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सामाजिक समस्याओं का निजीकरण

‘दिल्ली गैंगरेप’ ने कर्इ सवालों को सतह के ऊपर ला दिया है। यह सोचने के लिये विवश कर दिया है कि तमाम आर्थिक एवं राजनीतिक परिवर्तन के बाद भी, समाज की आधी आबादी की हालत वह नहीं है, जो ऊपर से नजर आती है। सड़क के किनारे खड़ा हो जार्इये तो लड़कियां आजाद खयाल सी गुजरती हुर्इ दिख जायेंगी। पत्र-पत्रिकाओं में झांकिये तो आपको ऐसा नहीं लगेगा कि वो किसी सोच से बंधी हुर्इ हैं। टीवी चैनलों की औरतें समाज की औरतों से बिल्कुल अलग हैं। विज्ञापनों में, वो इस्तेमाल होने वाली चीज हैं। समाचार चैनलों और अखबारों में जब वो सुर्खियां बनती हैं, तो नजारा कुछ और ही होता है।

इस ‘सामूहिक दुष्कर्म’ के खिलाफ जो नाराजगी और नाराजगी को मिलता हुआ जनसमर्थन है, वह छिले हुए खाल पर गिरे नमक की जलन है। सामाजिक असुरक्षा और उसे बदलने की छटपटाहट है। एक मांग है कि ‘अभियुक्तों को फांसी दे दो।’ ‘हम न्याय चाहते हैं।’ ‘वी वाण्ट जसिटस।’ इस नाराजगी और जनसंघर्ष का निचोड़ है।

”सामाजिक सुरक्षा शोषक समाज व्यवस्था में संभव नहीं।” मगर, अभी यह मुददा नहीं है।

न्याय एक कानूनी प्रक्रिया है, हम यह जानते हैं।

राजनीतिक चिंतायें दिखावटी हैं, जग जाहीर है।

जन उभार के, थक कर बैठने की, प्रतीक्षा है।

भीगे हालात को निचोड़ कर, न्याय के नाम पर, फांसी की सजा हासिल भी कर ली जाती है, तो वह दुष्कर्म के साथ हत्या की सजा होगी। जो है, वह बरकार रहेगा। सामाजिक सुरक्षा और सामाजिक सिथतियों में परिवर्तन का सवाल जहां है, वहीं खड़ा रहेगा। अब तक ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है कि हम कह या सोच सकें कि औरतों के बारे में लोगों की सोच में कोर्इ परिवर्तन भी आया है। जो कल हो रहा था, वही हो रहा है। दुष्कर्म की वारदातें बदस्तूर जारी हैं। कहा जा सकता है कि पहले से ज्यादा हो गयी हैं। या मसालेदार खबरों की जगह पा ली हैं। जो जनउभार पैदा हुआ था, उस जनउभार को पोस्टरों और बैनरों में बदला जा रहा है। जबकि उसके पास जनसंघर्षों के अलावा और कोर्इ रास्ता ही नहीं है।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने 11 जनवरी को दिल्ली गैंगरेप की ‘पीडि़ता’ और अपने गांव की सर्वमान्य ‘बिटिया’ के पिता को 20 लाख का ड्राफ्ट थमा आये। उन्होंने गांव में प्राथमिक चिकित्सा केंद्र खोलने और क्षेत्र के विकास की बातें भी की। चिटठी-पत्री के जमाने में, पत्र के अंत में जैसे लिखा जाता था कि ”शेष कुशल है।” कुछ वैसा ही ‘बिटिया’ के पिता ने कहा- ”मुख्यमंत्री की घोषणाओं व आश्वासनों से मैं पूरी तरह संतुष्ट हूं।” ‘बिटिया’ के भार्इ ने भी कहा -जो बहन का नाम सामाजिक करने के सख्त विरोधी हैं, और जिन्हें बहन के साथ देखी गयी आमीर खान की फिल्मों की याद आती है- कि ”दीदी का सपना गांव में अस्पताल बनाने का था। आज वह सपना पूरा होने को है। मुख्यमंत्री की घोषणां से हम सभी संतुष्ट हैं।”

संतुष्टी की हवा बहार्इ जा रही है। भाजपा भी पीछे नहीं है। 13 जनवरी को तेरही के भोजभात में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेयी भी पहुंचे 5 लाख का चेक थमाया, लोगों को जानकारियां दी कि भाजपा अब तक 10 लाख 25 हजार रूपये खर्च कर चुकी है। नितिन गडकरी और सुषमा स्वराज के द्वारा लिखित शोक संदेश पढ़ा गया। केंद्र सरकार से पीडि़ता के परिवार के लिये दिल्ली में डीडीए फ्लैट और भार्इ के लिये नौकरी की मांग की गयी। यह भी भरोसा दिया गया कि ”सूचना मिलते ही, वो मदद के लिये दौड़े चले आयेंगे।” कांग्रेस के स्थानीय नेताओं ने भी चक्कर लगा लिया। अच्छा खासा कवरेज मिला। जिसे देख कर, थोड़ी सी कोफ्त हुर्इ कि क्या यही आंदोलन की उपलबिध है? शीला दिक्षीत भी 5 लाख थमा चुकी हैं।

राजनीतिक दल और राजनेताओं के इस कदर संवेदनशील होने की वजह क्या है? खासकर तब जबकि निजी और सामूहिक दुष्कर्म की घटनायें लगातार हो रही हैं, और उन्हें संवेदनहीन पुलिस के भरोस छोड़ दिया गया है?

