कुआं

यह पानी के लिये निरर्थक श्रम की ऐसी कहानी है, जो पूरा न हो कर भी सिर्फ इसलिये पूरी है, कि पानी के बिना आदमी जी नहीं सकता। इसलिये अंतिम सांस तक जीने की लड़ाई तो हमें लड़नी ही होगी। यह लड़ाई उस जमीन और उस मौसम से है, जिसमें पानी नहीं है – मगर बारिश होती है। इसलिये पानी है! पानी को अपना बनाने की लड़ाई एक गहरा कुआं है।

यह कहानी में नहीं है, मगर निजी कम्पनियां बड़ी बेरहमी से पानी को छीनने में लगी हैं।

-संपादक

011920_600मैं एक बोलिवियन लैफ्टिनेंट हूं, नाम है मिगुऐल माजाया। बेरीबेरी रोग के चलते मैं फिलहाल यहां ताइरेरी अस्पताल में पचास दिनों के लिये कैद सा हो गया हूं। यह बीमारी इतनी गम्भीर नहीं थी, कि मुझे अपना पुश्तैनी शहर और अपने लिये आदर्श जगह ला पाज को छोड़ना पड़ता।

मैं सक्रिय मिलिट्री सेवा में ढाई साल से ज्यादा समय रहा हूं, पर न तो पिछले साल लगी गोली का घाव और न ही यह अव्वल दर्जे की बीमारी -जिससे मैं पीडि़त हूं- सेना से मुझे अवकाश दिला सकी।

सो, इस बीच मैं उन असंख्य बीमारों के बीच, जो अस्पताल में एक से अल्प पहनावे में भूत से लगते हैं, घूमते-घूमते उकता गया हूं। चूंकि मेरे पास इस नरक की इन दुश्वार घडि़यों मे पढ़ने के लिये कुछ नहीं है, इसलिये मैं अपने-आप को अपनी डायरी पढ़कर सुनाता रहता हूं। धुंधले अनुभवों को पेज-दर-पेज दर्ज करते हुए, मैं डायरी में एक ऐसे कुएं की कहानी लिखने में सफल हो पाया हूं, जो अब पेरागुअनों के कब्जे में है।

पर मेरे लिये, यह कुआं अब भी हमारा है, बोलिवियन है, शायद इसने हमें जो भयानक परेशानियां दुख दिये हैं, उन्हीं के कारण। इसके आस-पास और इतनी गहराइयों के भीतर एक दर्दनाक नाटक खेला गया। इसके दो भाग हैं। पहला इसकी खुदाई के दौरान का, दूसरा इसके तल में। मेरी डायरी में यह कहानी इस प्रकार दर्ज है-

15 जनवरी 1966

झुलसाने वाली गरमी का मौसम। चाको के इस हिस्से में बहुत बारिश होती है और जो थोड़ी बहुत बारिश हुई थी, उसका पानी भाप बन कर उड़ गया। उत्तर या दक्षिण, दायें या बायें, दूर-दूर तक जहां तक नजर जाये, जंगलों के अवास्तविक नंगेपन में भटकने पर भी पानी की कोई बूंद तक नजर नहीं आती। कुंठित ठूंठ, जो कभी पेड़ों के तने रहे होंगे, चांपे हुए कंकालों की तरह खड़े हुए हैं, जैसे इस बंजर जमीन पर पड़े रहने के लिये अभिशप्त हों। कहीं पानी की बूंद भी नहीं। किंतु यह सब भी आदमी को लड़ाई के दौरान यहां रहने के लिये नहीं रोक पाता।

हम जिंदा हैं। कमजोर, दयनीय, समय से पहले बुढ़ा चुके, उन पेड़ों की तरह जिन पर पत्तियों से ज्यादा टहनियां हो। उन आदमियों की तरह जो घृणां से ज्यादा प्यास से भरे हुए हैं।

मेरे नियंत्रण में 20 आदमी हैं। हम खाई खादने वालों की रेजीमेंट की एक टुकड़ी हैं। हमने यहां लोआ किले के पास एक हफ्ते पहले पड़ाव डाला है। हमें यहां सड़क काटने के काम पर लगाया गया है।

पहाड़ कांटेदार है और घने पीले झाड़-झांखाड़ से ढका है। यहां पानी नहीं है।

हमारे सामने की तरफ, हमारी रेजीमेंट ने पहाड़ी पर कब्जा कर लिया है, अभी इस इलाके की रक्षा कर रही है।

17 जनवरी

शाम के करीब, धूल के बादलों के बीच, पानी का ट्रक आया। इसका मडगार्ड टूटा हुआ था, विंडशील्ड गायब थी और एक बत्ती धूल से ढंक गयी थी।

