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ग – रामनाथ राय

g

दोपहर में तेज धूप होने के कारण सड़क का पिच भी मानो गलना शुरू हो गया था। गले हुए इसी पिच के रास्ते बसें चल रही हैं, सड़क पर ट्रामें चल रही हैं। उसी सड़क पर लोग भी चल रहे हैं। सड़क के दोनों किनारों पर फुटपाथ है। फुटपाथ पर चारो तरफ से दुकानें लगी हुई हैं। किसी-किसी दुकान के सामने तेज धूप से बचने के लिए खसखस लगा दिया गया है। मगर फुटपाथ पर इतनी भीड़ नहीं है, जितनी कि पहले होती थी। दोपहर में सकड़ पर बस कुछ लोग ही दिखाई दे रहे हैं।

ग सड़क पर चलते हुए जा रहा है। उसके दाहिने तरफ पोस्ट ऑफिस है। गर्मी से बचने के लिए ग अपने बदन पर एक हल्का सा कपड़ा पहन रखा है। पैंट भी उसका उसी तरह से हल्के कपड़े का है। ग के पैर में जूता है, मगर पीछे से उसका मोजा दिखाई दे रहा है।

चलते-चलते ग बाई तरफ के सड़क की ओर मुड़ जाता है। वह चाय की एक दुकान को देखता है। चाय दुकान के सिर पर एक साईन बोर्ड लगा हुआ है। कपड़े से बने लाल रंग के साईन बोर्ड पर बड़े-बड़े अक्षरों में सोनाली रंगों से लिखा गया है –

यहाँ पर
तरह-तरह का शरबत
मिलता है

साईन बोर्ड पर यह लिखा देखकर ग दुकान के अंदर चला जाता है। दुकान के अंदर आते ही ग चैंक जाता है। अंदर बहुत लंबी-चैड़ी जगह है। कमरे के छत पर दस पंखें घूम रहें हैं। अंदर लोगों की बहुत अधिक भीड़ है। बैठने के लिए कहीं भी कोई जगह खाली नहीं है। लोग बैठने के लिए जहाँ-तहाँ खड़े हैं। बाएं दीवार की तरफ सटी हुई एक कॉंउंटर है। कॉंउंटर के पास ही दो तल्ले पर जाने के लिए एक सीढ़ी बनाई गई है। कॉंउंटर में एक सज्जन बैठे हुए हैं। उनके गाल पर चापदाढ़ी है। कॉंउंटर में बैठे सज्जन की उम्र यही कोई चालीस या बयालीस वर्ष की होगी। कॉंउंटर पर बैठा आदमी ग के तरफ एक बार देखने के बाद अपनी नजरें नीचे कर लेता है। ग अपने कदम कुछ आगे बढ़ता है। उसके दोनों तरफ लाईन से टेबल लगी हुई है। टेबल-टेबल पर लस्सी, कोकाकोला, सरबत कि ग्लासें ….। टेबल के दोनों तरफ दो-दो कुर्सियाँ लगी हुई हैं। टेबल के ऊपर लाल रंग का सनग्लास बिछाया गया है। ग वहीं खड़ा होकर इधर-उधर देखने लगता है। पीछे से सिर्फ उसकी गर्दन ही घूमती दिखाई देती है। कुछ दूर एक खाली कुर्सी थी। ग वहाँ जाकर बैठने के लिए खड़ा हो जाता है। यह देखकर पास के कुर्सी पर बैठा आदमी कहता है – ‘यह जगह खाली नहीं है।’

ठीक उसी समय उसके पास से गुजते हुए कोई आदमी ग से कहता है – ‘ऊपर चले जाइए।’

ऊपर का हिस्सा नीचे का आधा है। चार पंखे हैं। दस टेबल है। चालीस कुर्सियां हैं। मगर एक भी कुर्सी खाली नहीं है। ग उसी तरह खड़ा रहता है। जहाँ और भी तीन-चार लोग ग की तरह ही खड़े हैं। एक आदमी उसके पास से गुजते हुए ग से कहता है – ‘नीचे चले जाइए।’

ग कॉंउंटर के सामने आकार खड़ा हो जाता है।

ग – ‘बैठने की जगह नहीं है?’

