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जनतंत्र अपनी राजनीति प्रक्रिया की वजह से गलत है

ALBERT_IND2223B_17121fकिसी भी समाज व्यवस्था की पहचान उसके मुखौटे से नहीं की जा सकती, ना ही किसी राजनीतिक दल की नीतियों को उसकी घोषणांपत्र की शराफत से समझा, जाना जा सकता है। जनतंत्र के सामने चुनी हुर्इ सरकारों का गहरा कुहासा है। यह कुहासा इतना जर्बदस्त है, कि मुखौटे को सूरत समझने की भूल हो जाती है। यह भूल कोर्इ और नहीं, हम और आप करते हैं। इस भूल को पांच साल में एक बार अनिवार्य रूप से कराने की तैयारियां बड़े ही तरीके से की जाती हैं। सबकुछ पूर्वनिर्धारित और सुनियोजित होता है। इसे हम जनतंत्र के राजनीतिक प्रणांली में सरकार के उत्पादन का कार्य भी कह सकते हैं, जहां सरकार एक उत्पाद है। जिसमें हम श्रमशकित बेचने वाले कामगर की तरह होते हैं, और यह नहीं जानते हैं, कि उत्पादन के साधन पर हमारा नहीं, किसी और का अधिकार है।

यह ‘और’ जो भी है, वही सरकार का मालिक है। बाजार में अलग-अलग ब्राण्ड की सरकारें हैं, मगर उत्पादन के साधन पर जिसका अधिकार है, उसे ही हर ब्राण्ड का मुनाफा मिलता है। हम ऐसी सरकार को चुनते या बनाते हैं, जिस पर हमारी कोर्इ पकड़ नहीं है। हमसे बस हमारा श्रम और अधिकार औने-पौने में खरीद लिया जाता है। यह सौदा एक दिन का होता है, जिसे मानने या न मानने से हमारी सिथति नहीं बदलती। हमें यह चुनने का अधिकार ही नहीं है, कि हमारा प्रतिनिधित्व कौन करेगा? राजनीतिक दल तय करती है, कि हमारा प्रतिनिधित्व ‘यह’ करेगा, और हमें इन्हीं में से किसी एक को चुनना होता है। यही हमारे जनतंत्र की वैधानिक एवं चुनावी प्रक्रिया है।

इसके पक्ष में तर्क है, कि हम खुद ही अपना प्रतिनिधित्व कर लें। अपने प्रतिनिधि को चुनाव में खड़ा कर दें। राजनीतिक अखाड़े में चुनाव लड़ लें। संगठित नहीं हैं, तो अकेले लड़ लें। हमें संगठित होने, संगठन और राजनीतिक दल बनाने का अधिकार है। बस शर्त एक है, कि हमें उन्हीं प्रक्रियाओं को मानना होगा, जो पूर्व निर्धारित हैं।

अधिकारों से भरा यह तर्क ला-जवाब है। इसमें यह सोचने की जगह नहीं है, कि जो सिंकिया पहलवान नहीं बन सकता, वह पेशेवर अखाड़ेबाजों से कैसे लड़ेगा?

सीधा सा जवाब है- लड़ना हो तो लड़े, नहीं तो दर्शक बने रहे। लड़ने वालों में से किसी एक को चुन ले।

क्या ऐसा नहीं हो सकता, कि राजनीतिक दल नहीं, हम अपने प्रतिनिधियों को तय करें?

वो हमें ऐसा करने की इजाजत नहीं देते, क्योंकि ऐसा करने का मुखौटा छाप समाज व्यवस्था में कोर्इ विधान नहीं है। चुनाव की ऐसी संवैधानिक प्रक्रिया नहीं है।

क्यों नहीं है?

