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आॅस्ट्रेलिया में सत्ता परिवर्तन

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आॅस्ट्रेलिया में सरकार रातो-रात बदल जाती है। उसके बदलने की खबर आम लोगों को तब होती है, जब मीडिया उन्हें यह खबर सुनाती है। वहां का लोकतंत्र वित्तीय ताकतों की जेब में पड़ा ऐसा लोकतंत्र है, जिसमें आम जनता की हिस्सेदारी उतनी ही है, जितनी हिस्सेदारी किसी निजी कम्पनी में काम करने वाले कामगर की होती है। जहां पूंजी की वरियता और श्रम उत्पादन का एक साधन मात्र है। जिसे खरीदा जाता है। जिसे बाजार में बेचने की अनिवार्यता होती है। इन दोनों के बीच वो दलाल भी होते हैं, जो पूंजी को श्रम से जोड़ने का काम करते हैं। उसे वैधानिक बनाते हैं।

पूंजीवादी लोकतंत्र की राजनीति में यह दलाल चुनी हुई सरकारें हैं। वो राजनेता हैं, जो देश की संसद, प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति बनते और बनाते हैं। राजनीति का कारोबार चलाते हैं।

राजनीति के कारोबार में फंसी सरकारें अपने देश की आम जनता को खुलेआम धोखा दे रही हैं। उन्हें इस बात की तमीज ही नहीं है, कि सरकारें वित्तीय ताकतों का दलाल नहीं होतीं। प्रायोजित दलालों की तरह काम करने वाली सरकारों ने आम जनता से कट कर अपनी औकात को घटा लिया है।

2007-08 के वित्तीय संकट के बाद जैसी स्थितियां यूरोपीय संघ के संकटग्रस्त देशों की बनीं, वहीं स्थिति आॅस्ट्रेलिया की हो गयी है। आर्थिक संकट से बचने और उसके बोझ को आम जनता पर लादने के लिये सरकारें बदल रही है। वर्तमान में आॅस्ट्रेलिया की सरकार का बदलना चीन के वित्तीय संकट से जुड़ गया, जो चीन का बड़ा व्यावसायिक साझेदार है, और जिसकी अर्थव्यवस्था चीन के आर्थिक विकास से जुड़ी हुई है।

14 सितम्बर 2015 को आॅस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री टोनी एबोट को सत्ता से बेदखल कर उनके स्थान पर मेल्कम टर्नबुल को प्रधानमंत्री बना दिया गया। सत्तारूढ़, लिबरल पार्टी के अंदर नेतृत्व परिवर्तन का यह खेल चंद घण्टों का था। ऐसा पिछले पांच सालों में तीसरी बार हुआ। आॅस्ट्रेलिया राजनीतिक अस्थिरता की ओर बढ़ रहा है, यह अस्थिरता स्वाभाविक है। लेकिन ‘हम जिसे आर्थिक अस्थिरता की ओर बढ़ना कह रहे हैं‘ वह अस्थिरता सिर्फ सरकारों का बदलना नहीं है, वह अस्थिरता उस आर्थिक अस्थिरता से जुड़ी हुई, जिसका स्वाभाविक परिणाम जनविरोध और सरकार का जनविरोधी होना है। संभवतः चीन के आर्थिक संकट का राजनीतिक परिणाम आॅस्ट्रेलिया में हम देख रहे हैं। ऐसी तब्दिलियां कुछ और भी जगह और देशों में देखने को मिले तो कोई खास बड़ी बात नहीं होगी।

आॅस्ट्रेलिया में हुए इस सत्ता परिवर्तन के मूल में काॅरपोरेट जगत का हित है, जिसके लिये काम करने वाले राजनीतिक दलालों ने इस घटना को अंजाम दिया। उन्होंने बड़ी चालाकी से पार्टी की संसदीय बैठक में, आंतरिक मतदान से मैल्कम को 44 के मुकाबले 54 मतों से जीता दिया। जो एक वकील और सफल व्यापारी हैं। जिन्हें एबाॅट ने 2008-09 में 1 मत से पराजित किया था। मैल्कम आर्थिक संकट के बोझ को आम जनता पर डाल कर काॅरपोरेट के हितों को बचाने के पक्षधर हैं।