ठीक उसी समय चार लड़के कॉंउंटर को घेरकर खड़े हो जाते हैं। उसमें से एक कहता है – ‘तीन लस्सी, तीन पाइनएपल जूस, दो कोकाकोला…’

ग फिर फुटपाथ पर खड़ा है। कड़ी धूप। फुटपाथ के किनारे से दुकानें हैं। चलते-चलते ग फिर रुक जाता है। एक काले रंग का बोर्ड बाहर खड़ा करके रखा गया है। बोर्ड पर चॉक से कुछ लिखा गया है-

BAR OPEN
TILL
MIDNIGHT

ग बाएं तरफ अपना गर्दन घूमता है। लकड़ी के बने फ्रेम में घिसे हुये काँच का एक दरवाजा है। दरवाजे के सामने वर्दी पहने कोई खड़ा है। उसका चेहरा धूप से लाल हो गया है। अंदर जाने के लिए एक सीढ़ी है। सीढ़ी के दोनों तरफ पीतल के गमले में पॉमगाछ के पौधे लगे हुए हैं।

ग अंदर घुस जाता है। कमरे के अंदर बहुत ठंडक है। चारों तरफ मद्धिम रोशनी है। अंदर चारों तरफ टेबलें लगी हुई हैं। टेबल-टेबल पर बोतलें रखी गई हैं, शीशे का गिलास और प्लेटों के साथ-साथ सिगरेट के लिए छाईदान रखा गया है। ग चारों तरफ देखने लगता है। पीछे से सिर्फ ग की गर्दन ही घूमती दिखाई देती है। कहीं कोई खाली जगह नहीं है। ग के दोनों तरफ से वेटर आने जाने लगते हैं। ग वहीं खड़ा रहता है। ग कहीं बैठने का इंतजार करने लगता है। मगर कोई अपने जगह से उठ नहीं रहा है। उल्टे ग के आसपास और भी लोग खड़े होने लगते हैं।

ग फिर फुटपाथ पर खड़ा है। कड़ी धूप है। किनारे से दुकानें लगी हुई है।

चलते-चलते ग बाएं तरफ मुड़ता है। सिनेमा हॉल के सामने आकर रुक जाता है। सिर के ऊपर एक तख्ती झूल रही है-

HOUSE FULL

नीचे लोगों की भीड़ लगी हुई है। सभी लोग अपने में व्यस्त हैं। सिगरेट का धुआ दिखाई दे रहा है। ग कुछ कदम और आगे बढ़ जाता है। बाएं तरफ एक पतली गली है। गली में लंबी लाईन लगी हुई है। टिकिट मिलना शुरू हो गया है। ग लाइन के सबसे अंत में लग जाता है। मगर लाइन कुछ दूर जाते-जाते टूट जाती है। लाइन के टूटते ही सभी लोग चारो तरफ बिखर जाते हैं।

ग संभल कर रास्ता पार करता है। फिर फुटपाथ पकड़कर चलना शुरू कर देता है। यहाँ फिर सिनेमा हॉल है, यहाँ भी बड़े-बड़े अक्षरों में एक तख्ती झूल रही है –

HOUSE FULL

कुछ दूर चलने के बाद ग दाहिने तरफ मुड़ता है। फिर आगे चलने लगता है। कुछ दूर और चलने के बाद उसके सामने फिर से एक सिनेमा हॉल मिलता है। यहाँ पर भी बड़े-बड़े अक्षरो में एक बोर्ड झूल रहा है –

HOUSE FULL

ग चलने लगता है। तीन बार रास्ता पार करता है।

सामने एक छोटा सा पार्क है। चारो तरफ रेलिंग लगी हुई है। पार्क के बीच में एक छोटा सा पहाड़ी टीला बनाया गया है। चारो तरफ पॉमगाछ के पौधे लगे हुए हैं। तरह-तरह के पॉमगाछ के पौधे लगाए गऐ हैं। पाँच तरह के सिल्वर क्वाइन के पौधे लगे हुए हैं। इधर-उधर बेंच फैलाकर लोगों के बैठने के लिए बनाए गए हैं। पार्क के एक कोने में लकडि़यों से बनायी गयी एक छावनी है। उसके नीचे एक बेंच लगी हुई है। उसी बेंच पर एक लड़की किसी लड़के के साथ बैठी हुई है। लड़की चुपचाप शांत है, मगर लड़के का मुँह हिलता नजर आ रहा है। रुक-रुक कर लड़के का हाथ भी हिल रहा है। ग एक खाली बेंच पर बैठने के लिए बेंच की तरफ आगे बढ़ता है। मगर बैठते ही अचानक जोर से उछल पड़ता है। बेंच की गर्मी ग को सहन नहीं हो पाता है।

