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अनवर सुहैल की दस कविताएं – किश्त एक

अनवर सुहैल की दस कवितायें हमारे सामने हैं – सिलसिलेवार! जैसे एक नदी अपने ही किनारों को छू कर बहती है! बात हदों और किनारों की करती है, मगर बात सिर्फ हदों और किनारों की नहीं होती, उससे आगे की होती है!

दस में से पांच कवितायें आज के लिये और पांच कवितायें कल छोड़ परसों, वह भी आपके लिये!

-संपादक

1. मैं उन बर्बरों से नहींanwar suhail

एक वो दौर था जब कक्षा में
मुगल-बादशाहों की गलतियों के इलज़ाम मेरे माथे आते थे
और मुझे औरंगजेब की उपाधि से नवाज़ा जाता था.
फिर क्रिकेट मैच के समय
मुझे पाकिस्तान समर्थक समझा गया
वे इमरान खान की तारीफ़ कर सकते थे लेकिन मैं नहीं
वे चाहें तो पाकिस्तान के जीतने की बाज़ी लगा सकते थे लेकिन मैं नही…
उस पर हद ये कि पाकिस्तान जीत जाए तो मेरा दिल टटोलते
कि मैं अन्दर से खुश तो नहीं
और भारत जीत जाता तो भी मेरा दिल टटोलते
कि मैं पाक की हार से दुखी तो नहीं

नौ/ग्यारह की घटना के लिए भी मुझे ज़िम्मेदार ठहराया गया
और अब आईसिस के दरिंदों को मेरा सगा बताया जा रहा है
हमास के लड़ाकों से मेरा रिश्ता जोड़ा जा रहा है
दुनिया ने हर युग में बर्बर देखे हैं
चारों तरफ से घेर कर
बेगुनाह समुदाय को ज़िंदा जलाना भी बर्बरता है
भ्रूण को पेट से निकाल कर नेजे पर टांगना भी बर्बरता है
इंसान को जानवर की तरह वध करना भी बर्बरता है
मैं पूछना चाहता हूँ मित्रों
चंद अपराधियों के कारण किसी समूची कौम को
घृणित करार देना भी क्या बर्बरता नही है?

मैं किस तरह अपनी बात कहूँ
कि आपको यकीन हो जाए
कि मैं उन बर्बरों में से नही….

 

2. घेराबंदी को धता बताकर

बचेंगी नहीं तितलियाँ
एक-एक कर सभी उड़ जायेंगी
या मार डाली जायेंगी
फूलों पर मंडरा नहीं पायेंगे भौंरे
गूंजेंगी नहीं बच्चों की किलकारियां
क्योंकि बदल गया है बगीचा का क़ानून
और इसी क़ानून के तहत एक दिन
बंद कर दिए जायेंगे बगीचे के कपाट
कि तितलियाँ, भौंरे, फूल, बच्चे और बगीचे
प्यार, अमन और मासूमियत के पर्याय हैं
हर तरह की घृणा के दुश्मन भी हैं
और घृणा ही तो मूल तत्व है
जिससे फैलता है हत्यारों का साम्राज्य….
तमाम घेराबंदी को धता बताकर
एक बुज़ुर्ग ने रोपा पौधा
एक बच्ची ने सींचा पानी
इस नाफ़रमानी को देख मुस्कुराया सूरज
हौले से बहने लगी समीर
और खिल गई कलियाँ
चुपके से उड़ने लगी तितलियाँ
भौंरा ललचाया
बुजुर्ग और बच्ची की आँखों में
सपने की ताबीर का सुख कौंध आया….

 

3. नफरत का सबक

जब मांगी गई शिक्षा
पढाया गया नफरत का सबक
माँगा गया काम
थमा दिया हाथों में धारदार हथियार
कि काम कैसे मिलेगा
तुम्हारे हिस्से के काम पर तो कब्जा दूजे का है
जब मांगी रोटी
पड़ोसी की रोटी छीनने का हुनर सिखाया गया
इस तर्क के साथ कि ये तुम्हारे हिस्से की रोटी है
इस पर ज़बरन काबिज़ लोगों से रोटी छीनना है तुम्हें
जब उठी मकान मांग
दिखलाए गये उनके मकान ये बताकर
कि तुम्हारी ज़मीनों पर ही तो बनाये गए हैं ये मकान
अब तो तुम्हारे पास है
तुम्हारे दिलों में उनके लिए बेपनाह नफरत
हाथों में धारदार हथियार
मिट्टी तेल, पेट्रोल, माचिस सब कुछ
और कुछ गडबड हुई तो हम हैं न
फिर काहे का डर….
इस सबक के सफल प्रयोग के बाद
बेख़ौफ़ शिष्यों ने एक दिन गुरु के खिलाफ ही
उठा लिए हथियार
प्रचंड घमासान चहुँ-ओर
मच गया हाहाकार….

