Home / सवाल-दर-सवाल / बाजार में संसद कहां है?

बाजार में संसद कहां है?

c20bb2d7e26218500c826ab0ec52c73e

भारत में राजनीतिक परिदृश्य में वामपंथी हैं, और दक्षिणपंथी भी हैं। और जब दोनों है, तो तीसरे का होना अपने आप जरूरी हो जाता है, तो जान लें कि, वह तीसरा भी है।

राजनीतिक दलों के नाम के आधार पर यहां कम्यूनिस्ट पार्टियां हैं- सभी तरह की। समाजवादी हैं- लोहिया से लेकर गैर लोहिया तरीके के, जिनके लिये समाजवाद साइकिल छाप झण्डा है राष्ट्रवादी हैं- तिरंगा छाप और भगवा छाप और बिना किसी छाप के। क्षेत्रीय दल हैं। कितने? यह बताना थोड़ा मुश्किल है। कई किस्म के क्षेत्रीय दल हैं। जनअसंतोष से उभरा हुआ आम आदमी पार्टी भी है, जिसे विकल्प की राजनीति का तमगा दिया गया था, जिसकी चमक फीकी पड़ गयी है।

सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी और ऐतिहासिक महत्व रखने वाली राष्ट्रीय कांग्रेस (इंदिरा) को हम नहीं भूल रहे हैं। वो भी हैं। न सिर्फ हैं, बल्कि सरकार बनाने के खेल के बड़े खिलाड़ी हैं। पहले पूरे देश में कांग्रेस की सरकार बनती थी, अब केंद्र में भाजपा है और कई राज्यों में भी है। अब दोनों मोर्चे की राजनीति है। एनडीए और यूपीए।

एक मोर्चा और भी है- वाम मोर्चा। जो तीसरा मोर्चा अपने को नहीं मानता, पिछले कई दशक से तीसरा मोर्चा बनाने की कवायत करते हुए दुबरा आ गया है। इतना दुबरा गया है, कि ठीक से सोचने-समझने के लायक भी नहीं बचा है।

ऐसे ही दलों और लोगों से देश की संसद भरी है। जिस पर देश को चलाने की जिम्मेदारी है। जो चलती है, तो जंग खाये मशीनों की रगड़, उठा-पटक और कुछ टूटने की आवाजें आती हैं, और जब थमती है, तो इस बार अडियल टट्टू का नजारा पेश कर चुकी है। मानसून सत्र में।

लोग कहते हैं, कि संसद को चलाने की जिम्मेदारी सरकार की होती है। उसे ही विपक्ष को साथ ले कर चलना पड़ता है।

सरकार की घोड़ी पर पीएम नरेंद्र मोदी बैठे हैं। लोकसभा में बहुमत को देख कर जिन्हें लगता है- ‘‘घोडी कद्दावर है, इसलिये सवार को तन कर बैठना चाहिये।‘‘ वो अंकड़ कर बैठ जाते हैं। उनके अंकड़ने की जितनी तारीफें हुईं, वो उससे कहीं ज्यादा अंकड़ते चले गये। उन्होंने देखा ही नहीं, कि जिरह-बख्तर के नीचे कुछ ऐसा है, जो पिघल रहा है। घोड़ी लंगड़ी है।

लोकतांत्रिक सरकार की घोड़ी अक्सर लंगड़ी ही होती है, क्योंकि घोड़ी पर सवार कोई और होता है, लगाम किसी और के हाथ में होती है और भरम यह भी बना कर रखना पड़ता है, कि सवार अकेला नहीं, उसके साथ देश की जनताा सवार है। अंकड़ के लिये कोई जगह नहीं, डकैती भी शराफत से डालनी पड़ती है।

आपको, आम जनता से, उसका सबकुछ छीनना है।

जिसके पास जमीन है, उससे उसकी जमीन छीननी है।

जिसके पास श्रम है, उससे उसका श्रम छीनना है।

जिसके पास बौद्धिक क्षमता है, उससे उसकी बौद्धिक क्षमता छीननी है।

जिसके पास जो है, मोदी जी को, उसका सबकुछ चाहिये, क्योंकि घोडी की लगाम जिन्होंने थाम रखी है, और जिन्होंने उन्हें सवार बनाया है, उन्हें लोगों का सबकुछ चाहिये। वह भी आराम से नहीं एक ही झटके में।

मोदी सरकार वायदों को पूरा करने वाली सरकार बनना चाहती है। यदि अब तक यह भरम बचा हुआ है, कि किससे किये गये वायदों को? तो दिल तोड़ने वाली बातों से ही आपका वास्ता पड़ेगा, क्योंकि चुनावी वायदों को वो शगूफा समझते हैं। उन्हीं से किये गये वायदों को पूरा करने का चलन है, जिसे पूरा न करने पर सरकारे ढ़ह जाती हैं।

मोदी जी की सरकार अभी ढ़ह नहीं रही है, अभी तो उनकी गढ़ी गयी छवि ढ़ह रही है, वह भी आम लोगों में नहीं, उनके बीच जिनके लिये काम करने का उन्होंने वायदा किया है। जिन्होंने उन्हें घोडी सजा कर दी, और उसका सवार बनया।

