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ईरान समझौता – भूराजनीतिक संतुलन और वित्तीय संघर्षों का हिस्सा है

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यदि हम ईरान और अयातुल्ला खुमैनी को जानते हैं,

यदि हम रूस, चीन और मध्य-पूर्व एशिया के देशों से ईरान के गहरे रिश्तों को जानते हैं,

और यदि हम अमेरिका और यूरोपीय संघ के नेतृत्वकर्ता देशो को जानते हैं, तो यह कहने में हमें कोई हिचक नहीं होगी कि 18 दिनों की लम्बी वार्ता के बाद दुनिया के 6 ताकतवर देशों और ईरान के बीच हुआ 14 जुलाई का वियना समझौता स्थायी नहीं है। जिसका आधार प्रचारित गलत मुद्दों के तहत विवश करके ईरान की नकेल कसने की है। उसे यह समझाने की है, कि यदि उसका राष्ट्रीय हित यूरो-अमेरिकी हितों के विरूद्ध हुआ, तो उसे आर्थिक प्रतिबंधों और सैन्य हस्तक्षेप का खतरा झेलना पड़ेगा।

यह मानी हुई बात है, कि ईरान अपने सम्बंधों का आधार नहीं बदलेगा और यूरो-अमरिकी साम्राज्यवाद वित्तीय ताकतों के गिद्धों का ऐसा समूह है, जो किसी भी देश के प्राकृतिक सम्पदा का मांस खाये बिना नहीं रह सकता। अमेरिका के वित्तीय साम्राज्य का आधार ही पेट्रो-डाॅलर है। और अमेरिकी डाॅलर विश्व बाजार में -तेल व्यापार- किनती बड़ी लूट है? आसानी से समझा जा सकता है, जिसके पास न तो स्वर्ण मानदण्ड है, ना ही फेडरल रिजर्व पर अमेरिकी सरकार का नियंत्रण है। वास्तव में वह वित्तीय ताकतों के द्वारा मुद्रा बाजार को नियंत्रित करने का जरिया भर रह गया है, जिसमें अमेरिकी सरकार भी एक साझेदार है। जिसे अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा का दर्जा दे दिया गया है।

कह सकते हैं, कि दुनिया के बाजार में अमेरिकी डाॅलर वित्तीय ताकतों का कारगर हथियार है। जिसका उपयोग अमेरिकी सरकार और साम्राज्यवादी ताकतें दुनिया की अर्थव्यवस्था को अपने नियंत्रण में रखने के लिये कर रही है। जिसका मकसद वैकल्पिक व्यवस्था को रोकना है।

और हम इस बात को जानते हैं, कि चीन के युआन ने अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा बाजार में वैकल्पिक मुद्रा व्यवस्था की चुनौतियां खड़ी कर दी है। एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक और इसी महीने ब्रिक्स बैंक की स्थापना भी हो गयी है। जिसके प्रमुख सहयोगी ब्रिक्स देश- चीन, रूस, भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका है। रूस, चीन और लातिनी अमेरिकी देशों के संगठनों की साझेदारी ने तथा एशिया के गैर अमेरिकी देशों -जिसमें ईरान भी है- की साझेदारी ने, नये भौगोलिक कूटनीतिक और सामरिक समिकरण को जन्म दे दिया है। जिसके सामने गैर अमेरिकी वैश्वीकरण है। मुक्त व्यापार के नये क्षेत्रों की रचना करना है।

ईरान से हुए इस समझौते का सच यह है, कि यह समझौता ईरान को रूस और चीन के खेमे से निकालने की यूरो-अमेरिकी कवायत है। जिसमें रूस और चीन की भी मौजूदगी है। और यहीं वह गंभीर सवाल है, कि क्या ओबामा सरकार और यूरोपीय देश इतने कामयाब हैं? क्या यह हो सकता है?

