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अमेरिकी अर्थव्यवस्था और चीन का वित्तीय संकट

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मुक्त व्यापार और बाजारवादी वैश्वीकरण ने दुनिया की अर्थव्यवस्था को आपस में इस तरह जोड़ दिया है, कि दुनिया के किसी भी देश की अर्थव्यवस्था अब स्वतंत्र नहीं है। आपसी निर्भरता इस सीमा तक बढ़ गयी है, कि एक बड़ी अर्थव्यवस्था के संकटग्रस्त होते ही दुनिया की अर्थव्यवस्था संकटग्रस्त होने लगती है। चीन का संकट सिर्फ चीन का संकट नहीं रह सकता, यह स्वाभाविक रूप से उन देशों तक भी पहुंच जाता है, जो उसके साथ हैं और जो उसके खिलाफ हैं। यह संकट अमेरिकी अर्थव्यवस्था को भी बुरी तरह प्रभावित कर सकता है। चीन ऐसी स्थिति में है, कि यदि उसकी अर्थव्यवस्था के पांव उखड़ते हैं, तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था के पांव भी जमे नहीं रह सकते। भले ही चीन अमेरिका और उसकी वैश्विक व्यवस्था के लिये बड़ी चुनौती है, जिसके खिलाफ अमेरिकी सरकार आज भी हमलावर है।

‘पिवोट टू एशिया’ और ‘ट्रांस-पैसेफिक पार्टनरशिप‘ के जरिये अमेरिका चीन के बढ़ते वर्चस्व को रोकने के लिये, उसकी आर्थिक एवं सामरिक नाकेबंदी करता रहा है। उसके ऐसे तमाम आर्थिक एवं कूटनीतिक समझौतों एवं संधियों से ब्रिक्स देशों को बाहर रखने की नीति का पालन सख्ती से किया है, साथ ही इन देशों से द्विपक्षीय सम्बंधों को बढ़ाने की जी-तोड़ कोशिशें भी कर रहा है। एशिया में भारत, अफ्रीका में दक्षिण अफ्रीका और लातिनी अमेरिका मे ब्राजील की वैश्विक साझेदारी को तोड़ना चाहता है। इसके बाद भी सच यह है, कि उसकी नीतियां नाकाम ही रहीं और उसकी अर्थव्यवस्था के लिये चीन का महत्व बढ़ता गया है।

इसलिये यह सोचना, कि चीन की अर्थव्यवस्था के लड़खड़ाने से अमेरिकी अर्थव्यवस्था में नयी जान आ जायेगी या उसकी अर्थव्यवस्था के राह की चुनौतियां खत्म हो जायेंगी, अपने आप में एक बड़ी भूल है, बल्कि सच यह है, कि अमेरिकी मुश्किलें और बढ़ जायेंगी। अघोषित रूप से पहले से दिवालिया हो चुकी अमेरिकी अर्थव्यवस्था की हालत और बिगड़ जायेगी।

चीन के स्टाॅक मार्केट की गिरावट का असर हम देख ही चुके हैं, चीन की मुद्रा युआन के अवमूल्यन की खबर से ‘स्टेण्डर्ड एण्ड पुअर‘ 500 में 0.96 प्रतिशत था। इससे भी गंभीर गिरावट अमेरिका के निजी एवं व्यक्तिगत स्वामित्व वाले स्टाॅक में देखने को मिला। ‘एप्पल‘ को 5.20 प्रतिशत का नुक्सान हुआ, माइक्रोन टेक्नोलाॅजी 4.99 प्रतिशत तक गिर कर 4.87 पर ठहर सका, जनरल मोटर्स को 3.48 प्रतिशत की हानि उठानी पड़ी। ये सभी कम्पनियां चीन में निर्यात करने पर निर्भर करती हैं।

‘फैक्ट सी‘ के मार्च के रिपोर्ट के अनुसार- ‘‘स्टैण्डर्ड एण्ड पुअर-500 कम्पनियों ने अपने कुल निर्यात का लगभग 10 प्रतिशत, एशिया-प्रशांत क्षेत्र से किया, जिनमें से ज्यादातर व्यापार चीन और जापान से हुआ।‘‘ यदि यह चीन की गिरावट और अवमूल्यन से स्थायी रूप से प्रभावित हुआ तो अमेरिकी कम्पनियों को भारी नुक्सान का सामना करना पड़ेगा। और अमेरिकी अर्थव्यवस्था में निजी कम्पनियों की हिस्सेदारी निर्णायक है।

