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प्रदीप त्रिपाठी की चार कविताएँ

pradeep tripathi1. कविता में अचानक चुप हो जाना’

महापुरुषों की फसलें अब सूख गई हैं
संताप-संलिप्त-जिजीविषाओं के विस्मृत कंठ
खूँटे से बंधे विचारों के साथ अट्टहास करते हुए
आम आदमियों की जुगाली और जुगलबंदियों के खंडहर-बीच
अपने-अपने वजूदों के द्वंद्व में
ध्वस्त हो रहे हैं वे और हम
फिर भी
यहाँ हस्तक्षेप जैसा कुछ भी नहीं है।
नेपथ्य में नए नए स्वांग रचते हुए
वाक्पटुता एवं धैर्य खो देने के बीच ही
पता नहीं क्यों
पूरी तरह घबराया हुआ आदमी
अचानक धूमिल की कविता को पढ़ते हुए हँस पड़ता है
पर
उसकी हँसी का रफ़्ता-रफ़्ता चुप्पी में तब्दील होना
मुझे कविता लिखने से अचानक रोक देता है
यह बताते हुए कि
‘जितना तुम्हारा सच है उतना ही कहो’
कविता में अब लिखने जैसा कुछ भी नहीं था
क्योंकि
वह भी जानते हैं…
‘मौन भी अभिव्यंजना है’

 

2. किसी का न मिलना

मिलने की खुशी में
किसी का न मिलना
उतरते हुए ट्रेन से
किसी चीज के छूटने के डर जैसा लगता है
इस तरह का मिलना
विचारों का मिलना नहीं
बल्कि
बंद दरवाजे की खोई हुई चाभी के
अचानक मिलने जैसा है
यह मिलना
किसी अदब का मिलना नहीं
बल्कि
गणित के किसी भूले हुए फार्मूले के
अचानक याद आने जैसा है
इस तरह के मिलने की खुशी
किसी के मिलने की खुशी
में न मिलने जैसा है
या
भीड़ में किसी नन्हें बच्चे के
खो जाने जैसा
या
सबका एक साथ मिलना
कोई बड़ा हादसा टल जाने जैसा |

 

3. खुरदुरे पांव की जमीन

कई सदियों से देख रहा हूँ
इन्हीं खुरदुरे पैरों को
हाँफता
झुझलाता
कांपता
बौखलाता हुआ
यहीं
सदियों से
देख रहा हूँ मैं
पर
कुछ भी नहीं कर पा रहा हूँ
इन फटेहाल पैरों का
जिनकी दरारें धीरे-धीरे
अब और बढ़ती जा रही हैं
दिन-प्रतिदिन…..

 

4. सच कहूँ तो चुप हूँ

सब के सब…
मिले हुए हैं ।
नाटक के भी भीतर
एक और नाटक खेला जा रहा है।
हम, सब …
एक साथ छले जा रहे हैं
‘क्रान्ति’ और ‘बहिष्कार’
के इन छद्मी आडंबरों के तलवों तले।
अभिव्यक्ति के तमाम खतरे उठाते हुए भी
मैं आज
‘नि:शब्द’ हूँ
सच कहूँ तो
चुप हूँ
कारण यह.
कि मेरे ‘सच’ के भीतर भी एक और ‘अदना सा सच’ है
कि
‘मैं’ बहुत ‘कायर’ हूँ।

-प्रदीप त्रिपाठी

 

कवि-परिचय:

प्रदीप त्रिपाठी
जन्म- 7 जुलाई, 1992
संप्रति- साहित्य विभाग, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा, पी-एच. डी. में शोधरत/
कविता-लेखन में विशेष रुचि
प्रकाशित रचनाएँ- विभिन्न चर्चित पत्र-पत्रिकाओं (दस्तावेज़, अंतिम जन, परिकथा, कल के लिए , वर्तमान साहित्य, अलाव, नवभारत टाइम्स आदि) में शोध-आलेख एवं कविताएं प्रकाशित
सम्मान- कविता लेखन के क्षेत्र में ‘मुक्तिबोध स्मृति काव्य प्रतियोगिता सम्मान’, 2013
संपर्क- साहित्य विभाग, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा
स्थायी पता- महेशपुर, आजमगढ़, उ.प्र., 276137
ई-मेल- tripathiexpress@gmail.com

प्रस्तुति :- नित्यानंद गायेन

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One comment

  1. अच्छी कविताए ,.. अच्छी लगी कवि और आपका शुक्रिया गाएन जी ।

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