अपने काले पीपों को ठेलता हुआ यह बूढ़ा ट्रक ऐसा लग रहा था, जैसे भूचाल से निकल कर आ रहा हो। पसीने से चमकते हुए इसके ड्राइवर की कमीज के बटन कमर तक खुले हुए थे, जिससे उसकी गीली छाती बाहर झांक रही थी।

‘‘तालाब सूख रह है‘‘ आज उसने यह घोषणा उछाली, ‘‘और रेजीमेंट के लिये पानी के राशन में कटौती करनी पडेगी।‘‘ उसने मुझे यह खबर भी दी कि उधर प्लेटानिलास में हमारी टुकडियों को और आगे भेजने की योजना बनायी जा रही है। इस खबर से सैनिकों में टिप्पणीबाजी शुरू हो गयी। उनमें से एक, पोतोसी के रहने वाले छोटे कद के, हथौड़े की तरह काले और मजबूत चाकौन ने असली सवाल उठाया, ‘‘क्या वहां पानी होगा?‘‘

‘‘यहां से कम‘‘ जवाब आया।

‘‘यहां से कम? तो क्या हम रेगिस्तानी पौधों की तरह हवा पीकर जिंदा रहेंगे?‘‘

एक पीपे का ढक्कन खोलते हुए ड्राइवर ने दो गैसोलीन कैनों को पानी से भरा। एक पकाने के लिये और एक पीने के लिये। फिर ट्रक धूल उड़ाता चला गया।

हमेशा पानी की कुछ बूंदें जमीन पर टपक जाती थीं और उसे गीला कर देती थीं। सफेद तितलियों के झुंड इस नमी को सोखने के लिये भिनभिनाने लगते थे।

कभी-कभी मैं अपनी गर्दन के पिछले हिस्से पर पानी की छपकियां मारता था और कई मधुमक्खियां -मैं नहीं जानता वे कैसे जिंदा रहती थीं- मेरे बालों में उलझ जाती थीं।

21 जनवरी

पिछली रात बारिश हुई। दिन में गर्मी ने हमें गर्म रबड़ के कपड़े की तरह ढक लिया था। रेत पर सूरज की चैंध, अपनी सफेद चमक से पगला रही थी। पर छह बजे पानी बरसा। हमने कपड़े उतार दिये और अपने तलुओं के नीचे और पैर की उंगलियेां के बीच गर्म कीचड़ को महसूस करते हुए भीगते रहे।

25 जनवरी

फिर वही गर्मी। फिर वहीं चुंधिया देने वाली चमक और हमारे बदन पर हंटर बरसाता हुआ सूखापन। मैं सोचता हूं कि कहीं एक खिड़की खोली जानी चाहिये, जिससे हवा भीतर आ सके। आसमान पत्थर की एक बड़ी सिल की तरह है, जिस पर सूरज धंस गया है।

हम कुदाल-फावड़े ढोते हुए जी रहे हैं। हमारी बंदूकें हमारे तंबुओं में धूल से पटी पड़ी हैं। और हम केवल मजदूर हैं, पहाड़ को सीधी रेखा में काटते जा रहे हैं, तपिश से झुलसे, उलझे हुए झाड़-झंखाड़ो के बीच से रास्ता निकाल रहे हैं। क्यों? हम भी नहीं जानते। सूरज ने सबकुछ जला डाला है। घास का एक मैदान जो कल सुबह पीला था, आज सलेटी हो गया है। घास झुलस गयी है, चपटा गयी है, केवल इसलिये कि सूरज उसके ऊपर से गुजर गया है।

भट्ठी की तरह तपती इस पहाड़ी में सुबह ग्यारह बजे से दोपहर तीन बजे तक काम करना असंभव है।

इन घंटों के दौरान, मैं किसी घनी छांह की व्यर्थ तलाश के बाद, किसी पेड़ की सूखी टहनियों की काल्पनिक छांह के नीचे लेट जाता हूं।

मिट्टी, नमी से मिलने वाली मजबूती के अभाव में, एक सफेद मौत की तरह उड़ती है और पेड़ के तनों को अपने धूल भरे आलिंगन में ले लेती है। सूरज की किरणें पास के मुर्दों की भांति फैले हुए चारागाह की सतह पर चुंबकीय कंपन पैदा करती हैं।

शिथिल, अवसन्न, रोजाना के बुखारों की निर्जीवता में घिरे हुए, गर्म जड़ता में डूबे हुए -जिसे केवल टिड्डियों का न थकने वाला शोर ही वेध पाता था- हम वहां पड़े हुए थे। तपिश टिड्डियों के शोर में भी रिस आती थी, जो पूरे जंगल मे गूंजता रहता था और वातावरण को गहरा बनाये रखता था।

