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शिरीष मौर्य की आठ कविताएं

शिरीष मौर्य1. कुछ प्रलापों से पहले एक बिखरा हुआ, टूटता-सा आलाप गांधार निषाद और धैवत का
(बसें गिर जाती हैं पहाड़ों से/लील जाती हैं नदियां उन्हें भी/जिनकी वे प्रिय थीं)

मृतकों का संसार बढ़ता जा रहा है
उसे और बढ़ाने कुछ लोग आ रहे हैं तेज़क़दम
कुछ को ठेल ही दिया गया है इस ओर
कुछ को गिरा दिया गया है पहाड़ से
कुछ को नदी में धकेल दिया गया है
कोई हारा हुआ ख़ुद ही कूद पड़ा है किसी सुविख्यात बताई गई झील में

मृतकों का टोला गांव के दक्षिण में है
पूरब में नदी है जो बहती उत्तर से है पूरब को काटती भर है
उत्तर में जब मृतक रवाना होते हैं रास्ते की ज़रूरी रसद लिए
तो भाबर में दिशाहीन हो जाते हैं
छिन जाता है सामान
वे पश्चिम को बढ़ जाते हैं

उधर को छूटती बसों में
रेलों में
अकसर सुनाई देता है हाहाकार
जबकि मृतक
किसी की सीट नहीं घेरते

मैं देखता हूं मसाण को साधे
अपने आगे
जलाए अखंड आग
दिल्ली जाते हुए मृतक
दिल्ली से आते हुए मृतक
रोज़-रोज़ की यह भागमभाग

मृतक जो भटकते घूमते रहे भीतर
मेरे साथ बैठते हैं
कांपते रहते हैं वे मेरे बाहर के शीत के सताए
अपने हाथ सेंकते हैं
आग और तेज़ करने की गुजारिश करते

अभी उस आग में कुछ जला था
अभी उस आग में कुछ जलेगा

अकालमृत्यु मर गए मेरे मेहनतकश ग़रीब लोगों का मसाण हैं यह
ऐसे ही सधेगा

जो डरते हैं वे मृतकों से ही नहीं
कविता से भी डरें
जिसमें डेरा है कुछ अंतिम आवाज़ों का
गूढ़ जैसे बुदबुदाती हो चिता
ठेठ जैसे ऐंठ जाता है जिसम उस आग में
बदलने करवट कोई आख़िरी

वहां मंत्र नहीं उचारे जाते
अश्रुओं से पखारे जाते हैं पग अपने ही
धवल हृदय होता है
रक्त से धुलने के बाद

पाठको चाहो कभी
तो चलना संग मेरे इन मृतकों के पास

जबकि ईश्वर नहीं है जीवन के बाद जीवन भी नहीं ही है
सब टोले इन्हीं के हैं अब
स्मृतियों में रहवास मृतकों का
दुनिया में भरम की तरह छाए
हमारे आवासों को परखता रहता है
दिन-रात

 

2. अति की बारिश का प्रलाप

बरसो रे बादलो
गरज रहे दिनों से
अब बरसो

संभाल ली जितनी संभल सकती थी देह
बरसो मूसलाधार

कल भरते पानी में ढह ही पड़ेंगे रस्ते
तो कर लूंगा कुछ देर इंतज़ार

पहुंचना तब भी था
पहुंचना अब भी है

भूस्खलन के एक ओर मेरा बिछौना है
दूसरी ओर नींद और अंतिम आराम

 

3. अधूरेपन का प्रलाप

मेरा अधूरा बहुत-कुछ मुझमें है अभी
बाहर निकले तो पता चल जाता है अधूरा है
पूरा करने की जरूरत नहीं उसे
अधूरा ही रहा चला आता है

उधर कई अधूरे मिलकर
एक पूरे की देखभाल करते हैं
उसका नाम लेकर चलते हैं
काटते हैं उसके पूरेपन को भीतर से
काटने को दीमक की तरह काटते हैं कहने में
लजा जाता हूं
मेरा पूरा मृत होने को है
उसे कुछ अधूरों की निगाह में बनाए रखने की ज़रूरत है

उनके बीच
अगर वह कुछ अधूरापन महसूस कर पाया
जी जाएगा
पूरा का पूरा ही बना रहा
तो मुझ धारण करने वालो को ही नाम धराएगा

