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प्रभात मिलिंद की कविता

प्रभात मिलिंद.चूहे

भादो के काले बदराये दिन हों या पूस की चुभने वाली ठंढ
रातें जब एकदम निश्शब्द हो जाती हैं
थक कर बेसुध…औंधी गिरीं, और गहरी स्याह
जड़ता, अँधेरे और सन्नाटे के ख़िलाफ़ तभी किसी एकांत से
दर्ज़ होती है खड़खड़ाहट की हौली-हौली लेकिन एक सतत आवाज़.
मनुष्यों की सभ्यता में नामालूम ये कब से शामिल हैं….
किसी भी इतिहासविद और पुरात्तववेत्ता के अभिलेख में
इनके विकास की क्रमयात्रा का सही-सही लेखाजोखा मौज़ूद नहीं
क्योंकि बेतरह और लगातार मारे जाने के बावजूद इन्होंने
अब तक बचाए रखा खुद को विलुप्त होती प्रजातियों में शरीक़ होने से.
अपनी दुश्वारियों के सहोदर हैं ये …. दोनों साथ-साथ जन्मे
लिहाजा अभिशप्त हैं ज़िंदा रहने के लिए उन्हीं दुश्वारियों के साथ ताउम्र
इनका पूरा जीवन अंतहीन विस्थापनों की अर्थहीन कथा है
इतनी बड़ी दुनिया में ज़मीन का ऐसा कोई टुकड़ा नहीं
जहां ये रह सके महफूज़… जिसको कह सके अपना.
इनके माथे हैं सौ गुनाह… और हज़ार तोहमतें भी इनके नाम
शायद इसलिए भी पृथ्वी पर उपस्थित
सबसे अवांछित और हेय नस्लों में गिने जाते रहे हमेशा
गंदगी और संक्रमण के जन्मना संवाहक हैं ये, मीठी नींद के चिरंतन बैरी
शीतगृह और खलिहानों के पुरातन लुटेरे और कपास के आदिम दुश्मन
दुनिया की एक बड़ी आबादी इनकी वजह से खाने-कपड़ों से वंचित है
कई बड़े अर्थशास्त्री और शोधकर्ताओं की मान्यता है ऐसी.
नुमाइशगाहों में रखे और अब तवारिख बन चुके ख़त और दस्तावेज़
या फिर, बड़े जतन से सहेज कर रखीं हुई दुनिया की
तमाम नायाब किताबों के लिए एक शाश्वत खतरा हैं ये
अपने वज़ूद की हिफाज़त के लिए इनके ही रहमोकरम के मोहताज़ हैं
स्मृतियों के रूप में बचे रह गए….कुछ लुप्तप्राय प्रेमपत्र
जबकि सृष्टि-जगत के एक निहायत कमज़ोर और लाचार जीव हैं ये…
युग-युगान्तर से हैं ये दुर्बलता और कायरता के प्रतीक!
इनकी ही बदौलत ज़िंदा हैं भाषा-विज्ञानं में
आज भी अनगिनत लोकोक्तियाँ और बेशुमार कहावतें
जहाज में छेद होने पर सबसे पहले भागने का इलज़ाम है इनपर
अरब से कमा कर लौटे अपने चचाजात भाई की
नई फटफटिया और दोनाली देखकर अक्सर चुटकी लेते काका
कि अगहन में तो चूहे भी सात ज़ोरुएँ रखते हैं
पिता भी नसीहते देते, जीवन में सुखी रहना है तो ‘चूहा-दौड़’ से बचो
और फिर… ‘पुन: मूषक भव!’ वाली कहानी तो हम सबने
न जाने कितनी बार सुनी थी बचपन में बाबा की ज़ुबानी
रसूख के सन्दर्भ में हाथी के विलोम अर्थ में याद किए जाते हैं ये
हमारी ताक़त के मुक़ाबिल होता है जो, उसे चूहे के बराबर समझते हैं हम
बज़ाहिर उस गजमस्तक आराध्य को अक्सर हम भूल जाते हैं
जो अपनी स्थूलकाया और तथाकथित पराक्रम के बावजूद निर्भर है
इसी बेऔकत पर… दसों दिशाओं में कहीं भी आने-जाने के लिए निर्बाध
हमारे पुरखों का ही बनाया सदियों पुराना कोई मंदिर है इसी देश में कहीं
जहाँ बाक़ायदा पूजे जाते हैं ये….माने जाते हैं पवित्र और श्रद्धेय
जनपद के सबसे बाहुबली नेता की बेटी बेहोश पाई गई हम्माम में
अख़बारों की रपट के मुताबिक उसके पाँव के नीचे एक चूहा आ गया था
अपनी तुच्छता के बारे में ये कभी नहीं रहे किसी मुगालते में
