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फिलिस्तीनी कवि हुस्साम मधून की कविता

imad-abu-shtayyehएक साल बाद – जंग के बाद हम हाजिर हैं

जंग के एक साल बाद हम हाजिर हैं।
हम जो जंग के बाद भी जिंदा हैं।
हम अभी भी खाते हैं और सोते हैं।
हम अभी भी काम पर जाते हैं, टीवी देखते हैं,
उन दोस्तों के पास जाते हैं जो अभी भी जिंदा हैं,
उन परिजनों से मिलते हैं जो बचे रह गये,
उन गलियों से गुजरते हैं जो अब पहचान में नहीं आतीं।
उन लोगों से मिलते हैं जो अब पहले जैसे नहीं रह गये।
कोई भी पहले जैसा नहीं रह गया।

जंग के बाद अपने घर के मलबे में
मुहम्मद अपनी बेटी का जन्मदिन मनाता है
जिस पर जंग के दौरान बम गिरा था।
वह याद करता है अपनी पत्नी और बेटे को,
एक दीवार और एक दरवाजे को,
एक बिस्तर और शान्त शामों को,
और उन यादों को जो जंग के साथ चली गयीं।

7 बरस की समीरा अपनी गुडि़या पकड़ने की कोशिश करती है,
लेकिन वह नहीं पकड़ सकती,
उसका हाथ जंग की भेंट चढ़ गया है।
अली की मां अभी भी छह लोगों का खाना बनाती है,
उसका शौहर उसे समझा नहीं पाता
कि उसके तीन बेटे जंग के साथ ही चले गये।
उसको अभी भी यकीन है कि वे लौटेंगे,
और जब वे लौटेंगे तो वे भूखे होंगे…
जंग के एक बरस बाद हम अब भी चायखाने जाते हैं
और पत्ते खेलते हैं,
बिना चीनी की अपनी काॅफी पीते हैं,
अपना हुक्का पीते हैं,
अपने फेसबुक पेज पर अपनी ताजा सेल्फी डालते हैं।
लेकिन हमारे फोटो एक बरस पहले जैसे नहीं रह गये।
रोशनी के बावजूद हमारे फोटो पर अंधेरा छाया रहता है।
जंग के बाद कोई भी चीज पहले जैसी नहीं रह गयी।

और मेरे दोस्त जंगें भी कई तरह की हैं।
आसमान से, जमीन से और समुद्र से।
आसमान से जंग में बमबारी हर ओर से आती है,
आप यह बता नहीं सकते कि वह कब और कहां आयेगी,
इसलिये आप छिप नहीं सकते, और आप बुत बने रहते हैं,
मौत के इंतजार में अपने चेहरे पर अजीबोगरीब जबरन मुस्कान ओढ़े।

जमीनी जंग में भी आप नहीं जानते कि गोले कब और कहां से आयेंगे
इसलिये एक बार फिर से आप छिप नहीं सकते,
और आप बुत बने रहते हैं,
मौत के इंतजार में अपने चेहरे पर अजीबोगरीब जबरन मुस्कान ओढ़े।

मेरे दोस्त, जंग बहुत अजीबोगरीब चीज है जिसके बारे में बता पाना
बहुत मुश्किल है।
जंग ख़त्म होती है और आपको लगता है कि आप बच गये।
लेकिन थोड़ी देर बाद आपको एहसास होता है कि
आपके भीतर तो जंग अभी भी जारी है,
जो आपका पीछा करती है
आपके ख्वाबों में,
आपके इर्द-गिर्द मची तबाही में,
अंत्येष्टियों और गलियों-बाजारों में उदास चेहरों में,
उनके गमों में जिन्होंने अपने प्रियजनों को खो दिया।

जंगें आसानी से खत्म नहीं होतीं या पीछा नहीं छोड़तीं।
अचानक आपका 11 बरस का बेटा बिस्तर गीला करने लगता है,
और आपकी बीवी को दुःस्वप्न आने लगते हैं,
आपको भी आते हैं, लेकिन आप स्वीकार नहीं करते।

आपकी होशियार बेटी को स्कूल में बहुत कम नम्बर मिलते हैं,
और वह इसका कारण नहीं जान पाती।
अचानक आपका दयालु और अच्छा पड़ोसी
अपनी बीवी और बच्चों पर दिन-रात चिल्लाना शुरू कर देता है
और कोई उसको रोक नहीं पाता है।
आपका बड़ा बेटा एक अजीब आवाज के साथ घबड़ाकर उठता है
दरवाजे पर दस्तक होती है, एक कप गिरकर चूर-चूर हो जाता है,
सड़क पर एक तेज गति की कार के पहिये आवाज करते हैं।

जंग के बाद कुछ भी पहले जैसा नहीं रह जाता।
जंग से पहले कोई भी आधे तबाह हुए घरों में नहीं रहता था
या स्कूलों में पनाह नहीं लेता था।
जंग के पहले बच्चे या औरतें
कूड़े के ढेर में कुछ खाने के लिये नहीं ढूंढ़ते थे।

जंग से पहले नहीं दिखते थे
हजारों भिखारी – बच्चे, युवा, महिलायें और पुरूष और वे भी
हर उम्र के।
जंग के पहले 50 हजार लोग बेघर नहीं थे।
जंग के पहले खौफ खाने वाले,
दुःस्वप्न के शिकार, बिस्तर गीला करने वाले,
सोने में परेशान या बेचैन हो जाने वाले
8 लाख बच्चे नहीं थे।
जंग के पहले… जंग के पहले… जंग के पहले…
और जंग के बाद?????????!!!!!!!!!

-हुस्साम मधून

लहु और इस्पात से फूटता गुलाब’ से साभार
संपादक – सत्यम
अुनवादक – आनन्द सिंह एवं संजय श्रीवास्तव
प्रकाशक – परिकल्पना प्रकाशन, लखनऊ, उत्तर प्रदेश

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One comment

  1. मन क्लांत कर देती है। ‘द काईट रनर’, ‘थाउजैंड स्प्लैंडिड सन्स’ और ‘एंड द माउंटेन ईकोड’ पढ़ने के पश्चात् ऐसा लगा कि इन उपन्यासों का सीक्वेल पढ़ रहा हूं। ऐसा लगा कि ‘आलैन’ की नाव यदि पार लग जाती और वह यदि जीवित रह जाता तो वह भी सामान्य नहीं रहता, रातों को बिस्तर गीला कर देता, हड़बड़ा कर रातों को उठ जाता,,,,

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