सरकार बदलने का यह तरीका -जिसमें आम जनता की कोई भूमिका नहीं होती- आॅस्ट्रेलिया की राजनीतिक परम्परा सी बन गयी है। जून 2010 में लेबर पार्टी के प्रधानमंत्री केविन रूड को इसी तरह पार्टी के आंतरिक मतदान के जरिये सत्ता से बेदखल किया गया था, और ठीक इसी तरह उन्होंने तीन साल पहले जूलिया गिलार्ड को सत्ता से बेदखल कर कार्यभार संभाला था।

सच यह है, कि आॅस्ट्रेलिया की राजनीति में लेबर और लिबरल पार्टी में कोई खास फर्क नहीं है। वो भी अमेरिकी डेमोक्रेट और रिपब्लिकन पार्टी की तरह ही वैश्विक वित्तीय ताकतों के हितों से संचालित होने वाले राजनीतिक दल हैं। जिसके जरिये पूंजीवादी लोकतंत्र में आम जनता को विकल्पहीन बनाया जाता रहा है।

आॅस्ट्रेलिया की आम जनता -जिसमें समाज का बहुसंख्यक वर्ग- मजदूर, किसान और आम बुद्धिजीवी एवं कर्मचारी वर्ग शामिल है- का मोहभंग लिबरल, नेशनल, लेबर और ग्रीन्स पार्टियों से हो चुका है। जिसकी वजह, समाज के बहुसंख्यक -मजदूर- वर्ग की नौकरी, मजदूरी और जीवन स्तर में आयी लगातार गिरावट है। ऐसा दशकों से हो रहा है, कि समाज के बहुसंख्यक वर्ग के जीवन स्तर में गिरावट आ रही है, और उनकी सम्पत्ति चंद लोगों के हाथें में सिमटती जा रही है। किसी भी राजनीतिक दल के पास इन स्थितियों को बदलने का साहस नहीं है। उन्होंने काॅरपोरेट से सहयोग और उसके हितों को अपनी नीतियों का स्थायी हिस्सा बना लिया है। इसलिये ऐसे किसी भी सरकार परिवर्तन का खामियाजा आम आॅस्ट्रेलियायी को ही भुगतना पड़ता है, जो सक्रिय राजनीति का निरर्थक सा हिस्सा बन गया है।

2008 की मंदी के बाद से ‘वैधानिक प्रकिया‘ से प्रधानमंत्री को बदल कर सरकार बदलने और निर्वाचन आयोग जैसी इकाईयों के परिणामों की औकात घटाने की चालबाज नीतियों में तेजी आ गयी है। एक ऐसी पद्धति विकसित कर ली गयी है, कि चुनी हुई सरकार को बदलने का खिलवाड़ रातों-रात हो जाता है। यूरोपीय संघ के सदस्य देश ग्रीस और इटली -जिन पर कर्ज का भारी बोझ है- में ऐसी सरकारें बार-बार बनती और बिगड़ती रही है। जिन्हें बनाने और बिगाड़ने का मकसद नयी कटौतियों को लागू करना और जन असंतोष को बरगलाना रहा है। वास्तव में यह चुने हुए प्रतिनिधियों को आंकड़ों में बदल कर सरकार बनाने की अवैधानिक कार्यवाही है, जिसे वैधानिक करार दिया जाता है। जिसमें उस देश की जनता की कोई भूमिका नहीं होती है। यह ‘अनइलेक्टेड टेक्नोक्रियेट गर्वमेंट‘ होती है। जिसका मकसद आम जनता के बीच जाये बिना जोड़-तोड़ की सरकार को लोकतंत्र की चुनी हुई सरकार के रूप में बनाये रखना है, ताकि काॅरपोरेट के हित में काम किया जा सके और वित्तीय तानाशाही को थोपा जा सके। इस समय आॅस्ट्रेलिया की अर्थव्यवस्था चीन में आयी मंदी और खनिज तथा तेल जैसे वस्तु की कीमतों में आयी गिरावट की वजह से काफी बुरे दौर से गुजर रही है।

आॅस्ट्रेलिया की एबोट सरकार के द्वारा कामगर वर्ग के खिलाफ कटौतियों का मुद्दा था। जिसे सख्ती से लागू करने का दबाव वित्तीय ताकतें बना चुकी थीं, और इस मामले में सरकार के असफल होने से नाराज काॅरपोरेट घरानों के प्रभावशाली राजनीतिक इकाई ने, एबोट सरकार को सत्ता से बेदखल करने का काम किया और लिबरल पार्टी के टर्नबुल को प्रधानमंत्री के पद पर बैठा दिया। टर्नबुल ‘गोल्डमैन सेज‘ के बैंकर्स हैं।