 

4. ग़लत से सही हो जाने का प्रलाप

कवि को लगा
कुछ रिश्ते मन में लगी फफूंद जैसे होते हैं
दिल की उमस उन्हें कायम रखती है
दिल के इलाक़े में कभी सूखा नहीं पड़ता
उधर साफ़-सफ़ाई का भी मन नहीं करता

ग़लत बिम्ब में फंसे कवि को
अंतत: उसके मनुष्य ने दिखायी राह –
‘दिल जिसे कहते हो
वह हमारे पुराने पड़ते मकान की
सीली हुई
कभी न खुलने वाली कोठरी है
दीमक के खाए उसके किवाड़ों की दरारों से
कभी कभार एक हल्की रोशनी झरती है
उधर एक स्त्री
इबादत कर रही है वर्षों से लगभग बिलखती हुई-सी
वह कहीं नहीं दिख रहे
चंद रिश्तों की ख़ैर मांग रही है’

आशा की धुंआती पीली-सी लौ जलाए
यक़ीनन वह एक स्त्री ही है
जिसे हम जैसे कमज़र्फ़ कवि
अपने बिम्बों में मन की फफूंद समझ बैठते हैं

क्रूर और ग़लत रूपकों में रहते हुए
हमें अब बिम्बों की नहीं
अपने पिछवाड़े एक ज़बरदस्त लात की ज़रूरत है।

 

5. कौवों के प्रेम का प्रलाप

कौवे भी प्रेम करते हैं
बदहवास
आकाश में मंडराते पुकारते साथी को
उनके स्वर की कर्कशता
हम मनुष्यों के कान की सीमा है

कोई उनका मिलन देख नहीं पाता
कबूतरों का मिलन देख लिया जाता है मुंडेरों पर
विकल आवाजों के सिलसिले
पंखों के बदलते सुघर सुन्दर रूपाकार
वह कोमल कामकला बहुधा सराही जाती है

चोंच में मरा चूहा दबाए
कौवे को देखा मैंने
चारदीवारी पर बैठी
अपनी प्रेयसी के लिए वह भेंट लाया था

आह, प्रेम में गहरे तक धंसा
दुर्धर्ष हृदय वह काले से उजला हुआ जाता

क्रूरता के अनोखे साधक ये कौवे हमारे
धरती के जमादार
मढ़ दिया गया बहुत कुछ उनके सिर
इतने मक्कार वे नहीं

प्रकृति के निकटस्थ इस निरीक्षण में
बहुत दिनों तक तो पता ही नहीं लगा
फिर एक दिन हम अचानक चौंक पड़े
कौवों का प्रणय था वह साधारण
घोंसले में
तब यह कोयल कहां से आई

धोखा जहां भी था
जहां से भी था
कौवों ने निभाया उसे भी

देखा हमने निभाया जाता
एक प्रेम समूचा
असल का हिस्सा खा जाने को भी आतुर
दिन भर की वह
कंठ भर-भर की जाती चूं चूं
एक दिन
बदल गई निषाद से पंचम में

कौवे मंडराते रहे हमारे ऊपर

सदा ही बहुत कुछ निभाना है उन्हें
उस स्थायी धोखे समेत
जो प्रेमपगा अपवाद पद भर है।

 

6. मृतात्मा का प्रलाप

चरखे की कूक सुन
पहाड़ों से उतरे कुछ दिन को
फिर पहाड़ों पर जा बैठे
जोगी
जा मैंने मरा मान लिया तुझको
कहा किसी ने
मैंने सुन लिया

उसने कहा
मान कर दिखा दिया

मृतक की तरह रहते हुए मैंने
जीवन को बहुत दूर और बहुत निकट से पढ़ना सीखा

किसी के लिए कोई मरा समान हो सकता है
पर देखा मैंने
मरा मान लेने से अहाते की घास तक नहीं मरती

तारों भरी रात में
निपट अकेली
जब फफकती है धरती
सुबह नित के दु:खों जैसी हरियायी मिलती है

 

7. प्रेम के प्रलाप

1
घास अब भी हिलती होगी
शीतल मंद झकोरों में
पहाड़ की उस ढलान पर
वर्षों पहले
जिस पर नीचे से चलता मैं
दरअसल
रोज़ एक चढ़ाई चढ़ता था

