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21वीं सदी के दावेदार – 3

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21वीं सदी के दावेदार साम्राज्यवादी ताकतें हैं- यूरो-अमेरिकी साम्राज्यवाद और मुक्त व्यापार के नये क्षेत्रों की रचना करने वाले देश। जिनके पास चीन की वित्तीय क्षमता और रूस की सामरिक एवं कूटनीतिक साझेदारी है। जिसके  बारे में हमारी बातचीत पहले हो चुकी है।

विश्व का बंटवारा हो चुका है, किंतु दोनों खेमों के सोच की जमीन एक है- मुक्त व्यापार और बाजारवाद।

कह सकते हैं, कि इन दावेदारों में, सदी पर, आम जनता की दावेदारी कहीं नहीं है। इसके बाद भी हमारे लिये यह सवाल सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण है, कि आम जनता कहां है? जिसे बेचा और खरीदा जा रहा है, जिस पर वैश्विक अर्थव्यवस्था का भारी-भरकम कर्ज है, और यह कर्ज निजी वित्तीय पूंजी-वैश्विक वित्तीय इकाईयों का ऐसा कर्ज है, जिसे देश की सरकारों के द्वारा उन पर लाद दिया गया है। जिनके पास विकास के जरिये समाजवाद और जनसमर्थक सरकारों के अलावा और कोई विकल्प नहीं है। वह दुनिया के उस वैकल्पिक व्यवस्था के पक्ष में है, जहां सरकारें उनकी फिक्र करे, उनका खयाल रखे।

और ऐसी सरकारें जरूरत से ज्यादा कम हैं, और जो है उन पर अमेरिकी साम्राज्य आर्थिक एवं कूटनीतिक हमले कर रहा है। राजनीतिक अस्थिरता फैला कर वहां तख्तापलट कराने में लगा है, ताकि वैश्विक स्तर पर जो चुनौतियां उसके सामने हैं, उन्हें विचारहीन बनाया जा सके।

भले ही अमेरिकी सरकार और पश्चिमी देशांे के सामने रूस और चीन की चुनौती है, लेकिन वैश्विक वित्तीय ताकतों के लिये लातिनी अमेरिका एवं कैरेबियन देशों की समाजवादी सरकारें वास्तविक चुनौती हैं। जो मुक्त व्यापार, बाजारवादी अर्थव्यवस्था, अर्थव्यवस्था के निजीकरण और एकाधिकारवाद के खिलाफ है। जिन्होंने ‘21वीं सदी के समाजवाद‘ की अवधारणां को ‘विकास के जरिये समाजवाद‘ के रूप में विकसित कर लिया है। जो ‘स्ट्रीट गर्वमेण्ट‘ और जनसमर्थक सरकारों के जरिये महाद्वीपीय एकजुटता को, साम्राज्यवाद के विरूद्ध कारगर हथियार बना चुके हैं। आज अमेरिकी साम्राज्यवाद चाह कर भी इन देशों के प्रति सैन्य हस्तक्षेत्र जैसी वारदातों को अंजाम नहीं दे पा रहा है।

क्यूबा के खिलाफ 54 साल पहले लगाये गये अमेरिकी प्रतिबंधों को अब अमेरिकी सकरार दूतावास स्तर के राजनीतिक सम्बंधों के रूप में विकसित कर रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को यह स्वीकार करना पड़ा कि ‘‘क्यूबा की समाजवादी सरकार के खिलाफ अमेरिकी नीतियां असफल रही हैं।‘‘ और अब ओबामा सरकार क्यूबा से अपने सम्बंधों को सुधारने की घोषणा कर रही है, और गये महीने दोनों देशों के बीच दूतावास स्तर के राजनीतिक सम्बंधों की स्थापना हो चुकी है। भले ही क्यूबा के ग्वातेनामा द्वीप पर अमेरिकी कब्जा है, आर्थिक प्रतिबंध आज भी जारी है और दूतावास कर्मचारी एवं राजनीतिज्ञों को दी जाने वाली छूट का मुद्दा है।

क्यूबा की समाजवादी सरकार ही नहीं लातिनी अमेरिकी एवं कैरेबियन देशों सहित विश्व समुदाय इस बात को जानता है, कि किसी भी देश में अमेरिकी दूतावास वहां की राजनीतिक अस्थिरता का कारण है। तीसरी दुनिया के देशों के लिये वह तख्तापलट का अड्डा है। अमेरिकी दूतावास अमेरिकी सरकार का ऐसा ठिकाना रहा है, जहां से अघोषित रूप में तीसरी दुनिया के देशों में अस्थिरता फैलायी जाती है। इसके बाद भी क्यूबा की सरकार ने दूतावास स्तर के सम्बंधों को स्वीकृति दी। और दूतावास खोले गये।

