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राज्यवर्द्धन की छः कविताएँ

राज्यवर्द्धन1. खेल चोर सिपाही मंत्री राजा का

बच्चे खेल रहे थे –
चॊर, सिपाही, मंत्री, राजा का खेल
डेस कॊस सिंगल बुलबुल मास्टर

सिपाही सिपाही
चॊर कॊ पकड़ॊ -मंत्री ने आदेश दिया
पकड़ लिया -सिपाही चिल्लाया
राजा के सामने पेश करॊ -मंत्री का आदेश हुआ

चॊर
राजा के सामने
पेश हुआ

राजा ने सुनाई
सजा –
दस नरम दस गरम

सिपाही के
दस नरम दस गरम
चपत खाकर
चॊर की हालत खाराब हुई

देखता रहा –
बच्चॊं के इस खेल कॊ
जिसे बचपन में
कभी हमने भी खेला था

खेल देखते हुए –
अचानक मन मेंआया ख्याल
कि इस खेल में
चॊर, सिपाही, मंत्री, राजा सभी हैं
परंतु प्रजा क्यॊं नहीं

यह प्रश्न
कई दिनॊं तक मथता रहा
मथता रहा……

इस यक्ष प्रश्न कॊ
माँ ,पिताजी, भाई, बड़ी बहन
नानी,दादी,चाची ,बुआ
सभी से पूछा

किसी का भी जवाब
सटीक नहीं लगा
और यक्ष प्रश्न
करता रहा परेशान

परेशानी के दौर में ही
एक दिन सपने में आया
एक दानिशमंद

पूछना चाहता था
उससे भी
यही प्रश्न
….मगर नहीं पूछा

देखकर मेरी ओर
वह मंद मंद मुस्कुराया
….और कहा –
तुम जानना चाहते हॊ ना कि
इस खेल में प्रजा क्यॊं नहीं है

अरे इस खेल में
चॊर ही असल में-
बेबस प्रजा है

राजा ,मंत्री और सिपाही ने
मिलकर चली है-
चाल

छिपाने के लिए
अपना अपराध
प्रजा कॊ ही
चॊर
घॊषित कर दिया है

और बेचारी प्रजा
जाने कब से
इसकी सजा भुगत रही है
और कह नहीं पा रही कि
वह चॊर नहीं है….नहीं है…

 

2. रॊटी और कविता (पाब्लॊ नेरूदा कॊ संबॊधित)

तुमने कहा था-
कविता कॊअच्छी तरह सिंकी
गॊल गॊल रॊटी की तरह हॊनी चाहिए

रॊटी
मैंने भी बनाई
पहली – कच्ची रह गई
दूसरी -जल गई
तीसरी -ठीक ठीक बन गई

जीवन में
आँच के महत्व कॊ समझा

जुड़ गया
सृजन की उस महान परंपरा से
जब इंसान ने
पहली बार रॊटी बनानी सीखी थी
और तुमसे भी

 

3. दिशाहारा

दिशाएं-
खो गई हैं
माँ की
फ्लैट में ।

सुबह पूछा था-
पूरब किधर है,
सूरज को अरघ देना है ।

शाम को
पूछती है फिर
बताना तो जरा
पश्चिम की दिशा
डूबते सूरज को दिखाना है-
संझा बाती।

दिशाहीन हो गई माँ-
महानगर की फ्लैट में .

माँ को तो मिल जायेंगी
दिशा
जब लौटेगी गाँव ।

मैं खोजता रहूँगा
दिशा
अभिशप्त सा
आजीवन !!

 

4. …नदी आदमखोर हो गयी है

दादी सुनाती थी-
किस्सा
…..लगातार बारिश होने पर
बाढ़ पहले भी आती थी
किसी किसी साल

चढ़ता था पानी
बित्ता -बित्ता
जैसे कोई शिशु बढ़ता हो धीरे-धीरे

नहीं होती थी
जानमाल की हानि

समय रहते शरण लेते थे लोग
किसी मचान पर
या चले जाते थे
गांव के किसी ऊँचे मकान पर

नदी का क्रोध
होता था जब शांत
उतर जाता था पानी
आहिस्ता-आहिस्ता
जैसे चढ़ता था

लौट आते थे लोग
अपने-अपने घरों में

कहती थी दादी-
जिस साल बाढ़ आती थी
उस वर्ष फसल दुगनी होती थी

बाढ़ जितना लेती थी
उससे कहीं ज्यादा लौटा देती थी

अब कहती है माँ-
जब से नदी पर बना है बांध
तब से नदी
सुंदरवन के बाघ की तरह
आदमखोर हो गई है

रात-बेरात
अचानक करती है
भयानक हमला
और खा जाती है-जान माल को
दे जाती है टीस-
जीवन भर के लिए…

 

5. फूल शब्दों के

खिलने दो-
फूल शब्दों के.
सुवासित हो जायेगी धरा-
सदियों तक !

