Home / विश्व परिदृश्य / बाजारवाद का हासिल – वैश्विक वित्तीय संकट

बाजारवाद का हासिल – वैश्विक वित्तीय संकट

20101211_bkd001

चीन के मंदी का असर दुनिया के अर्थव्यवस्था पर कितना पड़ेगा, और क्या होगा? यह एक सवाल है। जिससे सिर खपाने वालों की कमी नहीं, और जो भी सिर खपा रहा है, उसके माथे पर गंभीर लकीरें हैं, क्योंकि वैश्विक वित्त व्यवस्था की हालत पहले से खराब है, वह संकटग्रस्त हैं उसके संभलने की संभावनायें सिर्फ इसलिये नहीं बन पाती कि पूंजी राज्य के नियंत्रण से बाहर होती जा रही है, और उसका केंद्रियकरण निजी क्षेत्रों में तेजी से हो रहा है। इस तेजी से हो रहा है, कि विकासशील ही नहीं, विकसित देशों की अर्थव्यवस्था पर भी वैश्विक वित्तीय ताकतों -विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष और दुनिया भर में फैले सेण्ट्रल बैंकों की श्रृंखला का, भारी भरकम कर्ज है।

विश्व के तमाम फेडरल, रिजर्व और सेण्ट्रल बैंकों पर इन ताकतों का कब्जा हो गया है। चीन भी उससे अलग नहीं है। यह अलग बात है, कि इसकी सार्वजनिक घोषणा नहीं की जाती है। इसलिये चीन का संकट सही अर्थों में सिर्फ चीन का वित्तीय संकट नहीं है, बल्कि यह पूंजीवादी वैश्विक वित्त व्यवस्था और बाजारवादी अर्थव्यवस्था का संकट है। यह उस सट्टेबाज अर्थव्यवस्था का संकट है जो स्टाॅक मार्केट के आंकड़ों से गिरती और संभलती है। भले ही अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष की प्रमुख क्रिस्टीना लोगार्ड, 4 सितम्बर को, जी-20 देशों के सम्मेलन में कहती हैं, कि ‘‘यह उतनी बड़ी गड़बड़ी नहीं है, जितनी दुनिया के शेयर बाजार दिखा रहे हैं।‘‘ किंतु, उसी सम्मेलन में उन्होंने यह भी कहा, कि ‘‘विकसित दुनिया के अधिकांश देशों में समस्यायें हैं।‘‘ और समस्यायें क्या हैं? यह बताने के वो लायक नहीं हैं।

पहले से समस्याओं से घिरी विकसित देशों की वित्त व्यवस्था चीन की वित्त व्यवस्था में मंदी और अपनी अर्थव्यवस्था को बचाने के लिये तय की गयी उसकी मुद्रा युआन का अवमूल्यन और मौद्रिक नीतियों ने विश्व अर्थव्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया है, और आर्थिक अनिश्चयता लगातार बढ़ रही है। चीन की वित्त व्यवस्था से जुड़ी दुनिया भर की विकसित और विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था के सामने, अपने को बचाने का गंभीर संकट है। इन देशों में रूस, ब्राजील, लातिनी अमेरिकी देश, अफ्रीकी और एशियायी देश ही नहीं है, जिनकी अर्थव्यवस्था सीधे तौर पर चीन की अर्थव्यवस्था से जुड़ी है, बल्कि संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाड़ा, जापान, यूरोप और आॅस्ट्रेलिया भी है। जिसकी अर्थव्यवस्था के सामने गंभीर संकट है।

यह संकट 2007-08 में अमेरिकी अर्थव्यवस्था के संकट से किसी भी स्तर में कम नहीं। सच यह है, कि उससे बड़ा होने की आशंका है, क्योंकि पिछले दो दशक से चीन दुनिया भर की जरूरतों को पूरा करने वाला सबसे बड़ा उत्पादक और निर्यातक देश रहा है। लातिनी अमेरिका और अफ्रीका का वह सबसे बड़ा निवेशक देश है। एशिया के अलावा यूरोप और अमेरिकी अर्थव्यवस्था में भी उसके निवेश का आंकड़ा काफी ऊंचा है। एक तरह से अमेरिका के विदेशी कर्ज में चीन का कर्ज सबसे बड़ा है। उसकी पूंजी अमेरिकी बैंकों में भी लगी है, और अमेरिकी बाजार में चीन की बड़ी हिस्सेदारी है।

जिस समय, 2007-08 से अब तक, अमेरिकी और यूरोपीय अर्थव्यवस्था संकटग्रस्त हुई, चीन की अर्थव्यवस्था का विकास हुआ, किंतु चीन की अर्थव्यवस्था के संकटग्रस्त होते ही, स्वाभाविक रूप से अमेरिकी अर्थव्यवस्था भी संकटग्रस्त होती चली जायेगी, यह तय है। जिसका मतलब है, कि दुनिया की सबसे बड़ी दो अर्थव्यवस्था लगभग एक साथ -क्रमशः- संकटग्रस्त हो सकती हैं। जो बाजारवादी अर्थव्यवस्था के लिये अपने आप में अब तक का सबसे बड़ा संकट होगा।

