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देश को उद्योगपतियों को सौंपने का अवसर

Modi chairing a high-level meeting on the global economic scenario

केंद्र की मोदी सरकार ने देश को निजी कम्पनियों और उद्योगपतियों को सौंपने का अवसर निकाल लिया है। यह अवसर उसने चीन के स्टाॅक मार्केट में आयी गिरावट और चीन के द्वारा अपनी मुद्रा -युआन के अवमूल्यन से पैदा हुई राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय परिस्थितियों से निकाला है। उसकी सोच है, कि चीन के इस वित्तीय संकट को भारतीय अर्थव्यवस्था के लिये ‘विकास के अवसर‘ में बदला जा सकता है।

जिस समय वैश्विक अर्थव्यवस्था गोते लगा रही है, और दुनिया भर की बाजारवादी अर्थव्यवस्था में भारी गिरावट दर्ज की जा रही है,

जिस समय पूंजी का संकुचन तेजी से हो रहा है, और दुनिया भर की बाजारवादी अर्थव्यवस्था पर कर्ज का बोझ लगातार बढ़ रहा है,

उस समय भारत की मोदी सरकार उन्हीं नीतियों के तहत विकास की नयी संभावनाओं से संचालित हो रही है। वह मान कर चल रही है, कि वैश्विक स्तर पर जो चुनौतियां हैं, उसे सरकार और निजी क्षेत्रों की साझेदारी से अवसर में बदला जा सकता है। जो काम नरेन्द्र मोदी अपने ‘मेक इन इण्डिया‘ के भरोसे विदेशी पूंजी निवेश से करने में अब तक नाकाम रहे, अब उसे राष्ट्रीय उद्योगपतियों और घरानों के माध्यम से पूरा करना चाहते है। उन्होंने राष्ट्रवाद और बाजारवाद को जोड़ कर ‘निवेश के जोखिम से अवसर‘ का प्रस्ताव रखा है।

8 सितम्बर 2015 को प्रधानमंत्री आवास में सरकार और बाजार को संभालने वालों के बीच एक बैठक हुई। जिसमें प्रधानमंत्री सहित वित्त से जुड़े वित्तमंत्री- अरूण जेटली, सड़क व राजमार्ग मंत्री- नितिन गड़करी, बिजली एवं कोयला मंत्री पीयूष गोयल, पेट्रोलियम मंत्री धमेंद्र प्रधान, रिजर्व बैंक आॅफ इण्डिया के गर्वनर रघुराम राजन, स्टेट बैंक आॅफ इण्डिया और आईसीआईसीआई अध्यक्ष, फिक्की, सीआईआई व एसोचैम के अध्यक्ष, नीति आयोग के उपाध्यक्ष अरविंद पानगडिया और भारत के प्रमुख औद्योगिक घरानों तथा औद्योगिक समूहों के अध्यक्ष एवं प्रतिनिधियों ने भाग लिया। रिलायंस, टाटा समूह और आदित्य बिडला ग्रूप ने हिस्सा लिया।

प्रधानमंत्री ने निजीक्षेत्र से अपने देश में निवेश करने का आग्रह किया और निजी निवेशकों ने ब्याज दर में कटौतियों से लेकर निवेश के लिये बेहतर हालात बनाने की शर्तें रखी।

निजी कम्पनियों औद्योगिक समूहों, पूंजी निवेशकों या उद्योग जगत की शर्तों का बस एक ही मतलब होता है- ‘‘उत्पादन सस्ता हो और मुनाफा तगड़ा हो।‘‘ और यह भी हो, कि सरकार सहयोगी हो। देना कम पड़े और लेने की पूरी छूट हो। सरकार के नियंत्रण से बाहर बाजार हो।

