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बाजार के लिये पैंतरेबाजी

s.swami

2007-08 का वैश्विक वित्तीय संकट अभी बीता नहीं, कि दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी चीन की अर्थव्यवस्था लड़खड़ा गयी! उसके स्टाॅक मार्केट में भारी गिरावट दर्ज की गयी और एक बार फिर से वैश्विक वित्तीय व्यवस्था के सामने गंभीर संकट खड़ा हो गया!

सवाल यह होना चाहिए कि मुक्त व्यापार और बाजारवादी अर्थव्यवस्था बार-बार संकटग्रस्त क्यों हो जाती है?

यदि इस व्यवस्था के विकास की चरम अवस्था इसका दुर्घटनाग्रस्त होना है, तो ऐसी भेडि़याधसान बाजारवादी अर्थव्यवस्था में शामिल होने का मतलब क्या है?

हमें ऐसी अर्थव्यवस्था का निर्माण करने की जरूरत ही क्या है?

लेकिन, भारत की मोदी सरकार इसे अपने लिये एक अवसर की तरह देख रही है। उसके तथाकथित चिन्तक और वित्त मंत्री यह कहते फिर रहे हैं, कि हम चीन की जगह ले सकते हैं। उसकी अर्थव्यवस्था को पछाड़ सकते हैं। भारत का उद्योगपति वर्ग और वित्तीय ताकतें इसे अपने लिये विकास का अवसर मान रही हैं। वो यह मान रही हैं, कि चीन की अर्थव्यवस्था ने 2007-08 में दुनिया की सबसे बड़ी अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लड़खड़ाने से उसकी जगह लेने लायक हो गयी, हम भी उन्हीं नीतियों के तहत ऐसा कर सकते हैं!

शायद, आप ऐसा कर भी लें!

एक बार हम यह मान भी लें, कि आप ऐसा कर लेते हैं, तो बाजार के बजरबट्टुओं उसका परिणाम भी तो वही होगा, जो आज चीन की अर्थव्यवस्था का हो रहा है, और जो अमेरिकी अर्थव्यवस्था का हुआ। जिसकी चपेट में आते ही यूरोप कर्ज के बोझ से लद गया। इन देशों की सरकारों के हाथों में कटोरा आ गया और सरकारें दिवालियापन के उस कगार पर आ कर खड़ी हो गयीं, कि जब चाहे वित्तीय ताकतें उन्हें दिवालिया बना दें। वाॅलस्ट्रीट का कब्जा संयुक्त राज्य अमेरिका पर है, और व्हाईट हाउस हो या कांग्रेस उन्हीं के ईशारों पर, उन्हीं के हितों के लिये काम करती हैं। अमेरिकी सरकार कागज (डाॅलर) के नांव पर तैर रही है, और वह नाव भी पूरी तरह उसकी नहीं है।

जबकि चीन के युआन के लिये हम ऐसा नहीं कह सकते। वहां बैंकों की स्थिति भी थोड़ी भिन्न है, सेण्ट्रल बैंक होने के बाद भी। कई मामलों में दुनियाभर में चीन का निवेश अमेरिका से बड़ा है। लातिनी अमेरिका और अफ्रीका का वह सबसे बड़ा निवेशक देश है। पर्याप्त से ज्यादा स्वर्ण भण्डार, विदेशी मुद्रा (डाॅलर) कोष और निजी कम्पनियों के साथ सरकारी कम्पनियों की वरियता है। अपनी तमाम विसंगतियों के बाद भी चीन की सरकार, अमेरिकी सरकार से कहीं ज्यादा वित्तीय ताकतों की पकड़ से बाहर है।

इसके बाद भी भारत की मोदी सरकार जो जगह खाली ही नहीं हो उसे भरने की बात कर रही है। जिसकी बाजारवादी अर्थव्यवस्था उन निवेशकों के मुंह ताक रही है, जिनके लिये भारत या किसी भी देश की अर्थव्यवस्था की मजबूती से ज्यादा महत्वपूर्ण उस देश की अर्थव्यवस्था पर अधिकार कर उसे संकटग्रस्त कर के भी उससे मुनाफा कमाना है। इन्हीं ताकतों, निवेशकों और निजी कम्पनियों-काॅरपोरेशनों के भरोसे यदि मोदी सरकार चीन का विकल्प बनना चाहती है, और इसे उचित अवसर मान रही है, तो हम यही कह सकते हैं, कि देश को खोखला बनाने और देश की सम्प्रभुता को गिरवी रखने की योजना पक्की है। वास्तव में वह काॅरपोरेट की सरकार है।

यदि वह देश की, या देश के आम जनता की सरकार होती, तो वह बाजारवादी अर्थव्यवस्था से तौबा कर लेती।

