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अफ्रीकी देशों में चीन और अमेरिका की उपस्थिति

Africa - 09-09-2015

अफ्रीका महाद्वीप में चीन और अमेरिका के बीच आर्थिक एवं सामरिक प्रतिस्पद्र्धा बढ़ रही है।

चीन आर्थिक विकास और प्राकृतिक सम्पदा के दोहन के साथ सामाजिक विकास योजनाओं का साझेदार बन रहा है। वह अपनी सामरिक स्थिति भी अब मजबूत करना चाहता है, ताकि सत्ता परिवर्तन की अमेरिकी नीतियों को रोका जा सके।

अमेरिका के लिये अफ्रीकी देश उपनिवेश और साम्राज्यवादी तरीके से पूंजीवादी उत्पादन पद्धति से बाजार और निवेश के क्षेत्र हैं। जहां बहुराष्ट्रीय कम्पनियों और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकाईयों के लिये संघर्ष है। क्षेत्रीय युद्ध, आंतरिक गृहयुद्ध और सत्ता परिवर्तन के हथियार से वह काम कर रहा है। सरकार और बाजार पर नियंत्रण उसकी नीति है। जिसका आधार अमेरिकी सैन्य अड्डे, अभियान और ‘अफ्रीकाॅम‘ है। जिसकी वजह से आर्थिक विकास का लाभ उन देशों की सरकार और आम अफ्रीकी लोगों को नहीं मिल पाता। उसके सहयोगी यूरोपीय देश और आतंकी हैं।

अब अमेरिकी सरकार अफ्रीका में सीधे विदेशी निवेश की नीति पर काम कर रही है।

अमेरिका के स्टेट डिपार्टमेंट के सहयोग से 24 अगस्त काो एक सम्मेलन की शुरूआत लिब्रेविल, गेबन में हुई। जिसका मकसद वाॅल स्ट्रीट और अफ्रीका के बीच व्यापार को बढ़ाना है।

गेबन फ्रांस का पूर्व उपनिवेश रहा है। वह एक तेल उत्पादक देश है। जिसने पेरिस और वाशिंगटन से दोस्ताना सम्बंधों को अब तक बना कर रखा है। फ्रांस की सैन्य टुकडियां वहां आज भी हैं, और हाल के बरसों में गेबन में बढ़ते जनअसंतोष, जनप्रदर्शन और राजनीतिक अस्थिरता की वजह से फ्रांस की सेना काफी सक्रिय रही है।

अपने उद्देश्य के अनुरूप इस सम्मेलन की रूपरेखा ‘अफ्रीकन ग्रोथ एण्ड अपारच्यूनिटीज एक्ट‘ (एजीओए) को विस्तार देने के लिये किया गया था, जिसे 2000 से ही चलाया जा रहा है, ताकि अफ्रीका और अमेरिकी कम्पनियों के बीच व्यापार को सुगम बनाया जा सके।

अमेरिकी सरकार का कहना है, कि ‘‘यह एक्ट अफ्रीका में उसकी आर्थिक नीतियों के आधार का प्रतिनिधित्व करता है।‘‘ जिसे अमेरिकी कांग्रेस ने भी स्वीकृति दे दी है।

सम्मेलन के पहले जारी किये गये प्रेस वक्तव्य में अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेण्ट ने कहा- ‘‘फोरम के इस साल का मुख्य मुद्दा है- एजीओए एट-15, चार्टिंग ए कोर्स फाॅर सस्टनेबल यूएस -अफ्रीका ट्रेड एण्ड इन्वेस्टमेंट पार्टनरशिप।‘‘ 2015 फोरम के तहत हाल ही में किये गये पुर्नअधिकृत और व्यापार को बढ़ाने में महिलाओं, नागरिक संगठनों और निजी क्षेत्रों के महत्वपूर्ण भूमिका को समारोह की प्रस्तुत करने की बात की गयी है। इसके अलावा विस्तृत और दीर्घकालिक आर्थिक विकास और विकास की संभावनाओं को बनाने का जिक्र है।