यह स्वीकृति संवाद की कूटनीति है। जिसका उपयोग अमेरिकी सरकार लातिनी अमेरिकी एवं कैरेबियन देशों से अपने सम्बंधों को सुधार कर रूस और चीन के कूटनीतिक एवं आर्थिक बढ़त को रोकना चाहती है, वहीं क्यूबा की सरकार गतिरोध को समाप्त करने और असहमति के मुद्दों को वार्ता के मेज पर लाना चाहती है। जिसका मकसद दो ध्रुवी विश्व के बीच समाजवादी समाज व्यवस्था के लिये स्थान को सुरक्षित किया जा सके। यह बाजारवादी अर्थव्यवस्था से तालमेल बैठाने की पहल भी हो सकती है। क्यूबा महाद्वीपीय एकजुटता और महाद्वीपीय सुरक्षा के पक्ष में है। जिसे तोड़ने की अमेरिकी कवायतें वेनेजुएला, निकारागुआ और इक्वाडोर जैसे समाजवादी देशों में आज भी जारी है। जहां रूस और चीन की महत्वपूर्ण उपस्थिति है।

क्यूबा की क्रांतिकारी सरकार ने वेनेजुएला की शाॅवेज सरकार के साथ मिल कर लातिनी अमेरिका और कैरेबियन देशों के सामाजिक विकास योजनाओं और आर्थिक सहयोग की दिशा बदल दी। चिली में सल्वाडोर अलेन्दे की पहली समाजवादी सरकर का तख्तापलट करने के बाद, जिस अमेरिकी नवउदारवादी अर्थव्यवस्था की शुरूआत की गयी थी, उसे रोकने का गंभीर काम किय। ‘अपनी पकड़ मजबूत करने के जिस नीति‘ के तहत आज बराक ओबामा जो पहल कर चुके हैं, और वो अपने आपको आश्वस्त भी कर रहे हैं, और यही आश्वासन वो अमेरिकी कांग्रेस को दे रहे हैं, जो इसके पक्ष में नहीं है, वह इस बात पर निर्भर करती है, कि उनकी नीतियां महाद्वीपीय एकजुटता और रूस-चीन के बढ़ते प्रभाव को तोड़ पाती है या नहीं? जिसकी संभावना (आशंका) कम है।

इसके बाद भी हमारे लिये यह सोच का विषय है, कि ‘‘संवाद की यह राजनीति‘‘ समस्याओं को वार्ता की मेज पर लायेंगी या साजिशों को नया रूप देंगी? जिसका मकसद अमेरिका के लिये समाजवादी देशों की सरकारों को बदलना है। जिसे वह ‘लोकतंत्र को प्रोत्साहित‘ करने के नाम पर चलाती है। अभी-अभी 12 जून को ‘अमेरिकी कमेटी आॅन एप्रोप्रियेशन‘ ने 30 मिलियन डाॅलर की स्वीकृति इसी काम के लिये स्वीकृत किया है। जिसका अघोषित लक्ष्य वामपंथी एवं समाजवादी सरकारों को सत्ता से बेदखल करना है। अमेरिकी सरकार दशकों से यही कर रही है। अब तक कई बिलियन डाॅलर वह इसी काम में लगा चुका है। जिसमें उसे अब तक वह सफलता नहीं मिल सकी है, जिसकी उसे अपेक्षा थी।

वेनेजुएला के बारे में हमने विस्तार से चर्चा की है। जहां शाॅवेज के तख्तापलट की नाकाम कोशिश के बाद, उनके असामयिक निधन का लाभ उठाने की कोशिश आज भी अमेरिकी सरकार राष्ट्रपति निकोलस मदुरो की सरकार का तख्तापलट करने के लिये आर्थिक प्रतिबंध और हिंसक प्रदर्शनों का सहारा ले रही है। वेनेजुएला को ओबामा सरकार ने ‘अमेरिका के राष्ट्रपति सुरक्षा के लिये खतरा‘ तक घोषित किया, जहां उसके द्वारा तख्तापलट की कोशिशों का खुलासा भी हुआ।

इक्वाडोर में आज भी राष्ट्रपति राॅफेल कोरिया के खिलाफ वेनेजुएला जैसी स्थितियां पैदा की जा रही हैं। निकारागुआ नहर के निर्माण की वजह से वहां की वाम सरकार अमेरिकी निशाने पर है। बोलेविया के राष्ट्रपति इवो मोरालिस को सत्ता से बेदखल करना अमेरिकी नीतियां हैं।

क्यूबा और वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था में न सिर्फ चीन का बड़ा निवेश है, बल्कि वह महाद्वीपीय एवं तीसरी दुनिया में चलाये जा रहे सामाजिक विकास योजनाओं में भी सहयोगी है। इन देशों को रूस और चीन का कूटनीतिक, सामरिक एवं आर्थिक सहयोग हासिल है।

21वीं सदी के समाजवाद और विकास के जरिये समाजवाद को रूस और चीन का समर्थन हासिल है। वैश्विक स्तर पर बहुध्रुवी विश्व की अवधारणां मुक्त व्यापार के नये क्षेत्रों की रचना करने वाले रूस और चीन की घोषित नीति है। ब्रिक्स बैंक और एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक के लातिनी अमेरिकी देश महत्वपूर्ण साझेदार हैं। कह सकते हैं कि इन देशो के पास रूस और चीन का सहयोग और समर्थन न हो तो अमेरिकी साम्राज्यवाद इन देशों को इराक, लीबिया और सीरिया बनाने से चूकेगा नहीं।