यह सवाल हमारे राजनीतिक परिदृश्य से बाहर है।

जबकि होना चाहिये, क्योंकि वास्तविक जन-प्रतिनिधियों के द्वारा ही जनतंत्र की सरकारें चलती हैं। और यदि जन-प्रतिनिधि वास्तविक नहीं हैं, तो जनतंत्र की सरकारें भी वास्तविक नहीं हो सकतीं। जनतंत्र नकली होगा। जनतंत्र में सरकार बनाने की चुनावी प्रक्रिया भी नकली होगी।

ऐसे जनतंत्र के आम चुनाव का विरोध नक्सलवादी इन्हीं उददेश्यों के लिये करते हैं, या नहीं? हम विश्वास के साथ नहीं कह सकते। हम यकीन के साथ यह कह सकते हैं, कि मतपत्रों का महत्व है। आम चुनाव का महत्व है, क्योंकि यही एक मात्र ऐसी राजनीतिक प्रक्रिया है, जिसमें आम जनता की हिस्सेदारी इतने बड़े पैमाने पर होती है। और आम जनता की हिस्सेदारी जहां इतनी बड़ी है, वहां इसे महत्वपूर्ण बनाया जा सकता है। मौजूदा जनतंत्र में आम चुनाव अपने लक्ष्य और आदर्शों की वजह से नहीं, बलिक उसकी राजनीतिक प्रक्रिया की वजह से गलत है। एक ऐसी जन-विरोधी राजनीतिक प्रणाली विकसित कर ली गयी है, जहां जनादेश ही गौंण है।

आम चुनाव या विधान सभा चुनाव से ठीक पहले भारतीय नक्सलवादी-माओवादियों के फरमान आने लगते हैं। छत्तीसगढ़ में 11 और 19 नवम्बर को होने वाले विधानसभा चुनाव के खिलाफ नक्सलवादी चेतावनियां आने लगी हैं। खबरें दी गयीं कि ”नक्सलियों ने पिछले हफ्ते राज्य के बस्तर जिले के कर्इ गांवों का दौरा किया। उन्होंने पोस्टर बांटने के अलावा ग्रामीणों से आगामी चुनाव में वोट न देने को कहा। उन्होंने चेतावनी दी, कि ”अगर किसी की अंगुलियों पर मतदान करने का निशान दिखा तो उनकी अंगुलियां काट दी जायेंगी।” 90 सदस्योंवाली विधानसभा के चुनाव के खिलाफ जारी इस फरमान के बारे में मिली जानकारियां खास अच्छी नहीं कही जा सकती हैं, क्योंकि बस्तर के अलावा राज्य का बहुत बड़ा हिस्सा नक्सलवादियों के प्रभाव में है। वहां मतदान पहले भी कम ही होता था। जिसकी वजह तालाशने की कोशिश सरकारी स्तर पर कभी नहीं की गयी, यह मान लिया गया, कि क्षेत्र विशेष की आम जनता और मतदाता अशिक्षित हैं, वह मतदान के महत्व को नहीं जानती। यह भी मान लिया गया, कि नक्सलवाद प्रभावित इलाकों में मतदान कम होता है, क्योंकि वो मतदान के विरोधी हैं। तर्क यह भी बना लिया गया, कि वो सरकार, जनतंत्र और आम जनता के राजनीतिक अधिकारों के विरोधी हैं। कि वो व्यवस्था विरोधी उग्रवादी हैं। आतंकवादी हैं। देशद्रोही हैं।

