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श्वेता राय की पांच कविताएँ

श्वेता राय .तस्वीर1. विदा

माँ
पानी से भरे लोटे में
डाल कर हाथ
देती रही आशीष
जीवन भर की शीतलता का
और बहाती रही
तीन तीन पाती आँसू
पिता
आँखों में रोके बरसात
दिल में समेटे सागर
दिमाग में लिये लोकाचार
जोड़े दोनों हाथ
जुबान से बस इतना कह सके
कि हमारी बिटिया आपकी हुई….

 

2. प्रेम

प्रेम ने पहन रखा है
प्यार समर्पण विश्वास के धागे से बुना
एक चित्ताकर्षक चटकीला लिबास
और फैला रखी हैं अपनी बाँहें कि भर ले वो आगोश में तुम्हें
उसे देख के
रुकना, थोडा संभलना
फिर बढ़ाना अपना कदम उसकी ओर
क्यूंकि
भरते हुये तुम्हें अपनी बांहों में
करते हुये मुक्त तुम्हें, तुम्हारे दायरों से
अक्सर उसके बड़े नाख़ून कर जाएंगें तुम्हारी पीठ को लहु लुहान….

 

3. विलोम

जब से मिली हूँ तुमसे विलोम के मायने जान गई हूँ
सीख लिया है
चेहरे पर चिपकाना हँसी
समेटे मनोभावों को
करती हूँ कल्पना
कि कर लुंगी पूरी यात्रा एक दिन अनन्त की
पर प्रारम्भ ही नहीं खोज पाती
यूँ ही ख़त्म होते जाते हैं दिन के चौबीस घंटे
लेकिन नहीं आता कोई नया दिन
और उम्र जाती है घट
समेटे अनगिन पलों को
बरस दर बरस
जारी है क्रम मौसम के बदलने का भी
बस नहीं कुछ बदल रहा है तो मेरे बाहर और भीतर…..

 

4. तुम विक्षिप्त हो

बड़े बड़े गंदे मटमैले नाख़ून
धूल गर्द से भरे पड़े उलझे बाल
और बेतरतीब बढ़ी दाढ़ी लिये
तुम विक्षिप्त हो
पीठ से सटा पेट
दूर तक गंध मारती मुंह की बास
दांतों में पीलापन और
चमड़ी का रूखापन लिये
तुम विक्षिप्त हो
फ़टे पुराने कपड़े से झांकती बदहाली
फ़टी एड़ियों से रिसता खून
और बदन पर मोटी परत की मैल लिए
तुम विक्षिप्त हो
नहीं पड़ता फर्क तुमपर
किसी की खुशियों और दुःख का
तुम खोये रहते हो स्वंय में
कभी हँस पड़ते हो खिलखिलाकर तो
कभी आते जाते राहगीरों पर
लगते हो फेकने पत्थर
और लिये हुए मन भर अपशब्द अपनी जुबान पर
तुम विक्षिप्त हो
तुम्हारे पास से गुजरने वाला
लिये रहता है एक डर मन में कि
न जाने कैसा कर बैठो व्यवहार तुम
क्योंकि तुम विक्षिप्त हो
हाँ! विक्षिप्त ही हो
और तुम नहीं छुपा सकते अपनी ये विक्षिप्तता
कि यही तो है
तुम्हारा सकल नैसर्गिक स्वरुप जिसे यूँ ही सामने आना है
तुम अभिशप्त हो भोगने को
अपनी ये विक्षिप्तता सदैव क्योंकि तुम समय हो….

 

5. हम-तुम

जब हम साथ थे तो कितने अलग थे
तुम खुल कर हँसते और
मैं बमुश्किल कह पाती अपनी बातें
कभी भरी आँखों से जो देखती तुम्हें
तो तुम कहते
देखो! बहने न देना मेरा विश्वास
हाँ, एकदम अलग थे हम दोनों, उनदिनों साथ थे जब
टोक दिया करती थी तुम्हें मैं
जब देखती थी तोड़ती हुये कोई फूल
और तब खीझ भरी हँसी के साथ कहते तुम
कि फिर कभी न कहना कि मैंने दिया नहीं तुम्हें कभी फूल
हँस लेते थे साथ साथ
रो लेते थे साथ साथ
जबकि हम थे एकदम एकदम अलग उनदिनो जब थे साथ
बीतते पल
और बदलते मौसमो संग
अपनाते गये हम आदतें एक दूसरे की
समाते गये हम जरूरतों में एक दूसरे की
कि आज हम एक से हैं पर साथ नही

प्रस्तुति :- नित्यानंद गायेन

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One comment

  1. एक एक रचना मन को छूती हुई है

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