यही नहीं, यदि चीन के विकास दर में ठहराव आता है- जोकि आ चुका है- और गिरावट जारी रहती है, तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था को गहरा झटका लगेगा, क्योंकि चीन का निवेश और अमेरिका से उसके कारोबार सिर्फ संघीय नहीं राज्यों के स्तर पर भी हैं।

‘यूएस-चाइना बिजनस कांउसिल‘ ने एक आंकडा जारी किया है। इस ‘ग्राफ‘ से यह बात बिल्कुल साफ हो जाती है, कि यदि चीन मे विकास की गति धीमी पड़ती है, तो इसका खामियाजा संयुक्त राज्य के राज्यों को भी भुगतना पड़ेगा।

चीन को निर्यात करने वाले अमेरिका के प्रमुख राज्य-2014

राज्य
निर्यात
2005-2014 बढ़त
वाशिंगटन 15.3 बिलियन डाॅलर365 प्रतिशत
कैलिफोर्निया 14.9 बिलियन डाॅलर 93 प्रतिशत
टेक्सास 10.3 बिलियन डाॅलर 101 प्रतिशत
इलिनोइस 6 बिलियन डाॅलर 281 प्रतिशत
साउथ कैरोलिना 4.3 बिलियन डाॅलर 622 प्रतिशत
ओरेगन 4 बिलियन डाॅलर 424 प्रतिशत
न्यूयाॅर्क 3.9 बिलियन डाॅलर92 प्रतिशत
मिशिगन 3.9 बिलियन डाॅलर425 प्रतिशत
आहियो 3.9 बिलियन डाॅलर 252 प्रतिशत
मेनिसोटा3.2 बिलियन डाॅलर 235 प्रतिशत
जाॅर्जिया 3.2 बिलियन डाॅलर 193 प्रतिशत
अलबामा 3 बिलियन डाॅलर579 प्रतिशत
आयोवा2.9 बिलियन डाॅलर 391 प्रतिशत
नाॅर्थ कैरोलिना 2.7 बिलियन डाॅलर 222 प्रतिशत
इण्डियाना2.6 बिलियन डाॅलर329 प्रतिशत

संयुक्त राज्य अमेरिका के 42 राज्यों ने साल 2005 से 2014 के बीच चीन के साथ निर्यात में विकास दर के तीन अंकों को प्राप्त किया, और 5 राज्यों में तो 500 प्रतिशत की वृद्धि हुई। 2014 में चीन अमेरिका के 39 राज्यों के निर्यात बाजार में तीन प्रमुख देशों में से एक था। इसमें वे राज्य भी शामिल हैं, जो कि चीन के साथ मजबूत व्यापार समझौतों से जुड़े नहीं हैं, वे राज्य हैं- मेनीसोटा, मिसिगन, न्यूयाॅर्क, अलबामा, ओहियो और दक्षिणी कैरोलिना। साल 2014 में अमेरिका के 31 राज्यों ने चीन को 1 बिलियन डाॅलर से ज्यादा का निर्यात किया था।

यदि, इस व्यापार में चीन के संकट से गिरावट आती है, तो सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है, कि अमेरिका के 42 राज्यों को कितने बड़े वित्तीय क्षति का सामना करना पड़ सकता है? यह स्थिति बुरी इसलिये भी है, कि 2007-08 के वित्तीय मंदी से अमेरिकी अर्थव्यवस्था अब तक उबर नहीं सकी है। साल 2005 में वाशिंगटन राज्य ने चीन को 3.3 बिलियन डाॅलर का निर्यात किया था, जो 2014 में बढ कर 15.3 बिलियन डाॅलर हो गया। वाशिंगटन राज्य चीन को मुख्य रूप से यातायात सम्बंधि उपकरण, वन उपज, कम्प्यूटर और इलेक्ट्राॅनिक और खनिज तथा कच्चे धातु का निर्यात करता है। पिछले एक दशक में वाशिंगटन स्टेट के द्वारा चीन को किये जाने वाले निर्यात में 365 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है।