jharkhand_maoist_20120910देश या प्रदेश की आम जनता नक्सलवादी आंदोलन और माओवादियों से सहमत है या नहीं? सवाल यह नहीं है, मगर वह इन्हें आतंकवादी और देशद्रोही नहीं मानती। ऐसा न मानने की वजह नक्सलवादी या माओवादी नहीं हैं, जिन्हें उग्रवादी माना जाता है, बलिक स्वयं केंद्र एवं राज्य सरकारें हैं। उन्होंने नक्सलवादियों के खिलाफ जिन अभियानों की शुरूआत की -आपरेशन ग्रीन हण्ट और छत्तीसगढ़ में सलवा जुडूम- उससे नक्सलवादियों एवं माओवादियों का सफाया तो नहीं हुआ, हां, नक्सल प्रभावित क्षेत्र की आम ग्रामीण जन- किसान, कामगर एवं आदिवासियों को भारी दमन जरूर झेलना पड़ा। सरकार के इन सैन्य और असैन्य अभियानों की वजह से जनधु्रवीकरण जरूर हुआ। आदिवासी समाज का बहुसंख्यक वर्ग माओवादियों के साथ होने के लिये विवश होता चला गया, जिसके जल, जंगल और जमीन की लड़ार्इ माओवादी लड़ने लगे, जबकि सरकार राष्ट्रीय एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के लिये उनकी जमीन उनसे छीनने लगी। गांव खाली कराये गये। खदानों के लिये उनके दस्तावेज छीन लिये गये। उनके सामने पलायन और विस्थापन के अलावा कोर्इ रास्ता ही नहीं बचा। सिथतियां बद से बदत्तर इसलिये होती चली गयीं, कि सरकारी विकास योजनाओं को व्यावहारिक आधार नहीं मिला, और उन्हें नक्सलवादी करार दे, उनका दमन हुआ। यह दमन सिर्फ छत्तीसगढ़ में ही नहीं झारखण्ड और ओडिशा में भी हुआ। पशिचम बंगाल में भी हुआ। अघोषित रूप से सरकार यह मानती है, कि आदिवासी और गांव का गरीब वर्ग सरकार विरोधी है, इसलिये या तो नक्सलवादी है, या माओवादी है।

माओवादियों ने विभाजन की गहरी लकीर खींचने का काम बड़े ही तरीके से किया। जिन्हें अशिक्षित, भुच्च-देहाती समझा जाता है, उन्हें भी राष्ट्रीय एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के बारे में समझाया। मुक्त बाजार व्यवस्था एवं उसकी आर्थिक नीतियों के बारे में ग्रामीण क्षेत्रों की आम जनता शहरी क्षेत्र की आम जनता से ज्यादा व्यावहारिक समझ रखती है, क्योंकि जल, जंगल और जमीन से बेदखल उसे ही किया जाता है। इसके बाद भी, इसका मतलब यह नहीं है, कि वो नक्सल-माओवादी हैं। यदि ऐसा होता तो ग्रामीण क्षेत्रों में किसी फरमान या चेतावनी की जरूरत नहीं पड़ती। जिसका सीधा सा मतलब है, कि माओवादियों के मुददों से क्षेत्र की आम जनता भले ही सहमत हो, वह उनकी कार्यनीतियों से सहमत नहीं हो पाती।

‘जनवाद के बिना समाजवादी क्रांति संभव नहीं है’ और ‘कोर्इ भी भूमिगत संगठन समाजवादी क्रांति का नेतृत्व नहीं कर सकती’ के बारे में नक्सलवादी एवं माओवादियों को आज नहीं तो कल सोचना ही होगा। समाजवादी क्रांति के स्वरूप का निर्धारण राजनीतिक दल या संगठन नहीं सामाजिक परिसिथतियां करती हैं, इसलिये, सशस्त्र क्रांति के प्रति विशेष आग्रह का कोर्इ आधार नहीं है। वर्गगत राजनीतिक चेतना फौरी जरूरत है। शायद नक्सल आंदोलन से जुड़े लोग और संगठन और माओवादी, शायद इस बात को समझ सकें कि उनकी अपनी नीतियां, उनके घोषित समाजवादी लक्ष्य के लिये अपर्याप्त है। अंजाने ही वो भारत की मौजूदा परिसिथतियों में उनका हाथ बंटाने के स्थान पर, घोषित लक्ष्य के विरूद्ध हैं।

