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मूडीज के बाद एसोचैम की रिपोर्ट

Assocham

ग्लोबल रेटिंग एजन्सी -‘मूडीज कार्प‘ के बाद ‘एसोचैम‘ की रिपोर्ट आ गयी है। भारत में आर्थिक सुधारों का मुद्दा इन एजेन्सियों के लिये महत्वपूर्ण हो गया है। वजह बिल्कुल साफ है, कि राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के लिये भारत का महत्व बढ़ गया है। और महत्व बढ़ने की वजह भी बिल्कुल साफ है, कि केंद्र की मोदी सरकार ने भारत को मुक्त व्यापार का क्षेत्र बनाने और बाजारवादी अर्थव्यवस्था के निर्माण की खुली पेशकश की है, कि-

  • हमारे पास पर्याप्त खनिज सम्पदा और संसाधन है
  • सस्ता श्रम है और
  • आपकी अपनी सरकार है।

एक ऐसी सकरार है- ‘‘जिसने निजीकरण को राष्ट्रीय नीति में बदल दिय है।‘‘ देखें तो सही कितना बड़ा और खुला बाजार है।

उन्होंने आर्थिक सुधारों को राजनीतिक मुद्दा भी बना दिया। और मुद्दे की बात यह है, कि राजीतिक उलझनें पैदा हो गयीं। संसद में ज्यादातर महत्वपूर्ण विधेयकों के सामने राजनीतिक अड़चनें आ गयीं। जिन भ्रष्टाचार के मुद्दों से घिरी मनमोहन सरकार, अपने उदारीकरण की नीतियों को पूरा करने में नाकाम रही, उसकी रफ्तार घट गयी थी, साल भर में ही मोदी सरकार उसी मुकाम पर पहुंच गयी। जिसे बनाने और जमाने में वाॅल स्ट्रीट के बैंकों और निजी कम्पनियों और उनसे जुड़ी रेटिंग एजेन्सियों ने मीडिया की तरह बड़ी भूमिका निभाई थी। उन्होंने मोदी के आने (जीतने) और न आने (हारने) के मुद्दे को भारत के आार्थिक विकास से जोड़ दिया था।

मोदी ने जितने सपने देश की आम जनता को दिखाये थे, उससे कहीं बड़े सपने उन्होंने निजी कम्पनियों और दैत्याकार काॅरपोरेशनों को भी दिखाये हैं। या यू कहें कि उन्हीं सपनों को पूरा करने की जिम्मेदारी के साथ उनकी सरकार बनी। बनाई गयी। वो प्रधानमंत्री बने। जिन्हें अमेरिकी राष्ट्रपति की तरह ‘मिस्टर प्रेसिडेंट‘ की तर्ज पर ‘मिस्टर प्राईम मिनिस्टर‘ या ‘मिस्टर पीएम‘ सुनना अच्छा लगता है।

अब मिस्टर पीएम को ‘चेतावनियों‘ के साथ ‘सुधारों को गति देने का दबाव‘ मिलने लगा है।

एसोचैम के सर्वे में स्पष्ट रूप से कहा गया है, कि ‘‘भारतीय कम्पनियां चिंतित हैं, और विदेशी निवेशक निवेश से पीछे हट रहे हैं।‘‘ यह भी स्पष्ट कर दिया गया है, कि संसद में जारी गतिरोध की वजह से एनडीए सरकार की क्षमता को लेकर काॅरपोरेट के बिजनेस काॅन्फिडेन्स में गिरावट आयी है।‘‘

मतलब…?

राजनीतिक अडंगों को हटायें और सुधारों को गति दें, नहीं तो मुश्किलें बढ़ेगी।

मोदी सरकार मुश्किल में है।

आम जनता को तो वह कह चुकी है, कि ‘‘चुनावी वायदे चुनावी शगूफ होते हैं।‘‘ और आम जनता यह सुन कर चुप भी रही है। लेकिन वैश्विक वित्तीय ताकतों से ऐसा कहने का जोखिम वो नहीं उठा सकते। जो आगाह करना जानते हैं, वो नजरें भी रखतें हैं। जिनकी नजर बदलने से मोदी सरकार का नजारा बदल जायेगा।