चीन की अर्थव्यवस्था का यह संकट कितना वास्तविक है? भले ही यह तय होना बाकी है, किंतु मंदी और गिरावट तय है। जिसका लाभ भारत जैसी कई उभरती हुई अर्थव्यवस्था उठाना चाहती हैं। ‘‘लाभ उठाने की यह सोच‘‘ इस व्यवस्था को बचान की साजिश है। यह समझाने की कोशिश है, कि बाजारवाद के विकास की संभावनायें अभी बाकी हैं। इस सवाल को उभरने से रोकना है, कि यह व्यवस्था बार-बार संकटग्रस्त क्यों होती है? क्यों ऐसा होता है, कि इस व्यवस्था को बचाने का सारा बोझ देश और दुनिया की आम जनता -श्रमिक और किसानों- पर लाद दिया जाता है? क्यों ऐसा होता है, कि जिस रास्ते से इस व्यवस्था का विकास होता है, उसी रास्ते से वह दुर्घटनाग्रस्त हो जाती है?

मानी हुई बात है, कि आर्थिक विकास की बुनियाद में ही खामी है। जहां आम जनता के हितों के लिये कोई जगह नहीं है, और चंद लोगों के खजाने में दुनिया भर की सम्पत्ति को जमा करना जायज है। कल तक पूंजीवादी देशों की सरकारें भी इसे नियंत्रित करती थीं और समाजवादी देशों में इसे न सिर्फ नाजायज माना जाता था, बल्कि निजी सम्पत्ति पर सख्त पाबंदियां थीं। किंतु आज समाजवादी देशों में पूंजीवाद के अवशेषों को मिली वैधानिक स्वीकृति है, और पूंजीवादी देशों मं ‘पूंजी‘ राज्य की सरकारों के नियंत्रण से न सिर्फ बाहर हो गयी है, उसने राज्य की सरकारों और वैश्विक व्यवस्था को अपने वित्तीय इकाईयों, बैंकों और निजी कम्पनियों-काॅरपोरेशनों के जरिये, नियंत्रण में ले लिया है। निजीकरण को आर्थिक विकास की अनिवार्यता का दर्जा मिल गया है। पूंजीवादी सरकारें बाजार की दोस्त बन गयी हैं, जो समाज और आम जनता के हितों के विरूद्ध वित्तीय पूंजी को वैधानिक बना रही हैं। चीन का समाजवादी ढांचा जगह-जगह से दरक और ढ़ह रहा है।

अब चीन का जो भी आर्थिक एवं राजनीतिक संकट है, उसके मूल में मुक्त बाजारवादी अर्थव्यवस्था है। जिसकी आर्थिक विसंगतियों के साथ राजनीतिक विसंगतियां भी सामने आती जा रही हैं। यह विसंगति बाजारवादी व्यवस्था की विसंगतियां हैं। जिसकी वजह से राज्य की सरकारों की औकात घट गयी है। उन्होंने अपने देश और देश की आम जनता को कर्जदार बना दिया है।

दुनिया का एक भी देश और ऐसी सरकार नहीं है, जिस पर कर्ज का छोटा या बड़ा बोझ न हो। दुनिया की एक भी ऐसी अर्थव्यवस्था नहीं है, जो पूंजी निवेशक और वैश्विक वित्तीय ताकतों के जाल में न फंसी हो। यहां तक कि समाजवादी देशों पर भी भारी कर्ज है। जिसका चीन सबसे बड़ा निवेशक देश है। और चीन पर खुद एक बड़ा कर्ज है। बैंकों और वैश्विक वित्तीय इकाईयों के माध्यम से निजी वित्तीय पूंजी का वर्चस्व बन गया है, जिसकी कमान ‘वल्र्ड इकोनाॅमिक फोरम‘ के हाथ में है।

विश्व की सबसे बड़ी अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर वर्ष 2014 तक 17.7 ट्रिलियन डाॅलर का कर्ज था, यदि अमेरिकी संघ और अमेरिकी राज्यों के कर्ज को आपस में जोड़ दिया जाये तो यह 41 ट्रिलियन डाॅलर से ज्यादा हो जाएगा। जो उसकी अर्थव्यवस्था पर इतना बड़ा कर्ज है, कि अघोषित रूप से अमेरिका दिवालिया हो चुका है। उसके पास अपना कुछ भी नहीं है, फेडरल रिजर्व से लेकर डाॅलर तक और औद्योगिक इकाईयों से लेकर पार्क और स्टेच्यू आॅफ लिबर्टी तक बिक चुकी है। वाॅल स्ट्रीट सत्ता के केंद्र में है। जिस बाजारवाद की लड़ाई वह लड़ रहा है, वह बाजार भी उसका अपना नहीं है।