इस समझौते के सबसे महत्वपूर्ण बिंदू के रूप में यह प्रचारित किया जा रहा है, कि ‘‘ईरान अपने ऊपर लगे अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंध को हटाने की शर्त पर परमाणु हथियारों का निर्माण रोकने पर राजी हो गया है।‘‘ (न्यूयाॅर्क टाइम्स) जबकि सच यह है, कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम में परमाणु हथियार बनाने जैसी कोई बात ही नहीं है, और इस बात को अमेरिका और यूरोपयी देश भी जानते हैं। अंतर्राष्ट्रीय पर्वेक्षकों की रिपोर्ट भी यही है। अमेरिकी गुप्तचर इकाई -सीआईए- की गुप्त रिपोर्ट से भी यही प्रमाणित होता है। इसके बाद भी उसे प्रतिबंधों का सामना बरसों करना पड़ा। जिसके खिलाफ रूस, चीन और उनके सहयोगी देशों एवं संगठनों का सहयोग ईरान को मिला।

क्या ईरान की कोई भी सरकार इस बात को भूल सकती है? या वह अपने कूटनीतिक एवं वित्तीय सम्बंधों का आधार बदल सकती है?

ईरान के परमाणु कार्यक्रम की वजह से उस पर पश्चिमी देशों ने जो प्रतिबध लगाये, उसकी वजह से ईरान की अर्थव्यवस्था को भारी नुक्सान उठाना पड़ा। अमेरिका के दबाव की वजह से ही यूरोपीय और अमेरिकी बैंकों में जमा किये गये धनराशि को जप्त करने से उसे 100 बिलियन डाॅलर की क्षति हुई। उसके कई परमाणु वैज्ञानिकों की हत्या कराई गयी, और इस्त्राइल ने अमेरिका के साथ मिल कर ईरान के ‘न्यूक्लियर प्रोडक्शन कम्प्यूटर सिस्टम‘ को एक वायरस के जरिये ‘हैक‘ भी किया। ईरान के खाद्य पदार्थ और दवाओं के आयात को भी यूरो-अमेरिका ने रोक दिया। ईरान की अर्थव्यवस्था को तोड़ने, जन-असंतोष को बढ़ाने और उसकी राजनीतिक संरचना को बदलने की कोशिश की गयी। दुनिया के सभी देशों पर प्रतिबंधों को लागू करने का दबाव बनाया गया।

और अब अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा इस समझौते से ईरान का उपयोग रूस को कमजोर करने के लिये करना चाहते हैं। माना यही जा रहा है, कि यह समझौता रूस के विरूद्ध ओबामा की कूटनीतिक चाल है, जिसका मकसद रूस की अर्थव्यवस्था को ऐसा झटका देना है, कि वह वित्तीय संकट से उबर न पाये। जो काम वो यूक्रेन के माध्यम से करना चाहते थे, जहां उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा, अब वो ईरान के माध्यम से करने की नीति पर चल रहे हैं।

अमेरिका के लिये रूस और चीन का बढ़ता प्रभाव सबसे बड़ी चुनौती है, जिसे खत्म करना ओबामा की वरियता है।

ओबामा के सामने यह तय करने की जिम्मेदारी थी, कि इस समय उन्हें किससे लड़ना है? और किससे समझौता करना है? और उन्होंने समझौते के लिये ईरान को चुना, क्योंकि रूस से मतभेद किसी भी समझौते से आगे निकल चुका है, वह चीन के साथ मिल कर वैकल्पिक व्यवस्था बना रहा है। रूस और चीन अमेरिकी एकाधिकार की राह में सबसे बड़ी बाधा है।

यूरोप की निर्भरता रूस के प्राकृतिक गैस पर है। इस समझौते के बाद ओबामा इसे ईरान से समाप्त करना चाहते हैं। उन्होंने इस बात को स्वीकार भी किया है, कि ‘‘ईरान से समझौता अमेरिका के हित में है।‘‘

ईरान के लोग इस बात से खुश हैं, कि कई सालों से लगा प्रतिबंध हट गया है, मगर उन्हें यह जान लेना चाहिये कि उनकी सरकार ने किन शर्तों को स्वीकार किया है। ईरान अगले 25 सालों तक जांच की वस्तु होगा और उसके परमाणु कार्यक्रम पर निगरानी रहेगी। यदि अमेरिका या समझौते पर हंस्ताक्षर करने वाला कोई भी देश ईरान पर समझौते का उल्लंघन करने का आरोप लगाता है, तब प्रतिबंध फिर से लगाये जा सकते हैं। प्रतिबंधों की तलवार ईरान के सिर पर 25 सालों तक टंगी रहेगी।