हम, इन सब पगला देने वाली आवाजों के बीच निःशब्द विचारहीन जी रहे थे। घंटों रंगहीन आकाश में गिद्धों की चुप धीमी उड़ान को देखते रहते थे, जो मेरी नजर में अंतहीन फैले हुए कैनवास पर छपे हुए परिदों की तरह लगते थे। समय-समय पर दूर से फायरिंग की आवाजें आती रहती थीं।

1 फरवरी

तपिश हमारे शरीरों पर कब्जा कर उन्हें धरती की निर्जीव जड़ता का हिस्सा बना रही थी, धूल और बुखार में अस्तित्व को सिमटा रही थी। हमारी त्वचा पर भट्ठियों की तरह पसीजती टार्च से पैदा होने वाला कष्ट ही हमारी चेतना में था। केवल रात मे ही हम अपने आपे में होते थे। रात आती थी आखिर में नींद की इच्छा साथ लिये। हालांकि जानवरों की चीखों, सीटियों, चहचहाने और लगातार आने वाली कराहों से झुंझलाहट होती थी। अनेक प्रकार की अनजान आवाजें पहाड़ों और मैदानों से आती रहती थीं।

रात, फिर दिन। दिन में हम चुप लगाये रहते थे। किंतु रात को मेरे सैनिकों के शब्द वापस आते थे। उनमें से कुछ वास्तव में दिग्गज थे, जैसे कि निकोल्स पेडरोजा, एक बेलीग्रान्डीनो जो चाको में 1960 से था। उसे मलेरिया था, वह पीला पड़ चुका था और खोखले तने की तरह सूख चुका था।

‘‘वे कहते हैं, कि पेरागुअन हमारे इलाके की तरफ बढ़ रहे हैं‘‘ चाकोन ने घोषणा की।

‘‘यहां निश्चित तौर पर कहीं पानी नहीं है‘‘ पेड्रेजा ने अधिकारपूर्वक कहा। ‘‘किंतु पेरागुअन पहले ही उसे ढूंढ चुके हैं। वे पहाड़ों को किसी से भी ज्यादा जानते हैं‘‘ जो ट्रुस्टा ने विरोध किया। वह ला पाज का रहने वाला एक मजबूत आदमी था, जिसकी आंखें बेध डालने वाली थीं।

इसके बाद कोकपाबाम्बा से आये एक सैनिक ने -जिसे स्मोकी कहा जाता था- उत्तर दिया-

‘‘हां, लोग यही कहते हैं, मैं जानता हूं… किंतु जो पैरागुअन ट्रूपर हमें सिकट के पास प्यास से मरा पड़ा मिला था, जबकि तालाब ज्यादा दूर नहीं था, उसके बारे में क्या कहेंगे लैफ्टिनेंट?‘‘

‘‘हां, ठीक है‘‘ मैंने स्वीकार किया। ‘‘और काम्पास के सामने भी तो एक मिला था, जो जहरीले नींबू खाने से दम तोड़ चुका था।‘‘

‘‘लोग भूख से नहीं मरते। पर प्यास उन्हें निश्चित तौर पर मार देती है। मैंने दस नवम्बर की लड़ाई के बाद सिकट चारागाह में अपने कुछ आदमियों को कीचड़ चूसते देखा है।‘‘

इस तरह किस्से और बातें पर्त-दर-पर्त जमते जाते थे। वे चारागाह के ऊपर बढ़ने वाली उस हवा की भांति गुजर जाते थे, जो उसमें कंपन भी पैदा नहीं कर पाती।

6 फरवरी

फिर पानी बरसा। पेड़ कुछ ताजादम लगे। हमारे पास पानी से बने चहबच्चे थे, पर रोटी और चीनी नहीं थी। क्योंकि सप्लाई ट्रक कीचड़ में फंस गया था।

10 फरवरी

वे हमें करीब 20 किलोमीटर आगे बढ़ा रहे हैं। जो सड़क हमने काटी थी उसका इस्तेमाल नहीं होगा। हमें एक और सड़क काटने को कहा गया है।

पसीने से भीगा ट्रक का ड्राइवर बुरी खबर लाया है। ‘‘हमारा पानी का तालाब सूख चुका है। अब हमें ला चाइना से पानी लाना पड़ेगा।‘‘

26 फरवरी

कल एक बूंद भी पानी नहीं था। सप्लाई-सिस्टम टूट रहा है, क्योंकि ट्रकों को काफी दूरी तय करनी पड़ती है। कल, पूरे दिन पहाड़ में फावड़ा चलाने के बाद हम सड़क पर खड़े ट्रक का इंतजार करते रहे। सूरज की आखिरी गुलाबी रोशनी मेरी टुकड़ी के आदमियों के धूल सने चेहरों पर पड़ रही थी। पर ट्रक की जानी-पहचानी आवाज सुनाई नहीं दी।

