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किसके भरोसे हैं काम के अवसर?

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यदि कोई आदमी, किसी दूसरे के भरोसे कूदे तो उसे आप क्या कहेंगे?

या कोई अपनी जिम्मेदारी किसी दूसरे के कंधे पर लादे, तो उसे आप क्या कहेंगे?

कितना विश्वास करेंगे उस पर या उसकी बातों पर?

आज सरकारें यही कर रही हैं।

अपने देश की आम जनता से वो ऐसी ही बातें कर रही हैं।

उनकी बातें किसी लबारी की तरह हैं, या बतबनवा की तरह है।

हमारे देश की सरकार भी ऐसी है, या कहें उनसे कई कदम आगे हैं। जिसके मुखिया नरेंद्र मोदी हैं।

अच्छे दिन आने वाले हैं।

अच्छे दिन आ गये।

या भ्रष्टाचार मुक्त एक साल।

इन तमाम बकवासों को हम यहीं छोड़ दें। इनमें कोई दम नहीं है। जितना दम था, वह चुनाव जीतने में निकल गया, और साल भर में उन्होंने जो किया उसका निचोड़ सिर्फ इतना है, कि ‘निजीकरण को उन्होंने राष्ट्रीय नीति‘ में बदल दिया, जिनके पीछे मनमोहन सिंह सरकार की तमाम विसंगतियां चल रही हैं। बहुत जल्दी ही आपको पता चल जायेगा कि ‘मौन मोहन सिंह‘ उनके अघोषित आदर्श हैं।

बहरहाल, इन बातों का कोई मतलब नहीं है। वो विदेश में बोलें, देश में मौन रहें, या देश में बोलें, विदेश में मौन रहें, मगर यह तो उन्हें बताना ही होगा, कि उन्होंने आम जनता से जो वायदे किये हैं, जो सपने दिखाये हैं, और सरकार बनाने लायक जो विश्वास पाया है, उसे आप कैसे पूरा करेंगे?

आपने आर्थिक विकास और आम जनता से काम के वायदे किये हैं। और यह भी कहा है, कि उसमें आम जनता की हिस्सेदारी होगी।

आपके लच्छेदार भाषा को छोड़ कर हम ऐसा कह रहे हैं। और कई चीजों को छोड़ कर यह कह रहे हैं। भ्रष्टाचार विहीन पारदर्शिता, सुशासन, कालाधन जैसी तमाम बातों को छोड़कर। क्योंकि हम जानते हैं, कि आप ऐसा कुछ नहीं कर सकते। मौजूदा व्यवस्था में यह संभव नहीं है।

एक बात और,

हमें नरेंद्र मोदी से कुछ भी लेना, देना नहीं है। मगर प्रधानमंत्री से, देश की सरकार से, वह सब चाहिये, जो संवैधानिक है। जिसके लिये हम सरकार बनाते हैं। वह भी ऐसे नहीं कि आप कुछ भी कहें, कुछ भी मांगे हम सुनते और देते जायें, बल्कि आम जनता की राय से लेन-देन हो तो राजनीतिक उठा-पटक और खींच-तान की नौबत ही नहीं आयेगी।

आपने लाखों, करोड़ों पोस्टर छपवा कर गली-घर मुहल्ले को, सड़क, शहर और देश को पाट दिया- ‘‘सबका साथ, सबका विकास‘‘? उस समय भी हमको यकीन नहीं हुआ था, आज भी नहीं है। देश की जनता को शायद यकीन था, और आप कह सकते हैं, कि उसे आज भी यकीन है।

चलिये मान लेते हैं। उसी जनता से आपने काम देने की बात की थी। आपने रोजगार के नये अवसर की बातें की थी।

बस, बातें की थी।

यदि सीधे हमसे आपकी बातें होतीं, तो हम कहते- ‘‘आप हमें काम का अधिकार दे दीजिये। मौलिक अधिकारों में शामिल कर दीजिये। उसे संवैधानिक अधिकार का दर्जा दे दीजिये। बात बन जायेगी।‘‘

लेकिन, ऐसा हुआ नहीं। ऐसा होता भी नहीं। लोकतंत्र आपका चाहे जितना भी पुराना हो, उसकी जड़ें चाहे जितनी भी गहरी हों, उसके कसीदे चाहे जितनी मर्तबा पढ़े जायें, आम जनता को, अपने देश के नागरिकों को वह काम का अधिकार नहीं देती। संवैधानिक अधिकार का उसे दर्जा नहीं देती।

देश की जनता ने भी ऐसी मांग नहीं की है।

उससे आरक्षण की मांगे करा ली जाती हैं। उससे बाहरी-भीतरी की मांग करा ली जाती है, लेकिन काम के अधिकार को संविधान सें, मांगों के दायरे से बाहर रखा जाता है। आज भी वह बाहर है, और जब तक ऐसी व्यवस्था है, वह बाहर ही रहेगी।

फिर भी आपने काम के अवसर और रोजगार देने की बात की, और लोगों ने मान लिया।

आप यह सोच सकते हैं, कि ‘‘आप ऐसा कर लेंगे।‘‘ आपको यकीन है, कि जब उद्योग लगेंगे तो काम के अवसर बढ़ेंगे। कम मजदूरी में ही सही लेकिन लोगों को काम मिलेगा। बुरे हालात में ही सही, मगर लोग काम करेंगे।

