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भारत में चीन की कम्पनियों की उपस्थिति

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भारत और चीन के रिश्ते को भारतीय मीडिया राजनीतिक नजरिये से देखती है। पश्चिमी मीडिया की तरह ही उसे आर्थिक एवं सामरिक प्रतिद्वंदी करार देती रही है। यह प्रमाणित करना ही उनका लक्ष्य होता है, कि चीन भारत के लिये एक खतरा है। जबकि चीन की सरकार के लिये भारत का महत्व कूटनीतिक एवं आर्थिक रूप से बढ़ गया है।

चीन की निजी कम्पनियां अपने विस्तार के लिये भारत को संभावनाओं की तरह देख रही हैं। मोदी सरकार के ‘मेक इन इण्डिया‘ में उनकी दिलचस्पी है, जो सब कुछ – श्रम से लेकर संसाधन तक सस्ते में उपलब्द्ध कराने का प्रस्ताव है। जबकि चीन में ऐसी स्थितियां तेजी से बदल रही हैं। यूरोप और अमेेरिका से भले ही चीन में मेहनत और मेहनताना सस्ता है, लेकिन भारत में वह काफी सस्ता है, और सबसे बड़ी बात कि मोदी सरकार उसे और भी सस्ता बनाने के प्रस्ताव लिये घूम रही है। वह 40 करोड़ ग्रामीणों को औद्योगिक क्षेत्र में धकेलने की योजना पर काम कर रही है, ताकि श्रमिकों की उपलब्धता बनी रहे और श्रम की कीमत लगातार गिरती रहे।

इस समय चीन आर्थिक संकट झेल रहा है, और सस्ते श्रम का स्त्रोत भी सूखता जा रहा है।

भारत की मोदी सरकार यह उम्मीद कर रही है, कि ‘‘भारत दुनिया में काम की संभावना की ओर बढ़ रहा है।‘‘ उसके आर्थिक विकास की नीतियों का आधार देश में सस्ते मानव श्रम का अपार भण्डार है। जिसे वह आधारभूत ढ़ांचा और मुक्त बाजार के साथ निजी कम्पनियों के सामने पेश कर चुका है। जो निश्चित रूप से जो भारी मुनाफा की वजह से आकर्षक है। मोदी सरकार के लिये सैकड़ों चीनी कम्पनियां उसकी उम्मीदें हैं।

हाल के सालों में चीन ने भारत के बाजार में सक्रियता से प्रवेश पा लिया है। मोदी सरकार के आने से उसकी सक्रियता बढ़ी है। 18 अगस्त को ‘लीनोवो ग्रुप‘ ने घोषणां की है, कि ‘‘वह भारत में स्मार्ट फोन बनाने का काम शुरू करने जा रहा है‘‘, जबकि चीन की आईफोन निर्माता कम्पनी ‘फाॅक्सकाॅन‘ की योजना भारत के सभी राज्यों में एक-एक प्लांट लगाने की है। चीन की आंतरिक अर्थव्यवस्था जैसे-जैसे मुश्किलों से घिरती जा रही है, वैसे-वैसे सस्ते श्रम का मिलना वहां कठिन होता जा रहा है, इसलिये चीन की कई कम्पनियां विस्तार के लिये भारत की ओर देखने लगी हैं।

भारत के औद्योगिक नीति निर्धारण विभाग के सचिव अमिताभ कांत ने ‘स्पूतनिक‘ से कहा- ‘‘चीन की कम्पनियों ने ‘मेक इन इण्डिया‘ प्रोग्राम में शामिल होने के प्रति अपनी गंभीर दिलचस्पी जाहिर की है, जबकि भारतीय कम्पनियां खुद को चीन में बढ़ाने की उम्मीदें कर रही हैं।