24-25 अगस्त को फोरम में एक्टिविस्टों ने हिस्सा लिया और 26-27 अगस्त को राजनीतिक एवं मत्रियों ने हिस्सा लिया। जिसमें अमेरिका के उच्च एवं वरिष्ठ सरकारी अधिकारी और 39 अफ्रीकी देशों के वरिष्ठ अधिकारियों ने भी भाग लिया। इस सम्मेलन में एक व्यापार मेला का भी आयोजन किया गया था।

अमेरिका अफ्रीका में बढ़ते चीन के प्रभाव को रोकना चाहता है, जो आर्थिक एवं राजनीतिक रूप से उसके लिये बड़ी चुनौती बन गया है।

पिछले कुछ सालों में ‘पिपुल्स रिपब्लिक आॅफ चाइना‘ और ‘अफ्रीकन यूनियन‘ के सदस्य देशों के बीच आर्थिक एवं राजनीतिक रिश्ते काफी बढ़ गये हैं। जिस पर विश्व समुदाय सहित अमेरिका की नजरें टिकी हुई हैं। कह सकते हैं, कि चीन और अफ्रीकी देशों के आर्थिक एवं राजनीतिक भूमिका पर नजर रखी जा रही है, अंतर्राष्ट्रीय ‘फोकस‘ काफी बढ़ गया है।

इस समय चीन अफ्रीकी देशों का सबसे बड़ा व्यावसायिक साझेदार है, और उसका जोर उन देशों के राष्ट्रीय मुद्दों से जुड़े आधारभूत ढांचे का निर्माण करने और उन्हें बना कर रखने पर है, ताकि आर्थिक विकास सहित वहां सामाजिक विकास एवं राजनीतिक स्थिरता सुनिश्चित हो सके। दवाईयां, विज्ञान, यातायात-परिवहन और अन्य ऐसे ही क्षेत्रों को मजबूत बनाने के लिये चीन अफ्रीकी देशों को आर्थिक एव कई उपयोगी सहयोग दे रहा है, जिसका लक्ष्य उनके देशों की प्राकृतिक सम्पदा का दोहन और अपने लिये बाजार बनाना है।

वाशिंगटन चीन और ‘अफ्रीकन यूनियन‘ के सदस्य देशों के बीच के सम्बंधों को अपने हित के लिये खतरा मानता है। अफ्रीका में उसका जोर ‘अमेरिका-अफ्रीका कमाॅण्ड‘ -अफ्रीकाॅम- पर है। अपने आर्थिक एवं राजनीतिक हितों के लिये वह सैन्य सहमझौतों और सैन्य अभियानों को विस्तार दे रहा है। जिबूती में हजारों अमेरिकी सैनिक तैनात हैं। इसके साथ अमेरिका वहां खुफियातंत्र सहित हवाई और नौसैनिक अभियानों को चला रहा है। इसके बाद भी पश्चिम का प्रमुख देश अल्जिरिया और पूर्वी क्षेत्र केन्या में सुरक्षा की स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है। इस महाद्वीप के ज्यादातर देशों की स्थिति ऐसी ही है, जहां आतंकवादी संगठनों की तेज होती गतिविधियां और आपसी संघर्षों के साथ बढ़ते युद्ध और गृहयुद्ध की स्थितियां हैं।

चीन और अफ्रीकी यूनियन के सदस्य देशों के बीच कई संयुक्त परियोजनाओं पर काम चल रहा है, जिसमें शामिल है नया ‘स्टेट आॅफ द आॅर्ट कांफ्रेन्स सेंटर -जो कि अदिस अबाबा में स्थित महाद्वीपीय संगठन के लिए है- का निर्माण हो रहा है। जुलाई में केन्या और इथोपिया की यात्रा के अंत में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अफ्रीकन यूनियन के उसी मुख्यालय से अपना भाषण दिया था।