 

6. बूढ़ा आदमी

बूढ़े आदमी की
सुबह
जल्दी हो जाती है
सूरज के उगने से भी पहले
घर के लोगों के
जगने से भी पहले

बूढ़ा आदमी
प्रतीक्षा करता है-
चिड़ियों के चहचहाने की
सूरज के उगने की
घर के लोगों के जागने की

प्रतीक्षा लंबी हो जाती है
ज्यों सूरज की
कोई रोक रहा हो राह
या फिर चिड़यों को दिया हो भगा
जवान लोग रात की खुमारी में
चाहते है और सोना

बूढ़ा आदमी
जाग जाने के बाद
फिर नहीं सो पाता
उसके लिए सोना
‘सोना’नहीं हो पाता

चिड़याँ चहचहाने के बाद
जब हो जाती हैं-चुप
सूरज भी आकाश में जब
एक मुट्ठी उपर चढ़ जाता है
और तैरने लगता है
आकाश में धुआँ/चूल्हे का
तब बूढ़ा आदमी
कर रहा होता है-प्रतीक्षा
एक कप चाय की

जवान लोगों की खुमारी
तब भी नहीं टूटती
चाय की तलब
ओर भी गहरी हो जाती है
बूढ़े आदमी की

….फिर दिन तेजी से लगता है-
बीतने
परंतु बूढ़े की दिन और रातें होती है-
48 घंटों की
सबकुछ विस्तारित
इसलिए
बूढ़ा आदमी का समय नहीं कटता

बच्चे चले जाते हैं-
स्कूल
जवानआदमी चले जाते हैं-
काम पर
बूढ़े के लिए
गिनने को बचता है-
पहर

पहर गिनते गिनते
गिनती भूल जाता है-
बूढ़ा आदमी

बूढ़ा आदमी
प्रतीक्षा करता है फिर
जल्दी से सांझ ढ़लने का

बूढ़े आदमी के लिए
दिन क्या सांझ क्या रात क्या
बूढ़े आदमी के पास
कहने को बहुत है
पर कोई नहीं चाहता है सुनना
कहते हैं—
कई बार सुन चुका हूँ
आपकी कहानियाँ
माथा मत खाइये

बूढ़ा आदमी
सुनाना चाहता है
पोते-पोतियों को
आपनी नानी दादी से सुनी कहानियाँ
-शीत बसंत की
-गोनू झा की

परंतु बच्चे
व्यस्त है-
मोबइल फोन पर
इंटरनेट के चैट पर
या फिर देख रहे होते
बुद्धू बक्से में

चटपटी सीरियल्स
‘दबंग’ की दबंगता
‘रा-वन’ का करतब

बूढ़े आदमी के लिए
समय रावण है |

-राज्यवर्द्धन

 

कवि परिचय-
नाम- राज्यवर्द्धन
जन्म- 30 जून, 1960, जमालपुर (बिहार)

रचनाएं प्रकाशित-
1. धर्मयुग, वामा, नवभारत टाइम्स, हिन्दुस्तान, जनसत्ता, दैनिक जागरण, प्रभात खबर, प्रभातवार्ता, राजस्थान पत्रिका, इंडिया टुडे, आउटलुक, परिकथा, वागर्थ, स्वाधीनता आदि पत्र-पत्रिकाओं में फीचर्स, लेख, अग्रलेख, रिपोतार्ज, समीक्षाएं प्रकाशित।
2. हंस, वर्तमान साहित्य, वागर्थ, दस्तावेज, कृति ओर, प्रतिश्रुति, अक्षर पर्व, परिकथा, जनपथ, नई धारा, संवेद, हरिगंधा, समकालीन अभिव्यक्ति, अंतिम जन,जनसत्ता, दैनिक जागरण, प्रभात खबर, प्रभात वार्ता, छपते-छपते (वार्षिकांक), शुक्रवार (वार्षिकांक) आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं प्रकाशित।

सम्पादन-
1. ‘विचार’ के सम्पादक मंडल में (अनियतकालीन पत्रिका, जमालपुर से प्रकाशित, फिलहाल बंद)
2. ‘स्वर-एकादश’ (ग्यारह कवियों के कविताओं का संग्रह) का संपादन, बोधि प्रकाशन, जयपुर से प्रकाशित

स्तम्भ लेखन-
1. जनसत्ता (कोलकाता संस्करण) में 1995 से 2010 तक चित्रकला पर स्तंभ लेखन,
2. नवभारत टाईम्स (पटना संस्करण) में कई वर्षों तक सांस्कृतिक संवाददाता

पुरस्कार-
जनकवि रामदेव भावुक स्मृति सम्मान 2010 (मुंगेर, बिहार)

संपर्क-
राज्यवर्द्धन,
एकता हाईट्स, ब्लाँक-2/11ई,
56-राजा एस.सी. मल्लिक रोड,
कोलकाता-700032

ई-मेल- rajyabardhan123@gmail.com

प्रस्तुति :- नित्यानंद गायेन

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