नरेन्द्र मोदी ने ‘एनर्जी‘ और ‘टेलीकम्यूनिकेशन‘ के क्षेत्र में चीन की 18 कम्पनियों को भारत में काम करने का परमिट दिया है। भारत की मोदी सरकार देश में आधारभूत ढ़ांचा के निर्माण में वित्त एवं व्यापार की संभावनायें देख रही है। उसे इस बात की जानकारी है, कि संभावनाओं के सामने कठोर शर्तें हैं। चीन की शर्तें यूरोपीय और अमेरिकी कम्पनियों की शर्तों से इस लिये अलग नहीं हैं, कि मोदी सरकार ‘मेक इन इण्डिया‘ के लिये विश्व के निजी कम्पनियों और निवेशकों को आकर्षित करने की कार्यनीति पर चल रही है। जिसका लाभ स्वाभाविक रूप से चीन की निजी कम्पनियों को मिलेगा। वैसे चीन की वैश्विक आर्थिक नीति आधारभूत ढ़ांचे के निर्माण में गहरी हिस्सेदारी निभाने की रही है। अफ्रीका और लातिनी अमेरिकी देशों में वह यही कर रहा है।

‘आईबीएम – इण्डिया‘ के प्रतिनिधि प्रशांत प्रधान ने कहा है, कि ‘‘साल 2022 तक भारत की योजना बार-बार उपयोग किये जा सकने वाले स्त्रोतों से 100 गिगावाॅट तक बिजली उत्पादन करने की है।‘‘ उन्होंने भारत के बारे में कहा- ‘‘यहां कई अवसर हैं मुनाफा कमाने के। लोकल इण्डस्ट्रीज और सप्लाई की सुविधाओं को हासिल करना काफी सस्ता हैं।‘‘

चीन की कम्पनियों ने भारत के बाजार को परखना और समझना शुरू कर दिया है। उसके हुबेई प्रांत की 70 सरकारी एवं गैर सरकारी कम्पनियों के प्रतिनिधियों ने भारत की यात्रा की। इसके अलावा भी कई सरकारी और निजी कम्पनियां भारत के बाजार को नजदीक से देख रही हैं, उनके प्रतिनिधि भी भारत आ चुके हैं। चीन की सरकार के लिये भारत का महत्व बढ़ गया है, वह अपने आर्थिक विस्तार के लिये भारत में संभावनायें देख रही है।

अमिताभ कांत ने बताया कि ‘‘हाल के बरसों में भारत और चीन के बीच व्यापारिक रिश्ते काफी मजबूत हुए हैं। साल 2000 में दोनों देशों के बीच सिर्फ 3 बिलियन डाॅलर का व्यापार हुआ था, जो कि इस साल बढ़ कर 72 बिलियन डाॅलर हो गया है।‘‘

भारत के मौजूदा विकास दर और बाजारवादी नीतियों को देखते हुए अनुमान लगाया जा रहा है, कि आने वाले तीन-चार सालों में चीन की लगभग 100 सरकारी और गैर सरकारी कम्पनियां यहां खुल जायेंगी। भारत चीन की अर्थव्यवस्था के लिये ऐसे संसाधन के रूप में सामने आ गया है, जिसके पास खनिज सम्पदा के साथ बाजार भी है, और सबसे बड़ी बात कि उसके पास चीन से सस्ता श्रमशक्ति का स्त्रोत है। जिसका उपयोग चीन आसानी से कर लेगा। वैसे भी तीसरी दुनिया के देशों में उसकी स्थिति काफी मजबूत है।

इसलिये चीन की घरेलू अर्थव्यवस्था में जो भी मुश्किलें नजर आ रही हैं और संकट की जैसी स्थितियां बन रही हैं, चीन उसका समाधान भारत सहित तीसरी दुनिया के देशों से करने की स्थिति में है। कह सकते हैं, कि उसके घरेलू संकट का नकारात्मक प्रभाव चीन से ज्यादा विश्व अर्थव्यवस्था में अमेरिका, आस्ट्रेलिया, कनाडा, जापान और यूरोपीय देशों पर पड़ेगा।

एशिया में आर्थिक विकास की संभावनाओं को देखने वाले यूरो-अमेरिकी देशों के लिये भारत सस्ता श्रम बाजार है, जहां आने वाले कल में निजी कम्पनियों और निवेशकों की होड़ लगने वाली है। वहां चीन की उपस्थिति कई समिकरणों का रूख बदल सकती है।

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