यह ऐसी शर्त है, जिसमें बार-बार पेंच का आना तय है।

ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातुल्ला खुमैनी ने कहा है- ‘‘तेहरान अमेरिका के मध्य-पूर्व की नीतियों से अभी भी सहमत नहीं है। वाशिंगटन के प्रति उसका रवैया नहीं बदलेगा, चाहे परमाणु समझौता हो या न हो।‘‘

राईटर्स के अनुसार, उन्होंने कहा- ‘‘इस समझौते की स्वीकृति या अस्विकृति का प्रभाव हमारे मित्र देश- फिलिस्तीन, यमन, सीरिया, इराक, बहरीन और लेबनान पर नहीं पड़ेगा। हम उनका समर्थन कभी बंद नहीं करेंगे। इस समझौते के बाद भी हमारी नीतियां अपने पर गुमान करने वाले मगरूर अमेरिका के प्रति नहीं  बदलेगी।‘‘

खुमैनी ने साफ तौर पर कहा, कि ‘‘ईरान के द्वारा परमाुण कार्यक्रम पर अमेरिका से वार्ता को एक अपवाद के तौर पर ही देखना चाहिये। हम हमेशा से कहते आये हैं, कि अमेरिका के साथ क्षेत्रीय या अंतर्राष्ट्रीय मामलों पर और द्विपक्षीय सम्बंधों पर हम वार्ता नहीं करेंगे।‘‘ उन्होंने कहा- ‘‘इसके बाद भी हमने परमाणु कार्यक्रम पर चर्चायें की- अपने हितों को पूरा करने के लिये? अयातुल्ला खुमैनी ने दोनों देशों की नीतियों के बारे में कहा, कि ‘‘इस क्षेत्र में अमेरिका की नीतियां और ईरान की नीतियां बिल्कुल विपरीत हैं।‘‘

18 जुलाई को अयातुल्ला खुमैनी ने ट्वीट किया कि ‘‘ईरानी क्रांति के बाद से अब तक 5 अमेरिकी राष्ट्रपति यह दुआ करते-करते कि, ‘ईरान उनके सामने समपर्ण करेगा‘ या तो मर गये या इतिहास में खो गये।‘‘ उन्होंने ओबामा के लिये लिखा, कि ‘‘आप भी उन्हीं की तरह हैं।‘‘

खुमैनी ने रमजान महीने के अंत होने के मौके पर ईरान की सरकार से अपील की कि ‘‘वह इस समझौते की बड़ी बारीकी से जांच करें और यह निश्चित कर कि हमारा राष्ट्रीय हित सुरक्षित है।‘‘ उन्होंने अमेरिकी लोगों के बारे में कहा- ‘‘अमेरिकी कहते हैं, कि उन्होंने ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोक दिया। वो जानते हैं, कि यह गलत है। हमने फतवा जारी किया था, कि ‘‘इस्लामी कानून में परमाणु हथियार प्रतिबंधित है।‘‘ इसका परमाणु वार्ता से कुछ भी लेना-देना नहीं था।‘‘ ईरान के धार्मिक नेता का यह वक्तव्य व्हाईट हाउस के उस वक्तव्य के चंद घण्टों के बाद आया, जिसमें कहा गया था, कि ‘‘ईरान के खिलाफ सैन्य कार्यवाही का विकल्प अभी भी हमारे पास है।‘‘