जिसका निर्माण आम लोगों को अधिकारविहीन बना कर होता है।

जिसका विकास आम लोगों के शोषण और दमन से होता है। और

जिसके दुर्घटनाग्रस्त होने से आम लोगों की जान जाती है।

इस पूरे प्रक्रिया के, हर एक चरण में आम जनता पर ही गाज गिरती है। आज सारी दुनिया में भूख, गरीबी, आपदा, बेरोजगारी, दमन और शोषण से लेकर युद्ध और आतंक की जैसी स्थितियां हैं, वह इस व्यवस्था की उपज है।, ऐसी उपज हैं जिसने मानव समाज के विकास को ही गलत बना दिया है। जिसका लाभ समाज के चंद लोगों को मिलता है। लाभ पर आधारित एक ऐसी व्यवस्था से हमारा वास्ता पड़ गया है, जहां आम आदमी को श्रम का स्त्रोत और सामान मान लिया गया है। जो अपने संकट का लाभ उठाने से भी नहीं चूकता। जहां आम आदमी के लिये आदमी की हैसियत से कोई जगह नहीं है।

भाजपा के नेता और भाजपा के चिंतक कहे जाने वाले सुब्रहमण्यम स्वामी ने भारत के एनडीए सरकार से कहा है, कि ‘‘सरकार चीन के मौजूदा आर्थिक संकट में अपने लिये अवसर तलाश करे।‘‘ उन्होंने कहा- ‘‘मौजूदा आर्थिक संकट से चीन की अंतर्राष्ट्रीय महाशक्ति बनने की महत्वाकांक्षा पर जबरदस्त असर पड़ा है, और इससे युआन के अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा बन कर उभरने की संभावना को भी झटका लगा है।‘‘ वो मानते हैं, कि ‘‘अमेरिकी डाॅलर को चुनौती देने की युआन की ताकत में फर्क पड़ा है।‘‘ उन्होंने कभी भविष्यवाणी की थी कि ‘‘2020 तक चीन की अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो जायेगी।‘‘ उन्होंने प्रेस ट्रस्ट को दिये अपने इंटरव्यू में कहा- ‘‘मुझे खुशी है कि यह पांच साल पहले हो रहा है।‘‘ उनका खयाल है, कि ‘‘भारत इस समय चीन को पछाड़ने की स्थिति में है।‘‘

उनके इस खयाल का आधार यह है, कि ‘‘चीन की अर्थव्यवस्था में ढ़ांचागत कमजोरियां हैं।‘‘ जिसका मतलब है- ‘‘स्वदेशी प्रणाली का न होना।‘‘ वो नरेन्द्र मोदी को इसी स्वदेशी प्रणाली का पाठ पढ़ने के लिये भाजपा से सलाह-मशविरा करने की सलाह देते हैं।

वैश्वीकरण के दौर में स्वदेशी प्रणाली का मतलब क्या है? और भारत की स्वदेशी प्रणाली क्या है? यदि इसे साफ करने के लिये हम बैठेंगे तो मोदी सरकार की ‘पूंजी निवेश‘ की कवायत, विश्व बाजार, महाशक्ति बनने की संभावनाओं की बतकही और चीन को पछाड़ने की जल्दबाजी से लोगों को भुलावे में डालने की नीतियां ही बे-सार हो जायेंगी। उन्हें नरेन्द्र मादी को खारिज करना होगा, जो ‘मेक इन इण्डिया‘ का मशीनी बाघ लिये घूम रहे हैं। जिसमें विदेशी निवेशकों, वित्तीय इकाईयों और निजी कम्पनियों और काॅरपोरेशनों की निर्णायक भूमिका है।

जिनके लिये नरेन्द्र मोदी सरकारी छूट से लेकर संविधान में संशोधन करने को तैयार हैं। आधारभूत ढ़ांचे का निर्माण कर अर्थव्यवस्था के निजीकरण को आर्थिक विकास की अनिवार्यता में बदल चुके हैं। वैश्विक वित्तीय ताकतें और राष्ट्रीय औद्योगिक घरानों की मांगें खुलेआम हो गयी हैं। उन्होंने सरकार के सामने अपने हितों से बंधे आर्थिक विकास का चारा डाल दिया है। जिसके पीछे मोदी सरकार देश, समाज और समाज के बहुसंख्यक वर्ग के हितों को पीछे छोड़ कर चल रही है। उसने पूंजी निवेश को आर्थिक विकास की पहली शर्त बना लिया है। लोगों के दिमाग में भी यह बातें भर दी गयी हैं। और अब यह भी भरा जा रहा है, कि चीन के इस संकट से भारत का भला होगा।