ओबामा ने अपने केन्या और इथोपिया की यात्रा के दौरान एक व्यापारिक सम्मेलन की मेजबानी करके उसमें अफ्रीकी उद्योग उपक्रम पर जोर दिया था, जबकि चीन इस समय इस क्षेत्र में एक नये रेलवे लाईन का निर्माण कर रहा है, जोकि पूर्वी अफ्रीका के काफी बड़े हिस्से को आपस में जोड़ेगा। यह निर्माण परियोजना उस क्षेत्र में रहने वालों के लिये व्यापार और काम के नये अवसर को बढ़ायेगा। अमेरिकी नीति की यह विसंगति है, कि उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद लोगों के और सामान के मुक्त प्रवाह का विरोधी है।

गये साल, 12 मई 2014 को, बीबीसी के वल्र्ड सर्विस ने एक रिपोर्ट दिया था, कि ‘‘पूर्वी अफ्रीका में एक नये रेला लाईन का निर्माण कार्य चीन के सहयोग से किया जाना है। जिस पर केन्या की राजधानी नैरोबी में हंस्ताक्षर किया गया। यह रेलवे लाईन मोम्बासा से नैरोबी तक बिछायी जायेगी और उसका विस्तार यूगांडा, रवांडा, बुरूंडि और दक्षिणी सूडान तक किया जाना है।‘‘ रिपोर्ट में आगे कहा गया था, कि यह रेलवे लाईन सौ साल पहले ब्रिटिश औपनिवेशिक काल में केन्या में बनाये गये नैरो गौज़ ट्रैक की जगह लेगा। चीन इसके निर्माण के पहले दौर में 90 प्रतिशत का आर्थिक सहयोग देगा। जिस पर कुल खर्च 3.8 बिलियन डाॅलर है। आर्थिक सहयोग की प्रमुख शर्त है, कि चीन यह सहयोग तब देगा, जब इस रेलवे लाईन का निर्माण कार्य चीन की कम्पनियां करेंगी।‘‘

अफ्रीकी देशों को दिये जाने वाले, चीन के आर्थिक सहयोग एवं संयुक्त परियोजनाओं का प्रभाव अमेरिका और अफ्रीकी देशों के बीच के सम्बंघों और व्यापार पर पड़ने लगा है। ओबामा प्रशासन के दौरान अफ्रीका और अमेरिका के व्यापार में भारी कमी आयी है। जिसकी वजह तेल और खनिज तथा अन्य वस्तुओं की कीमत में आयी भारी गिरावट भी है। इसके अलावा एक महत्वपूर्ण कारण यह भी है, कि वाॅल स्ट्रीट और वाशिंगटन आम अफ्रीकी कामगर और वहां के समुदाय की हिस्सेदारी की कीमत पर ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने की नीति पर चल रहे हैं। जिसकी वजह से आर्थिक विकास एवं व्यापार का लाभ वहां के आम लोगों को नहीं मिल पाता।

ओबामा सरकार इन नीतियों में किसी भी बदलाव के पक्ष में नहीं है। विश्लेषकों का मानना है, कि ‘‘एजीओए की कार्यनीति इस नीति का ही प्रमाण है, कि वह अफ्रीका में बहुराष्ट्रीय काॅरपोरेशनों को और मजबूत मिलेेगी, तथा वहां के कामगर और स्थानीय उत्पादकों को और अधिकार विहीन कर, उन्हें हासिये में डालने का काम करेगी।‘‘ इस फोरम के तहत केन्या और अन्य राज्यों में, जिसमें दक्षिणी अफ्रीकी क्षेत्र लेसोथो भी शामिल है, में कपड़े का कारखाना और ऐसे ही अन्य छोटे उद्योगों की स्थापना की गयी है। ऐसे उत्पादन इकाई ग्रामीण क्षेत्रों के अफ्रीकी लोगों को आाकर्षित तो करते हैं, किंतु मांग में आयी कमी और अमेरिका के द्वारा एजीओए के लिये फण्डिंग में कमी या समय पर ‘फण्ड‘ न मिलने की स्थिति में उन्हें नौकरियों से निकाल दिया जाता है। परिणाम स्वरूप आर्थिक अनिश्चयता लगातार बनी रहती है।

