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अनवर सुहैल की दस कविताएं – किश्त दो

anwar suhail6. फिदायीन

वो निकल गया फैक्ट्री
बिना लगाये सील मोहर
बिना टेस्ट प्रमाणित हुए
कि अभी कच्चा था वो
अपरिक्व बच्चा था वो
जन्नत की हूरों का आशिक
दूसरी दुनिया में खुद के लिए
पाने को उम्दा मुकाम
अपनी दुनिया में अमन की हत्या का
ये कैसा गुरुमन्त्र था
कि उसने बनना स्वीकार किया
एक आत्मघाती हमलावर
और बिना पुख्ता प्रशिक्षण के
हड़बड़ी में भेज दिया गया
कत्लो-गारत करने
ऐसी ही जाने कितनी फैक्टरियां हैं
ऐसे ही जाने कितने विद्यार्थी हैं
जो प्रेम करने की कच्ची उम्र में
बनना चाह रहे फिदायीन
जिनकी नापाक हरकत देखते तमाशबीन।

 

7. ईद, सेंवई और अम्मी की यादें

अम्मी के जाने के बाद पसंद नहीं कीं
अब्बा ने कभी भी हमारे हाथों बनाई सेवइयां
जबकि मैंने अम्मी की बीमारी की दशा में
सीखी थी उनसे चाशनी वाली महीन सेंवई बनाने की कला
अम्मी बताती जाती थीं और मैं शुद्ध घी में सुनहरा होने तक भूनता था सेंवई
फिर खोवे को कद्दूकस करके सेंवई के संग एक बड़ी परात में मिलाता था
छोटी इलायची का चूर्ण मिलाते ही सेंवई से आती थी ईद की खुशबु
देर तक औटाये हुए दूध को इस मिश्रण में मिलकर कुछ देर छोड़ दिया जाता था
सेंवई के लिए चाशनी बनाना भी एक कला है
उस चाशनी में जब परात की संवई डाली जाती और एक रस मिलाई जाती
तो हो जाता था पूरा घर ईद की गमक से मुअत्तर
जो छींट दिया जाए गुलाबजल थोड़ा सा…
ऐसे ही तो अब भी बनाने की कोशिश करते हैं हम
फिर अब्बा क्यों नहीं पसंद करते और बार-बार अम्मी को याद करते हैं
ईदगाह से सटे कब्रिस्तान में हम मिलते हैं हर ईद-बकरीद-शबे-बरात में
छोटा भाई भी यहीं मिलता है अब…कितनी व्यस्तता आ गई है हमारे जीवन में
हम छोटे थे तब भी अम्मी तीन-चार किलो सेंवई बनाती थीं
और अब सेंवई के फास्ट-फ़ूड रूप आ गये हैं
बस कटोरी में डालो, चीनी मिला दूध मिलाओ,
ऊपर से काजू-बादाम के टुकड़े छींट दो..हो गई सेंवई तैयार
जबकि उस जमाने में चाँद दीखने की घोषणा होते ही
बड़ी सी कडाही पर आधी रात तक सिर्फ सुनहरी भूनी जाती थी सेंवई
लकड़ी के चूल्हे में आंच को मॉनिटर करना कठिन होता है
हम काजू, बादाम, नारियल की गरी को काटते तराशते
देखा करते थे चूल्हे की आंच से तपा अम्मी का चेहरा
कितना सुनहरा दीखता था जैसे कि सुनहरी भुनी सेंवई….
आज ईद है और अम्मी याद आ रही हैं
अम्मी बहुत याद आ रही हैं
अब्बाजी भी अम्मी को बहुत याद कर रहे हैं….

 

8. फिर काहे की दूरियां

देखकर मुझको तुम्हें याद आती बिरयानी की
मिलकर मुझसे बातें करते शराब-शबाब से लबरेज़ गजलों की
तुम्हारे संवाद में अचानक उर्दू कुछ ज्यादा आ जाती
और अपने उर्दू ज्ञान से प्रभावित करने के लिए
कहते मुझे जनाब की जगह ‘ज़नाब’
और जाते समय कहते ख़ुदा-हाफ़िज़ की जगह ‘खुदा-हाफिज’
जबकि मैं तुम्हारी तरह इसी मिटटी की उपज हूँ
उतना ही हिंदी, उतना ही देसी, उतना ही देहाती जितने तुम
फिर मुझे क्यों देखते हो एक परदेसी की तरह
मैं कोई एलियन नहीं हूँ भाई
खान-पान, बरत-त्यौहार, रीत-रिवाज़ अलग होते हुए भी
कितने एक से हैं…देखो न, बेटियां बिदा के वक्त रोती हैं तुम्हारे यहाँ
और भर आती हैं आँखें लडके वालों की भी
हमारे यहाँ भी तो ऐसा ही होता है भाई
फिर काहे का अंतर…
फिर काहे की दूरियां…