आज सुबह आखिरकार पानी का ट्रक आया। पीपों के पास हाथों, घड़ों और बर्तनों की खनखनाहट थी, जो रंजिश में एक-दूसरे से टकारा रहे थे। आपस में मुठभेड़ भी हो गयी, और मुझे दखल देना पड़ा।

1 मार्च

एक छोटे कद का तुर्रामिजाज लेफ्टिनेंट हमारी चैकी पर आया। उसने मुझसे पूछा कि मैं कितने आदमी दे सकता हूं।

‘‘मोर्चे पर हमारे पास कतई पानी नहीं है‘‘ उसने बताया। ‘‘तीन दिन पहले मेरे तीन आदमियों को लू लग गयी। हमें कुंओं की खोज करनी चाहिये।‘‘

‘‘वे कहते हैं कि ला चाइना में कुएं खोदे गये हैं।‘‘

‘‘तो क्या उन्हें पानी मिला।‘‘

‘‘हां, कुछ तो मिला।‘‘

‘‘यह किस्मत की बात है।‘‘

‘‘यहां भी, लोआ के पास, उन्होंने कुएं खोदने की कोशिश की थी।‘‘

इसके बाद पेड्रेजा ने, जो सुन रहा था, बताया कि सालों पहले यहां से पांच किलोमीटर दूर वास्तव में खुदाई हुई थी। कुछ मीटर खोदा, फिर छोड़ दिया गया। शायद जो लोग पानी ढूंढ रहे थे, वे कहीं और चले गये। पेड्रेजा सोचता है कि हमें कुछ और गहरा खोदना चाहिये।

2 मार्च

पेड्रेजा ने जो जगह बतायी थी, वहां हमने खोज की। वहां पर एक ऊंचे पेड़ के पास झाड़-झंखाड़ों से घिरा एक गड्ढा वास्तव में था। लेफ्टिनेंट ने कहा कि वह हैडक्वाटर को खबर करेगा। इस दोपहर हमें तब तक खुदाई करने के आदेश दिये गये जब तक पानी न निकल आये। मैंने इसके लिये पांच खुदाई वाले चुने, पेड्रेजा, टरूस्टा, चाकौन, स्मोकी और चार इंडियन।

3 मार्च

गड्ढा करीब पांच मीटर चैड़ा और इतना ही गहरा है। जमीन सीमेंट की तरह कठोर है। हमने इस जगह तक रास्ता साफ किया और पास ही में डेरा डाल दिया। आज हम सारा दिन खुदाई करने वाले हैं, क्योंकि तपिश कुछ कम हो गयी हैं

सैनिक, कमर तक नंगे, पसीने में मछली की तरह चमकते हैं। पसीने के परनाले सांप की तरह उनकी छाती पर बहते हैं। वे कुदालों को गड्ढे में उछाल देते हैं और फिर चमड़े की रस्सी से नीचे उतर जाते हैं।

10 मार्च

बारह मीटर। ऐसा लगता है कि हम पानी तक पहुंचने ही वाले हैं। जो मिट्टी हम खोद रहे हैं, वह ज्यादा-से-ज्यादा नम होती जा रही है। हमने कुएं में एक तरफ लकड़ी के तख्ते ठोंक दिये हैं, और मैंने एक सीढ़ी बनाने का हुक्म दिया है जिससे एक पुल्ली की मदद से मिट्टी बाहर निकाली जा सके। सैनिक बारी-बारी से काम करते हैं और पेड्रेजा निश्चिंत है कि एक सप्ताह के भीतर पानी निकल आयेगा।

22 मार्च

मैं कुएं में नीचे उतरा था। जैसे तुम इसमें उतरते हो, तुम्हें ठोस को भेदते हुए जिंदा शरीर की अनुभूति होती है। सूरज की रोशनी से परे, एक ऐसी अजीब हवा से सामना होता है, जिसमें मिट्टी की गंध रची-बसी होती है। ज्यों ही मैं अंधेरी गहराइयों में उतरा और सपाट जमीन को अपने पांव से छुआ, एक तीखी ठंडक ने मुझे लपेट लिया। मैं करीब 18 मीटर गहराई में हूं।

जब मैं ऊपर देखता हूं, तो एक काली अंधेरी नली जैसा दिखाई पड़ता है, जिसके मुहाने पर सूरज की रोशनी ढकी है। तली में जमीन पर कीचड़ है और कुएं को हाथ से छूने पर भरभरा कर मिट्टी गिरती है। मैं कीचड़ में लथपथ बाहर आया। मच्छरों के एक झुण्ड ने तत्काल मुझ पर हमला बोल दिया और तब तक काटते रहे जब तक मेरा पैर सूज नहीं गया।