वाशिंगटन एजीओए को दिये जाने वाले वित्तीय सहयोग का उपयोग अफ्रीकी देशों के आंतरिक एवं क्षेत्रीय मामलों को प्रभावित करने के लिये करता रहा है। जो वास्तव में अमेरिकी साम्राज्यवाद का हंथियार रहा है।

अफ्रीका फाॅरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (एफडीआई) सेण्टर के रूप में सबसे तेज विकास करने वाले क्षेत्र के रूप में नामिल किया गया है, जो पूंजीवादी उत्पादन पद्धति पर आधारित है। जिसका लक्ष्य पश्चिमी निवेशकों को, बहुराष्ट्रीय काॅरपोरेशनों और बैंकों के मुनाफा को बेहतर बनाना है। जिसमें श्रमिक-कामगरों, किसानों, नौजवानों और स्थानीय व्यावसायिकों का हित कहीं नहीं है।

कैम्ब्रिज विश्व विद्यालय के पीएचडी रिसर्च स्काॅलर जोस्टाइन लोर हाउगे ने अपने एक प्रकाशित आलेख में लिखा है, कि ‘‘अफ्रीका अब दुनिया का -सीधे विदेशी निवेश (एफडीआई) के लिये- तेजी से विकसित होने वाला क्षेत्र है। 1990 से 2013 के बीच अफ्रीका में एफडीआई के प्रवाह में 19 गुणा की वृद्धि हुई है, वह 3 बिलियन डाॅलर से बढ़ कर 57 बिलियन डाॅलर हो गया है। जिसे न्यूनतम आय वाले देशों के आर्थिक विकास के लिये शुभ संकेत के रूप में देखा जाता है -विशेष कर अफ्रीका में- जहां ज्यादातर देशों के पास अपना बचत काफी कम है। ऐसे देशांे की अर्थव्यवस्था के विकास करने और काम के अवसर बनाने के लिये एफडीआई से प्रभावित करना काफी महत्वपूर्ण और निर्णायक हो सकता है।‘‘ (अफ्रीकन एग्रीमेण्ट्स, 20 अगस्त 2015)

एफडीआई के तेजी से बढ़ने का मूल्यांकन करते हुए हाउगे ने निष्कर्ष निकाला है, कि ‘‘यह उन कम्पनियों के लिये, जो कि इससे जुड़े हुए हैं, अच्छा है, और सामान्य रूप से उन देशों की अर्थव्यवस्था के लिये भी जहां इसे स्थापित किया जाता है, मगर प्रभावशाली एवं शक्तिशाली बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के विस्तार से यह समस्या भी है, कि इससे कुछ ही लोगों के पास बड़े बाजार का बड़ा शेयर और मुनाफा आ जाता है। वो ऐसा आसानी से इस लिये कर पाते हैं कि उनके पास ‘टेक्नोलाॅजी‘ और ‘ब्राण्ड नेम‘ होता है। जो प्रभावशाली हैं और जिसकी अपनी स्वीकृति है।‘‘

वास्तव में एफडीआई किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को, उस देश की सरकार के सहयोग से उसे अपने नियंत्रण में लेने का वित्तीय पूंजी का बाजारवादी षडयंत्र है। अमेरिकी सरकार अफ्रीका में वैश्विक वित्तीय ताकतों के लिये खुलेआम तरीके से यही कर रही है। जिसका मकसद इन ताकतों के लिये चीन के बड़े निवेश को रोकना है।

इस समय चीन का अफ्रीका के साथ वित्त एवं व्यावसायिक सम्बंध 220 बिलियन डाॅलर से ऊपर का है, और यह अफ्रीका में अमेरिकी निवेश से तीन गुणा बड़ा है।

अपने आर्थिक हितों को सुरक्षित करने के लिये चीन अब अफ्रीका में अपनी सामरिक स्थिति भी मजबूत करना चाहता है।

अफ्रीका का एक छोटा सा देश जिबूती है। जो सामरिक दृष्टि से काफी महत्व रखता है। यह हिंद महासागर से लाल सागर के मुहाने पर और स्वेज नहर के प्रवेश द्वार पर स्थित है। जहां अमेरिकी सेना स्थायी रूप से रहती है। अफ्रीका में जिबूती अमेरिका का स्थायी सैन्य ठिकाना है।

