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नूर मुहम्मद नूर की तीन गज़लें

NOOR JI1.

हर घड़ी रिश्ता ग़मो से जोड़ता है रातदिन
कौन है मुझमें, जो मुझको तोड़ता है रातदिन
वह जो दिखलाता है सबको आईना या यूँ कहो
मैं वो शीशा हूँ जो पत्थर तोड़ता है रातदिन
ताकि कल गुल लहलहा उठ्ठें इसी उम्मीद पर
खून से लथपथ वो सहरा कोड़ता है रातदिन
आज भी तो जंगलों में मुफलिसी के चार सू
भूख का काला हिरण इक दौड़ता है रातदिन
एक सर हैं करोड़ो सर, सरों की सरगुज़श्त* (आत्मकथ्य)
नूर नाहक तो नही सर फोड़ता है रातदिन ||

 

2.

उम को हर दिन उबाल कर मालिक
हर घड़ी मत हलाल कर मालिक
तेरे नौकर हैं, ठीक हैं, फिर भी
थोड़ा ढंग से सवाल कर मालिक
कल जो आंधी है कल जो दहशत है
कल का कुछ तो ख्याल कर मालिक
आज जो कह दिया , कहा लेकिन
कल से कहियो संभाल कर मालिक
मोच आजाये ना बुलंदी में
राह चल देखभाल कर मालिक
इन अंधेरों को नूर होना है
तेरी हस्ती उछाल कर मालिक

 

3.

अब ये करतब भी करिशमा भी दिखाओ लोगो
देश को देश के लोगो से बचाओ लोगो
सारे मकतूल भी क़ातिल भी हैं, अपने घर के
अपने घर-बार को मकतल न बनाओ लोगो
अब जो बोया है वही काटना होगा सबको
लो ! ये नफ़रत है ये दहशत इसे खाओ लोगो
अपने धर्मों से कहो कुछ तो मुहब्बत सीखें
अब ये जोख़िम भी सरेआम उठाओ लोगो
एक जंगल के अंधेरे में खड़ी है दुनिया
अब तो मिलजुल के कोई आग जलाओ लोगो
फिर से बन जाएंगे ये दैरोहरम टूट के भी
टूट कर दिल न जुड़े दिल को बचाओ लोगो ||

-नूर मुहम्मद नूर

 

परिचय:

वैसे तो नूर मुहम्मद नूर किसी पहचान-परिचय के मोहताज नहीं फिर भी नूर जी ग़जलकार, कवि, आलोचक एवं संपादक हैं | आपका जन्म १७ अगस्त १९५४ में गाँव महासन, जिला –देवरिया (आजकल कुशीनगर) उत्तर प्रदेश में हुआ था |

हिंदी के साथ –साथ उर्दू, अरबी, बांग्ला के साथ –साथ अंग्रेजी में भी आप समान अधिकार रखते हैं और लिखते हैं |

दो दर्जन से अधिक कहानियां, पचास से अधिक पुस्तकों की समीक्षा, आलोचना लेख , सैकड़ों कविताएँ , व्यंग्य आदि सभी साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित | अब तक चार ग़जल संग्रह प्रकाशित और दस से अधिक पुस्तकें प्रकाशाधीन हैं |

दक्षिण–पूर्व रेलवे मुख्यालय कोलकाता के दावा विधि विभाग से प्रधान लिपिक पर से पिछले वर्ष सेवामुक्त होकर इनदिनों स्वतंत्र रूप से लेखन कार्य में व्यस्त | कोलकाता से प्रकाशित साहित्यिक पत्रिका ‘पैरोकार’ के प्रधान संपादक |

प्रस्तुति:- नित्यानंद गायेन

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