30 मार्च

अजीब बातें हो रही हैं। दस दिन पहले तक कुएं से गीली कीचड़ निकल रही थी, पर अब फिर सूखी मिट्टी निकलने लगी है। मैं एक बार फिर कुएं में उतरा। वहां नीचे मिट्टी की गंध फेफड़ों को जकड़ लेती है। कुएं की दीवार को छूने पर नमी का अहसास होता था, पर जब मैं तली पर पहुंचा तो समझ आया कि हम गीली मिट्टी की एक पतर से होकर नीचे बढ़े हैं। मैंने खुदाई रोकने का आदेश दे दिया। मैं देखना चाहता था कि शायद कुछ दिनों में पानी रिस कर इकट्ठा हो जाये।

12 अप्रैल

एक हफ्ते बाद भी कुएं की तली सूखी-की-सूखी है। इसके बाद फिर खुदाई शुरू हुई और आज मैं चैबीस मीटर नीचे उतरा। कुएं में नीचे की तरफ अंधेरा ही अंधेरा है। जमीन, ठोस जमीन जो एक मौन कंपकपा देने वाली मजबूती के साथ अपने पंजे तुम्हारी गर्दन में गड़ा देती है। जब मैंने कुएं की दीवाल पर कुदाल से ठोका तो एक जवाबी आवाज आई जो बिना गूंजे मेरे दिल के कोनों को ठकठकाती रही।

28 अप्रैल

मुझे लगता है, हमारी पानी की खोज असफल हो गयी है। हमें यह बेकार का काम रोक देना चाहिये। यही सोच कर मैंने हैडक्वार्टर एक अर्जी भेजी है। मुझे कल पेश होने के लिये कहा गया है।

29 अप्रैल

‘‘कैप्टन‘‘ मैंने अपने से बड़े अफसर को कहा, ‘‘हम तीस मीटर गहरा खोद चुके हैं, पर पानी मिलने की कोई सूरत नजर नहीं आ रही।‘‘

‘‘पर हमें हर कीमत पर पानी चाहिये‘‘ उसने जवाब दिया। ‘‘तब फिर किसी और जगह खुदाई की जाये।‘‘

‘‘न कतई नहीं। जहां शुरू किया वहीं खोदते रहो। तीस-तीस मीटर के दो कुएं हमें पानी नहीं दे सकते। पर हो सकता है एक में चालीस मीटर खोदने पर पानी मिल जाये।‘‘

‘‘ठीक है, कैप्टन।‘‘

‘‘और फिर, शायद पानी निकलने ही वाला हो।‘‘

‘‘ठीक है, कैप्टन।‘‘

‘‘शाबााश, थोडा और प्रयास करो। हमारे आदमी प्यास से मर रहे हैं।‘‘

लेकिन, हम केवल प्यास से नहीं मर रहे थे। बल्कि रोज-रोज की यातना सह रहे थे। यह अंतहीन यातना थी। एक आदमी को एक जग पानी दिया जाता था। मेरे सैनिकों को बाहर की बनिस्पत कुएं में ज्यादा प्यास लगती थी, क्योंकि वहां धूल थी और खुदाई भी मुश्किल थी। किंतु खुदाई जारी रहनी चाहिये।

मैंने अपने आदमियों को अफसर का आदेश सुनाया। उन्होंने अधीरता से उसका विरोध किया। मैंने एक अफसर होने के नाते उनकी अधीरता को कम करने के लिये कोका पौधे और पानी के राशन में बढ़ोत्तरी कर दी।

3 मई

काम जारी है। यह कुआं हमारे बीच एक भयानक शख्सियत हासिल कर रहा है, वास्तविक और तोड़ देने वाली। खुदाई करने वालों पर अनदेखा कब्जा कर रहा है। वे उसी धुतहा क्रम में जीते हैं, एक धुंधली आशा की गिरफ्त में। एक ऐसा लोभ जो उन्हें रोशनी के बिना कीड़े-मकोड़ों की तरह काम करने पर मजबूर कर रहा है। जब भी मैं उनकी तरफ देखता हूं, एक भयानक सिहरन होती है। उनकी आंखों, पलकों, कानों, नथुनों पर मिट्टी बैठ चुकी है। बाल मिट्टी से सफेद हो चुके हैं। लगता है उनकी आत्मायें चाको मिट्टी से लिथड़ गयी हैं। वे हाड़-मांस के नहीं, बल्कि मिट्टी के ढेलों से बने दिखाई पड़ते हैं।