60 वर्षीय मेल्कम टर्नबुल एक वकील, व्यापारी और ऐसे बैकर्स हैं, जो कि वित्तीय पूंजी और दुनिया के सबसे धनवान लोगों के लिये आॅस्ट्रेलिया में उपयोगी हैं। वो एक मल्टी मिलेनियर और आॅस्ट्रेलिया के सबसे धनवान राजनीतिज्ञों में दूसरे नम्बर के राजनीतिक हैं। साल 1997 से 2001 तक वो आॅस्ट्रेलिया में अमेरिकी इन्वेस्टमेंट बैंक -गोल्ड मैन सेज- के मैनेजिंग डाॅयरेक्टर रह चुके हैं। उन्होंने साल 2004 में सक्र्रिय राजनीति में प्रवेश किया और कुछ दिनों बाद ही मीडिया उन्हें एक महत्वाकांक्षी राजनेता और आॅस्ट्रेलिया के लिये भावी प्रधानमंत्री के रूप में पेश करने लगी। 2008-09 में भी उनके लिये अच्छी संभावनायें बनी थीं, किंतु पार्टी के अंतरिम चुनाव में वो 1 मत से पिछड़ गये। एबोट के स्थान पर टर्नबुल का सत्तारूढ़ होना वित्तीय पूंजी की तानाशाही का विस्तार है। पूंजी की वरियता को बना कर रखने की ऐसी राजनीति है, जो राजनीतिक रूप से अमेरिकी लोकतंत्र और आर्थिक रूप से चीन से अपने सम्बंधों को विस्तार दे कर आर्थिक संकट से उबरने की नीति है।

प्रधानमंत्री बनते मेल्कम टर्नबुल ने चीन के साथ अपने सम्बंधों को बढ़ाने के लिये ‘‘चाइना-आॅस्ट्रेलिया फ्री ट्रेड एग्रीमेण्ट‘‘ को ‘फास्टट्रैक लेजिशलेशन‘ पर डाल दिया यह जानते हुए कि अगले महीने तक इस एग्रीमेण्ट पर कोई भी रिपोर्ट नहीं आनी है। उनकी ‘लिबरल-नेशनल काॅलिजन‘ सरकार ने 16 सितम्बर को फेडरल पार्लियामेण्ट में इस समझौते के विधेयक को पेश कर दिया और घोषणां की कि ‘‘विधेयक इस साल के अंत से पहले हर हाल में पारित होना है, ताकि 2016 के शुरूआत से एग्रीमेट को लागू किया जा सके।

टर्नबुल का काॅरपोरेट जगत और आॅस्ट्रेलिया के ऐसे बड़े व्यावसायिक वर्ग से नजदीकी सम्बंध है, जो चीन के बाजार में बन रहे नयी संभावनाओं को हथियाना चाहते हैं। इसलिये चीन के साथ आॅस्ट्रेलिया के नजदीकी सम्बंधों की घोषणां से यह वर्ग टर्नबुल के पक्ष में लामबद्ध हो गया है। टर्नबुल की तरह वो भी मानते हैं, कि आॅस्ट्रेलिया की अर्थव्यवस्था के लिये चीन से सम्बंध भविष्य के लिये भी जरूरी है। इसलिये यह कहा जा सकता है, कि टर्नबुल का सत्तारूढ़ होना आॅस्ट्रेलिया मे आज भी चीन के लिये बड़ी संभावना है। वास्तव में यह सत्ता परिवर्तन एक व्यापारिक समझौता है।

चीन के साथ आॅस्ट्रेलिया के व्यापारिक समझौते से, न सिर्फ दोनों देशों के आर्थिक सम्बंधों का प्रभाव बढ़ेगा, बल्कि यह अमेरिका के ओबामा सरकार के ‘पिवोट टू एशिया‘ की रणनीति को भी प्रभावित करेगा, जिसका मकसद चीन की आर्थिक नाकेबंदी और सामरिक घेराबंदी है। माना यही जा रहा है, कि इस क्षेत्र में संघर्षों की नयी परिस्थितियां बन रही हैं। इस नजरिये से देखा जाये तो चीन के वित्तीय संकट के बाद भी वैश्विक वित्तीय ताकत और आॅस्ट्रेलिया का काॅरपोरेट जगत चीन के पक्ष में है।

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