हाल ही में जिबूती की सरकार ने अमेरिकी सेना को सूचना दी है, कि ‘‘वह आॅबोक्क बेस को खाली कर दे, जहां अमेरिकी सेना का दूसरे स्तर का सैनिक अड्डा है।‘‘ अमेरिकी सेना को यह जानकारी भी दी गयी है, कि ‘‘वहां चीन के 10,000 सैनिकों को रखा जायेगा।‘‘

यह घोषणां अमेरिकी विदेश मत्री जाॅन कैरी के, मई में जिबूती की यात्रा के दूसरे दिन की गयी।

यह अमेरिका के लिये बड़ी चिंता है। चीन ने जिबूती में ऐसी बढ़त अपने भारी निवेश और उस देश की अर्थव्यवस्था को सहयोग देने के बल पर प्राप्त किया है। जिबूती के राष्ट्रपति इस्माइल ओमर गुलेह खुले रूप में चीन के महत्व के बारे में बातें कर रहे हैं।

चीन 3 बिलियन डाॅलर की लागत से निर्माणाधीन रेल मार्ग -जोकि इथोपिया की राजधानी अदिस अबाबा से जिबूती तक होगा- को पूरा करने ही वाला है। जिबूती इथोपिया को एक बंदरगाह भी उपलब्ध करा रहा है। इथोपिया एक ऐसा देश है, जिसके पास अपना कोई समुद्री किनारा नहीं है, वह चारो ओर से अन्य देशों की भू-सीमाओं से घिरा है। चीन जिबूती में छोटे और खराब बंदरगाह के आधुनिकीकरा के लिये 400 मिलियन डाॅलर का निवेश कर रहा है, जिससे कि इथोपिया पिछले 17 सालों से अपने 90 प्रतिशत ईधन और खाद्य सामानों का आयात करने के लिये बाध्य रहा है।

अपने भारी भरकम पूंजी निवेश से चीन इन देशों की अर्थव्यवस्था को संभालने और नयी दिशा देने का काम कर रहा है, जिससे उसके अपने हित भी जुड़े हैं। वह ऐसे देशों के आर्थिक विकास और ढांचागत निर्माण से काम के नये अवसर और आपसी सहयोग को भी बढ़ा रहा है। जो अमेरिकी नीति के विरूद्ध है। जिसे रोकने के लिये अमेरिका एजीओए और अफ्रीकाॅम का उपयोग कर रहा है।

जिबूती दोनों देशों के बीच नया मसला बन गया है। अमेरिकी सेना लेमोन्नियर बेस का उपयोग करने के लिये जिबूती की सरकार को सालाना 63 मिलियन डाॅलर का भुगतान करती है। जहां 4000 अमेरिकी सैन्य टुकडियां रहती हैं, और दुनिया का सबसे बड़ा अमेरिकी ड्रोन बेस है। जिससे अमेरिका यमन और सोमालिया के आतंकी गुट -‘अलकायदा‘ और अल सबाब‘- के नाम से उन पर हमले कर, इन देशों की आम जनता को आतंकित करता है।

चीन के निवेश से जिबूती सरकार के खजाने में हर साल सैंकड़ों मिलियन डाॅलर आयेगा। उसकी तुलना में अमेरिकी सेना से मिलने वाला धन काफी छोटा है। अमेरिकी सरकार किसी भी कीमत पर अपने सैनिक अड्डे के इतने करीब, चीन के 10,000 सैनिकों की उपस्थिति को रोकने में लगी है।

चीनी सेना के जिबूती में मौजूद होने की स्थितियां बनने से ही अफ्रीकी देशों में एक बार फिर से सत्ता परिवर्तन का खतरा बढ़ गया है। ‘टेलिग्राफ‘ के आधार पर जिबूती में सरकार के तख्तापलट की योजना पर अमेरिकी पेंटागन काम शुरू कर चुका है।

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