क्या जिन्होंने वास्तव में ‘दिल्ली गैंगरेप’ को सामाजिक मुददा बनाया, वो यही चाहते थे, या चाहते हैं?

हम सहयोग और समर्थन के विरोधी नहीं हैं, मगर, यह सवाल तो पैदा होता ही है कि जिन्हें सहयोग और समर्थन लेने में आपतित नहीं है, वो उस नाम को क्यों गुमनाम रखना चाहते हैं? यह अधिकार उन्हें किसने दिया? क्या यह भी पुरूषशासित समाज के वर्चस्व की मनोदशा नहीं है?

यदि ‘बिटिया’ बहादुर है -जिसे प्रमाणित किया जा सकता है कि उसने बलात्कारियों के सामने सम्पर्ण नहीं किया, और हर हाल में संघर्ष की- तो उसमें सुरक्षा और शर्मिंदगी की अनुभूतियां क्यों हैं?

सवाल कर्इ हैं, मगर मूल सवाल एक ही है कि सरकारें, राजनीतिक दल और राजनेता जो कर रहे हैं, उससे सामाजिक सुरक्षा और महिलाओं के विरूद्ध हो रहे दुष्कर्म और सामाजिक हिंसा के विरूद्ध हम एक कदम भी, आगे बढ़े हैं?

यदि- ‘हां!’ तो कैसे?

और- ‘नहीं!’ तो आप ऐसा क्यों कर रहे हैंं?

सरकारें जन समस्याओं का सामाजिक समाधान करने के बजाये, उसे निजी मामला बना रही हैं। संघर्ष करने वालों के हाथों से अधिकार छिन गया है, और मामला घरेलू हो गया है।

लड़की जब तक जन समस्याओं का चेहरा नहीं थी, तब तक आप उसे निजी मान सकते हैं। वह अपने घर-परिवार और सिर्फ गांव की हो सकती है, किंतु, जैसे ही वह जन समस्याओं की सूरत बनती है, वह पूरी तरह सामाजिक हो जाती है। यह समझने की जरूरत है, कि जिन्होंने बिना किसी नाम और चेहरे के प्रदर्शनों में भाग लिया, उनके लिये अपनी सूरत, अपनों का चेहरा भी महत्व रखता है। और विवादहीन रूप से वो सिर्फ अपने लिये सहयोग और सुरक्षा की अपेक्षा नहीं रखते। वो समाज व्यवस्था में परिवर्तन चाहते हैं। पुरस्कार की तरह सहयोग राशि से तो परिवर्तन नहीं हो गये?

यदि आज बलात्कारियों के लिये कठोर से कठोर सजा के प्रावधान की मांग की जा रही है, तो यह निजी प्रतिशोध नहीं, वैधानिक व्यवस्था की मांग है। इसलिये, बलात्कारियों को मानसिक रोगी समझना चाहिये, या दण्ड स्वरूप रसायनिक विधि से उन्हें नपुंसक बना देना चाहिये, या उन्हें सार्वजनिक फांसी की सजा मिलनी चाहिये? हमारे लिये यह सवाल नहीं है। हमारे लिये मुददा यह है कि जन समस्याओं को निजीकरण मूलत: गलत है। उस अमानवीय समाज व्यवस्था को बनाये रखने की स्वीकृति है, जहां बलात्कार और सामाजिक हिंसा है। जहां औरत विज्ञापन से लेकर बाजार तक, उपयोग की चीज है।

यह सोचना खुलेआम बकवास है कि ”मौजूदा समाज व्यवस्था को बदले बिना समाज की आधी आबादी को बराबरी से जीने का हक दिलाया जा सकता है।” यह लड़ार्इ न तो पुरूष अकेले लड़ सकता है, ना ही महिलायें अकेले लड़ कर जीत सकती हैं।

दुष्कर्म का मुददा मानवीय और सामाजिक है। हम यह मानते हैं। दिल्ली गैंगरेप में जो हुआ, वह अमानवीय, असामाजिक और अवैधानिक है। यह भी सही है। मगर अब जो हो रहा है, वह सही से ज्यादा गलत हो रहा है। मुददे को रेस का घोड़ा बना दिया गया है। बड़े-बड़े दाव चले जा रहे हैं। दुख और सामाजिक शर्म को, जश्न बना दिया गया है। ऐसा लग रहा है जैसे सहयोग देने की नीलामी लगी है। राजनेता से लेकर समाजसेवी और संस्था से लेकर संस्थान तक, यही कर रहे हैं। दुष्कर्म में अब लड़की का वह परिवार भी शामिल हो गया है, जो प्रतीकों को संतुष्ट करने की राजनीति का जरिया बना हुआ है।

हमारी समाज व्यवस्था और उसकी राजनीतिक बुनावट ऐसी हो गयी है कि सामाजिक मूल्य जबानी जमा खर्च के अलावा और कुछ नहीं, जिससे आसानी से मुकरा जा सकता है। सच सिर्फ एक है कि जो पत्थर तबियत से उछाला गया है, उसे निजी मत होने दीजिये।

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