 

9. कोई बावफा कैसे दिखे…

कोई हमनफस कैसे दिखे
कोई हमनवा कैसे रहे
बतलाए मुझको कोई तो
कोई बावफा कैसे दिखे…
तुम बदलते रूप इतने
और बदलकर बोलियाँ
खोजते रहते हो हममें
वतनपरस्ती के निशाँ
हम प्यार करने वाले हैं
हम जख्म खाने वाले हैं
हम गम उठाने वाले हैं
हम साथ देने वाले हैं
अकीदे का हर इम्तेहां
हम पास करते आये हैं
किसी न किसी बहाने
तुम टांग देना चाहते हो
जबकि हमारे काँधे पे
देखो सलीब कब से है…

 

10. क्या कोई मौत आरामदेह होती है?

जब मालूम हो कि कत्ल तो होना ही है
उस समय क्या कोई ख्वाहिश इस तरह की भी हो सकती है
कि मकतल में किस तरह से मौत मिले…
क्या कोई मौत आरामदेह, लक्ज़री, पुरसुकून भी होती है
या हर मौत दर्दनाक तरीके से जिस्म में दाखिल होती है
चुपचाप या शोर-शराबे के साथ
इससे क्या फर्क पड़ता है कि जला कर मारा गया
या गला रेत कर जिबह किया गया
गला घोंट कर मारा गया
या सर फोड़कर मारा गया
पत्थर मार कर मारा गया
या हाथ-पैर बाँध गहरे पानी में डुबो कर मारा गया
हो सकता है मरने के या क़त्ल किये जाने के और भी कई तरीके हों
हाँ, हुकूमतें बड़े शातिराना और पेशेवराना तौर पर
फांसी के तख्ते पर चढ़ाकर सज़ा देती हैं
और इसे किसी भी तरीके से सभ्य-समाज में कत्ल नही कहा जाता
लोग कहते हैं मकतूल के हाथ पीछे बाँध, गला रेतकर मारना बर्बर है
लेकिन कोई ये तो बताये कि किस तरह से मारना बर्बर नही है
घुटनों के बल बिठाकर सर पर गोली मारने से भी मौत होती है
चारों तरफ से घेर कर निहत्थे लोगों के जिस्म
गोलियों से छलनी करने से भी तो होती है मौत
और क्या किसी की मजबूरी से फायदा उठाने के लिए उसे ब्लेकमेल कर
ख़ुदकुशी के लिए बाध्य करना बर्बर नही है…
या कोई खुद को सच्चा साबित करने के लिए
खुद को मार डालने की कोशिश करे तो उसे क्या कहा जाएगा…
जाने कितने कत्लगाहों में ठुंसे हैं लोग
जिन्हें बेबस कहना ठीक नही होगा
क्योंकि एक की निगाह में जो देशभक्त होता है
दूसरे की निगाह में वो उतना ही बड़ा देशद्रोही भी होता है
यह एक मिसाल है कि जगह बदलने के साथ
दृष्टिकोण भी बदलता है और आस्थाएं भी…
मैं उसपर बहस नही करना चाहता
क्योंकि कत्लगाह के क़ानून के मुताबिक़ वे गुनाहगार हैं
जिन्हें मौत का हुक्म मिल चूका है पारा-पारी
क्या हम भी उनमे से नहीं हैं
जो कत्लगाहों में या कत्लगाहों के बाहर
कर रहे अपनी पारी का इंतज़ार
किसी ऐसी मौत का
जो बेशक लक्ज़री, पुरसुकून या आरामदेह तो नही ही होगी....

-अनवर सुहैल

 

अनवर सुहैल हमारे समय के चिन्हित कवि – उपन्यासकार हैं ! उनका उपन्यास ‘पहचान’ बहुत चर्चित रहा है ! इसके अलावा उनके कथा संग्रह ‘गहरी जड़ें’ के लिए उन्हें मध्य प्रदेश हिंदी सम्मेलन द्वारा वर्ष २०१४ का वागीश्वरी पुरस्कार मिलने की घोषणा हुई है ! अनवर जी बेहतरीन कवि /कथाकार के साथ –साथ एक कुशल संपादक भी है ! कविता केन्द्रित लघु पत्रिका ‘संकेत’ इसका प्रमाण हैं !

 

परिचय :-

जन्म : 09 अक्तूबर 1964 , मध्यप्रदेश के नैला / जांजगीर में !
प्रकाशन : दो उपन्यास , तीन कथा संग्रह , एक कविता संग्रह , तीन कविता पुस्तिकाएं तथा ‘असुविधा’ और ‘संकेत’ पत्रिकाओं का सम्पादन !
सम्प्रति : कोल इंडिया लि. में सीनियर मैनेजर !

प्रस्तुति:- नित्यानंद गायेन

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