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मुद्दे उछल रहे हैं!

Sonia-Congress-Protest-PTI

भारतीय लोकतंत्र धीरे-धीरे अपने ताबूत की ओर बढ़ रहा है।

काम के नजरिये से देखा जाये तो संसद ठप्प है।

लोकसभा में सत्तारूढ़ भाजपा विपक्ष के बिन, काम कर रही है।

राज्यसभा में, जहां सरकार के पक्ष में सहयोग नहीं है, वहां भी भारी विवाद है।

विपक्ष गांधी जी के पुतला के सामने जमा है।

मुद्दे उछल रहे हैं।

मुद्दा भूमि अधिग्रहण विधेयक का था। या कह लीजिये कि अभी भी है। जिस पर मोदी सरकार अड़ी हुई थी। मोदी जी ने देखा नहीं कि साल भर पहले जिन लोगों ने लोकसभा में बैठने के लिये इतनी सीटें दी, कि वो प्रधानमंत्री बन गये। पीएम बन गये। उन्हीं लोगों ने ‘अपना भला चाहने वाले‘ इस विधेयक का साथ नहीं दिया। वो अडे़ रहे कि ‘बहुमत की सरकार की पटरी पर आना, दौड़ती हुई रेल की पटरी पर आना है।‘

अब उन्होंने बड़ी लाईन से उतर कर छोटी लाईन पकड़ लिया है, और 2013 के संशोधन विधेयक से संसद में पटरी बैठाने की पेशकश की है। लेकिन पेशकश भी ऐसी, कि पटरी न बैठे।

अभी गाड़ी पटरी पर आयी नहीं है, ऊपर से बेपटरी होने के कई मुद्दे उछल गये।

‘ललित गेट‘ के पिंजड़े में कई बड़े परिन्दे फंस गये।

अभी सरकार हुंकार भर ही रही थी, कि व्यापम घोटाले का परदा उठ गया।

मोदी जी ‘भ्रष्टाचार मुक्त एक साल‘ का कार्ड अभी फेंका ही था कि गड़े हुए कई मुर्दे उखड़ गये।

उन्होंने यूपीए के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के ‘मौन‘ को गोद ले लिया, जिन्हें वो ‘मौन मोहन सिंह‘ कहा करते थे।

अब कांग्रेस उनके मौन की तख्ती दिखा कर, बोलने के लिये उकसा रही है। लेकिन मोदी जी बोल नहीं रहे है। बोलने का शौक वो विदेशों में पूरा कर रहे हैं। उनके बदले वो लोग बोल रहे हैं, जिन्हें साल भर उन्होंने बोलने नहीं दिया था।

ललित गेट और व्यापम के साथ विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान उछल रहे हैं। कांग्रेस कह रही है- ‘‘इस्तीफा दो। मानसून सत्र चला लो।‘ भाजपा कह रही है- ‘‘संसद को चलने दो। जो बड़ी मुश्किल से मिला है, उसे तो हम नहीं देंगे।‘‘

देने, न देने के बीच संसद ठप्प है।

लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन के सामने तख्तियां लहराने वाले कांग्रेस के 25 सांसद की सदस्यता, पांच दिनों के लिये, निलंम्बित है।

अब यह मुद्दा भी उछल रहा है।

सांसदों का निलंबन होता रहा है, इसलिये निलंबन जायज है।

घोटालों के खुलासे के बाद इस्तीफे की मांग होती रही है, इसलिये इस्तीफे की मांग जायज है।

इस तरह सरकार जायज है, विपक्ष जायज है।

भाजपा जायज है, और कांग्रेस भी जायज है।

जिनके साथ जो जुड़े हुए हैं, वो सभी जायज हैं।

‘अच्छा लग रहा है।‘

अच्छा लग रहा है, यह देख कर कि लोकतंत्र का ताबूत देश के सभी जिम्मेदार आपस में मिल कर बना रहे हैं। लोकतंत्र की दुहाई देते हुए, तानाशाही के खिलाफ नारे लगाते हुए बना रहे हैं।

जिस तरह लोकतंत्र में चुनाव को लोकतंत्र मान लिया गया है, ठीक उसी तरह संसद के चलने को संसद की व्यवस्थित सांसें मान लिया गया है। जबकि, संसद पेशेवर भ्रष्ट राजनीतिक, माफिया, उद्योगपति, निजी कम्पनियों के दलाल और ऐसे लोगों से भर गया है, जिनकी गिरेबां पर किसी और का हाथ है। यह लोकतंत्र का दिखने वाला ऐसा ताबूत है, जिसे संसद भवन में रखा गया है, वहीं बनाया जा रहा है।

आप पूछ सकते हैं, कि ‘‘एक मुर्दे के लिये -जो अभी मरा नहीं- किनते ताबूतों की जरूरत पड़ेगी?‘‘

हम आपको बतायें, कि हमारी चिंता भी यही है। लोकतंत्र के साथ एक पूरी व्यवस्था और उसके लिये बनी आम लोगों की उम्मीदों को मारा जा रहा है। जिसका सबसे बड़ा सच यह है, कि ‘‘पूरी की पूरी व्यवस्था बहुत पहले ही असंदर्भित हो चुकी है। जनविरोधी हो चुकी है।‘‘