सवार बनते ही उन्होंने सरपट दौड़ लगा दी।

उम्मीदें परवान चढ़ने लगीं।

औद्योगिक घरानों के हौसले बुलंद हो गये।

निवेशकों को लगने लगा, कि बंदा काम का है।

जिसके पास काम की जमीन है -खनिज सम्पदा से भरी- उससे उसकी जमीन छीन लेगा।

जिसके पास श्रम है, उससे उसका श्रम रोजी-रोजगार के नाम से छीन लेगा।

बाजार को हमारे हवाले करेगा। गांवों को उजाड़ कर खदानों-कारखानों में मजदूर भर देगा।

जो भी सरकार और समाज का है, उसका निजीकरण कर डालेगा।

सवा सौ करोड़ लोग और एक विशाल उपमहाद्वीप नव उदारवादी बाजार व्यवस्था के हवाले हो जायेगा।

बैंको से लेकर लोगों की जेबों पर कब्जा होगा।

सेवा शुल्क लेंगे, देश और समाज की जम कर सेवा करेंगे। ‘वस्तु एवं सेवा कर विधेयक‘ पारित होगा। 2016 की शुरूआत में ही लागू होगा।

लेकिन मानसून सत्र में सबकुछ लटक गया। कोई खूंटी पर, तो कोई खूंटे पर टंग गया। मोदी जी के चारो ओर (ललित) मोदी जी मंडराने लगे, व्यापम की लाशें चकराने लगीं। भ्रष्टाचार केे भय से भ्रष्टाचार के भय का पेंच लड़ाना नाकाम रहा। छवि दरकने लगी। उम्मीदें फिसलने लगीं। पारा गिरने लगा।

पीएम साहब, तबीयत से निरंकुश होना एक बात है, मगर प्रधानमंत्री का निरंकुश होना ऐसी बात है, कि अपनों का साथ भी छूटने लगता है। जरा गौर से देखिये बात समझ में आ जायेगी, कि जिन्होंने घोड़ी की सवारी दी है, वो किसी के नहीं होते, और आप जिनके साथ हैं, वो तब तक आपके साथ हैं, जब तक उन्हें खतरा नहीं है।

सोचिये, भारत के राजनीतिक परिदृश्य में जितने भी पंथी हैं, या वादी हैं, या राजनीतिक दल हैं, वो ऐसे क्यों हैं?

संसद ठप्प क्यों रही?

वह अधमरा लोकतंत्र कहां है, जिसकी धुलाई सभी ने मिल कर की? और यह कार्यक्रम आज भी चल रहा है। रूकेगा भी नहीं। संसद में बैठे -हम मान लेते हैं, कि जो भी सांसद है, वह संसद में बैठता है- लोगों की सोच और समझ का अपहरण हो गया, वो जाने-अंजाने मुक्त बाजारवादी हो गये हैं। उसी बाजारवाद का हाथ बंटा रहे हैं, सरकार के जिस घोड़ी पर सवार, पीएम साहब हैं। जिनका कठोर आग्रह है- ‘‘आप हमारे विरूद्ध खड़े न हों, यह अधिकार आपका नहीं है, क्योंकि हमने जीत हासिल की है। संसद भवन हमारा है।‘‘

लाल किले पर, लाल निशान गाड़ने वाले, न जाने क्यों भौचक हैं? जो बाजारवादी रोग से पीडि़त हैं, और जानते हैं, कि बाजारवाद इबोला से भी ज्यादा खतरनाक है।

सुनते हैं, हमारे देश में साईकिल पर सवार समाजवादी हैं, जो नहीं जानते कि समाजवाद क्या है? वो सरकार चला रहे हैं।

बहुजन समाज न जाने क्यों हाथी पर सवार है?

टोपी पर लिखा आम आदमी है।

जिनके पंजे कटे हैं, वो कांग्रेसी हैं। जिन्होंने संविधान में समाजवाद जोड़ा, और देश को बाजार बनाने वालों के हवाले कर दिया।

अब तो यह भी सच है, कि राष्ट्रवाद का रट्टा मारने वाले बाजारवाद के कारिन्दे हैं।

समझना मुश्किल है, मगर आईये मिल-बैठ कर समझे बाजार में देश की संसद कहां है?

कुछ लोगों ने कहा- ‘‘भाई संसद जहां था, वहीं है उसके आस-पास बाजार सज गया है।

बात समझ में आने वाली थी, आ गयी।

अब समझना यह है, कि ‘‘बाजार से संसद को निकालें? या संसद के आस-पास सजे बाजार को उजाड़ें?‘‘

यह सवाल भी है, कि ‘‘यह सब करेगा कौन?‘‘

सरकार तो बाजार की हिमायती है, वह करेगी नहीं, और जो बच गये ‘पंथी‘ और ‘वादी‘ हैं, वो बाजार के दुकान हैं। हमारे पास अपने अलावा और कोई विकल्प ही नहीं है। सरकार को अपने पक्ष में खड़ा करने की अनिवार्यता हमारी है, क्योंकि देश और दुनिया में जो भी है, वह हमारा है। सरकार को बाजार की बाहें थाम कर चलने की इजाजत नहीं है। उसकी हरकतें बेजा और गैर-कानूनी हैं।

Print Friendly

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

Select language:
Hindi
English
Scroll To Top