काॅरपोरेट मोदी सरकार के लिये लोहे के चने है।

बहरहाल, मोदी जी की स्थिति बिगड़ तो रही है, मगर स्थितियां इनती भी नहीं बिगड़ी हैं, कि समझौते की गुंजाइशें न हों।

समझौते की शर्त सिर्फ एक ही होनी है, कि सरकार सुधारों को गति दे। गतिरोध हटाये। गद्दी बचाये। जो वादा किया है, वह वादा निभाये।

एसोचैम आम जनता से किये गये वायदों को भी बड़ी तरजीह दे रही है, इस शर्त और सीख के साथ कि ‘सुधार नहीं करोगे तो नौकरी कहां से लाओगे?‘ जिसकी कीमत आम जनता को ही चुकानी होगी। बड़ी कीमत चुकानी होगी।

इसलिये रिपोर्ट में कहा गया है, कि ‘‘भारतीय अर्थव्यवस्था रिकवरी की राह पर आने का कोई संकेत नही दे रही है।‘‘ जिसकी वजह सुधारों को ले कर बनी यथा स्थिति है, जो रिजर्व बैंक के द्वारा किये गये सुधारों का लाभ नहीं उठा पा रही है। एसोचैम का सुझाव है, कि ‘‘ऐसी स्थिति में साहसी कदम उठा कर अर्थव्यवस्था को गति देने की जरूरत है।‘‘ आंकलन के आधार पर अर्थव्यवस्था को गति देने की एनडीए सरकार की क्षमता को लेकर सवाल खड़े हो गये हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है, कि ‘‘सीईओ और काॅरपोरेट में बिजनेस काॅन्फिडेन्स इंडेक्स कुछ माह पहले 74 प्रतिशत था, जो अब गिर कर 52.4 प्रतिशत पर आ गया है।‘‘ पीएम मोदी से अपेक्षा व्यक्त की गयी है, कि ‘‘वो अर्थव्यवस्था में बड़े स्तर पर तेजी लायें। इसके बिना उनके लिये लोकसभा चुनाव में किये गये विकास और नौकरी के वायदे को पूरा करना आसान नहीं होगा और ऐसा न होने पर युवाओं और देश में बेचैनी पैदा हो सकती है।

मतलब, जनअसंतोष बढ़ेगा।

जनअसंतोष के बढ़ने को वित्तीय ताकतें, भारत जैसे तीसरी दुनिया के देशों में, सत्ता परिवर्तन का जरिया बना लेती है, आौर जनअसंतोष के बढ़ने के आंकलन से, मौजूदा सरकार को अपनी शर्तों को मानने का दबाव भी बना लेती है। और रही बात, काम के अवसर या नौकरी की, तो यह बाजारपरक अर्थव्यवस्था का ऐसा अभिशाप है, जिसे आम जनता को ही झेलना है। झेलना और मरना उसे हर हाल में है। सकरार के लिये काम के अवसर का लालच दिखा कर ही भूमि अधिग्रहण से लेकर औद्योगिकी करण का आधार बनाया जाता है। जो संसद में जारी गतिरोध का शिकार है।

भूमि अधिग्रहण, श्रम कानूनों में संशोधन और वस्तु एवं सेवा कर विधेयक में सरकार और वित्तीय ताकतों के सम्बंधों की जान बस रही है।

‘‘राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय निवेशकों ने यह स्पष्ट कर दिया है, कि मैन्यूफैक्चरिंग हब और इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास को बढ़ावा देने के लिये भूमि अधिग्रहण में सुधार के साथ श्रम कानूनों में सुधार जरूरी है।‘‘ जिसके लिये सरकार और विपक्ष के बीच आम सहमति जरूरी है।

यह सहमति विपक्ष से ज्यादा सरकार केे लिये जरूरी है।

देश की मीडिया की जुबान और खयाल ऐसे हैं, जैसे विपक्ष संसद को चलने नहीं दे रही है। लेकिन नजरें टिका कर देखें तो पता चल जायेगा कि सरकार ही इस बारे में गंभीर नहीं है। पिछली सरकार और कांग्रेस के जिस भ्रष्टाचर को वो मुद्दा बनाती रही है, उसी भ्रष्टाचार पर अपनी फंसी गर्दन को वह स्वीकार नहीं करती, यही नहीं कांग्रेसी सांसदों को निलंबन का पांच दिवसीय फरमान लोकसभा अध्यक्ष सुना देती हैं।

क्या मोदी सरकार देश की संसद के प्रति गंभीर है?

