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पंकज चतुर्वेदी की तीन कविताएँ

पंकज चतुर्वेदी1. 1947 में
(सईद अख़्तर मिर्जा की फि़ल्म ‘नसीम’ देखकर)

1947 में जो मुसलमान थे
उन्हें क्यों चला जाना चाहिए था
पाकिस्तान ?
जिन्होंने भारत में ही रहना चाहा
उन्हें ग़रीब बनाये रखना
क्यों ज़रूरी था ?
जिस जगह राम के जनमने का
कोई सुबूत नहीं था
वहाँ जब बाबरी मस्जिद का
दूसरा गुम्बद भी ढहा दिया गया
तो पहले और दूसरे गुंबद के बीच
सरकार कहाँ थी
कहाँ था देश
और संविधान ?
फिर भी तुम पूछो
क्यों नीला है आसमान
तो उसकी यही वजह है
कि दर्द के बावजूद
मुस्करा सकता है इंसान
मगर इससे भी अहम है
हिन्दी के लेखकों से पूछो:
जब आर्य भी बाहर से आये
तो मुसलमानों को ही तुम
बाहर से आया हुआ
क्यों बताते हो
उनकी क़ौमीयत पर सवाल उठाते हुए
उन्हें देशभक्त साबित करने की
उदारता क्यों दिखाते हो ?
दरअस्ल बाहर से आया हुआ
किसी को बताना
उसे भीतर का न होने देना है
जबकि उनमें-से कोई
महज़ एक दरख़्त की ख़ातिर
1947 में
यहीं रह गया
पाकिस्तान नहीं गया

 

2. कुछ सवाल
(सईद अख़्तर मिर्जा की फि़ल्म ‘नसीम’ देखकर)

ख़ुशी के चरम बिन्दु पर
इंसान को
दुख की आशंका क्यों होती है
ताजमहल देखकर
यह क्यों लगता है
उसे किसी की नज़र न लगे
हिन्दू घरों में औरतें
जलायी क्यों जाती हैं
मुसलमान घरों में
तलाक़ का रिवाज क्यों है
क्या तुम जानते हो
कविता को उसके संदर्भ से काटकर
शाइर के अस्ल मानी
बदलना गुनाह है
तहज़ीब और शख़्सीयत
यादों का कारवाँ है
तो तेरी तहज़ीब
मेरी भी क्यों नहीं है
मेरे होने में
तू भी शामिल है
तो यह आपस का
झगड़ा क्यों है

 

3. शमीम

जाड़े की सर्द रात
समय तीन-साढ़े तीन बजे
रेलवे स्टेशन पर
घर जाने के लिए
मुझे आॅटो की तलाश
आखि़र जितने पैसे मैं दे सकता था
उनमें मुझे मिला
आॅटो-ड्राइवर एक लड़का
उम्र सत्रह-अठारह साल
मैंने कहा: मस्जिद के नीचे
जो पान की दुकान है
ज़रा वहाँ से होते हुए चलना
रास्ते में उसने पूछा:
क्या आप मुसलमान हैं ?
उसके पूछने में
प्यार की एक तरस थी
इसलिए मैंने कहा: नहीं,
पर होते तो अच्छा होता
फिर इतनी ठंडी हवा थी सख़्त
आॅटो की इतनी घरघराहट
कि और कोई बात नहीं हो सकी
लगभग आधा घंटे में
सफ़र ख़त्म हुआ
किराया देते वक़्त मैंने पूछा:
तुम्हारा नाम क्या है ?
उसने जवाब दिया: शमीम ख़ान
नाम में ऐसी कशिश थी
कि मैंने कहा:
बहुत अच्छा नाम है
फिर पूछा:
तुम पढ़ते नहीं हो ?
एक टूटा हुआ-सा वाक्य सुनायी पड़ा:
कहाँ से पढ़ें ?
यही मेरे प्यार की हद थी
और इज़हार की भी

-पंकज चतुर्वेदी

 

पता–
पंकज चतुर्वेदी
203, उत्सव अपार्टमेण्ट;
379, लखनपुर;
कानपुर (उ0प्र0)-208024

सम्पर्क –
ई-मेल – cidrpankaj@gmail.com

प्रस्तुति :- नित्यानंद गायेन

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2 comments

  1. Sanjay Kumar Shandilya

    पंकज की कविताओं में एक साथ कयी ध्वनियाँ मौजूद हैं ।वह एक बेहद नई काव्य-भाषा के साथ अपने समय को बरतते हैं ।लगता है जैसे किसी गीत का अभी तुरंत बना धुन हो ।ये कविताएँ पढ़ी जाकर भी बनी रह जाती हैं ।कवि को कविताओं के लिए और संपादक को इनके चयन के लिए बधाई ।

  2. Aparna Anekvarna

    तो पहले और दूसरे गुंबद के बीच
    सरकार कहाँ थी
    कहाँ था देश
    और संविधान ?
    फिर भी तुम पूछो
    क्यों नीला है आसमान
    तो उसकी यही वजह है
    कि दर्द के बावजूद
    मुस्करा सकता है इंसान

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