 

4. रंजिशों का दौर

रंजिशों के दौर में भी कह रहे हैं
मुलाक़ात होनी चाहिए
और बात होनी चाहिए
रंजिशी माहौल में भी
दो किनारों को जोड़ता सा
एक जो पुल बन रहा है
तामीर उसकी चलती रहे
कोशिशें होती रहें
कि गाहे-बगाहे बात होनी चाहिए
एक रिश्ते का तसव्वुर झिलमिलाता,
धुंधला होकर गुम होता सा
और उसी बनते-बिगड़ते
रिश्ते की कसमें खा-खाकर
रंजिशों के नेजे से
दोस्ती से जख्म हमेशा हरे रहेंगे….
ये बता दो पूछते हैं लोग सारे
दोस्ती करनी नहीं जब
फिर वहां पर कौन सी मजबूरियाँ हैं
सच कहूँ तो गौर कर लो
रिश्तों के बीच देखो दूरियां ही दूरियां हैं
दूरियां बढ़ती रहेंगी
और बनने से पहले ही टूटकर
गिर जाएगा पुल….
रंजिशें, कडुवाहटें, सरगोशियाँ सब
दोस्ती की राह में दुश्वारियां पैदा करते हैं
लेकिन जब इनसे उबरकर राह तय हो जाती है
दोस्ती की मंजिल ही आती है….

 

5. जीवन की दरिद्रता से बेपरवाह कवि

जब कोई करता है विध्वंस
कवि एक अच्छी कविता सिरजता होता है
जब कोई उगलता है नफरत के जुमले
कवि शब्दकोष में खंगालता है
प्रेम, भाईचारा, दोस्ती और अमन के पर्यायवाची शब्द
जब कोई ताकता है शेयर बाज़ार के उतार-चढाव
कवि अपनी मासिक आय के दस प्रतिशत दाम की
खरीदता है कविता की किताब
जब कोई ऐंठता है पद-प्रतिष्ठा के बल पर
कवि जुड़ता है विरासत से, ज़मीन से, लोक से
और पाता है भरपूर ऊर्जा नए सृजन की
जब कोई करता होता है जुगाड़
पुरूस्कार, सम्मान या पदस्थापना का
कवि लगाकर गोते संवेदनाओं के सागर में
खोज लाता नये मुहावरे, नए प्रतीक, नए बिम्ब
जब कोई करता आन-तान खरीददारी
अपने जीवन की दरिद्रता से बेपरवाह
कवि अपनी कविता का तापमान जानने के लिए रहता बेचैन….

-अनवर सुहैल

अनवर सुहैल हमारे समय के चिन्हित कवि – उपन्यासकार हैं ! उनका उपन्यास ‘पहचान’ बहुत चर्चित रहा है ! इसके अलावा उनके कथा संग्रह ‘गहरी जड़ें’ के लिए उन्हें मध्य प्रदेश हिंदी सम्मेलन द्वारा वर्ष २०१४ का वागीश्वरी पुरस्कार मिलने की घोषणा हुई है ! अनवर जी बेहतरीन कवि /कथाकार के साथ –साथ एक कुशल संपादक भी है ! कविता केन्द्रित लघु पत्रिका ‘संकेत’ इसका प्रमाण हैं !

 

परिचय :-

जन्म : 09 अक्तूबर 1964 , मध्यप्रदेश के नैला / जांजगीर में !
प्रकाशन : दो उपन्यास , तीन कथा संग्रह , एक कविता संग्रह , तीन कविता पुस्तिकाएं तथा ‘असुविधा’ और ‘संकेत’ पत्रिकाओं का सम्पादन !
सम्प्रति : कोल इंडिया लि. में सीनियर मैनेजर !

प्रस्तुति:- नित्यानंद गायेन

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