आपको 40 करोड़ किसानों को उनकी जमीन, उनके खेतों से निकालने का निर्देश भी है।

ऐसा होने पर जमीन अधिग्रहण भी हो जायेगा, और औद्योगिक क्षेत्रों मे मजदूरों की भरमार भी हो जायेगी।

श्रम कानूनों में परिवर्तन आप कर ही रहे हैं, ‘वस्तु एवं सेवा कर‘ के लिये हेराफेरी भी हो ही रही है।

‘कौशल विकास‘ की योजना भी आपकी है ही।

‘मेक इन इण्डिया‘ की दहाड़ सुनने के लिये आप बेकरार हैं। मगर, यह सब होगा कैसे?

जमीन आप हड़प लेंगे।

श्रम कानूनों में फेर-बदल भी हो जायेगा।

‘वस्तु एवं सेवा कर‘ की खाई भी पार हो ही जायेगी।

आम जनता के विरोध को बहलाने-फुसलाने, नकली प्रतिरोध से बरगलाने और फिर जो भी बचा-खुचा रहेगा, उसे कुचलना भी हो जायेगा, मगर आप अपने वायदों को पूरा कैसे करेंगे?

काम का अधिकार तो आप देंगे नहीं, काम के अवसर भी नहीं बना पायेंगे, क्योंकि जिन निवेशकों, निजी कम्पनियों, काॅरापेरेशनों और वित्तीय इकाईयों के भरोसे आप कूद रहे हैं, वो श्रम को सस्ते में ही नहीं चाहते, वो उसके महत्व को और घटाना चाहते हैं। वो कुछ ऐसा चाहते हैं, कि मानव श्रम शक्ति पूरी तरह से उनकी गिरफ्त में हो, उनकी निजी सम्पत्ति हो। वो मशीनों की तरह उसे खरीद सकें, उससे मनमाना काम ले सकें और जब चाहें उसे कबाड़ के भाव बेच दें।

अब आप समझ गये होंगे, कि मै कहना क्या चाहता हूं, और जिनके भरोसे आप कूद रहे हैं, वो दुनिया भर में क्या कर रहे हैं?

उन्होंने बाजार को रेस का मैदान बना दिया है और मुनाफे को रेस का घोड़ा। जिसे जिताने के लिये उन्हें हर कीमत पर अपने उत्पाद की कीमत घटा कर रखनी है। वो सस्ते में श्रम चाहते हैं, और एक से दस का काम लेना चाहते हैं। उनके लिये मशीन और मशीनी मानव मानव श्रम का विकल्प हैं।

जिनकी कोई मांग नहीं होती, वो हड़ताल नहीं करते।

जिन्हें नियमित वेतन देने की जरूरत नहीं पड़ती।

जिनसे 8 घण्टे काम लेने की पाबंदी नहीं होती।

जिन्हें क्षतिपूर्ति, ओवरटाईम या पेंशन नहीं देना पड़ता।

जिनके लिये काम की परिस्थितियों को बेहतर होना जरूरी नहीं होता।

वे आपस में एकजुट नहीं होते, यूनियन का झंझट नहीं होता।

उन पर श्रम कानून लागू नहीं होते।

उनसे काम लेने वालों की संख्या कम होती है।

और सबसे बड़ी बात वो सस्ता श्रम का स्थायी स्त्रोत हैं।

इसलिये, निजी कम्पनियों के जरिये जिस काम के अवसर को आम जनता देख रही है़, ऐसे काम के अवसर जरूरत से ज्यादा कम हैं। जिसे गुजरात का झूठा सच बांटा गया है, वहां भी यही हुआ है। इसलिये, पीएम साहब आप यह नहीं कह सकते कि ‘‘आपको इसकी जानकारी नहीं है।‘‘

फिर, सरकार की नीति ही निजीकरण की है। वह सार्वजनिक क्षेत्रों को धीरे-धीरे मार रही है। जिसका सीधा सा मतलब है, कि वह अपने देश के नागरिकों के लिये काम के अवसर को बनाने की नीति से हाथ खींचती जा रही है। आनेवाले कल में, यदि नीतियां यही रहीं, तो समाज के बहुसंख्यक वर्ग को पूरी तरह निजी कम्पनियों और काॅरपोरेशनों के हवाले कर दिया जायेगा। जिन पर देश की सरकार का कोई नियंत्रण नहीं होगा। सरकार से ज्यादा निजी कम्पनियों और काॅरपोरेशनों के अपने नियम, कानून-कायदे और शर्तें होंगी। देश की सरकार केे पास सीमित अधिकार और काम के अवसर भी सीमित होंगे।

अब आप ही बताईये पीएम साहब, कि देश की चुनी हुई जिस सरकार के आप मुखिया हैं, वह सरकार अपने देश के लोगों के साथ क्या कर रही है? दूसरों के भरोसे कूदने वाली आपकी बातों को हम कहां खड़ा करें?

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