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खुशफहमी का मौसम

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‘मोदी जी तो मोदी जी हैं!’ मीडिया ने कहा!

हमने सुना और पढ़ा! सुन और पढ़ कर अच्छा लगा। यह भी लगा कि देश की मीडिया कमाल है। गोबर सान कर गोइठा बना रही है। अपने लिये बाटी-चोखा का पक्का इंतजाम कर रही है।

इंतजाम पक्का है। सुरक्षा घेरे में, वातानुकूलित मंच पर देश की सरकार है। सरकार के-

दो हाथ, दो पांव और दो आंख हैं।

एक पेट है – धीरे-धीरे बढ़ता हुआ,

एक सूरत है – चिकनाता और चमकता हुआ,

एक शहर है – बनारस, वाराणसी और काशी, तीन नामों वाला!

मामला – एक दो तीन है।

आप कहेंगे- ‘यह तो गिनती है, पुराने जमाने के टाटपट्टीछाप स्कूल का!’

हम यह कहेंगे- ‘यह जोड़-घटाव है राजनीतिकछाप अंक गणित का!‘‘

नौ में से दो घटा दें, तो एक दिन में बनारस के विकास योजना है- सात! और सात में दो जोड़ दें तो योजना है- नौ! बिहार के बाद उत्तर प्रदेश! कुल मिला कर विकास की योजना- नौ दो ग्यारह!

मोदी जी अपना प्रचार करने से कहीं नहीं चूकते। बड़े स्मार्ट हैं।

योजना स्मार्ट है- बनारस को स्मार्ट बनाने का!

शहर स्मार्ट है- घाटों पर बैठा, जाम और जाल में फंसा हुआ!

भाजपा स्मार्ट है- एक सूरत में अपने को खोता और पाता हुआ! नमो जाप करता हुआ।

सुनते हैं यहां बाढ़ नाली से आता है और नाले से उतर जाता है। शहर बजबजाता है और सूख कर तपाने लगता है।

देश और शहर में मोदी जी – करोड़ों-करोड़ के वायदों की बाढ़ है।

बाढ़ का पानी कहां से उतरेगा? कितना बजबजायेगा? कितना तपायेगा? कोई नहीं जानता। जानने की जरूरत ही नहीं है। वैसे भी, जानकारों की हसरतें बेवकूफों के पीछे-पीछे चलती हैं।

हमारी बड़ी हसरत थी – पेड़ों की छांव में बैठने की, मगर खोपड़ी की तरह शहर रोज चटियल हो रहा है। और हम इस बात से खुश हो रहे हैं, कि ‘गंजों के पास बहुत पैसा होता है।‘ वो सौगात भी करोड़ों-करोड़ का देते हैं, और वसूलते हैं हलक में हाथ डाल कर कर्ज की तरह! शहर नंगा और देश दुघर्टनाग्रस्त हो जाता है!

लेकिन मोदी जी के रहते घबराने की कोई बात नहीं है। इंतजाम पुख्ता है। उन्होंने आनलाईन ट्रामा सेंटर का बरसों से बंद द्वार खोल दिया है।

इधर दुर्घटनाग्रस्त होईये, उधर इलाज कराईये!

मीडिया की जुबान में बनारस खुश है।

बनारस की तरह हम भी खुश हैं!

खुशफहमी का मौसम शबाब पर है।

‘जो काम 50 साल में नहीं हुआ, मोदी जी उसे 50 महीना में कर दिखायेंगे।’

जी खुश हो गया यह देख कर कि योजनायें सिर के बल दोड़ रही हैं। सेक्टर सेक्टर दौड़ रही हैं। पब्लिक, प्राईवेट और पर्सनल सेक्टर में दौड़ रही हैं।

पब्लिक सेक्टर के लिये – बड़े-बड़े ताले हैं!

प्राईवेट सेक्टर के लिये – बड़ी-बड़ी योजनायें हैं!

पर्सनल सेक्टर के लिये – मुद्रा बैंक है!

पूरी व्यवस्था – खुला बाजार है!

बाजार में धोबी, धोबी हैं और गदहा गदहा है! सबकी धुलाई होनी है! गदहों की भीड़ न जाने कहां-कहां लगी है? चैराहे पर गदहा हुमक रहा है। घोड़े से तेज गदहा दौड़ रहा है।

सोचिये शहर और देश गदहों के पीछे-पीछे जब दौड़ेगा, तब कहां पहुंचेगा?

‘मोदी जी, मोदी जी हैं’

मेक इन इण्डिया, स्टैण्डअप इण्डिया, न जाने कैसे-कैसे इण्डिया हैं?

सुबह-ए-बनारस, शाम-ए-अवध की ठाठ है!

रिमोट कण्ट्रोल हैं! जिन पर अंगुलियां किसी और की हैं!

आप पूछेंगे कि- ‘किसकी हैं?‘

मगर, हमारी चुप्पी मोदी जी की सौगातों की चंवर छाप दुम हैं!

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