास है।

सरकारें इस बात को अच्छी तरह जानती हैं, कि आर्थिक एवं राजनीतिक घोटालों की कब्र यदि वास्तव में उधेड़ी गयी, तो सरकारों के साथ उनके मंत्री ही नहीं, उनकी सूरतें भी सामने होंगी जिन्होंने इसका लाभ उठाया है। ये वो निजी कम्पनियां हैं -जिन्होंने कभी मनमोहन सिंह को बनाया था और जो आज नरेंद्र मोदी के वास्तुकार हैं।

इसलिये, आज संसद में जो भी हो रहा है, वह ऊपरी खेल-तमाशा है, आम जनता को दिखाने और अपना हक जताने के लिये। जिसका लाभ सरकार अध्यादेशों से काम चलाने और वित्तीय ताकतों को आश्वस्त करने के रूप में उठायेगी, और विपक्ष अपने लिये उस विकल्प को बनाने में लगा रहेगा, कि वो भी सरकार बनाने का दावेदार है। इस बीच मुख्यधारा की मीडिया लोकतंत्र का गाना गायेगी और संसद की गरिमा को तार-तार करने वालों का साथ निभायेगी। वित्तीय ताकतों का हित जितना सुरक्षित कल था, आज भी वह उतना ही सुरक्षित है। देश की सरकार और मौजूदा राजनीतिक दलों से आम जनता के पक्ष में खड़े होने की उम्मीद पालना, अपने को धोखा देना है।

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