जारी नहीं किया अपने पक्ष में कोई बयान…बचाव में कोई हलफनामा
उनकी हैसियत को लेकर हम ही रहे हमेशा से संशयग्रस्त और तर्कविहीन
इन्होंने ज़्यादा किया हमारा नुकसान कि हमने लीं इनकी जानें ज़्यादा
इसपर खामोश है हमारी जमात जबकि यह सवाल ज़रूर होगा उनके ज़ेहन में.
उनकी निरीह और कातर आँखों को एक नज़र गौर से देखिए…
अपनी मर्ज़ी से नहीं आये ये इस मौकापरस्त और जालिम दुनिया में
कभी नहीं चुनते यह जीवन अगर होता कोई विकल्प इनके पास
इतनी घृणा, तिरस्कार, हीनता, अपमान और संघर्ष से भरा.
ये हमारी सभ्यता के सबसे घुमंतु यायावर हैं….. दुनिया के सबसे बड़े कलंदर
हमारी मनुष्यता को इनकी जिजीविषा से अब भी सीखने की ज़रूरत है….
पृथ्वी पर कहीं नहीं इनका घर फिर भी बना लेते हैं ये कहीं भी ठौर अपना
बार-बार उजाड़े जाने के बाद भी बसा लेते हैं अपना कुनबा
बसर कर लेते हैं हमारी जूठन पर अपनी मुख़्तसर ज़िंदगियाँ
बदबूदार गटर हो या सीलन भरी दुछत्ती… कहीं भी कर लेते हैं प्रेम
फटे-पुराने जूतों के भीतर बढ़ाते रहते हैं अपनी पुश्तों का करवां
सोचिए ज़रा कि अदने से परदे पर घूमता है नुक़्ते सा कोई तीर
निकलती है इसके हमनाम से ‘क्लिक’ की मद्धिम सी आवाज़
और खो जाते हैं हम सामने खुली सूचनाओ और संपर्कों की एक अद्भुत दुनिया में
कितने अशक्त और मतलबी हैं हम इनके बरक्स
कि हर बार इनको ही भेजा हमने अंतरिक्ष में खुद जाने से पहले
ढाए हज़ार ज़ुल्म शोधशालाओ में टीकों और दवाओं की ईज़ाद के बहाने
फिर भी खाली रहे इतिहास के सफे इनकी कुर्बानियों के ज़िक्र या किस्सों से.
चुराया होगा भूख भर अनाज, किसी के हक़ का निवाला तो नहीं छीना
थोड़े-बहुत कपडे-कागज़ात कुतरे होंगे, रिश्तों के धागे तो नहीं काटे
चबाए होंगे चंद हरुफ़, लफ़्ज़ों को बेमानी तो नहीं किया
भुरभुरी की होंगी खेत-खलिहान की थोड़ी सी ज़मीन…किसी पुराने घर की नींव
लेकिन रिवायत और उसूलों पर तो नहीं आजमाए अपने पैने दांत.
जो दीखते हैं ज़हीन और पहनते हैं नफीस कपडे
जो बोलते हैं संजीदा ज़ुबान…. रहते हैं आलिशान कोठियों में
जो अपने ही हमजात से डर कर चलते हैं बुलेटप्रूफ गाड़ियों में
और बिस्तर से मंदिर के गर्भगृहों तक घिरे हैं सुरक्षा के अभेद्य घेरे में
जो इत्तफ़ाक़न बने हुए हैं हमारी ज़िन्दगियों के मुख़्तार और मुंसिफ
अपने सख्त जबड़ों से जो चबा रहे हैं हमारा मुस्तकबिल
खोखली कर रहे अपने सफ़ेद नरम पंजो से पूरी बुनियाद…
चूहों की एक प्रजाति यह भी है जिससे ज़्यादा डर और ख़तरा है हमें
आदिम नफरतों और हज़ार हिकारतों के बावजूद चूहे
शामिल रहे हैं आदियुग से हमारी सभ्यता में…. रहेंगे ये
अनंतकाल तक, अलग-अलग काया में….बदल-बदल कर वेश.

-प्रभात मिलिंद

 

कवि परिचय:

नाम- प्रभात मिलिंद
जन्म – 16 फरवरी 1968
शिक्षा- दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास में एम. ए. की अधूरी पढाई.
सम्प्रति- एक कारोबारी आदमी. फुरसत में यायावरी और फोटोग्राफी के साथ-साथ लेखन. हिंदी की सभी शीर्ष पत्रिकाओं में कविता, कहानी, डायरी-अंश और आलेख प्रकाशित . विगत पंद्रह सालों से असम के बोंगाईगाँव मे प्रवास.
ई-मेल- prabhatmilind777@gmail.com

प्रस्तुति :- नित्यानंद गायेन

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