भारत एक विशाल देश है, एक उपमहाद्वीप है। और जहां सामाजिक जन-चेतना, वर्गगत राजनीतिक समझ और राजनीतिक संस्कृति का स्तर अलग-अलग है। छोटे पैमाने पर यह एक साथ पूरे महाद्वीप में क्रांति कराने की अव्यवहारिक सोच की तरह है। आम जनता के बिना, हथियार और हथियारबद्ध लोगों से तख्तापलट तो किया जा सकता है, मगर जनक्रांति नहीं। जनक्रांति के लिये जनसमर्थन और जन-सहयोग जरूरी है। आम जनता के सामने खुले आम रहना भी जरूरी है। उनके लिये फरमान या चेतावनी की नीति गलत है। गुरिल्ला युद्ध को जनयुद्ध में बदलना जनवाद के बिना संभव नहीं है। देश की जनता क्या चाहती है? क्या यह जानना जरूरी नहीं है? भारत में वित्तीय तानाशाही है, दमन और हमले हैं, मगर जनतंत्र भी है, और आम जनता तक पहुंच बनाने की राहें भी हैं। पहुंच की इन राहों पर चलने को मौजूदा व्यवस्था के ढांचे के अनुरूप बनना नहीं है।

प0 बंगाल, केरला और त्रिपुरा की वामपंथी सरकारें, जो कर सकती थीं, वो नहीं कर सकीं, यह सच है, मगर उससे बड़ा सच यह है, कि देश एवं प्रदेश की आम जनता ने वामपंथी ताकतों का साथ दिया था, और लम्बे समय तक साथ दिया। यदि आज दक्षिणपंथी ताकतें एकजुट हैं, और पूंजीवादी ताकतों की एकजुटता वैशिवक स्तर पर कायम हो गयी, तो इस देश का सच यह भी है, कि आम जनता के सामने इस संकट से उबरने के लिये, कोर्इ विकल्प नहीं है। इस विकल्पहीनता के लिये वामपंथी ताकतें ही सबसे बड़ी दोषी हैं, जिन्होंने जनसमस्याओं के समाधान और वर्गगत राजनीतिक संघर्ष को विस्तार नहीं दिया, जबकि परिसिथतियां, उनके पक्ष में थीं। आज भी पूंजीवादी जनतंत्र, मुक्त बाजारवाद और उदारीकरण की नीतियां संकटग्रस्त हैंं। वैशिवक स्तर पर उसकी आर्थिक एवं राजनीतिक संरचना टूट और बिखर रही है। दुनिया की आम जनता ऐसी सरकारों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रही है, और लातिनी अमेरिकी देशों में चुनी हुर्इ सरकारें समाजवादी विकल्पों की रचना कर चुकी हैंं। शताब्दी के अंतिम दशक में ध्वस्त समाजवाद, 21वीं सदी के समाजवाद में बदल कर माक्र्सवाद की नयी संभावनाओं को जन्म दे चुका है।

मौजूदा दौर में पूंजीवादी जनविरोधी सरकारों के पास सेना, पुलिस, गुप्तचर इकार्इ और प्रचारतंत्र के अलावा और कुछ नहीं है। जन-समर्थन और जन-सहयोग तो उनके पास है ही नहीं। जन-आदेश के लिये भी उन्हें सेना और पुलिस बल की जरूरत पड़ती है।

छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव से बात शुरू हुर्इ थी, आर्इये, एक नजर नवम्बर 2013 में होने वाले इस चुनाव पर भी डाल लें। दक्षिणी छत्तीसगढ़ पर अपनी नजरें जमायें। जहां शांतिपूर्ण चुनाव कराने के लिये प्रांतीय सरकार ने केंद्र सरकार से पैरा मिलिट्री फोर्स की 1500 कम्पनियों की मांग की थी। जिसे केंद्रीय गृहमंत्रालय ने अस्वीकार दिया और 600 कम्पनियों की तैनाती तय हुर्इ। हर एक कम्पनी में 120 से 135 सैनिक होते हैं। इस तरह 80,000 सैनिकों को दक्षिण छत्तीसगढ़ एवं राजनांद गांव में तैनात किया जायेगा। इसके अलावा 33 बटालियन सेण्ट्रल फोर्स के जवानों की तैनाती होगी। इस तरह कुल मिला कर 1,17,000 सेना के जवान वहां होंगे। राज्य पुलिस फोर्स के 25,000 पुसिल भी शांतिपूर्ण चुनाव कराने के लिये तैनात किये जायेंगे। सेना और पुलिस मिला कर 1,43,000 सुरक्षा सैनिक होंगे।

Voters_India_NEW_Reutersइन एक लाख तीरालिस हजार सेना एवं पुलिस के जवानों पर दक्षिण छत्तीसगढ़ के 12 विधानसभा क्षेत्र और राजनांद गांव के 6 विधानसभा क्षेत्रों में शांतिपूर्ण मतदान कराने की जिम्मेदारी होगी। जहां की कुल आबादी 45 लाख से अधिक है, और इन क्षेत्रों में नक्सलवादी-माओवादियों की पकड़ मजबूत है। इसलिये, इतनी सुरक्षा के बाद भी राज्य सरकार 299 अतिसंवेदनशील मतदाता केंद्रों पर, मतदान न कराने के पक्ष में है। वह चाहती है, कि इन मतदाता केंद्रों के मतदाताओं को किसी अन्य मतदाता केंद्र में मतदान करने की व्यवस्था की जाये या इन मतदाता केंद्रों को स्थानांतरित कर दिया जाये। अब तक ऐसा कोर्इ निर्णय नहीं हुआ है, मगर इस बात की संभावना से इंकार नहीं किया गया है।

किसी क्षेत्र में चुनाव कराने के लिये उसे सैनिक छावनी में बदलने की ऐसी मिसाल का मिलना मुशिकल है। यह देश की राजनीतिक संरचना और किसी भी चुनी हुर्इ सरकार के लिये राजनीतिक प्रक्रिया पूरी कराने की ऐसी सिथति है, जो अपने आप में एक बड़ा सवाल है।

किसी भी संवेदनशील क्षेत्र में सेना एवं जवानों का इतना बड़ा जमावड़ा, दुनिया में सर्वोच्च दर में है। एक जवान पर 1:31 लोगों की जिम्मेदारी (जनसंख्या के आधार पर) है। जब अफगानिस्तान युद्ध अपने चरम सिथति में था, तब भी वहां 1:73 का दर था। 2011 में इस्त्राइल में, जहां सेना को वरियता हासिल है, यह दर 1:42 था। यहां तक कि भारत का सबसे संवेदनशील सीमांत क्षेत्र कश्मीर जहां आतंकवादियों की घुसपैठ होती रहती है, वहां भी 1:21 या 1:27 का अनुपात होता है। मगर नक्सल प्रभावित यह क्षेत्र अपने उच्च दर पर है। जो नक्सलवादियों के प्रभावशाली होने का, अपने आप में प्रमाण है। जो इस बात का भी प्रमाण है कि नक्सवादियों के पांव के नीचे, वास्तव में जमीन है और संभवत: वो भारतीय जनतंत्र के लिये निर्णायक मोड़ देने की क्षमता भी रखते हैं। बस, शर्त एक है, कि वो जनवाद को अपनी ससोच में जगह दें, और यह स्वीकार करें कि कोर्इ भी गुप्त या भूमिगत संगठन समाजवादी क्रांति का नेतृत्व करने में सक्षम नहीं होता। जन-सहयोग और जन-समर्थन किसी भी महत्वपूर्ण बदलाव की पहली शर्त है। क्रांति बंदूक की नाल से नहीं निकलती, वह सामाजिक संघर्ष और सही विकास की सतत प्रक्रिया है।

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