24 मई

हम कुछ मीटर और गहरे गये हैं। काम धीमा है। एक सैनिक नीचे कुएं में मिट्टी खोदता है, दूसरा पुल्ली चलाता है। और मिट्टी गैसोलीन के कैन से बनाई गयी बाल्टी से ऊपर आती है। सैनिक नीचे हवा की कमी की शिकायत कर रहे हैं। जब वे खोदते हैं, माहौल का दबाव उनकी पसलियां कड़कड़ाता है। यह दबाव उनके पैरों के नीचे, आस-पास, ऊपर पूरे कुएं में, तपती रात की तरह खिंचा हुआ है। बेरहम, बोझिल, दमघोंटू, लोहे सा भारी एक बोझ खोदने वाले पर हावी रहता है, उसे अंधेरे में दफन करता हुआ।

वे अपने जग से गरम गंदला पानी पीते हैं और फिर दुबारा मांगते हैं। क्योंकि न बुझने वाली प्यास खुदाई करने वाले के फेफडों पर जहरीली नागफनी की तरह बैठी रहती है। वह कुएं में अपने नंगे पैरों से गर्म धूल में उस गीले सौंधेपन की तलाश करता है, जो दूर उसके गांव के खेतों में उसके पैरों पर लिपटा रहता था। याद अब भी उसकी छुअन में है।

और फिर वह कुदाली से खोदता है, खोदता है, जबकि मिट्टी गिरती जाती है उसके पैरों पर, पलकों पर। पर वह पानी कभी नहीं नजर आता, जिसके लिये हम सभी अपनी जान दे रहे हैं।

5 जून

हम चालीस मीटर गहराई तक पहुंचने वाले हैं। अपने सैनिकों का उत्साह बढ़ाने के लिये मैं खुद कुएं में उतरा और कुछ खुदाई की। कुएं में उतरते हुए मुझे लगा कि मैं किसी अंतहीन गुनगने सपने में उतर रहा हूं। यहां कुएं की तली में मैं अपने आप को सबसे जुदा महसूस करता हूं। लड़ाई दूर है और खत्म न होने वाला विनाश भी कोसों दूर। यहां रोशनी की एक झलक भी नहीं है। हवा का बोझिलपन मेेरे शरीर को कुचलने लगता है। अंधेरे की शिला मेरे ऊपर गिर जाती है और मुझे बाकी इंसानियत से अलग कर देती है।

मैंने खोदने की कोशिश की। तेजी से कुदाल चलाते हुए समय की गति को तेज करने की जी-जान से कोशिश की। पर इस नरक में समय ठहरा हुआ है, रूक गया है। जब समय का बीतना, रोशनी में बदलाव से तय नहीं होता, तो इस अंधेरे कूप में समय ऐसे ही बेकार होता है जैसे मेरे पैरों पर झरती यह गर्म धूल। यहां रोशनी मर जाती है। यहीं उस विशाल पेड़ की जड़ें हैं, जो रात को उग आता है और धरती को अपनी डरावनी गिरफ्त में ले लेता है।

16 जून

अजीब बातें हो रही हैं। कुएं की तल में सिमटा अंधेरा कमरा, हमारे सपनों में पानी की तस्वीरें बनाता है। पानी के साथ हमारा मोह एक अजीब और रूमानी संसार गढ़ रहा है, जो जमीन में एकतालीस मीटर तक जाकर खत्म हो जाता है।

स्मोकी ने मुझे इस बारे में बताया। कल वह कुएं की तली में सो गया और उसने चमकदार सांप की चमक देखी। उसने उसको पकड़ा किंतु वह फिसल गया, और कुएं की दीवार पर ऐसे ही कई सांप बुलबुलों की तरह निकलने लगे, लगा वे जादुई सांप हैं, और ठोस नहीं बल्कि उस पानी की धार की तरह तरल हैं जिसकी सतह पर स्मोकी तैरता रहा जब तक उसकी नींद नहीं खुली। उसे लग रहा था कि हर पेड़ एक फव्वारा बन गया है। चारागाह गायब था, उसकी जगह ठंडे पानी की एक हरी झील थी, जिसमें हमारे सैनिक पेड़ की घनी छावं के नीचे नहा रहे थे। उसे हमारे दुश्मनों को झील के दूसरे किनारे से फायरिंग करते देख हैरानी नहीं हुई, और न यह देख कर कि हमारे सैनिक हंसी के ठहाकों के बीच गोलियां पकड़ने के लिये पानी में कूद रहे हैं। वह केवल पानी पीना चाहता था। उसने झील में से निकलते फव्वारे में से पानी पिया और पानी की ठंडी परतों के बीच तैरता रहा। उसने पानी ही पानी पिया, पर उसकी प्यास इस पानी से जरा भी नहीं बुझी, जो सिर्फ नकली था, आंखों का धोखा था। पिछली रात स्मोकी बुखार में तपता रहा। मैंने उसे अपनी रेजीमेंट के प्राथमिक चिकित्सा स्टेशन भेजने क प्रबंध किया।

