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साहित्य का बाजार में होना

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आज कल बाजार की बड़ी धूम है।

ऐसे में एक सवाल आप से-

‘‘साहित्य यदि बाजार में हो, तो आपको कैसा लगेगा?‘‘

हो सकता है, आपको कुछ न लगे! और हो यह भी सकता है, कि आप अपने लगने को कोई दिशा देना चाहें! यह तो आप पर है, कि साहित्य को आप क्या समझते और मानते हैं?

मालगाड़ी पर लदा सामान? या कुछ और! जिसे बाजार तक पहुंचना है, या समाज में पहुंचना है।

हां, यह तय है, कि उसे कहीं न कहीं पहुंचना जरूर है!

इसलिये आपको यह भी लग सकता है, कि ‘‘इसमें लगने जैसी कोई बात नहीं है। साहित्य बाजार में पहुंचे या समाज में, उसे पहुंचना तो लोगो के बीच ही है!‘‘

बात सही है! लेकिन लगने जैसी बात भी है।

यह सवाल भी है, कि ‘‘समाज बाजार में है?‘‘ या ‘‘बाजार में समाज है?‘‘ जिसे संतुलित और नियंत्रित करने के लिये सरकारें होती हैं।

और सरकारें आज कल बाजार को सभी बंधनों से मुक्त करने का अभियान चला रही हैं।

बाजार को कुछ ऐसा बनाने में लगी हैं, कि उस पर किसी की पकड़ न हो!

‘‘ऐसा हो सकता है या नहीं?‘‘ यह सवाल मैं आपसे नहीं करूंगा।

मेरी अपनी बात यह है, कि ‘‘ऐसा नहीं हो सकता। ऐसा नहीं है! ऐसा नहीं होना चाहिए! ऐसा होने का मतलब है, कि समाज पर बाजार का नियंत्रण होगा और उसे नियंत्रित एवं संतुलित करने वाली सरकार भी उसके कब्जे में होगी!‘‘

फिर आप तो जानते ही हैं, कि बाजार खरीद-फरोख्त है। मुनाफा कमाने का जरिया है। और हम जिस बाजार में हैं, वहां श्रम पर पूंजी की वरियता है। उसी की चलती है। उसी की चलती चलाते रहने की यह सोच है।

साहित्य का बाजार में होने का मतलब मेरे लिये कुछ ऐसा ही है। और साहित्य को कान पकड़ कर उठा-बैठक करते हुए देखने की मेरे पास मानसिकता नहीं है।

यह स्वीकार नहीं है, कि कोई साहित्य की कान पकड़े और उसे सरे राह घुमाये!

समाज में आम लोगों के बीच साहित्य का होना तो अच्छा है, मगर, गिरेबां पकड़ कर बाजार में उसे खड़ा करना, उसे बेचना, उसकी बोलियां लगवाने को, मैं स्वीकार नहीं कर पाता।

किसी की मांग बढ़ाने या घटाने का दांव-पेंच मुझे पसंद नहीं है। मेरे खयाल से साहित्य मुनाफे का जरिया नहीं है।

बाजार में मुनाफा बढ़ाने के दो ही तरीके हैं-

उत्पादन सस्ता हो और मांग में तेजी बनी रहे!

चाहे जितने घपले हों, चाहे जितनी मिलावट हो, सब जायज है!

विज्ञापनों की खुली दुकानें हैं। गंदी नसीहते हैं, कि ‘जो दिखता है, वही बिकता है, और जो बिकता है, वही दिखता है।‘ इसलिये दिखने के लिये बिकें और बिकने के लिये दिखें। दिखने और बिकने के लिये ऐडि़यां रगड़ें। सामाजिक सम्बद्धता और आदर्शों में कुछ नहीं धरा है। साहित्य भी एक बौद्धिक उत्पाद है। सरकार की जुबान में देश के पास बौद्धिक सम्पदा है। जिसे बाजार में बिकना है।

श्रम और सम्पदा को सस्ते में बेचने की सरकारी पेशकश है।

अब साहित्य के साथ बाजार की यही पेशकश हो, तब….?

मां के साथ गोर्की की कहानियां मुफ्त!

गोदान के साथ प्रेमचंद की कहानियों का मूल्य नहीं!

कबीर, निराला, मुक्तिबोध सस्ते में!

पुराने के साथ डिसकाउण्ट का टैग!

नये के साथ वन गेट वन…..टू…..थ्री…..फ्री!

बात बुरी है।

सोच बीमार है।

स्थापित होने, सम्मान पाने के लिये ‘लाॅबिंग’ भी वैधानिक है।

कल को खिलाडि़यों की तरह बोली लगे! कलाकारों की तरह भाव उतरेंगे-चढ़ेंगे। जो बिकेगा वह चलेगा, और जो नहीं बिकेगा वह पिटता रहेगा। बाजार की जो मांग होगी, वही लिखा जायेगा।

जो सामाजिक जिम्मेदारियां साहित्य निभाती रही है, उसे बाजार निगल जायेगा।

अब आप तय करें कि साहित्य का बाजार में होने से आपको कैसा लगेगा? कुछ लगेगा, या नहीं लगेगा?

-आलोकवर्द्धन

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