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साहित्य सम्पत्ति नहीं

??????????????????????????????साहित्य से सरकार और बाजार की दावेदारी को खत्म कर देना चाहिये, और यदि गोर्की भी कहें कि ‘‘मां मेरी है।‘‘ तो कहना चाहिये- ‘‘पतली गली से निकल लें, अब मां मेरी है।‘‘ ऐसी दावेदारी का कोई मतलब नहीं है। हम सरकार और बाजार का विरोध भी इसलिये करते हैं, कि उनकी दावेदारी साहित्य को और साहित्यकार को भी ‘पेटेंट‘ बनाने की दावेदारी है।

‘‘हर्ज क्या है भाई, जो जिसका है, उसका तो होना ही चाहिये।‘‘ कुछ लोग ऐसा कह सकते हैं।

हम भी यही कहते हैं, कि ‘‘जो जिसका है, उसे उसका ही होना चाहिये।‘‘ पेटेंट करा लेने से या सौदा कर लेने से साहित्य को निजी सम्पत्ति में बदलना गलत है।

सरकार को और सरकारों के विधि-विधानों के तहत साहित्यकारों से लिखा-पढ़ी करा लेने वाले बाजार को और साहित्यकार को, यह अधिकार ही नहीं है, कि वह समाज की सम्पत्ति को निजी सम्पत्ति में बदले।

‘सम्पत्ति‘ भी हम इसलिये कह रहे हैं, कि इसके अलावा और कुछ कहने पर बात समझ में नहीं आयेगी। क्योंकि बड़े ही तरीके से हर एक चीज को -प्रकृति से लेकर सोच और समझ को, श्रम और क्षमता को, हमारे आज और कल को, सम्पत्ति बना दिया गया है। व्यक्ति और समाज को भी सम्पत्ति में बदल दिया गया है। सम्पत्ति को वहां घुसा दिया गया है, जहां किसी भी चीज के लिये जगह नहीं है।

ऐसा लगता है, जैसे हम सम्पत्ति बनने और बनाने के कारोबार का हिस्सा हैं।

क्या प्रेमचंद ने गोदान सम्पत्ति बनने या बनाने के लिये लिखा था? उनका लेखन सम्पत्ति है?

आप कहेंगे- ‘‘यह तो बड़ा ही बेहूदा सवाल है।‘‘

मगर, यह बेहूदी सोच है।

ऐसी व्यवस्था है, जहां सम्पत्ति बनने और बनाने को सम्मानित दर्जा हासिल है।

इसलिये, यदि यह सवाल बेहूदा है, तो ऐसी सोच भी बेहूदी है, और ऐसी समाज व्यवस्था सबसे बड़ी बेहूदगी है। क्योंकि प्रेमचंद जी ने सम्पत्ति बनने या बनाने के लिये कभी कुछ नहीं लिखा।

अभी-अभी आपने ‘प्रेमचंद जयंती‘ मनाने का ‘गौरव‘ हासिल किया है। प्रेमचंद जी को फूल-मालाओं से लाद दिया है। जिस समाज व्यवस्था के खिलाफ प्रेमचंद जी ने लिखा, उस व्यवस्था ने समारोहों में बड़ी मौज की। ठेले लगाये। गोलगप्पे खाये। बड़ी-बड़ी गप्पें मारी। प्रेमचंद को पुतला बनाया और सम्मानित लोगों ने, साहित्य की दुकान चलाने वाले लोगों ने तस्वीरें खिंचवाई। कुछ लोगों ने लमही में केक भी काट दिया। और यह भी कहा, कि ‘प्रेमचंद महान थे।‘ ऐसी-ऐसी तारीफें की, कि यदि प्रेमचंद वहां होते तो गड़बबड़ा जाते। मतलब? हम समझते हैं, कि प्रेमचंद वहां नहीं थे।

तो कहां थे? या कहां हैं? आप तय करें।

हम तो यही कहेंगे, कि प्रेमचंद जी को याद करने से अच्छा है, उन्हें जीना, और उन्होंने जिस समाज व्यवस्था को जीया, उसे बदलना। क्योंकि, प्रेमचंद उसे बदलने की लड़ाई हैं।

आप मुझे क्षमा करें लेकिन मुझे उन लिक्खाड़ों से बड़ी चिढ़ होती है, जिनके भीतर न तो चूल्हा है, न बर्तन है, ना ही आग है, फिर भी वो कुछ न कुछ पकाते रहते हैं। यह बताते रहते हैं, कि ‘‘हम यहां हैं।‘‘ जबकि वो कहीं नही होते और जहां होते हैं, वहां सरकार और बाजार बनने और बनाने में लगे रहते हैं। और वो ऐसा इसलिये करते हैं, कि और कुछ कर नहीं सकते, और सरकार और बाजार बनने में मुनाफा है। अपनी दुकान चलाना है। ऐसे लिक्खाड़ चलती हुई दुकान के नकलची हैं।

जब माक्र्सवाद चल रहा था, ये माक्र्सवादी बने।

और जब पूंजीवादी बाजारवाद चलने लगा, ये बाजारवादी हो गये।

आज कल बाजार और बाजारवाद की मुनादी सरकारें कर रही हैं। ऐसे में यदि रूस की पुतिन सरकार गोर्की की दावेदारी करे, यदि अमेरिका की ओबामा सरकार हावर्ड फास्ट को अपना कहे, या भारत की मोदी सकरार प्रेमचंद के होरी और गोबर के लिये, उनका भला करने की कोई बात कहे और कोई लिक्खाड इस बात पर यकीन करे और उस यकीन को फैलाने में मीडिया की तरह दिन-रात एक करे, तो आपको कैसा लगेगा?

लगेगा- ‘‘भाई यह तो परले दर्जे की बेहूदगी है।‘‘

मगर, यह सिर्फ बेहूदगी नहीं, मक्कारी है। समाज से, समाज के बहुसंख्यक लोगों से और साहित्य से, उसके अपनों को छीनने की साजिशें हैं। सरकारें बाजार के साथ मिल कर चालबाज हो गयी हैं। झारखण्ड में शोषित समाज के लिये लड़ने वाले बिरसा मुण्डा के नाम से राजपथ, स्टेडियम, हवाई अड्डा और चैराहा ही नहीं, कारागार भी है।

-आलोकवर्द्धन

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