फिर फुटपाथ। कड़ी धूप। किनारों से दुकानें सजी हुई है।

ग चलने लगता है।

चलते-चलते ग बस स्टेंड तक आकर पहुंचता है। बस स्टेंड में आकर ग खड़ा हो जाता है। कुछ देर के बाद एक डबलडेकर बस आकर खड़ी होती है। तीन लोग बस से नीचे उतरते हैं। अंदर बहुत भीड़ है। बस के फुटबोर्ड पर बहुत से लोग देह से देह सटाए खड़े हैं। ग बस में चढ़ता नहीं है। बस चली जाती है। उसके बाद दो स्टेट बस आती है। बस में उसी तरह की भीड़ है। ग इस बस में भी नहीं चढ़ता है।

ग फिर चलने लगता है।

ग के हाथ में रखा पोर्टफोलियो झूलने लगता है। एक बार पोर्टफोलियो को अपने हाथ से बदलकर दूसरे हाथ में लेता है। कड़ी धूप, किनारे पर दुकानें सजी हुई हैं। चलते-चलते आहिस्ता-आहिस्ता ग का शरीर छोटा होने लगा है। चलते, चलते ग का शरीर आहिस्ता, आहिस्ता इतना छोटा हो जाता है कि वह फिर देखाई नहीं देता है।

-रामनाथ राय

Dilip Kumar Sharma Agyat (Photo)

अनुवादक – दिलीप कुमार शर्मा ‘अज्ञात’

 

लेखक परिचय :

Ramanath Rai

रामनाथ राय

जन्म :
3 जनवरी 1940 कोलकाता में। बांग्ला साहित्य में एम.ए.।

बांग्ला के परम्परावादी लेखन से हट कर एक अलग पहचान बनानेवाले साहित्यकार। मुख्यतः फांतासी और व्यंग्य जरिए आधुनिक जीवनबोध पर सशक्त टिपणी करने वाले एक अद्भुत कथाकार। इनका साहित्य आधुनिक युग का पंचतंत्र है। यही कारण है कि इनके साहित्य का किसी भी अन्य भाषा में अनुवाद होने का हमेशा माँग रहता है। इसलिए इनके साहित्य का हिन्दी, अँग्रेजी, मराठी, कन्नड़, ओडिया और फारसी जैसी विदेशी भाषा में अनुवाद हुआ है। इनकी बहुत सी कहानियों पर बंगाल में थियेटर खेले गाएं हैं। बहुत सी कहानी पर शॉर्ट फिल्म बनाई गई है।

प्रकाशन :
इनके बारह उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं। सम्पूर्ण उपन्यासों का एक खंड प्रकाशित हो चुका है। अब तक दो सौ से अधिक कहानियाँ इनकी प्रकाशित हो चुकी है। सम्पूर्ण कहानियों को लेकर चार खंडो में कहानी समग्र प्रकाशित चुके है। निबंध का एक संग्रह प्रकाशित है। श्रेष्ट कहानी का एक संग्रह बांग्ला से हिन्दी में प्रकाशित हो चुका है।

सम्मान :
प्रतिश्रुति पुरस्कार वर्ष 1967 में। कौस्तुभ पुरस्कार वर्ष 1970 में। बंकिम स्मृति पुरस्कार 2014 में। (यह पुरस्कार प्रति वर्ष बांग्ला के किसी एक साहित्यकार को दिया जाता है। बंकिम स्मृति पुरस्कार पश्चिम बंगाल का सबसे बड़ा सरकारी साहित्यिक पुरस्कार है।) इसके आलवे छः और पुरस्कार भी इन्हें मिले हैं।

अनुवाद :
हिन्दी, अँग्रेजी, मराठी, कन्नड़, पंजाबी, ओडिया और फारसी जैसी विदेशी भाषा में इनके साहित्य का अनुवाद हुआ है।

बांग्ला थियेटर :
इनके बहुत सी कहानी को लेकर बांग्ला में थियेटर खेले गाएं हैं।

शॉर्ट फिल्म :
बहुत सी कहानी पर शॉर्ट फिल्म बनाई गई है। ‘कहानी एक सिलाई मशीन’ की इस कहानी पर बनी लघु बांग्ला टेलीफिल्म पर फ़िल्मकार को नेशनल अवार्ड मिल चुका है।

संपर्क :
Ramanath Rai, MERLIN MARIGOLD, 3A-3rd Floor,31-B, Raja Dinendra Street, Kolkata-700009 (West Bengal) INDIA

प्रस्तुति:- नित्यानंद गायेन

 

 

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