कभी आपने सुना था, किसी ऐसी व्यवस्था के बारे में, उसे चलाने वाली ऐसी सरकार के बारे में जो दिन-रात एक ही गाना अलग-अलग तरीके से गाती है, कि सामाजिक एवं आर्थिक विकास के लिये देशी एवं विदेशी पूंजीनिवेश जरूरी है। राष्ट्रीय एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की जरूरत है। उन काॅरपोरेशनों की जरूरत है, जिनके पास बहुत पैसा हैं बड़ी पूंजी है। इस देश को ऐसे ही पूंजी की जरूरत है। पूंजी निवेशकों की जरूरत है। सवा-सौ करोड़़ लोगों के हितों के लिये उसे लुभाने की जरूरत है। उसके सामने नाचने और उसकी शर्तो को मानने की जरूरत है।

उसकी शर्त है-

श्रम सस्ता हो, प्रचूर मात्रा में हो।

खनिज सम्पदा हो, उसे बेरोक-टोक निकालने की स्वतंत्रता हो।

सड़क-बिजली-पानी अच्छा हो, कहीं कोई विरोध न हो, आधारभूत ढांचा हो, सरकारी करों मे छूट हो, सहुलियतें हों, सकरारी सहयोग हो, और सबसे बड़ी बात व्यापार मुक्त हो, बाजार खुला हो, मुनाफा भरपूर हो।

और सरकार यह सब करने लगे।

पहले से ही लचर श्रम कानूनों में, उसे और लचर बनाने का मसौदा बना ले।

भूमि अधिग्रहण को और भी आसान बनाने के लिये प्रस्तावित विधेयक को अध्यादेशों से लागू कर दे।

औद्योगिक श्रमिकों के लिये गांवों से किसानों को उजाड़ने लगे।

आधारभूत ढांचा के निर्माण के लिये आम जनता से प्राप्त पूंजी को झोंक कर उस पर नये कर्ज लादने की तरकीबें निकालने लगे।

उद्योगों का निजीकरण करने लगे और निजीकरण को राष्ट्रीय नीति में बदल दे।

यह भी कहने लगे कि ‘‘निवेशकों यहां आओ। हमारे पास सस्ता श्रम है, प्रचूर मात्रा में खनिज सम्पदा है, सवा-सौ करोड़ लोगों का खुला बाजार है, यहां बनाओ वहां बेचो, खूब कमाओ, मौज ही मौज है।‘‘

इससे देश और देश की आम जनता को क्या मिलेगा?

कहते हैं- ‘‘देश आर्थिक महाशक्ति बन जायेगा।‘‘

शानदार! अच्छी बात है।

आम जनता?

उसको काम मिलेगा। कमायेगी, पेट भर खायेगी और कुछ बचा लिया तो बैंकों में जमा करेगी। उस बैंक में जिस बैंक में सरकारें साझेदार भर रह गयी हैं, जिनके नाम से उसे चलाती हैं निजी कम्पनियां। उस बाजार में खर्च करेगी, जिस पर बाजारवादी ताकतों का अधिकार है।

सुख शिकंजे में और दुख अपार है।

किसान- अपनी जमीन गवांयेगा।

ग्रामीण- औद्योगिक क्षेत्रों में मजदूर बनेंगे। जो बच जायेंगे उनके सामने दिहाड़ी मजदूर बनने का विकल्प है।

पढ़े-लिखे लोग- बौद्धिक सम्पदा बन जायेंगे।

देश, अपनी खनिज सम्पदा को गवांयेगा।

कुल मिला कर समृद्धि जिनके पास है, उन्हीं की बढ़ेगी। लोग फटे कपड़ों में होंगे। जिनके पास न संवैधानिक अधिकार होगा, ना अपनी सरकार होगी, ना ही वो मानवीय परिस्थितियों में होंगे।

संसद में लड़ाई इस बात की नहीं चल रही है, कि ऐसा होना चाहिये या नहीं?

लड़ाई इस बात की चल रही है, कि यह मौका हमारे पास क्यों नहीं?

मनमोहन सिंह ने इस ‘नेक काम‘ की शुरूआत की थी, मगर ‘नेकी का कारनामा‘ नरेंद्र मोदी दिखा रहे हैं।

वामपंथी भाईयों आप क्या कर रहे हैं?

किसका दामन थाम रहे हैं? किसकी बांह छोड़ रहे हैं?

लोकतंत्र के ताबूत को आप किसके साथ मिल कर बना रहे हैं?

क्या आपको नहीं दिख रहा है, कि श्रम कानून हो या भूमि अधिग्रहण विधेयक देश की आम जनता के खिलाफ है?

क्या अब भी समझना यह बाकी है, कि अर्थव्यवस्था का निजीकरण लोकतंत्र की हत्या का सुनियोजित षड़यंत्र है?

या यह जानने के लिये अभी आपको और वक्त चाहिये कि जिन ताकतों को आपने साम्प्रदायिकता के फ्रेम में जकड़ कर रखा, उन्हीं ताकतों ने देश में वित्तीय तानाशाही को सुनिश्चित कर दिया है?

या यह समझना बाकी है, कि जो मुद्दे उछल रहे हैं, या जिन मुद्दों को उछाला जा रहा है, वो नकली हैं?

यदि आपने यह सब जान लिय है, तो बतायेंगे, कि आप जहां खड़े हैं, वहां क्यों हैं? आम जनता के बीच होने और आम जनता को सही मुद्दों से जोड़ने की आपकी कार्यनीति क्या है?

कृपया बकवास न करे। भाजपा और कांग्रेस और ज्यादातर विपक्षी दलों की नीतियां बाजारवाद के बारे में एक हैं। और मुक्त बाजारवाद आम जनता के पक्ष में नहीं है। क्या आप आम जनता के पक्ष में हैं, या आपकी लड़ाई भी नकली है?

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