27 जून

डिवीजन के सी.ओ. ने इधर से गुजरते हए अपनी कार हमारे पड़ाव पर रूकवाई। उसने मुझसे बातचीत की। उसे यह मानना मुश्किल हो गया कि हम केवल एक बाल्टी और पुल्ली की मदद से करीब पैतालिस मीटर गहरा खोद चुके हैं। मैंने उसे बताया, ‘‘कर्नल, जब किसी सैनिक की बारी खत्म हो जाती है, तो हमें उसे बाहर बुलाने के लिये चिल्लाना पड़ता है।‘‘

बाद में, कोका पौधे और सिगरेटों की ताजा सप्लाई के साथ कर्नल ने एक बिगुल भी भेजा और इस तरह हम कुएं की खुदाई में लगे रहे।

हर बार ज्यादा अकेले, ज्यादा परेशान, अपने ख्यालों से लदे हुए मेरे आदमी खोदते रहे, खोदते रहे। वातावरण, जमीन, जिंदगी, खुद पर फावड़ा चलाते हुए, एक धीमी मौत की ताल पर।

4 जुलाई

क्या वास्तव में पानी जैसी कोई चीज होती है? जब से स्मोकी को सपना आया है, हम सब इसे देखते हैं। पेड्रेजा ने हमें बताया कि वह अचानक आयी पानी की बाढ़ में डूब रहा था, जो उसके सिर के ऊपर से निकल गयी। ट्रस्ट्रा बता रहा था कि उसकी कुदाल बर्फ की सिल से टकराई, और चाकोन ने कल सपने में जमीन के नीचे एक झील के अक्स देखे।

क्या पानी के स्त्रोतों का यह बहाव इतने दुख, इतनी तकलीफ, खोज, उत्सुकता और आत्मा की इतनी ज्यादा प्यास से आता है।

16 जुलाई

मेरे आदमी बीमार पड़ रहे हैं। वे कुएं में उतरने से मना कर रहे हैं। मुझे जोर देना पड़ा। उन्होंने मुझसे मोर्चे पर भेज देने की प्रार्थना की। मैं एक बार फिर कुएं में उतरा और डर से लबरेज, चैंका हुआ बाहर आया। हम करीब 50 मीटर तक पहुंच चुके हैं। माहौल अंधेरा और घुप अंधेरा होता जाता है, और शरीर को एक अजीब गड़ती हुई गिरफ्त में जकड़ लेता है। नीचे मिट्टी की परतें आदमी का दम घोंट देती हैं, और वह वहां एक घण्टे से ज्यादा नहीं टिक पाता। यह एक दुःस्वप्न बन गया है। यह चाको मिट्टी कुछ असाधारण, अभिशप्त है, भुतहा है।

25 जुलाई

हर घण्टे बाद खुदाई करने वाले को बुलाने के लिये कर्नल का दिया हुआ बिगुल कुएं के मुहाने पर बजाया जाता है। बिगुल की आवाज, नीचे गहराईयों में, हथौड़े की तरह कनपटियों पर बजती है। पर इस दोपहर बिगुल बजाने के बावजूद कोई बाहर नहीं आया।

29 जुलाई

आज चाकौन बेहोश हो गया। और जब उसे ले जाया जा रहा था, वह एक फांसी पर लटकाये गये आदमी की तरह लग रहा था।

5 सितम्बर

क्या यह काम कभी खत्म नहीं होगा? सैनिक खुदाई जारी रखे हैं, किंतु पानी मिलने की किसी आशा के बगैर, केवल एक अंधे, घातक, भुतहा उद्देश्य के लिये।

यहां ऊपर, यह कुआं युद्ध की तरह न टाला जा सकने वाला, न खत्म होने वाला और बेकार लगता है। कुएं से निकली मिट्टी के टीले बन गये हैं, जिन पर छिपकली और बिच्छू घूमते हैं। जब कोई खुदाई करने वाला सैनिक कुएं से निकलता है, पसीने और धूल से लथपथ, पलकें और बाल मिट्टी से सफेद, तो वह बाढ़ के बाद धरती में से निकलने वाले किसी प्रागऐतिहासिक दानव की तरह लगता है।