यदि किसी देश की चुनी हुई सरकार का प्रधानमंत्री अपने देश की अर्थव्यवस्था को संभालने, अपने देश के नागरिकों को काम देने के लिये, अपने देश के उद्योगपतियों से अपने देश में निवेश करने का प्रस्ताव रखे और कुछ करने के नाम पर यही करे, तो समझा जा सकता है, कि वह अपने देश, अपनी सरकार और अपने देश के नागरिकों को कहां खड़ा कर रहा है? भारत की चुनी हुई सरकार के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यही कर रहे हैं। और उनके इस किये को देश की मीडिया सहारा दे रही है। मनमोहन सिंह की सरकार की आलोचना इस बात के लिये भी की गयी थी, कि प्रधानमंत्री विदेश यात्रा से पहले और वापस आने के बाद भारतीय उद्योग जगत के प्रभावशाली समूहों से मिलते थे। कुछ लोगों ने उनकी सरकार को अम्बानी की दुकान भी कहा। आज नरेंद्र मोदी उनसे आगे निकल गये हैं। उन्होंने बैठक में खुले रूप से ‘निवेश करने और लाभ कमाने‘ की पेशकश की। उन्हें जवाब भी कुछ वैसा ही मिला।

औद्योगिक संगठन ‘फिक्की‘ की अध्यक्ष ज्योत्सना सूरी ने कहा- ‘‘प्रधानमंत्री ने कहा है, कि यह हमारे लिये लाभ उठाने और निवेश करने का एक अवसर है।‘‘ उन्होंने पूंजी की लागत को कम करने के बारे में कहा- ‘‘पूंजी की लागत अभी काफी ऊंची है। ऐसे में मुझे नहीं पता कि कितने लोग जोखिम उठाने और निवेश के लिये आगे आ सकते हैं? फिक्की ने ब्याज दरों में कटौती का सुझाव दिया है।‘‘

एसोचैम के अध्यक्ष राणा कपूर ने प्रधानमंत्री के ‘उद्योग जगत के जोखिम लेने की क्षमता‘ का उल्लेख करते हुए बैंक पूंजी, बैंकों में फंसे कर्ज और क्रेडिट फ्लो को सुधाने की बातें की। उन्होंने यह भी कहा कि ‘‘प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का दृष्टिकोंण अर्थव्यवस्था की दिशा को लेकर काफी साफ है।‘‘ जिसका सीधा सा मतलब है, कि उद्योग जगत अर्थव्यवस्था के निजीकरण के नजरिये से सहमत है। इसलिये सुधारों को गति देने की जरूरत है। मोदी सरकार जिसके लिये चारो हाथ-पांव से कुछ भी करने को तैयार है।

बैठक के बाद सीआईआई के अध्यक्ष सुमित मजूमदार ने कहा- ‘‘पीएम ने हमसे कहा कि निजी क्षेत्रों के पास जोखिम उठाने का ज्यादा दमखम है, इसलिये उन्हें मौज्ूदा हालात में भारत में निवेश बढ़ाना चाहिये। मौजूदा हालात निवेश बढ़ाने के अनुकूल है।‘‘ उन्होंने भी पूंजी की लागत का जिक्र किया। कारोबार के लायक माहौल बनाने के लिये सुधारों की बात की।

सरकार ने अपनी तरफ से उद्योग जगत को यह विश्वास दिलाया कि कारोबार के माहौल को बेहतर बनाने और आर्थिक सुधारों की गति तेज करने के लिये आवश्यक कदम उठाये जायेंगे।

कह सकते हैं, कि ‘‘मौजूदा चुनौतियों को अवसर में बदलने के लिये सरकार और निजी क्षेत्र मिल कर काम करेंगे। और काम करने के लिये जो भी वैधानिक एवं अन्य अड़चनें आयेंगी सरकार उन्हें दूर करेगी।‘‘ सरकार पहले भी यही कर रही थी, मगर अब आर्थिक विकास के लिये करेगी, वैश्विक चुनौतियों को अवसर में बदलने के लिये करेगी, उन ताकतों के लिये करेगी जो देश की अर्थव्यवस्था को बचाने के लिये लोगों को काम देने के लिये अपनी पूंजी को देश में लगाने का जोखिम उठ रहे हैं। ऐसे में वो मुनाफा कमाते हैं, तो बुरा क्या करते हैं? ऐसे में सरकार उनके लिये काम करती है, तो बुरा क्या करती है? यदि वो देश की चुनी हुई सरकार का काम करते हैं, तो सरकार को उनका काम करना ही होगा। मोदी सरकार सचमुच काॅरपोरेट है।