भारत में गोदरेज समूह के चेयरमैन आदि गोदरेज ने कहा है, कि ‘‘चीन के इस संकट से भारत की अर्थव्यवस्था पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा, बल्कि, यह अपनी अर्थव्यवस्था को आगे ले जाने का अवसर है।‘‘ उन्होंने ब्याज दर में कमी से लेकर वस्तु एवं सेवा कर पर भी बातें की। मेक इन इण्डिया के बारे में उन्होंने साफ तौर पर कहा कि ‘‘सरकारी हस्तक्षेप जितना कम होगा, मेक इन इण्डिया उतना ही अच्छा होगा।‘‘ जिसका सीधा सा अर्थ है, कि सरकार निजी कम्पनियों और काॅरपोरेट के लिये काम के अवसर बनाये, वैधानिक एवं अन्य सुविधायें प्र्रदान कराये और बाजार को सरकारी नियंत्रण से मुक्त रखे। उस पर किसी भी किस्म का कोई नियंत्रण न हो! निजी कम्पनियों और काॅरपोरेशनों के पक्ष में सरकारें हों।

सरकार की बाजार से साझेदारी ने दुनिया भर की ज्यादातर मुक्त व्यापार और बाजारवादी सरकारों को अपनी गिरफ्त में ले लिया है। जिनकी नीतियों का निर्धारण ‘वल्र्ड इकोनाॅमिक फोरम’ के तहत जीने वाली बैंक एवं वित्तीय इकाईयां कर रही हैं। जिनके लिये वैश्विक मंदी एक बड़े मुनाफे का धंधा बन गया है।

उत्पादन और निर्यात पर आधारित चीन की अर्थव्यवस्था यदि संकटग्रस्त होती है, तो यूरो-अमेरिकी साम्राज्य की वैश्विक व्यवस्था के विरूद्ध विश्व की वैकल्पिक व्यवस्था का निर्माण करने वाले रूस और लातिनी अमेरिकी देशों तथा चीन के एशिया और अफ्रीका के मित्र देशों की अर्थव्यवस्था ही प्रभावित नहीं होगी, बल्कि यूरोप और अमेरिकी अर्थव्यवस्था का दम भी घुटने लगेगा। विश्व की मौजूदा वित्त व्यवस्था ही चरमरा जायेगी।

उत्पादन और निर्यात पर आधारित अर्थव्यवस्था के सामने गंभीर संकट होगा, जिसके जरिये ‘अवसर’ की बातें बनायी जा रही हैं।

स्वामी जी! वित्त मंत्री जी! पीएम साहब आप, और बाजार के तमाम बजरबट्टुओं, हो सके तो जान लें, कि आज तक किसी भी वित्तीय संकट या वैश्विक मंदी का लाभ दुनिया के किसी भी देश और आम आदमी को कभी नहीं मिला, वैश्विक वित्तीय ताकतें ही मजबूत हुई हैं, और उनकी व्यवस्था की विसंगतियां ही उभर कर सामने आयी हैं। इसलिये बाजार के लिये पैंतरेबाजी दिखाना बंद कीजिये। संकट की घड़ी में आम जनता के पक्ष में खड़ा होना ही सही विकल्प है, जो कि आप नहीं कर रहे हैं।

दुनिया के किसी भी आदमी से आप पूछ लें- क्या भूख, गरीबी और बेरोजगारी में जीना उसे पसंद है?

किसी भी काम करने वाले से आप पूछ लें, कि- सीलबंद कारखाने और जेलनुमा कमरे में दिन-रात खटना उसे पसंद है? या खदानों की काली सुरंगों और उधड़ी हुई धरती पर वह जीना चाहता है?

किसी भी किसान से आप पूछ लें, कि अपनी जमीन से बेदखल होना, शहरों की खाख छानना और दिहाड़ी मजदूरों की तरह वह जीना चाहता है?

या उन युवाओं से आप पूछ लें, जिनकी आंखों में आप बाजार के रंगीन सपने भर रहे हैं, बाजार के लिये जीना और पूंजी के लिये मरना सिखा रहे हैं, कि लोहे की छत्त और बंदिशों की सलाखों के बीच जिंदगी गुजारना उसे पसंद है?
आपको जवाब मिल जायेगा।

आगजनी और लूटमार बंद करें। यह तर्क देना बंद करें, कि हत्या और आत्महत्या करने वालों के लिये साधन और सामान मुहैया कराना, फायदे का धंधा है। आम आदमी की बद्हाली और तकलीफों को बढ़ा कर बार-बार संकटग्रस्त होने वाली व्यवस्था को बचाने के लिये जीना अब बंद करें। यह अवसर बाजारवाद से तौबा करने का है, मगर आप ऐसा नहीं करेंगे, हम यह जानते हैं!

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