इस तरह वैश्विक स्तर पर ‘विकास के जरिये समाजवाद‘ की अवधारणां और समाज व्यवस्था बहुध्रुवी विश्व की अवधारणां से संचालित ‘यूरेशियायी बाजारवादी ताकतों‘ से टिक कर खड़ी हो गयी है। सोच के स्तर पर 21वीं सदी पर जिनकी अपनी दावेदारी है।

सोच के स्तर पर समाजवादी दावेदारी को अस्वीकार नहीं किया जा सकता, जिसके पीछे राजसत्ता नहीं, जनसत्ता है। इसके बाद भी, सोच के स्तर पर यह सच है, कि ‘विकास के जरिये समाजवाद‘ की अवधारणां में राज्य के सरकारों की भूमिका सबसे बड़ी है। नजारा कुछ ऐसा बनता है, जैसे सरकारें आगे-आगे चल रही है, और अपने पीछे और साथ चलती देश की आम जनता को सरकारें वर्गगत राजनीतिक एवं सामाजिक जनचेतना से प्रशिक्षित करती हुई, सरकार में समाज की न सिर्फ भूमिका बढ़ा रही हैं, बल्कि सरकार को भी सड़कों पर पहुंचा रही है। राजभवनों से आम जनता के बीच ला रही हैं। आम जनता की हिंस्सेदारी बढ़ाना ही उनका मकसद है।

क्यूबा के बारे में कहा जाता है, कि ‘‘वहां का हर नगरिक सरकार है‘‘ और वेनेजुएला में शाॅवेजवादी निकोलस मदुरो की सरकार ‘स्ट्रीट गर्वमेंट‘ है। सामाजिक विकास योजनाओं को आम जनता के हितों से जोड़ा जा रहा है। कम्यूनों की रचना से ले कर कम्पनियों के प्रबंध तक को मजदूरों को सौंपा जा रहा है।

यह अच्छा है। इसके बाद भी एक सवाल है।

‘‘क्रांति एक सतत् प्रक्रिया है‘‘ यह सच है। और यह भी सच है, कि क्रांति के द्वारा समाजवादी समाज के निर्माण का कठिन काम 90 प्रतिशत लोगों के हितों के लिये 10 प्रतिशत लोगों पर ‘सर्वहारा वर्ग की तानाशाही‘ का माक्र्सवादी प्रावधान है। जिस दौरान श्रम की प्रधानता और वर्गविहीन समाज के निर्माण की वास्तविक पहल होती है। ‘विकास के जरिये समाजवाद‘ क्रांति से पहले ही समाजवादी सरकार का प्रावधान है, यही कारण है, कि समाजवाद संक्रमण के दौर में है और दक्षिणपंथी ताकतें साम्राज्यवादी एवं वैश्विक वित्तीय ताकतों के हितों से संचालित होती हुई समाजवादी सरकार का या तो तख्तापलट देती है, या उसे सत्ता से बेदखल करने की लड़ाई उस लोकतंत्र के नाम से लड़ती रहती है, जिनसे उनका कोई वास्ता नहीं होता। फाॅसिस्ट सरकार और वित्तीय तानाशाही जिनका मकसद होता है।

यह ठीक है, कि वैश्विक वित्तीय ताकतों ने जितना विस्तार पा लिया है, और नकली ही सही, लेकिन लोकतंत्र आम जनता के बीच जितना विश्वसनिय है, उसे देखते हुए चुनावी (पूंजीवादी) पद्धति से समाजवादी सरकार बनाना गलत नहीं, किंतु बाजारवादी ताकतों पर बढ़ती उसकी निर्भरता, उसकी अपनी दावेदारी के पक्ष में नहीं है। हम यूरोपीय वामपंथ  को नहीं भूल सकते, जहां समाजवादी संशोधनवादियों ने हर एक निर्णायक मोड़ पर आम जनता का साथ छोड़ने का काम किया है। ग्रीस की सिप्रास सरकार का मामला नया है।

आज मंदी की चपेट में आयी रूस की पुतिन सरकार और मंदी के दौर में प्रवेश करने वाली चीन की अर्थव्यवस्था यदि लड़खड़ा जाती है, तो विकास के जरिये समाजवादी सरकारों का क्या होगा? क्या वो साम्राज्यवादी हमलों को झेल सकेंगी? क्या उनमें समाजवादी वैश्विक अर्थव्यवस्था के निर्माण का दमखम है? जिस सोच और समझ से हम संचालित हो रहे हैं, और मौजूदा विश्व परिदृश्य की जैसी स्थिति है, समाजवाद के लिये यह कठिन दौर है। वैश्विक वर्चस्व की कठिन लड़ाई चल रही है।

21वीं सदी पर समाजवाद की दावेदारी आम जनता की पाली में है। जो पूंजीवादी साम्राज्यवाद और बाजारवादी अर्थव्यवस्था से छुटकारा पाना चाहती है।

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