उद्योग जगत ने वस्तु एवं सेवाकर का जिक्र तो किया, किंतु उसने भूमि अधिग्रहण विधेयक पर चर्चायें नहीं की। उद्योग जगत के इशारे पर और उद्योग जगत को हर हाल में संतुष्ट रखने की नीति से संचालित मोदी सरकार ने भूमि अधिग्रहण विधेयक के मामले में भी उसने उद्योग जगत को विश्वास में ले लिया है। जिस समय केंद्रीय सरकार भूमि अधिग्रहण विधेयक के अपने संशोधनों को वापस ले रही थी, और विपक्ष इसे अपनी सफलता मान रहा था, 20 जुलाई 2015 को ई-न्यूज के वेबसाइट पर ‘भूमि अधिग्रहण विधेयक- ठण्डे बस्ते की राजनीति‘ पोस्ट किया गया था। जिसमें इस बात का विशेष उल्लेख किया गया था कि माोदी सरकार राज्य की सरकारों के जरिये भूमि अधिग्रहण को लागू करेगी। इस बैठक के बाद वित्त मंत्री अरूण जेटली ने कहा- ‘‘निजी क्षेत्र मानता है, कि भूमि अधिग्रहण की जिम्मेदारी राज्यों को सौंपने का सरकार का फैसला सही है।‘‘ उद्योग जगत ऐसी व्यवस्था अन्य क्षेत्रों में भी चाहता है। और मोदी सरकार काॅरपोरेट जगत के हित में यही कर रही है। ऐसा ही करेगी।

यदि हम इस बात पर यकीन करें कि मोदी सरकार केंद्र में काॅरपोरेट की सरकार है, तो इस बात का ठोस आधार बनता है, कि अब राज्यों की सरकारें भी काॅरपोरेट ही बनवायेगा। बिहार और उत्तर प्रदेश का चुनाव इस सच को उजागर कर देगा। बिहार में जिस तरह से मोदी के नाम पर चुनाव अभियान शुरू किया गया है, और जिस तेजी से सपा सुप्रिमो मुलायम सिंह यादव ने महा गठबंधन के खिलाफ पलटी मारी है, उससे यह स्पष्ट है, कि वहां मोदी की सरकार बनाने की तैयारियां चल रही हैं। जिसे उत्तर प्रदेश में दुहराया जायेगा।

यह पूर्वानुमान है, लेकिन दो और दो चार का अनुमान है। इससे मोदी की ताकत संसद के राज्य सभा में भी बढ़ेगी और मीडिया को यह खबर उड़ाने की पूरी छूट होगी कि देश की आम जनता मोदी के पक्ष में है। उस सरकार के पक्ष में है, जो अपनी जिम्मेदारियों को निजी कम्पनियों और काॅरपोरेट को सौंप रही है। यह जानते हुए कि इसका मतलब क्या है? वह अपने होश-ओ-हवास में यह कर रही है। सुनियोजित तरीके से कर रही है।

तीन घण्टे की वार्ता आनेवाले कल पर बहुत ही भारी है, जिसका खामियाजा देश की आम जनता ही चुकायेगी जिस जोखिम को उठाने की बात प्रधानमंत्री निजी क्षेत्र के उद्योगपतियों से कर रहे हैं, वास्तव में वह जोखिम सरकार और देश की आम जनता उठा रही है। उद्योगपति वर्ग के सामने तो निवेश से मुनाफा कमाने की सुविधा है।

चीन के संकट, या यूं कहें कि बाजारवादी अर्थव्यवस्था के संकट से सकारात्मक रूप से एक ही सबक ली जा सकती है, उसे अवसर में बदलने का एक ही तरीका है, कि सरकार अपने देश, अपनी अर्थव्यवस्था और अपने देश के नागरिकों की सुरक्षा के लिये, ऐसी व्यवस्था से तौबा करे और बाजार को अपने नियंत्रण में ले। अपने देश के संसाधन और अपने देश की आम जनता पर यकीन करे। लेकिन मोदी सरकार इसके विपरीत काम कर रही है, और मान रही है, कि वह इसे ‘अवसर‘ में बदल सकती है। जबकि सच यह है, कि वह देश को, सरकार को और आम लोगों के हित को उद्योगपतियों को सौंपने का अवसर बना रही है।

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