सर्वोच्च धार्मिक नेता ने व्हाईट हाउस को लथाड़ते हुए कहा- ‘‘अमेरिका के राष्ट्रपति कहते हैं, कि ‘ईरान की सेना को वो हरा सकते हैं।‘ हां, वो ऐसा जरूर कर सकते हैं, क्योंकि हम ना तो कभी युद्ध की शुरूआत करते हैं, ना ही उसका स्वागत करते हैं, इसके बाद भी हम कहते हैं, कि यदि युद्ध होता है, तो अमेरिका को बे-आबरू ही होना होगा, उसकी विदाई ऐसे ही होगी।‘‘ अयातुल्ला खुमैनी की प्रतिक्रिया को ईरान की सरकार से भी बड़ी बात समझी जाती है। इसलिये यह मान लेना कि समझौते के बाद ‘‘ईरान आसान चीज़ है, और अब अमेरिका और यूरोपीय संघ के प्रमुख देशों की चलती ईरान पर होगी, पूरी तरह सच नहीं है, भलेही समझौते की शर्त है, कि ‘‘ईरान के खिलाफ लगे प्रतिबंधों को यह देखते हुए चरणबद्ध तरीके से हटाया जायेगा, कि वह अपने परमाणु कार्यक्रमों को किस सीमा तक रोक कर रखता है। और समझौते की शर्तों का पालन करता है।‘‘

14 जुलाई के समझौते के बाद ईरान के विदेश मंत्री मोहम्मद जावेद जरीफ और यूरोपीय संघ के नीति निर्धारकों की प्रमुख फ्रेडरिक मोगेराइन ने अस्टिया की राजधानी वियना में संयुक्त वक्तव्य जारी किया। प्रेस वक्तव्य के दौरान जरीफ ने कहा- ‘‘मेरा मानना है, कि यह एक ऐतिहासिक पल है। हम एक ऐसे समझौते पर पहुंचे हैं, जो किसी के लिये भी पूरी तरह सही नहीं है, मगर यह वह है, जिस पर चल कर हम उसे पा सकते हैं।‘‘ उन्होंने कहा- ‘‘आज के दिन उम्मीदों का अंत हो सकता था, मगर हम उम्मीदों के एक नये अध्याय की शुरूआत कर रहे हैं।‘‘ इस मौके पर मोगेराइन ने कहा- ‘‘आज जो हमारे सामने है, वह बड़ी मशक्कत का परिणाम है, जो अंतर्राष्ट्रीय सम्बंधों के क्षेत्र में एक नये अध्याय को खोल सकता है। मेरे खयाल से यह पूरी दुनिया के लिये नयी उम्मीद है।‘‘

इसके बाद भी यह सच है, कि दुनिया के 6 बड़े देशों के हितों के बीच और ईरान के हितों में गहरा मतभेद है। और यह किसी भी समझौते के लिये खास अच्छी बात नहीं। यही नहीं इस समझौते से अमेरिका और यूरोपीय संघ के मित्र देशों की भी पूरी सहमति नहीं है, वो अमेरिका से नाराज है।

इस्त्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू -जो कि वार्ता के खिलाफ रहे हैं- ने इसे ‘ऐतिहासिक भूल‘ करार दिया। जबकि राष्ट्रसंघ के प्रमुख ने इस समझौते में शामिल पक्षों को बधाई देते हुए कहा, कि ‘‘मैं आज वियना में हुए इस ऐतिहासिक समझौते का स्वागत गर्मजोशी के साथ करता हूं। यह मूल्य एवं वार्ताओं का घोषणां पत्र है।‘‘

न्यूयाॅर्क टाइम्स के अनुसार- इस समझौते के तहत तेहरान अपने परमाणु क्षमता को कम से कम 10 सालों तक उल्लेखनिय ढंग से सीमित रखेगा, और इसके बदले में दुनिया की 6 बड़ी शक्तियां इस बात से सहमत हैं, कि ईरान के खिलाफ लगे अंतर्राष्ट्रीय तेल एवं वित्तीय प्रतिबंधों को वो हटा लेंगी।‘‘ यह प्रतिबंध अमेरिका, यूरोपीय देश उनके सहयोगी देशों -इस्त्राइल सहित- के द्वारा पिछले 12 सालों से ईरान पर थोपा गया था। जिसका घोषित लक्ष्य उसके परमाणु कार्यक्रमों को रोकना था, ताकि वह परमाणु हंथियारों का निर्माण न कर सके। जबकि ईरान की ऐसी कोई योजना कभी नहीं थी।