कुछ कहने, केवल कुछ बोलने के लिये मैं उससे पूछता हूं ‘‘कुछ मिला?‘‘ ‘‘कुछ नहीं, अब भी कुछ नहीं लैफ्टिनेंट‘‘ कुछ नहीं, केवल कुछ नहीं, हमारी लड़ाई की तरह। इस कुछ नहीं का कभी अंत नहीं होगा।

1 अक्टूबर

खुदाई रोकने के आदेश आ चुके हैं। सात महीनों की खुदाई के बावजूद हमारे हाथ गर्म धूल के सिवा कुछ नहीं लगा है।

इस बीच, आउट पोस्ट काफी बदल गयी है। कुछ केबिन बन गये हैं, और एक बटालियन कमांड स्टेशन बन गया है। हमें अब पूर्व में एक सड़क काटने जाना है, पर हमारा कैंप उसी जगह रहेगा।

कुआं भी रहेगा, बेकार, अपने चुप मुहाने और चकरा देने वाली आशाहीन गहराई के साथ। यह मनहूस कुआं हमारे बीच है, एक भयानक दुश्मन, हमारी घृणा से परे, एक घाव की तरह, यह बेकार है।

7 दिसम्बर (प्लातानिलोस अस्पताल)

हां, वह कुआं आखिरकार बेकार सिद्ध नहीं हुआ। मेरी याददास्त अब भी ताजा है, क्योंकि 4 तारीख को हमला हुआ था और वे मुझे 5 तारीख को यहां लाये थे। मैं मलेरिया से कांप रहा था।

जाहिराना तौर पर, मोर्चे पर बंदी बनाये ये सैनिकों ने ही पेरागुअनों को बताया होगा कि बोलिवियन तैनाती के पीछे एक कुआं है। प्यास से बेहाल, गुआरानी इंडियनों ने हम पर हमला बोलने की सोची होगी।

सुबह छह बजे पहाड़ी मशीनगनों की आवाज से कंपकपाने लगी। हमें महसूस हुआ कि हमें अगले मोर्चे की खाईयों पर हर हालत में कब्जा जरूर करना होगा क्योंकि पेरागुअनों की गोलाबारी हमसे दो सौ मीटर आगे थी। दो बम हमारे तंबू के पीछे गिरे।

मैंने अपने सैनिकों को उनकी धूल सनी राइफलें दीं और उन्हें एक बेहतर जगह तैनात कर दिया। तभी हमारा एक अफसर एक मशीनगन और कुछ सैनिकों के साथ हमारे पास पहुंचा। उसने उन्हें कुएं के बाईं तरफ पांत में तैनात कर दिया। हम कुएं की दाहिनी तरफ थे। कुछ सैनिकों ने मिट्टी के टीलों के पीछे पोजीशन ले ली। गोलियां अजीब सी आवाजों के साथ टहनियों पर बरसती रहीं। मशीनगन की दो लंबी फायरिंग ने एक बड़े पेड़ में छेद कर दिया। पेरागुअनों की गोलियों की बौछार पास आती गई। गोलियों की आवाजों के बीच उनकी जंगली चिल्लाहटें साफ सुनी जा सकती थीं। उन्होंने कुएं को अपने हमले की तेजी का निशाना बना रखा था। किंतु हम एक मीटर भी पीछे नहीं हटे, कुएं की ऐसे रक्षा करते रहे जैसे उसमें सचमुच पानी हो।

गोलियों की बौछार से धूल उड़ती रही, मशीनगन की गोलियां सिरों और छातियों को बेधती रहीं, किंतु हमने पांच घण्टे तक चली मुठभेड़ के बावजूद कुएं को नहीं छोड़ा।

दोपहर को मौत की सी चुप्पी छा गयी। दुश्मन वापस लौट चुका था। तब हमने लाशों को उठाया। पेरागुअन अपने पीछे पांच लाशें छोड़ गये थे, और हमारे आठ मरने वाले सैनिकों में स्मोकी, पेडराजा, ट्रस्टा और चाकौन शामिल थे। उनकी छातियां खुली हुई थीं और उनके खुले मुंह से धूल सने दांत दिख रहे थे।

गर्मी, एक पारदर्शी भूत की तरह पहाड़ी पर छाई हुई थी। कब्र खोदने की मेहनत से बचने के लिये, मैंने कुएं के बारे में सोचा।

तेरह लाशें कुएं के मुहाने तक खींच लायी गयीं, और धीरे से उन्हें कुएं के अंधेरे खालीपन में धकेल दिया गया। वे चकराती हुई अंधेरे में गायब हो गईं।

तब ऊपर से मिट्टी डाली गयी, ढेर सारी मिट्टी और धूल। पर तब भी, यह कुआं आज भी पूरे याको में सबसे गहरा है।

-आगस्टो सेस्पेडेस

लैटिन अमरीका की कहानियां’ से साभार

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