2007 के बाद से अमेरिकी सरकार के कर्ज में 35 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है, जबकि अमेरिकी काॅरपोरेशन के कर्ज में 2 प्रतिशत की कमी आयी है। कर्ज के दलदल में अमेरिकी अर्थव्यवस्था सबसे गहराई में है। यूरोप की हालत उससे भी बुरी है, और जापान पर उसके जीडीपी का 400 प्रतिशत कर्ज है।

चीन का कर्ज 2007 से 2014 के बीच उसके जीडीपी का 83 प्रतिशत बढ़ा है। यह उसके जीडीपी का दो गुणा से ज्यादा है। चीन की स्थिति जापान, यूरोप और अमेरिक से इस रूप में बेहतर है, कि उसके पास अघोषित रूप से दुनिया का सबसे ज्यादा स्वर्ण भण्डार -गोल्ड रिजर्व- है। घरेलू बाजार सहित निजी कम्पनियों के अलावा सरकारी कम्पनियां है। उसका निवेश तीसरी दुनिया खास कर लातिनी अमेरिका और अफ्रीका में, सबसे बड़ा है। एशिया की अर्थव्यवस्था का वह निर्णायक देश है। उसके पास आज भी संसाधन और आधारभूत ढांचे की कमी नहीं है। बाजारवादी नजरिये से देखा जाये तो अमेरिकी वैश्वीकरण और लातिनी अमेरिकी देशों के बहुधु्रवी विश्व का पूरा-पूरा लाभ उसने ही उठाया है और रूस के साथ मिल कर विश्व की वैकल्पिक व्यवस्था का वर्तमान में वह आधार हैं यह आधार खिसक रहा है या कोई नया रूप ले रहा है? तय होना बाकी है।

वैश्विक मंदी के जिस आहट को हम आज सुन रहे हैं, यदि उसका विस्तार होता है -जिसकी संभावना है- तो यह 2007-08 के मंदी से छोटा नहीं होगा। 2007 में शुरू हुए वित्तीय संकट के बाद से 2013-14 तक में वैश्विक कर्ज में 57 ट्रिलियन डाॅलर का इजाफा हुआ है।

2014 में मैकिन्से कंसल्टेंट्स द्वारा 47 देशों में कराये गये सर्वेक्षण के अनुसार साल 2008 के वित्तीय संकट -वैश्विक मंदी- के बाद, लगभग सभी के कर्ज में बढ़ोत्तरी हुई है। ‘‘जिसकी वजह से कई देशों में संकट का खतरा बढ़ा है, और कई देशों में सीमित विकास की संभावना पैदा हुई है।‘‘

साल 2014 के अंत में वैश्विक कर्ज 199 ट्रिलियन डाॅलर पहुंच गया था और यह कर्ज दुनिया के सकल घरेलू उत्पादन का 269 प्रतिशत से बढ़ कर 286 प्रतिशत हो गया। जबकि साल 2007 में वैश्विक कर्ज 142 ट्रिलियन डाॅलर था।

रिपोर्ट केे अनुसार- ‘‘वैश्विक अर्थव्यवस्था पर कर्ज का बढ़ता उच्च स्तर वित्तीय विकास पर सवाल खड़ा करता है।‘‘ उस समय ही नये वैश्विक संकट की आशंका व्यक्त की गयी थी। कहा गया था कि ‘‘कई देशों पर मंदी का खतरा मंडरा रहा है।‘‘ यह खतरा अब खुलेआम है। मुक्त व्यापार और बाजारवादी व्यवस्था का नया संकट हमारे सामने है, जिसका आधार ही आर्थिक विकास के लिये ‘पूंजीनिवेश‘ के नाम पर बड़ा कर्ज है। जो निजी वित्तीय पूंजी के वर्चस्व और राज्य की सरकारों को जनविरोधी बना रही है। बार-बार एक ऐसे संकट को जन्म देती है, जिससे बाहर निकलने का रास्ता मौजूदा व्यवस्था में नहीं है।

यह सवाल अपने आप में महत्वपूर्ण है, कि यदि बाजारवाद का हासिल वैश्विक वित्तीय ताकतों का बढ़ता कर्ज आर्थिक अनिश्चयता और रोज बढ़ता खतरा है, तो ऐसी व्यवस्था को बनाये रखने की जरूरत क्या है? क्यों सरकारें इसे बदलने के पक्ष में नहीं हैं? वो क्यों कर्ज का लगातार बढ़ता बोझ, पूंजी का निजी क्षेत्रों में संकुचन और वैश्विक मंदी का लाभ उठाने वाली ताकतों को देखना पसंद कर रही है(?) यह जानते हुए कि किसी एक देश का संकट दुनिया की अर्थव्यवस्था को संकटग्रस्त कर सकता है।

Print Friendly

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

Select language:
Hindi
English
Scroll To Top