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सुजाता की दो कविताएँ

सुजाता .फोटो1. धैर्य
इस पेड़ से उस पेड़ की दूरी
मामूली थी एकदम कि
दोनों की टहनियों को बांधकर
एकसाथ डाला जा सकता था झूला
लेकिन वे खड़े ही थे बस
गले लग जाने के लिए
किसी अन्धड़ के इंतज़ार में !

 

2. आज, अभी
मुलायम ही दिखता है दलदल लेकिन
धँसते धँसते जब धँसने ही वाली हो नाक भी
तब पूरा दम लगाकर भी निकला नही जा सकता इससे बाहर ।
मैंने नहीं खोजे थे अपने रास्ते और अपने दलदल भी नही चुने थे
आज़माए रास्तों पर से गुज़रने वाली पुरखिनें
लिख गयीं थीं कुछ सूत्र किसी अज्ञात भाषा में
जिनका तिलिस्म तोड़ने के लिए मरना ज़रूरी था मुझे

सो मरी कई बार …
बार बार …
और अब सुलझ गए हैं कई तिलिस्म
समझ गई हूँ कि
मेरे रास्तों पर से निशान वाली पट्टियाँ
उलट देते थे वे जाते जाते ।
मार्ग सुझाने का चिह्न शास्त्र भी
अपने ही साथ लिए फिरते थे वे- जंगल के आदिम शिकारी !
अनुगमन करना मेरे लिए विकल्प तो था
पर एकमात्र नहीं
इसलिए सहेज लेना रास्तों पर से फूल-कंद
अनुगमन की ऊब से निजात देता था।
पीडाएँ गाती थीं समवेत और मुक्त कर देता था नाच लेना बेसुध !

यह आसान मुझ पर कितना मुश्किल बीता
इसकी कहानी नही सुनाने आयी हूँ मैं ।
मुझे पूछना है तुमसे साफ –साफ कि पिछली पीढियों में अपनी धूर्तता की कीमत
कभी किसी पीढी मे तो तुम चुकाओगे न तुम !
करना ही होगा न साहस तुम्हें ?
तो वह आज और अभी ही क्यों न हो !

-सुजाता

 

कवि परिचय :
सुजाता दिल्ली वि.वि. के श्यामलाल आनंद कालेज में अध्यापन करती हैं | स्त्री प्रश्नो पर पहले सामुदायिक ब्लॉग चोखेरबाली का मोडरेशन |
प्रकाशन : विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में लेख व कविताएँ प्रकाशित | फेसबुक पर भी सक्रीय |

संपर्क : chokherbali78@gmail.com

प्रस्तुति :- नित्यानंद गायेन

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