इस्त्राइल आज भी ईरान को अपने लिये और दुनिया के लिये खतरा मानने की नीति पर अड़ा हुआ है। उसके प्रधानमंत्री ने कहा है, कि ‘‘ईरान के साथ हुए इस परमाणु समझौते के बाद दुनिया कल के मुकाबले आज ज्यादा खतरनाक जगह बन गई है।‘‘ उन्होंने कहा- ‘‘हम हमेशा अपना बचाव करेंगे। यह समझौता ईरान को सैंकड़ों बिलियन डाॅलर का अप्रत्याशित लाभ देगी, जिसका उपयोग वह इस्त्राइल को नष्ट करने के लिये अपनी ताकत को बढ़ाने में करेगा।‘‘

26 जुलाई को अमेरिकी राष्ट्रपति ने ईरान के साथ हुए समझौते को अमेरिकी कांग्रेस के सामने स्वीकृति के लिये भेजा है, जहां रिपब्लिकन पार्टी का वर्चस्व है। इस्त्राइल ने कांग्रेस से अपील की है, कि ‘‘वह इस ‘टेरर मशीन‘ -ईरान- के साथ हुए समझौते को खारिज कर दे।‘‘ सीबीएस नेटवर्क के साथ एक इण्टरव्यू में नेतन्याहू ने कहा- ‘‘सही यह होगा, कि इस समझौते के साथ आगे ना बढ़ा जाये।‘‘ जिससे कांग्रेस के रिपब्लिकन सदस्य सहमत हैं। जबकि ओबामा ने कहा है, कि ‘‘यदि कांग्रेस इस समझौते को खारिज करती है, तो वो अपने विटो पाॅवर का उपयोग करेंगे।‘‘ उन्होंने ईरान से हुए इस समझौते को अमेरिका और उसके मित्र देशों की सुरक्षा के लिये उपयोगी बताया और कहा- ‘‘यह हमारे हित में है।‘‘

रूस और चीन की प्रतिक्रिया सामान्य है। कह सकते हैं, कि उनकी चुप्पी और वक्तव्य कूटनीतिक है। उन लोगों की तरह है, जो अपने ऊपर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों के प्रति सतर्क है। जिनके लिये ईरान एक सहयोगी देश है। ऐसा देश है, जिसकी आर्थिक एवं सामरिक सुरक्षा की जिम्मेदारी उन पर है।

रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लोवारोव ने कहा- ‘‘यह समझौता इस क्षेत्र में ‘इस्लामिक स्टेट‘ की बढ़त को रोकने के संघर्ष में सहायक होगी।‘‘ उन्होंने कहा- ‘‘यह इस्लामिक स्टेट और अन्य आतंकी गुटों के खिलाफ लड़ने के लिये उस बेरियर को हटाने का काम करेगा, जो कि कृत्रिम है।‘‘ जिससे इराक और सीरिया का संकट जुड़ा हुआ है। जिसका अमेरिका और यूरोपीय देश अपने हितों के लिये उपयोग कर रहे हैं। राजनीतिक अस्थिरता और सैन्य हस्तक्षेप को बढ़ा रहे हैं। जिसके खिलाफ रूस और चीन सहित बहुध्रुवी विश्व की अवधारणा रखने वाले वो देश है- जो अमेरिकी वर्चस्व और एकाधिकारवाद के खिलाफ है। जबकि अमेरिकी साम्राज्य अपने आर्थिक एवं सामरिक वर्चस्व को बनाये रखने की ऐसी लड़ाई लड़ रहा है, जिसमें ईरान की भूमिका महत्वपूर्ण हो गयी है।

दुनिया के 6 शक्तिशाली देश -जिनके बीच खेमे की लड़ाई है- और ईरान के बीच हुआ ‘वियना समझौता‘ भू-राजनीतिक संतुलन को अपने पक्ष में करने और वित्तीय संघर्षों का हिस्सा है। ईरान अब इराक, लीबिया और सीरिया की तरह साम्राज्यवादी संघर्षों के बीच है, जिसकी सुरक्षा वेनेजुएला की तरह चीन और रूस से जुड़ गयी है।

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