दक्षिणी कैरोलिना अमेरिका का एक और ऐसा राज्य है, जिसके द्वारा साल 2005 में चीन को 590 मिलियन डाॅलर का निर्यात किया गया था, जोकि 2014 तक बढ़ कर 4.2 बिलियन डाॅलर हो गया। इस राज्य से चीन को निर्यात की जाने वाली बीएमडब्ल्यू कार और ग्रीयर सीटी में बने एसयूवी कार सबसे प्रसिद्ध हैं। पिछले साल बीएमडब्ल्यू कार बनाने वाली जर्मन कम्पनी ने ग्रीयर प्लांट पर 1 बिलियन डाॅलर और निवेश करने की घोषणा की थी। उसने 800 कामगरों एवं कर्मचारियों को बढ़ाने की भी बात की थी। 2014 में इस राज्य ने चीन को 2.8 बिलियन डाॅलर का यातायात एवं परिवहन सम्बंधि सामान का निर्यात किया।

2007-08 की मंदी के बाद अमेरिकी अर्थव्यवस्था के संभलने की जो भी संभावनायें बनी हैं, उसमें चीन की भूमिका महत्वपूर्ण है। उसकी अर्थव्यवस्था में चीन का निवेश इतना बड़ा है, और अमेरिकी फेडरल रिजर्व में, उसके बाॅण्ड और शेयर में, चीन की हिस्सेदारी जितनी बड़ी है, उसे देखते हुए यह आसानी से समझा जा सकता है, कि यदि चीन की अर्थव्यवस्था के पांव उखड़ते हैं, तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था का लड़खड़ाना तय है, जो पहले से ही अपनी वित्तीय चुनौतियों को हल करने की स्थिति में नहीं है।

अमेरिका के तमाम मित्र देश कनाडा से लेकर यूरोप तक और आॅस्ट्रेलिया से लेकर जापान तक की वित्त व्यवस्था मंदी के दौर में पहुंच सकते हैं। एशिया, अफ्रीका और लातिनी अमेरिका एवं कैरेबियन देशों में भी चीन का निवेश इतना बड़ा है कि चीन की अर्थव्यवस्था यदि मन्दी के दौर में प्रवेश करती है तो इन देशों और महाद्वीपों की अर्थव्यवस्था का मंदी के दौर में प्रवेश करना लगभग तय हो जायेगा।

इसलिये चीन का संकट सिर्फ उसके स्टाॅक मार्केट और युआन के अवमूल्यन का संकट नहीं है, बल्कि संयुक्त राज्य अमेरिका सहित दुनिया की अर्थव्यवस्था के लिये भी एक संकट है।

अमेरिकी साम्राज्य अपने विकास के उस दौर में प्रवेश कर चुका है, जहां उसके नीतियों की सफलता भी -चीन की वैश्विक चुनौतियों को सामप्त करने की- उसके हित में नहीं है। यह अजीब सी स्थिति है, कि दुनिया जैसी है, वैसी रह नहीं सकती और उसके बदलने का आर्थिक एवं राजनीतिक प्रभाव दुनिया के साम्राज्यवादी देशों के लिये भी एक संकट के बाद दूसरा संकट है।

इसके बाद भी सच यह है, कि वैश्विक ताकतों के लिये ‘मंदी का संकट‘ मुनाफा कमाने का और सरकारों के जरिये राज्यों पर अपनी पकड़ मजबूत करने का जरिया रहा है। उनकी कोशिश ‘मुक्त व्यापार के नये क्षेत्रों की रचना करने वाले देशों पर‘ अपनी पकड़ बनाने की होगी। चीन का संकट उसके लिये एकाधिकार और चुनौतियों को अपने लिये अवसर में बदलने की हो सकती है। ऐसा होने का मतलब वैश्विक वित्तीय ताकतों का वर्चस्व दुनिया की अर्थव्यवस्था पर होगा। जिसकी आर्थिक एवं राजनीतिक विसंगतियां भी विस्फोटक होती जा रही हैं।

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