ठीक इसी तरह
इन दिनों
किसी की स्मृतियों में मेरा ढलान पर होना
मेरे लिए
रोज़ एक कठिन चढ़ाई में बदलता है

जीवन में अब वह घास नहीं
आषाढ़ के अंत पर तेज़ धूप में सूखते हुए मिलते रहे
उसके कंकाल
बरस-दर-बरस

मैं निर्लज्ज
चढ़ाता रहा अपनी अस्थियों पर मांस

 

2
ये जो आजकल बरसते हैं बादल धार-धार
सिर पर हमारे
दरकते हैं घर धंसते हैं रास्ते
ये तपते हैं दिनभर अपनी ऊपरी परतों में
सूर्य के विकट ताप से

बिना ताप के भी भला कोई बरसता है

-इन काव्याभासित शब्दों के साथ विदा कर रहा हूं ख़ुद को
मुझे कहीं चले जाना है
बार-बार घर लौटते हुए
यह चले जाना चलता रहता है

पहुंच जाऊंगा
तो आएगी पहुंचने की ख़बर
घर लौटने पर
बताएगा परिवार तुम पहुंच गए हो

पूछेगा
सुनो
वापिस कब आओगे ?

 

3
सुनो लुहार भी गाते हैं
भारी हथौड़े के नीचे जो गाती है तपकर लाल हुई धातु
उसे सुनते हुए
उसी के साथ लुहार भी गाते हैं

मैं पच्चीस वर्ष दूर हूं अपने गांव से
पच्चीस वर्ष पहले बनते देखी थी दराती
उसकी धार पहले प्रेम-सी चमकती थी

लुहार ने जो गाया था गढ़वाली गीत
वह एक लड़की के बारे में था

उस दराती के साथ मैं वह तेज़धार गीत भी लाया था
पच्चीस वर्ष बाद गाता हूं उसे
लेकिन टूट चुकी उसकी धार
जिसे चढ़ाने फिर उसी लुहार के पास जाना है

सुनते हैं
वह रहता है अभी और दस-बीस- पच्चीस बरस पार।

 

8. स्मृति प्रलाप : शैलेश मटियानी

जाने कितने लोगों का
कंठ लिए
तुम बोले
गूंजे
धिड़ धिगिड़ धिगिड़ धिड़ धूम ताम

जब तब सुन पड़ती
बेबस जीवन की उतनी ही उत्कट
यह पुकार

हे जन के जीवन के
कथासार
तुम महाकाय
पर्वताकार
आज कुछ स्मृतियां बिलखती हैं
तुम्हारे द्वार

रोशनी-सा शव धरा हो
ज्यों तिमिर के गांव-आंगन में
देखो आज भी तो
किसी ने दाह देने की जगह
अगिनी वरण की है

भाषा में तुम्हारी ही
शरण ली है

-शिरीष मौर्य

 

कवि परिचय-
जन्म: 13 दिसम्बर 1973, नागपुर में |
शिरीष कुमार मौर्य समकालीन युवा कविता का एक प्रमुख नाम है | कविता के साथ–साथ चित्रकला में भी इनकी गहरी रूचि हैं, इनके बनाये कई चित्र अनेक पुस्तकों का आवरण बन चुका हैं | एक बेहतरीन कवि और चित्रकार के साथ–साथ शिरीष जी आलोचना में भी अपना दखल रखते हैं | समकालीन कवियों की कविता पर इनके लेख समय –समय पर प्रकाशित होते रहते हैं |

प्रकाशित कृतियाँ –
पहला कदम, शब्दों के झुरमुट में,(इजरायली कवि येहूदा आमिखाई की कविताओं का अनुवाद धरती जानती है-संवाद प्रकाशन), दन्तकथा और अन्य कविताएँ (2014)

विविध –
1994 में एक काव्य-पुस्तिका तथा 2004 में पहला कविता-संग्रह प्रकाशित। दूसरा संग्रह ‘ पृथ्वी पर एक जगह’ 2009 में। 2004 में प्रथम अंकुर मिश्र स्मृति पुरस्कार तथा 2009 में लक्ष्‍मण प्रसाद मंडलोई सम्‍मान। तीसरा संग्रह ‘जैसे कोई सुनता हो मुझे’ शीघ्र प्रकाश्‍य।

प्रस्तुति :- नित्यानंद गायेन

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