यह अलग सवाल है, जिस का जिक्र होना चाहिये, लेकिन इस आलेख में हम नहीं कर पा रहे हैं।

भारत का उद्योग जगत, यूपीए की मनमोहन सरकार द्वारा पारित भूमि अधिग्रहण विधेयक 2013 को, पर्याप्त नहीं मानती। इसलिये, संशोधित विधेयक से मोदी सरकार की वापसी से जो झटका उसे लगा है, उसे वह सह नहीं पा रही है। ऊपर से ‘वस्तु एवं सेवा कर विधेयक‘ का लटक जाना भी अपने आप में बड़ा झटका है। रिपोर्ट में जिसे ‘राजनीति के भेंट चढ़ जाना‘ के रूप में पेश किया गया है। जो वास्तव में देश की आजादी के बाद अब तक का सबसे बड़ा ऐसा कर सुधार विधेयक है, जो पूरी तरह से निवेशक और निजी उद्योगपति के पक्ष में है।

वस्तु एवं सेवा कर विधेयक को पारित कराने के लिये संवैधानिक संशोधन की जरूरत है। सरकार जिसे लोकसभा में अपने संख्या बल के आधार पर पारित करा लेगी, लेकिन राज्य सभा में कांग्रेस के समर्थन के बिना पारित करा पाना संभव नहीं है। सरकार जिसे घटाने के बजाये बढ़ा रही है। संभव है, कि मोदी की नीति पहले कांग्रेस के रूप में बनी स्थायी चुनौती को हमेशा के लिये खत्म करने की हो।

यह राजनीतिक लड़ाई खुद मोदी और मोदी सरकार के लिये अच्छी नहीं है। उन्हें इस बात की जानकारी या कहें समझ नहीं है, कि वैश्विक वित्तीय ताकतें भारत में लोकतंत्र को मटियामेट करने के पक्ष में नहीं हैं। उनके लिये मोदी, भाजपा या संघ परिवार या उनके राजनीतिक लक्ष्य और जुमलेबाजी से नहीं, बल्कि अपने हितों को साधने वाली सरकार से मतलब है। विश्व राजनीति एवं क्षेत्रीय राजनीति में भारत का लोकतांत्रिक होना ही उनके हक में है।

एसोचैम सरकार की ऐसी मुश्किलों का जिक्र करती है, जिससे पार पाना सरकार के लिये जरूरी है, जिसमें खराब मानसून से लेकर खराब हो रहे मानसून सत्र का जिक्र है। उसका आंकलन है, कि यदि मानसून सत्र में वस्तु एवं सेवा कर विधेयक पारित नहीं होता है, तो उसे 1 अप्रैल 2016 से लागू करना मुश्किल होगा। और विशेषज्ञो का मानना है, कि ‘‘ऐसा होता हुआ नहीं दिख रहा है।‘‘ उनकी फिक्र है, कि कर्ज की मांग कमजोर है और काॅरपोरेट आय भी खास नहीं है। सरकारी बैंक गैर निष्पादित परिसम्पत्ति की समस्या से जूझ रहे हैं। और मोदी सरकार स्थितियों पर अपनी पकड़ तेजी से खोती जा रही है।

एसोचैम का मानना है, कि ‘‘जब तक भारत की केंद्रिय सरकार नये आदेश और आधारभूत ढांचे के खर्च में तेजी ला कर अर्थव्यवस्था को गति नहीं देती है, काॅरपोरेट आय कमजोर बनी रहेगी।‘‘

ग्लोबल रेटिंग एजेन्सियों की मेज पर भारत का महत्व है, लेकिन उनकी ही बनायी मोदी सरकार उनके लिये उतनी कारगर नहीं बन सकी है, जितनी कारगर होने की उन्हें अपेक्षा है।

राजनीतिक बदलाव और जन विरोधी समझौतों की प्रबल स्थितियां हैं। रेटिंग एजेन्सियां अपना काम शुरू कर चुकी हैं।

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